WWW.ACNTIMES.COM & : कवि और कविता https://acntimes.com/rss/category/Poem WWW.ACNTIMES.COM & : कवि और कविता en Copyright @ ACNTIMES.COM | All Rights Reserved | Webmaster : HARSH SHUKLA कवि और कविता : 'पानी के पेड़ पर जब बसेरा करेंगे आग के परिंदे...' &चंद्रकांत देवताले https://acntimes.com/Poet-and-Poetry-When-the-birds-of-fire-will-settle-on-the-water-tree-Chandrakant-Devtale https://acntimes.com/Poet-and-Poetry-When-the-birds-of-fire-will-settle-on-the-water-tree-Chandrakant-Devtale आशीष दशोत्तर 

कविता एक बेहतर इंसान को रचती है। कोई व्यक्ति बेहतर इंसान हुए बिना बेहतर कवि नहीं हो सकता। बेहतर होना आदर्श होने से कहीं अलग है। कविता इंसान को बेहतर बनाती है, उसे गढ़ती है और संवेदनशील बनाती है। यही कविता जब उस बेहतर इंसान से एकाकार हो जाती है तो वह असीम ऊर्जा से परिपूर्ण होती है और सीधे दिल पर असर करती है।

समकालीन कविता को अपनी रचनात्मकता से एक नई शैली और नया तेवर देने वाले कवि श्री चंद्रकांत देवताले की कविताएं एक ऐसा संसार रचती है जहां पर मनुष्यता के सभी पक्ष सामने उभरकर सामने आते हैं। देवताले जी अपनी कविताओं के ज़रिए आसपास बिखरी चीज़ों को उठाकर उन्हें इस खूबसूरती से जोड़ते हैं कि वह एक बेहतरीन कविता की शक्ल लेकर हमारे जीवन से वाबस्ता हो जाती हैं। 

अगर तुम्हें नींद नहीं आ रही तो मत करो कुछ ऐसा

कि जो किसी तरह सोए हैं 

उनकी नींद हराम हो जाए।

हो सके तो बनो पहरुए,

दुःस्वप्नों से बचाने के लिए उन्हें

गाओ कुछ शान्त मद्धिम

नींद और पके उनकी जिससे,

सोए हुए बच्चे तो नन्हें फरिश्ते ही होते हैं

और सोई स्त्रियों के चेहरों पर

हम देख ही सकते हैं थके संगीत का विश्राम

और थोड़ा अधिक आदमी होकर देखेंगे तो

नहीं दिखेगा सोये दुश्मन के चेहरे पर भी

दुश्मनी का कोई निशान।

अगर नींद नहीं आ रही हो तो

हँसो थोड़ा, झाँको शब्दों के भीतर

ख़ून की जाँच करो अपने कहीं ठंडा तो नहीं हुआ।

देवताले जी का जन्म 7 नवंबर 1936 को बेतूल जिले के जोलखेड़ा गांव में हुआ और निधन 14 अगस्त 2017 को हुआ। शिक्षा इंदौर में और 1952 में पहली कविता 'सुबह' बड़वाह में नर्मदा के किनारे लिखी। रतलाम से देवताले जी का विशेष जुड़ाव रहा। उनकी काव्य यात्रा का महत्वपूर्ण समय रतलाम का ही रहा। 1970 से 1983 की अवधि में वे रतलाम में रहे। उनके काव्य संग्रह जो देशभर में चर्चित हुए वे रतलाम में रहते हुए ही प्रकाशित हुए। 'हड्डियों में छिपा ज्वर' (1973), 'दीवारों पर ख़ून से' (1973), 'लकड़बग्घा हंस रहा है' (1980), 'रोशनी के मैदान की तरफ़' (1982) 'भूखंड तप रहा है' (1982) ये सब काव्य संग्रह उनकी साहित्य यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव की तरह रहे। 

बच्चों और युवाओं के भविष्य के लिए 

बहस में शामिल 

पिपलोदा के श्यामलाल गुरूजी सोच रहे हैं

इतने बड़े नेक काम के लिए याद किया गया उन जैसा,

वे अहोभाग्य समझकर सपनों की टूटी हड्डियाँ

अपने भीतर जोड़ रहे हैं,

पूरा राष्ट्र बहस में शामिल है

इसलिये इसे राष्ट्रीय बहस कहा गया,

और श्यामलाल गुरू जी ने भी दो शब्द कहे

पिपलोदा गाँव की कच्ची पाठशाला में

और सोच खुश हुए - उनके शब्द भी शामिल हुए

मुद्दों के राष्ट्रीय दस्तावेज़ में

श्यामलाल गुरू जी टाट पट्टियों और डस्टर के बारे में परेशान थे पूरी बहस के दौरान

और महीनों तक देखते रहे थे आसमान में

नयी टाट पट्टियों की उड़ान।

 इसके बाद  इतनी पत्थर रोशनी’ (2002), ‘उजाड़ में संग्रहालय’ (2003), ‘जहाँ थोड़ा सा सूर्योदय होगा’ (2008), ‘पत्थर फेंक रहा हूँ’ (2011) उनके प्रमुख काव्य-संग्रह हैं। ‘मुक्तिबोध: कविता और जीवन विवेक’ उनकी आलोचना पुस्तक के अतिरिक्त उन्होंने ‘दूसरे-दूसरे आकाश’ और ‘डबरे पर सूरज का बिंब’ का संपादन किया है।इन संग्रहों की कविताओं में रतलाम पूरी तरह मौजूद है। यहां के आदिवासी अंचल की व्यथा, सड़क पर बालम ककड़ी बेचती महिला का चित्रण, आम आदमी के जीवन संघर्ष और कई सारे दृश्य उनकी कविता में मिलते हैं जो रतलाम में उनके बिताए दिनों की मिसाल है। 

कोई लय नहीं थिरकती उनके होंठों पर

नहीं चमकती आंखों में ज़रा-सी भी कोई चीज़,

गठरी-सी बनी बैठी हैं सटकर

लड़कियाँ सात सयानी और कच्ची उमर की

फैलाकर चीथड़े पर

अपने-अपने आगे सैलाना वाली मशहूर

बालम ककड़ियों की ढीग

सैलाना की बालम ककड़ियाँ केसरिया और खट्टी-मीठी नरम।

वे लड़कियाँ सात

बड़ी फ़जर से आकर बैठ गई हैं पत्थर के घोड़े के पास ,बैठी होंगी डाट की पुलिया के पीछे,

चौमुखी पुल के पास होंगी अभी भी 

सड़क नापती बाजना वाली

चाँदी के कड़े ज़रूर कीचड़ में सने

पाँवों में पुश्तैनी चमक वाले,

होंगी और भी दूर-दूर समुद्र के किनारे पहाड़ों पर

बस्तर के शाल-वनों की छाया में

माँडू-धार की सड़क पर

झाबुआ की झोपड़ियों से निकलती हुई

पीले फूल के ख़यालों के साथ

होंगी अंधेरे के कई-कई मोड़ पर इस वक्त 

मेरे देश की

कितनी ही आदिवासी बेटियाँ

शहर-क़स्बों के घरों में पसरी है अभी तक।

अन्तिम पहर के बाद की नींद

बस शुरू होने को है थोड़ी ही देर में

कप-बसी की आवाज़ों के साथ दिन

लोटा भर चाय पीकर आवेंगे धोती खोंसते

अंगोछा फटकारते खरीदने ककड़ी

उम्रदराज़ सेठ-साहूकार बनिया-बक्काल

आंखों से तोलते-भाँपते ककड़ियाँ

बंडी की जेबों से खनकाते रेजगी,

ककड़ियों को नहीं पर लड़कियों को मुग्ध कर देगी

रेजगी की ख़नक आवाज़

कवि लोग अख़बार ही पढ़ते लेटे होंगे

अभी भी कुढ़ते ख़बरों पर

दुनिया पर हँसते चिलम भर रहे होंगे सन्त

शुरू हो गया होगा मस्तिष्क में हाकिमों के

दिन भर की बैठकों-मुलाक़ातों

और शाम के क्लब-डिनर का हिसाब

सनसनीख़ेज ख़बरों की दाढ़ी बनाने का कमाल

सोच विहँस रहे होंगे मुग्ध पत्रकार

धोती पकड़ फहराती कार पर चढ़ने से पहले

किधर देखते होंगे मंत्री

सर्किट हाउस के बाद दो बत्ती फिर घोड़ा

पर नहीं मुसकाकर पढ़ने लगता है मंत्री काग़ज़

काग़ज़ के बीचोंबीच गढ़ने लगता है अपना कोई फ़ोटू चिंन्तातुर

नहीं दिखती उसे कभी नहीं दिखतीं

बिजली के तार पर बैठी हुई चिड़ियाएँ सात।

मैं सवारी के इन्तज़ार में खड़ा हूं और

ये ग्राहक के इन्तज़ार में बैठी हैं।

सोचता हूँ

बैठी रह सकेंगी क्या ये अंतिम ककड़ी बिकने तक कभी ये भेड़ो-सी खदेड़ी जाएंगी

थोड़ा-सा दिन चलने के बाद फोकट में ले जाएगा ककड़ी.संतरी

एक से एक नहीं सातों से एक-एक कुल सात

फिर पहुँचा देगा कहीं-कहीं कुल पाँच

बीवी खाएगी थानेदार की

हँसते हुए छोटे थानेदार ख़ुद काटेंगे

फोकट की ककड़ी,कितना बड़ा रौब गाँठेंगी

घर-भर में, आस-पड़ोस तक महकेगा 

सैलाना की ककड़ी का स्वाद

याद नहीं आएंगी किसी को लड़कियाँ सात,

कित्ते अंधेरे उठी होंगी

चली होंगे कित्ते कोस

ये ही ककड़ियाँ पहुँचती होंगी संभाग से भी आगे

रजधानी तक भूपाल

पीठवाले हिस्से के चमकते काँच से

कभी-कभी देख सकते हैं इन ककड़ियों का भाग्य

जो कारों की मुसाफ़िर बन पहुँच जाती हैं कहाँ-कहाँ

राजभवन में भी पहुँची होंगी कभी न कभी

जगा होगा इनका भाग।

सातों लड़कियाँ ये

सात सिर्फ़ यहाँ अभी इत्ती सुबह

दोपहर तक भिंडी, तोरू के ढीग के साथ हो जाएगी इनकी

लम्बी क़तार

कहीं गोल झुंड

ये सपने की तरह देखती रहेंगी

सब कुछ बीच-बीच में

ओढ़नी को कसती हँसती आपस में

गिनती रहेंगी खुदरा

सोचतीं मिट्टी का तेल गुड़

इनकी ज़ुबान पर नहीं आएगा कभी

शक्कर का नाम

बीस पैसे में पूरी ढीग भिंडी की ,दस पैसे में तोरू की

हज़ारपती-लखपती करेंगे इनसे मोल-तोल

ककड़ी तीस से पचास पैसे के बीच ऐंठकर

ख़ुश-ख़ुश जाएंगे घर जैसे जीता जहान

साँझ के झुटपुटे के पहले लौट चलेंगे इनके पाँव

उसी रास्ते

इतनी स्वतंत्रता में यहाँ शेष नहीं रहेगा

दुख की परछाई का झीना निशान

गंध डोचरा-ककड़ी की

देह के साथ

लय किसी गीत की के टुकड़े की होंठों पर

पहुँच मकई के आटे को गूँधेंगे इनके हाथ

आग के हिस्से जलेंगे

यहाँ-वहाँ कुछ-कुछ दूरी पर

अंधेरा फटेगा उतनी आग भर

फिर सन्नाटा गूँजेगा थोड़ी देर बाद

फिर जंगलों के झोपड़ी-भर अंधेरे में

धरती का इतना जीवन सो जाएगा गठरी बनकर

बाहर रोते रहेंगे सियार

मैं भी लौट आऊँगा देर रात तक। 

सोते वक्त भी

क्या काँटों की तरह मुझमें चुभती रहेंगी

अभी इत्ती सुबह की

ये लड़कियाँ सात। 

रतलाम में रहते हुए देवताले जी ने ब्रेख्त की कहानी का नाट्य रूपांतरण 'सुकरात का घाव' (1979) के रूप में किया, जिसका रतलाम में सफल मंचन हुआ। यह नाटक वाणी से पुस्तकाकार प्रकाशित भी हुआ और उसके मुख्य पृष्ठ पर रतलाम में मंचित नाटक का ही चित्र है जिसमें रतलाम के सुप्रसिद्ध रंगकर्मी श्री कैलाश व्यास सुकरात की भूमिका में दिखाई दे रहे हैं। रतलाम में रहते हुए देवताले जी ने 'आवेग' जैसी महत्वपूर्ण पत्रिका से सम्बद्ध होकर आवेग के संपादक श्री प्रसन्न ओझा के साथ कई महत्वपूर्ण अंक निकाले, जो देशभर में चर्चित रहे। आवेग पत्रिका ने देवताले जी के पचासवें वसंत पर संपूर्ण विशेषांक प्रकाशित किया जिसमें उनके साथी रचनाकारों के साथ ही समकालीन कविता के वैचारिक आंदोलन पर भी विमर्श था।

अप्रैल 2000 में देवताले जी से लिया गया लंबा साक्षात्कार उनकी रचनाधर्मिता से परिचित होने का मेरा महत्वपूर्ण अवसर रहा। उनकी रग-रग में बसे रतलाम और रतलाम में ही उनसे उनकी रचनाधर्मिता पर हुई बातचीत में कई सारे पहलू उजागर हुए।  

शाम को सड़क पर

वह बच्चा बचता हुआ कीचड़ से

टेम्पो, कार-ताँगे से

उसकी आँखों में चमकती हुई भूख है और

वह रोटी के बारे में शायद सोचता हुआ...

कि चौराहे को पार करते वह अचकचा कर

रह गया बीचों-बीच सड़क पर खड़ा का खड़ा,

ट्रैफिक पुलिस की सीटी बजी

रुकी कारें-टेम्पो-स्कूटर

एक तो एकदम नज़दीक था उसके

वह यह सब देख बेहोश-सा

गिर पड़ा।

मैं दौड़ा-पर पहुँच नहीं पाया

कि उसके पहले उठाया उसे

सन्तरी ने कान उमेठ

होश-जैसे में आ,

वह पानी-पानी,कहने लगा बरसात में

फिर बोला बस्ता मेरा...

तभी धक्का दे उसे फुटपाथ के हवाले कर

जा खड़ा हो गया सन्तरी अपनी छतरी के नीचे

सड़क जाम थी क्षण भर

अब बहने लगी पानी की तरह

बच्चा बिना पानी के जाने लगा घर को

बस्ते का कीचड पोंछ। 

मैंने पूछा, आपकी रचनाओं में गहन करुणा और वृहत्तर जीवन की छवियां नज़र आती हैं। आप आदिवासियों के इतने निकट पहुंच जाते हैं, यह कैसे संभव होता है?

वे सहजता से कहने लगे,  मैं स्वयं को एक आदिवासी मानता हूं, बल्कि मेरा तो मानना है कि कवि बुनियादी तौर पर खुद आदिवासी होता है । मैं तो गोंडवाना में आदिवासियों के बीच बचपन में रहा हूं। रतलाम- बाजना आदि क्षेत्र मेरी कर्मभूमि रही है । जैसा जीवन हम जीते हैं वैसा ही जीवन के प्रति हमारा आकर्षण हो जाता है। बचपन में हमारा वातावरण यह तय कर देता है कि हमें किस तरफ़ जाना है । हमारा वहीं से प्रारंभ हो जाता है जो ताउम्र चलता रहता है। मैं बचपन से ही निर्धन ग़रीब, आदिवासी वर्ग की पीड़ा को देखता रहा, समझता रहा। आभिजात्य के छद्म ने मुझे कभी प्रभावित नहीं किया, यह मेरा सौभाग्य रहा।  इसके बाद जब मुक्तिबोध को पढ़ने का अवसर मिला तो जाने - अनजाने में उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। उनकी कविताओं की बहुत बड़ी भूमिका रही है मेरा परिष्कार करने में। दरअसल मैं समझता हूं कि कवि एक जासूस भी होता है। इस जगह उसकी जासूसी निगाहें काम करती हैं, मगर किसी के नुकसान के लिए नहीं। एक आदिवासी की जासूसी कितनी निष्कपट होती है यह सोचने की बात है। मैं यह नहीं मानता कि कवि का बनना होता है। परिस्थितियां उसे कवि बनाती है। मेरी परिस्थितियों ने मुझे कवि बनाया इसलिए हर कविता में जीवन नज़र आता है। कोई कविता जीवन से कटी हुई नहीं रह सकती है। 

अगर मुझे औरतों के बारे में

कुछ पूछना हो तो मैं तुम्हें ही चुनूंगा

तहकीकात के लिए

यदि मुझे औरतों के बारे में

कुछ कहना हो तो मैं तुम्हें ही पाऊँगा अपने भीतर

जिसे कहता रहूँगा बाहर शब्दों में

जो अपर्याप्त साबित होंगे हमेशा

यदि मुझे किसी औरत का कत्ल करने की

सज़ा दी जाएगी तो तुम ही होगी यह सज़ा देने वाली

और मैं खुद की गरदन काट कर रख दूँगा तुम्हारे सामने

और यह भी मुमकिन है

कि मुझे खन्दक या खाई में कूदने को कहा जाए

मरने के लिए

तब तुम ही होंगी जिसमें कूद कर

निकल जाऊँगा सुरक्षित दूसरी दुनिया में

और तुम वहाँ भी होंगी विहँसते हुए

मुझे क्षमा करने के लिए 

मेरी फिर जिज्ञासा रही, कि आपकी कविताओं में इतना अर्थ गांभीर्य कैसे पैदा हो जाता है?

वे कहने लगे, भाषा और काव्य मेरे लिए एकांत नहीं है। मैं भाषा को भी सामाजिक अभ्यास मानता हूं। जिस वातावरण में हम रहते हैं, जो हमारे आसपास है, वही हमें भाषा देता है। कोई शब्द या वाक्य यदि कहीं से फूटता है तो वही कविता लिखने का सबब बन जाता है।  मैं कभी भी भाषा के लिए पृथक से सावधान या सजग नहीं रहा। मुक्तिबोध की भाषा भी हमारे जीवन का हिस्सा लगती है । कोई भी भाषा जीवन से कटी हुई नहीं होती। इसी भाषा को लेकर कवि अपना काम बखूबी करता है और यही उसकी नियामत है।

कवि की सामाजिक भूमिका जब मैंने उनसे जानना चाही तो वे कहने लगे, कवि की आत्मा एक सामाजिक आत्मा होती है। उसे समाज कवि बनाता है। स्वयं कवि होने की बात पाखंड है। कवि का काम उपदेश देना नहीं है। वह जो देखता है ,उसका चित्रण करता है। सिर्फ़ कविता ही कुछ नहीं कर सकती कर सकती है जब तक कि समाज उसके साथ ना चले समाज जब कविता के साथ होता है तो कविता आज की तरह कई तीखे और प्रासंगिक प्रश्न खड़े करती है। 

एक-दूसरे के बिना न रह पाने

और ताज़िन्दगी न भूलने का खेल

खेलते रहे हम आज तक

हालाँकि कर सकते थे नाटक भी

जो हमसे नहीं हुआ।

किंतु समय की उसी नोक पर

कैसे सम्भव हमेशा साथ रहना दो का

चाहे वे कितने ही एक क्यों न हों

तो बेहतर होगा हम घर बना लें

जगह के परे भूलते हुए एक-दूसरे को

भूल जाएँ ख़ुद ही को

ग़रज़ फ़क़त यह कि बहुत जी लिए

इसकी-उसकी, अपनी-तुपनी करते परवाह

अब अपनी ही इज़ाज़त के बाद

बेमालूम तरीके से अदृश्य होकर रहें हम

कोहरे के बेनाम-बेपता घर में। 

रतलाम का उनके जीवन में अहम स्थान रहा। जब उनसे रतलाम की बात की गई तो वे अपनी पुरानी यादों में खो गए। कहने लगे, मैं रतलाम में 14 वर्ष रहा। यहां पर रहते हुए मेरी अधिकांश पुस्तकें प्रकाशित हुईं। यहीं से कविता लिखना प्रारंभ किया। यहां आकर पुरानी यादों में खोया महसूस करता हूं। मैं सोचता हूं कि हर जगह आदमी को बहुत कुछ देती है। आज कवि हूं तो यहां की ज़मीन ने मुझे बहुत कुछ दिया है । यहां के अभावों ने,आदिवासियों ने , यहां के आत्मीय वातावरण ने मुझे बहुत कुछ दिया है, जिसे मैं कभी भुला नहीं सकता हूं।

देवताले जी नई पीढ़ी को प्रोत्साहित करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण मुझे उस वक्त मिला जब 3 मार्च 2002 को नई दुनिया के रविवारीय परिशिष्ट में मेरी कविता 'तीर्थ' छपी तो देवताले सर ने स्वयं फोन पर मुझे बधाई दी और उस कविता का विस्तार से विश्लेषण भी किया। देवताले सर के उस स्नेह की स्मृति आज तक मेरे भीतर मौजूद है।

एक कवि अपने साथ कुछ नहीं ले जाता मगर वह जो कुछ देकर जाता है वह आने वाले संसार को एक खूबसूरत आकार देने के लिए काफी होता है ।देवताले जी ने अपनी कविता में कहा- 

पानी के पेड़ पर जब

बसेरा करेंगे आग के परिंदे

उनकी चहचहाहट के अनंत में

थोड़ी-सी जगह होगी जहां मैं मरूंगा।

मैं मरूंगा जहां वहां उगेगा पेड़ आग का

उस पर बसेरा करेंगे पानी के परिंदे

परिंदों की प्यास के आसमान में

जहां थोड़ा-सा सूर्योदय होगा

वहां छायाविहीन एक सफेद काया

मेरा पता पूछते मिलेगी। 

देवताले जी की कविताएं यकीनन आज भी उनका आभास करवाती है और हिंदी काव्य साहित्य की धरोहर है।

आशीष दशोत्तर

12/2, कोमल नगर
बरबड़ रोड,
रतलाम - 457001
मो. नं. - 9827084966

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Sun, 15 May 2022 10:42:45 +0530 Niraj Kumar Shukla
कवि और कविता : 'अपनी बेगुनाही का सबूत भी नहीं दे सकते हम...' https://acntimes.com/Poet-and-Poetry-We-cannot-even-give-proof-of-our-innocence https://acntimes.com/Poet-and-Poetry-We-cannot-even-give-proof-of-our-innocence आशीष दशोत्तर

कविता मनोभावों की अभिव्यक्ति है। यह भाव स्वत: मनुष्य को सृजनशील बनाते हैं। हर व्यक्ति के भीतर एक कविता मौजूद रहती है, मगर उसे अभिव्यक्त करना और लेखनी के ज़रिए उसे कागज़ पर उतारना बहुत मुश्किल होता है। जीवन की आपाधापी के बीच मनुष्य कविता से दूर हो रहा है और इसी दूरी के कारण मनुष्य अविवेकी होता जा रहा है। 

कविता मनुष्य के मनुष्य बने रहने के लिए बहुत ज़रूरी है। यह कविता ही मनुष्य को भीतरी ऊर्जा प्रदान कर सकती है। जिन्होंने इस ऊर्जा को महसूस किया वे कविता से जुड़कर अपने जीवन को सृजनशील बनाते रहे। जो व्यक्ति कविता से जुड़ा वह हर क्षेत्र में सृजन से जुड़ा रहा। ऐसे ही सृजनशील रचनाकार श्री बंसीलाल गांधी भी सृजन के साथ निरंतर जुड़े रहे। उनके पहचान यद्यपि एक राजनेता के रूप में अधिक रही मगर उनके साथ उनका कवि भी हरदम गतिमान रहा। राजनीति केल फलक पर वे कांग्रेस के स्थानीय से केंद्रीय स्तर तक अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहे तो शायद इसके पीछे उनके भीतर का कवि ही उन्हें शक्ति प्रदान करता रहा होगा।

श्री गांधी के यहां कविता एक वक्तव्य की तरह नहीं आतीं। वे कविता को बहुत गहराई से महसूस करते नज़र आते हैं। उनकी कविता में एक अंतर्द्वंद भी नज़र आता है। मनुष्य के भीतर उठने वाली भावनाएं, भीतर ही भीतर चल रहा ऊहापोह भी अभिव्यक्त होता है।

हमारे भीतर एक दुमकटा महासर्प 

रेंगता रहता है, फन उठाए, सदा सचेत।

यह सर्प हमारी ही शिराओं और धमनियों पर 

अपने लप-लपाती नुकीली पतली जीभ रख कर 

अपना जीवन रस चूसता है।

अपनी ज़हर की गांठ को ज़हरीला बना कर 

घूमता है 

यह हमारा भीतरी सर्प ही हमें 

चैन की सांस लेने नहीं देता।

यही भीतरी बेचैनी कवि को इससे आगे सोचने पर विवश करती है। जब मन बेचैन होता है तो वह हर परिस्थिति को उसी दृष्टि से सोचता है। यह संभव है कि उस बेचैनी को दूर करने के कई सारे मार्ग हो सकते हैं मगर भीतर की बेचैनी व्यक्ति को उस राह की ओर उन्मुख करती है जहां से वह इस बेचैनी को दूर कर सके। कवि इस बेचैनी को बखूबी महसूस करता है। उसकी संवेदनशीलता ही उसे इस तरह की बेचैनी को महसूस करने की ताक़त प्रदान करती है।

भविष्य को आंखें मूंद 

मनुष्य के अंतर में डूब जाने दो।

अतीत की अंतरआत्मा को 

खूंटी पर टांग दो 

तभी तुम्हारा वर्तमान 

अपने पैरों पर खड़ा हो सकेगा,

संसार को चुनौती देता हुआ 

आगे बढ़ सकेगा।

मनुष्य के अंतर में डूबा हुआ भविष्य

तरलता की कई -कई परतों को चीर कर

और कर्म के रंगों में रंगा हुआ अतीत

हवा का झोंका बन तुम्हारे सच को बुहारेगा। 

यह माना जाता है कि कवि के मन में वेदना से ही काव्य भाव उत्पन्न हुए। जब वह समाज की विषमता को देखता है, वहां मौजूद अव्यवस्थाओं को देखता है, एक आम आदमी के जीवन पर लगे हज़ार प्रतिबंधों को महसूस करता है, तब उसकी वेदना उभर कर सामने आती है और यही वेदना कविता के रूप में अभिव्यक्त होती है। कवि की संवेदनशीलता हर मनुष्य के साथ जुड़ी होती है। वह स्वयं हर मनुष्य का प्रतिबिंब होता है। कवि किसी भी मनुष्य से स्वयं को पृथक नहीं कर सकता। मनुष्य ही क्या, कभी किसी भी प्राणी से अपने आपको अलग नहीं कर सकता। प्रथम कविता का जन्म ही एक क्रौंचवध से उत्पन्न पीड़ा से हुआ था। ऐसे में कवि के मन में हर व्यवस्था के प्रति बेचैनी होना स्वाभाविक है। यहां भी कवि के मन में एक बेचैनी साफ़-साफ़ नज़र आती है। यही बेचैनी उसके भावों को विस्तार प्रदान करती है। साथ ही वह इस बेचैनी को पैदा करने वाले कारणों और उन से निजात पाने की राह भी खोजता है।

जब बाहरी आतंक, भय, चिंता से हम 

तनिक से मुक्त हो विश्राम करते हैं 

यह सर्प तब नुकीले दांत से अपने नसों में 

और मांसपेशियों में हमारी 

भीतर ही भीतर ज़हर उतारता रहता है।

एक आत्मिक दंश की पीड़ा से 

तिलमिलाकर हम समूह चेतन जाते हैं 

किसी तनी हुई प्रत्यंचा के समान 

हमारा मानसिक लिजलिजा फैलाव 

यकायक तनाव से आक्रांत 

हड़बड़ा कर विचारों पर टूट पड़ता है। 

बंसीलाल गांधी के यहां यह वैचारिक द्वंद्व बार-बार उभर कर सामने आता है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और पारिवारिक परिस्थितियों से घिरा मनुष्य कई बार अपने रचनाओं के ज़रिए इस वैचारिक द्वंद्व को व्यक्त करता है। यह स्वाभाविक भी है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी। वह चाह कर भी स्वयं को समाज से अलग नहीं कर सकता इसीलिए कवि को, एक रचनाकार को सभ्य समाज का प्रतिनिधि माना जाता है। यह भी विश्वास किया जाता है कि वह समाज के उस व्यक्ति की आवाज़ को बुलंद करेगा जो अपनी बात कहने में असहाय और अक्षम है। 

ज़मीं के रंग-ओ-बू में 

ऐसा उलझा आदम ,

कि ताउम्र भागते रहना 

फितरत बन गई उसकी।

ज़िंदगी की जुल्फों के 

पेचोख़म सुलझाते हुए

उंगलियों के पोरों से 

लहू बहने लगा उसकी। 

बंसीलाल गांधी के यहां दृष्टि का विस्तार बहुत है । यद्यपि वे जिस परिवेश से जुड़े रहे वहां भिन्न-भिन्न मनुष्य से संपर्क, पीड़ित और प्रताड़ित व्यक्तियों की वेदना को समझने का और देखने का उन्हें काफी अवसर मिला। एक जनप्रतिनिधि के रूप में प्रतिदिन इस तरह की परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। एक रचनाकार उन परिस्थितियों को देखता भी है, समझता भी है और महसूस भी करता है । व्यवस्था में चाहे वह उन परिस्थितियों का समाधान करने में अधिक सफल न हो पाए मगर अपनी रचनाधर्मिता के ज़रिए उसकी पीड़ा को सामने अवश्य लाता है । बंसीलाल गांधी के यहां भी इस तरह की पीड़ा बार बार उभर कर सामने आती है। यही उनकी रचनात्मक सोच को पुष्ट करती है। श्री गांधी के यहां भी ये संवेदनाएं रचनात्मकता के साथ आती हैं।  

मंथर गति से चल रहे जहाज को 

हम आंधी तूफान की आशंका से आतंकित

भीतरी हड़बड़ाहट और घबराहट में डुबो देते हैं,

तली से बुलबुले भी उठकर 

हमारे भावांकुरों के गर्भाधान होने की 

सिफारिश नहीं करते और हम 

कई डूबे हुओं के समान 

आत्मदंश की पीड़ा को अहसासते 

उठते, गिरते रहते हैं,

और हमारे भीतर का सर्प हमारे भीतर 

नए-नए बिलों की खोज में 

अपनी ज़हरीली जीभ लपलपाता घूमता फिरता है 

हमारे भीतर निशंक, निर्द्वंद्व और हम 

अपनी बेगुनाही का सबूत भी नहीं दे सकते।

लपलपाती जीभ के सामने मौजूद और अपनी बेगुनाही का सबूत न दे पाने के कारण मनुष्य की पीड़ा सहजी समझी जा सकती है। 9 सितंबर 1939 को जन्मे श्री बंसीलाल गांधी निरंतर सृजनशील रहे। अपने राजनीतिक सफर में उन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखे। वे इस पथ पर अपनी मौजूदगी दिखाते रहे और कविता काफी पीछे रही, मगर उन्होंने कविता का दामन कभी नहीं छोड़ा। वे निरंतर सृजनशील बने रहे और अपने साथियों के बीच उन कविताओं के साथ अपने भीतर के विचारों को मुखर भी करते रहे।  

अच्छा यही है समझौता कर लें

हर दुःख से, हर आफत से,

बहुत मिलेंगे यहां विरोधी 

किस-किस से झगड़ा लेगा।

लाख करें कोशिशें 

चुपचाप गुज़र जाए दुनिया की राहों से 

किंतु असंभव सूखी पत्तियों की छाती पर चल लेना 

मन की आशाएं परवशता की जंजीरों में 

ऐसी जकड़ी हैं कि 

थोड़ा हिलने पर भी आहट तो कर देना। 

उनकी कविताएं समय-समय पर सामने आती रही। यह संख्या में भले ही कम रही हो मगर इनकी ताक़त कभी कम नहीं हुई। उनकी कविताओं से उभरे रचनाकार को समझना उस व्यक्ति के बूते की बात नहीं जो उन्हें सिर्फ एक राजनीतिक व्यक्ति ही समझता है। उनका रचनाकार स्वरूप उन्हें उससे बिल्कुल पृथक करता है। उनकी कई सारी अप्रकाशित रचनाएं भी प्रकाश में आना है और इन रचनाओं के सामने आने के साथ उनकी एक अलग छवि रचनात्मक क्षेत्र में उनकी उपस्थिति का आभास कराएगी, यह उम्मीद की जाना चाहिए।  

आशीष दशोत्तर

12/2, कोमल नगर

बरबड़ रोड

रतलाम - 457001

मो. 98270-84966

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Wed, 20 Apr 2022 23:21:37 +0530 Niraj Kumar Shukla
कवि और कविता : 'माथे पर लिखी हज़ार ख़तों की इबारत...' https://acntimes.com/kavi-aur-kavita-maathe-par-likhee-hazaar-khaton-kee-ibaarat https://acntimes.com/kavi-aur-kavita-maathe-par-likhee-hazaar-khaton-kee-ibaarat आशीष दशोत्तर 

कविता का कैनवास बहुत बड़ा होता है। कवि अपनी कल्पनाशीलता और यथार्थ के साथ सामंजस्य बिठाते हुए इस कैनवास पर जो रेखांकन करता है वह एक ऐसा आकार ग्रहण करता है जिसे हम कविता कहते हैं। यह कविता कवि के व्यक्तित्व, उसकी समझ, उसके सोच के विस्तार और उसकी पक्षधरता को व्यक्त करती है। इसमें कवि का चिंतन, मनन और किसी भी दृश्य को देखने की क्षमता का अवलोकन होता है।

एक लंबे समय तक अपनी रचनात्मकता से हिंदी साहित्य को अपना महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करते रहे, कवि, नाटककार और संवेदनशील रचनाकार डॉ. हरीश पाठक की रचनात्मकता समय से कदमताल करती रही। वे नई सुबह लाने की ख़्वाहिश रखने वाले रचनाकार थे। उनकी कविताएं एक नई उम्मीद की कविताएं थीं। इन कविताओं में अंधकार से व्याप्त बेचैनी और उस से जूझने का हौसला दिखाई देता है। कवि इस अंधेरे को मिटा कर एक नई रोशनी बिखेरने का प्रयत्न करता है। 

एक रात की एक निस्तब्ध लकीर 

कितनी ही रातों की निस्तब्ध स्याह लकीरें 

एक सुबह एक शुरुआत 

कितनी ही सुबहों की कितनी ही क्रूर शुरुआतें 

एक चढ़ता दिन और ढलती शाम 

चढ़ते दिनों और ढलती शामों के 

अंतहीन बड़बड़ाते खाली पन्ने ‌। 

ज़िंदगी की जद्दोजहद और तमाम विसंगतियां किसी भी रचनाकार को झकझोरती है। उसे व्यथित करती है और लिखने के लिए विवश भी करती है । कवि जब इन विसंगतियों पर इतनी कलम चलाता है तो वह उन सारे संदर्भों को भी सामने रखता है जिनसे होकर व्यवस्था को बेहतर बनाया जाना चाहिए था, मगर नहीं बनाया जा रहा है । कभी अपने बिम्बों के ज़रिए और इशारों-इशारों में कई सारे संकेत देता है।

आपने ही पहले-पहल बताया हमें 

उस वक्त 

जब सूरज ठीक हमारे ऊपर जल रहा था 

हमारा मुल्क तरक्की से बहुत आगे बढ़ गया है,

मंज़िल की आखिरी पीढ़ी पर पहुंचा 

फिर अपने ही छोड़े ब्रह्मास्त्र पर उड़ गया है। 

डॉ. हरीश पाठक की कविताएं आम जनजीवन की कविताएं थीं। ये कविताएं आम व्यक्ति की पीड़ा, उसकी व्यथा और उसकी विवशता को उजागर करती है। इन कविताओं में ज़िंदगी की वे बेचैनियां बाहर आती हैं जिनसे एक सामान्य व्यक्ति दो-चार होता है। 

कोई भी रचनाकार अपनी परिस्थिति और परिवेश से मुंह नहीं मोड़ सकता। संवेदनशील रचनाकार वही होता है जो इन सारे दुःख- दर्द को अपना दर्द समझे और यह तय करे कि वह किसके साथ खड़ा है। व्यवस्था को जितना बेहतर बनाया जाना चाहिए था, नहीं बनाया जा सका। आम ज़िंदगी में जो खुशियां भी बिखेरी जानी चाहिए थी, नहीं बिखेरी जा सकीं। सूनीआंखों में मौजूद सपने साकार होने थे, नहीं किए जा सके। कवि इन सब के लिए व्यवस्था के विरोध में खड़ा होता है। एक रचनाकार सदैव व्यवस्था के विरोध में ही खड़ा होता है और इस तरह आम ज़िंदगी के पक्ष में दिखाई देता है। वह उस शोषक और कुटिल व्यवस्था का विरोध करता है जिसके कारण जीवन दूभर होता जा रहा है। श्री पाठक की कविता में कई सारे दृश्य साथ साथ चलते हैं। वे अपनी कविता में अपने पक्षधरता को स्पष्ट भी करते हैं और अपने पक्ष को मज़बूती से भी रखते हैं। 

पूरी संजीदगी से टोका उसे आपने 

जो बयान कर रहा था 

अपनी ही दुःखों की तफ़सील 

आपने कहा 'मौत का एक दिन मुअय्यन है' 

चलते रहो समस्याओं की हवा में झूल कर 

भूल कर कि हम ग़रीब हैं 

दमखम से तरक्की का मीज़ान करो 

कहो मेरा देश है ये। 

डॉ. पाठक ने अपनी कविताओं में आधे समाज के के प्रति पूर्ण सहानुभूति रखते हुए उसके भीतर दबे दर्द को सामने लाने की कोशिश की। वह सब कुछ हो कर भी कुछ नहीं है। जिसके ज़रिए सबको पहचान मिलीं, उसकी अपनी ख़ुद कोई पहचान नहीं। सभी के साथ रहकर भी वह किसी की नहीं। यहां तक कि वह खुद की भी नहीं रह पाती है। यह सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए पाठक जी ने अपनी कविताओं में स्त्री विमर्श की उसी चेतना को मज़बूत किया है। 

न जाने 

कितनी नदियों का संगम है उसके भीतर 

पर वह कहती है 

उसने आज तक नदी नहीं देखी 

नदी, एकदम नदी जैसी नदी। 

राजनीतिक विसंगतियों से रचनाकार प्रभावित होता ही है। वस्तुतः वह सामाजिक होने के साथ समाज से जुड़ी उन सभी क्रियाओं से भी जुड़ा होता है जो जन सामान्य के लिए आवश्यक है। राजनीतिक सामान्य जनजीवन को बहुत प्रभावित करती है। राजनीति में निरंतर आते पतन और जन सामान्य को राजनीति के माध्यम से बरगलाने की कोशिशों को पाठक जी ने अपनी कविताओं के ज़रिए बखूबी उजागर किया है। न सिर्फ उजागर ही किया बल्कि उन्होंने राजनीति के जरिए आम आदमी को छलने वाली ताक़तों पर उंगली भी उठाई। 

बाहर हल्ला हो रहा था 

आप बोलते रहे 

लोग सो गए 

आप बोलते रहे।

आप आए हार, फूल , गुलदस्तों को ओढ़कर 

और श्रद्धांजलि पढ़ कर चले गए

हमें ब्लैक बोर्ड साफ करने हैं 

जो रंग दिए आपके ही फालतू हाथों ने।  

कई बार रचनाकार होने और न होने के बीच कई सारे सवाल खड़े करता है। जो चीज़ हो कर भी नहीं है और जो नहीं होकर भी है, उसे पहचानने की शक्ति और उसे देखने की दृष्टि एक रचनाकार के पास ही होती है। वही रचनाकार सफल होता है जो अपने समय के आंख में आंख डाल कर देखता है और समय से सवाल करता है। उसके सवाल उन सैकड़ों आंखों की उम्मीद और आशाओं के लिए सहारा बन जाते हैं जो सदियों से अपने होने को पहचानने में पथरा गई हैं। 

देहरी पर पांव रख 

देखती क्षितिज तरफ़ 

डूबती शाम इंतज़ार करती है वह डाकिये का 

डाकिया उसका साहित्य कोष ,

बांचता ख़तों की इबारत ,

ख़त कभी लिखे नहीं उसने 

सुने हैं या इंतज़ार किया है ।

हजार ख़तों की इबारतें उसके माथे पर 

सलवट बन उभरती है। 

एक रचनाकार को अपनी अभिव्यक्ति में पूरा ईमानदार होना चाहिए। इस साफगोई से ही उसका रचना स्तर बेहतर होता है। पाठक साहब की रतलाम में काफी सक्रियता रही। जब वे उज्जैन  में थे तब 1966-67 में एक अखबार निकाला 'कनटोपा', उसके संपादक पाठक जी थे। कॉलेज के प्राचार्य थे डॉ. शिवमंगल सिंह 'सुमन'। देवताले जी प्रमोशन पर पिपरिया जा चुके थे। इस संबंध में पाठक जी ने रोचक संस्मरण बताया, ' हमारी इस मुहिम का तत्कालीन मौकापरस्त प्रोफेसरों ने कव्वे की कांव-कांव शीर्षक से समाचार अख़बार में दे दिया, जिसके पीछे शहर के व्यवसायियों का भी हाथ था।'

डॉ. हरीश पाठक का रतलाम से काफी गहरा नाता रहा। वे यहां महाविद्यालय में पदस्थ रहे और उन्होंने कई विद्यार्थियों को न सिर्फ एक शिक्षक की तरह बल्कि एक साथी की तरह शिक्षा प्रदान की। ख़ासतौर से रंगकर्म के क्षेत्र में उनके द्वारा रतलाम में किए गए प्रयास आज भी याद किया जाते हैं। नाटकों की रिहर्सल में पूरे समय उनकी मौजूदगी और उनके सूक्ष्म निर्देशकीय वक्तव्य आज भी रंगकर्म को नई दिशा देते हैं। उनकी रंगकर्म में गहरी रूचि के कारण ही उन्होंने रतलाम में युगबोध, जन नाट्य मंच के माध्यम से आयोजित होने वाले नाटक में अपनी सार्थक उपस्थिति प्रदान की । रंगकर्म के प्रति उनका समर्पण और नए कलाकारों को प्रोत्साहित करने की उनकी शैली अद्भुत थी। वे कलाकारों की पीठ थपथपाते और उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देते। उनका यही सहज, सरल स्वभाव एक पूरी पीढ़ी को रंगकर्म से जोड़ता गया। आज रतलाम में रंगकर्म की जब चर्चा होती है तो डॉ. हरीश पाठक के ज़िक्र के बग़ैर पूरी नहीं होती। उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।उनका संकोची स्वभाव और रंगकर्म के प्रति लगाव प्रेरित करने वाला था।

वे अपने परिवेश से वाबस्ता रहे। बहुत छोटे-छोटे संदर्भों से कोई महत्वपूर्ण बात निकाल लेने का अलग ही उनका अंदाज़ था। वे अपने सामान्य से लहजे में भी कई ख़ास बातें कह दिया करते थे। 

आपने चीख़ कर कहा 

वह देखो मैली कमीज़ ।

आप मुस्कुराए -सीखो तमीज़।

फिर आप चुप 

बात आपकी 

और अर्थ उसका महीन। 

उनकी कविताएं अनावश्यक विस्तार से बचने के साथ आवश्यक संदर्भ से एकाकार होती रहीं।प्रकृति उनकी रचनाओं में बार-बार लौट कर आती रहीं मगर बड़ी सहजता और सरलता से। प्रकृति के माध्यम से उन्होंने जीवन के विभिन्न दृश्यों को प्रस्तुत करते हुए एक सकारात्मक वातावरण बनाने की कोशिश की। दरअसल प्रकृति किसी भी रचनाकार के भीतर एक आनंद का संचार करती है और यही आनंद उसे सकारात्मक दृष्टिकोण देता है। डॉ. हरीश पाठक के यहां भी प्रकृति एक ऐसे रूप में प्रस्तुत होती रही जिसने उनकी कविता को ताक़त दी और साथ ही उस मनुष्य को भी ताक़त दी जिसके लिए उन्होंने रचनाएं लिखीं। 

वसंत आ रहा है 

दूर कहीं बारिश हो रही है 

टूट कर गिर रहे हैं बर्फ के पहाड़ 

सर्द हवाएं ठिठुरन में जकड़ रही है।

वसंत आ रहा है 

गुनगुनाने लगे हैं पेड़ 

जवान होने लगीं हैं फूल-पत्तियां।  

पाठक जी का जन्म 11 नवंबर 1946 को उज्जैन में हुआ। वे हिंदी के प्राध्यापक रहे। उन्होंने कविता के अतिरिक्त कहानियां भी लिखीं।  उनकी कविताएं उनके काव्य संग्रह 'नरक को कभी शर्म नहीं आती' के साथ ही शहर चुप नहीं है, कैक्टस और गुलाब, आज की हिंदी कविता, नवें दशक की हिन्दी कविता में शामिल हैं। जन नाट्य मंच रतलाम द्वारा उन्हें रंगकर्म के क्षेत्र में विशेष प्रयास के लिए 'सुमंगला स्मृति सम्मान' से सम्मानित भी किया गया। उनका निधन अप्रैल 2021 में 75 वर्ष की आयु में हो गया। अपने जीवन काल में और ख़ास तौर से रचना काल में उन्होंने आम आदमी के जनजीवन और उसकी ताक़त को बहुधा रेखांकित किया। वे इंसान को उसकी इंसानियत से पहचाने जाने और इंसान की शक्ति को महसूस करने की प्रेरणा देने वाले रचनाकार थे। 

अपने आज से 

उनके कल को मत पकड़ो 

भीतर से बाहर तक फैल रहे 

सदियों के अंधेरे को 

अपने दांतो से पकड़कर चीर देंगे 

धूल और पानी से भरी खेलती उनकी देह 

आकाश और पृथ्वी है।

अभी-अभी तो डूबा है सूरज 

सुनो और देखो 

उनकी हंसी किलकारियों को। 

कोई रचनाकार अपनी रचनाओं के ज़रिए सदियों तक जीवित रहता है। हरीश पाठक सर को वक्त ने हमसे ज़रूर छीन लिया है मगर उनकी रचनाएं हर वक्त से बतियाती रहेंगी, बुरे वक्त से सवाल करती रहेंगी और हर इंसान के कंधे पर हाथ रख उसे एक संबल देती रहेंगी।

आशीष दशोत्तर

12/2, कोमल नगर, बरबड़ रोड,
रतलाम - 457001 (म.प्र.)
मो. नं. 9827084966

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Sun, 27 Feb 2022 16:42:44 +0530 Niraj Kumar Shukla
कवि और कविता : 'ले मशाल सिंदूरी नभ से अलख जगाने जो आई...'  https://acntimes.com/Poet-and-Poetry-Le-Mashal-Sindoori-Nabh-Se-Alakh-Jagane-Jo-Aayi https://acntimes.com/Poet-and-Poetry-Le-Mashal-Sindoori-Nabh-Se-Alakh-Jagane-Jo-Aayi  आशीष दशोत्तर 

जीवन की विषमताओं और विविधताओं से रचनात्मकता मुखर होती है। व्यक्ति इनसे सीख भी लेता है और जीवन को समझने की कोशिश भी करता है। हर व्यक्ति के भीतर एक रचनाकार मौजूद होता है। वह स्वयं की रचनात्मकता से वाबस्ता भी होता है। यह और बात है कि कुछ लोग इसे कागज़ पर उतार पाते हैं और कुछ नहीं। रचनाकार की दृष्टि और उससे प्रस्तुत करने का तरीका ही उसे अन्य लोगों से श्रेष्ठ बनाता है। रचना वही मज़बूत और ताक़तवर होती है जिसमें जीवन शामिल होता है।

रचनाकार का दृष्टिकोण ही उसे सभी की दृष्टि में लाता है। कोई रचना यदि वर्षों बाद भी याद रहती है तो वह उसकी प्रभावोत्पादकता, भाषा वैशिष्ट्य और सामयिकता होती है। एक लंबे समय तक रचनात्मक वातावरण से जुड़े रहे और निरंतर अपनी सृजनात्मकता से साहित्य को समृद्ध करते रहे गीतकार एवं कवि श्री शिवशंकर जोशी भी ऐसे ही रचनाकार रहे। उन्होंने अपनी रचनाओं को समसामयिकता से जोड़कर संपन्न बनाया। रतलाम के रचनात्मक वातावरण ने उन्हें जिस वैचारिक दृष्टिकोण से जोड़ा वही उनकी रचनात्मक संपन्नता का कारण बना ।

श्री जोशी मधुर गीतकार रहे। उन्होंने सस्वर अपनी रचनाओं का पाठ कर उसे और अधिक प्रभावी बनाया। रतलाम में एक समय जब गोष्ठियों का दौर चरम पर था तब वे अपने पूरे हाव-भाव के साथ रचनाओं का पाठ किया करते थे। उसके बाद भी जब-जब रतलाम में उनका आगमन हुआ तब वे यहां की साहित्यिक संगोष्ठियों में उपस्थित होकर अपनी रचनाओं को शिद्दत के साथ प्रस्तुत करते रहे । उनका रचनात्मक जुड़ाव और प्रगतिशील वैचारिकता के प्रति समर्पण उन्हें एक बेहतर रचनाकार साबित करता रहा। 

भरे मांग सिंदूर लिए 

मस्तक पर कुमकुम की थाली।

लिये रुचिर मृदुहास पिये 

मानिक मदिरा की जो प्याली।

कुछ पीने कुछ और पिलाने 

मधुबाला सी मुस्काई 

साथी सांझ चली आई। 

रचनाकार अपनी परिस्थिति और परिवेश से काफी प्रभावित होता है। जोशी जी भी अपनी रचना प्रक्रिया में इससे अछूते नहीं रहे। दरअसल हर रचनाकार यही कोशिश करता है कि वह अपने आसपास से ही ऐसे विषय को रचना में शामिल करे जिनसे मनुष्य का जीवन जुड़ा हुआ है। अमूमन रचनाकार विषय वहीं से उठाता है। ये विषय हमारे आसपास बिखरे होते हैं। कहीं प्रकृति में, कहीं परिवेश में, कहीं परिस्थितियां और कभी किसी के प्रभाव से ऐसे विषय हमारे सामने स्वयं उपस्थित होते हैं। ये हमें लिखने के लिए विवश करते हैं और विचार करने की शक्ति भी देते हैं। ऐसे विषय ही किसी रचना को मज़बूत बनाते हैं। जोशी जी ने भी इन विषयों को न सिर्फ छुआ बल्कि उनके भीतर जाकर उनकी पड़ताल करने की कोशिश भी की । यही कारण है कि उनकी रचनाएं सामान्य होते हुए भी महत्वपूर्ण प्रतीत होती है‌।वे अपनी रचनाओं के माध्यम से हर मनुष्य से बात करते हैं और उसके भीतर जाकर उसके दुःख- दर्द से एकाकार होने की कोशिश करते हैं। 

सर सरिता में रुनझुन करती 

वन उपवन में इठलाती ।

डाली- डाली पर हरषाती 

फल फूलों पर मदमाती।

विकल किसी राधा के 

मनमोहन की सुधि रंग लाई। 

मनुष्य के सामने कई बार अजीब से सवाल आते हैं। वह समाज में व्याप्त विषमताओं को देखता है तो व्यथित हो जाता है । मनुष्य, मनुष्य के बीच मौजूद भेदभाव और उसे कमज़ोर बनाने वाली ताक़तों का बाहुल्य उस रचनाकार को हैरान भी करता है और परेशान भी। जोशी जी भी इसी द्वंद्वात्मक स्थिति को अपनी रचनाओं में स्थान देते रहे। एक मनुष्य वह है जो अपना सर्वस्व न्योछावर करता है, भरपूर श्रम करता है, अपना जीवन समर्पित कर देता है और बदले में उसे वह सब कुछ नहीं मिलता जिसका वह अधिकारी होता है। वहीं दूसरी ओर वह व्यक्ति होता है जो सुख सुविधाओं को भोगता है। वह उन छोटे मनुष्यों का शोषण करता है जो अपनी श्रम शक्ति से विपरीत परिस्थितियों को बदलने का साहस करता है। श्रम करने के बाद थके हारे मजदूरों का लौटना, एक पंछी के दल की भांति कोई रचनाकार ही बता सकता है। यहां जोशी जी ने श्रमिकों को एक पंछी सा बता कर वही ऊंचाई दी है जो जिसका वह अधिकारी है। उसकी निश्चलता, अपने लक्ष्य के प्रति उसका सचेत होना, निरंतर श्रम करते रहना और किसी से कोई भेदभाव न रखना यही एक श्रमिक की पहचान है। ऐसा करते हुए वह किसी पंछी से कम नहीं होता । निरंतर ऊंचाइयों को छूने की उसकी ख़्वाहिश और शिकारियों की मानिंद घात लगाए बैठे शोषक ,उसकी राह की बाधा बनते हैं। जोशी जी की रचनाएं उसी श्रमिक वर्ग का गीत गाती है। 

लौट रहे जल विहंगों के दल 

भ्रमित श्रमिक पागल बादल।

स्वर्ण दान दे अंशुमाली ने 

समेट लिया अपना आंचल।

तब निंदिया की राह सलोने 

सपन जगाने जो आई। 

शिवशंकर जोशी जी ने अपनी रचनाओं में जनपक्षधरता को नज़रअंदाज़ नहीं किया। जीवन के हर बिम्ब को देखने का नज़रिया मानवीय होना चाहिए। वे भी अपने दृष्टिकोण में मानवीय पक्ष को विस्मृत नहीं करते हैं। शिव शंकर जोशी जिस दौर में रचना करते रहे वह दौर जनआंदोलनों का दौर था । उस वक्त रतलाम में जन आंदोलन चरम पर थे। यहां पर बड़े-बड़े रचनाकार अपनी रचना प्रक्रिया के द्वारा न सिर्फ जनता की आवाज़ को बुलंद कर रहे थे बल्कि जनता की शक्ति को भी बता रहे थे। सिर्फ क्षेत्र में ही नहीं बल्कि पूरे देश में एक ऐसा जन आंदोलन मुखर हो रहा था जिसके माध्यम से रचनात्मकता को नया आया मिल रहा था। जोशी जी ने भी अपनी रचनाओं में उस जनपक्षधरता को शामिल कर उसे आवाज़ प्रदान की।

जन-जन के मन में चमकाती,

जैसे दीपक की बाती ।

हारे पंथी के मन में फिर 

विजय पताका फहराती। 

ले मशाल सिंदूरी नभ से 

अलख जगाने जो आई।

छायावादी कविता से श्री जोशी प्रभावित रहे। उनकी रचनाओं में प्रकृति चित्रण बहुत बारीकी से नज़र आता है। उनके गीत अपने इस अंचल की भीनी महक प्रदान करते हैं। अपने गांव, चौपाल, पगडंडियां, सुबह की लाली, ढलती सांझ के दृश्य, घर-आंगन और रिश्तों के रंग उनके गीतों के प्रमुख विषय रहे। इसके साथ ही वे सामान्य जन की पीड़ाओं से भी वाबस्ता रहे। नई कविता के दौर से कदमताल करते हुए अपनी रचनाओं को एक अलग आकार प्रदान करते रहे। जोशी जी की रचनात्मकता रतलाम में पुष्पित और पल्लवित हुई। उसे रतलाम से मुंबई जाने के बाद भी निरंतरता मिलती रही। वे निरंतर सृजन करते रहे। अपनी श्रेष्ठ रचनाओं से रतलाम का नाम रोशन करते रहे और प्रगतिशील कविताओं एवं गीतों के अपने पक्ष को और अधिक उज्जवल करते रहे। उनकी रचनाएं उनके गीत संग्रह में शामिल भी हैं। ये रचनाएं उनके वैविध्य और उनके रचनात्मक जुड़ाव को व्यक्त करती हैं। उनका स्मरण उस दौर की रचनात्मकता स्मरण है। 

आशीष दशोत्तर

12/2, कोमल नगर, बरबड़ रोड, रतलाम- 457001

मो. नं. - 9827084966

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Tue, 15 Feb 2022 12:26:53 +0530 Niraj Kumar Shukla
वसंत पंचमी पर विशेष गीत : कभी इधर भी वसन्त आना... https://acntimes.com/Special-song-on-Vasant-Panchami-Kabhi-idhar-bhi-vasant-aana https://acntimes.com/Special-song-on-Vasant-Panchami-Kabhi-idhar-bhi-vasant-aana कभी इधर भी वसन्त आना...

ख़बर हमारी कभी तो लेने
ज़रा इधर भी वसंत आना।
हमारी नासमझी को भुलाकर
समझ बढ़ाने सुमन्त आना।

विचार मन में घुमड़ रहे हैं
ये बादलों से उमड़ रहे हैं ।
मगर ये जा कर किसे सुनाएं
हम अपनी पीड़ा किसे बताएं ।
दुखों के स्वर को हमारे सुनने
कभी ऋतु के महंत आना।

सभी हैं अपने सभी पराए
किसी  की पीड़ा कही न जाए ।
हमारे कांधे पे हाथ रखना
हमेशा तू अपना साथ रखना।
हमारी खातिर दिलों में अपने
खुशी तू लेकर अनंत आना।

अभी समय कुछ डरा हुआ है
गले- गले तक भरा हुआ है ।
शिशिर को छूकर जरा समझना
यहां पे तुम भी जरा संभलना।
कभी मुसीबत में गर बुलाएं
तो हमसे मिलने तुरंत आना।

आशीष दशोत्तर

12/2, कोमल नगर
रतलाम, मो.9827084966

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Sat, 05 Feb 2022 09:21:10 +0530 Niraj Kumar Shukla
कवि और कविता : तुम तट पर बैठे गीत प्रणय के गाते, मैं तूफानों से प्यार किया करता हूं... स्व. भंवरलाल भाटी https://acntimes.com/Poet-and-Poetry-Bhanwarlal-Bhati https://acntimes.com/Poet-and-Poetry-Bhanwarlal-Bhati - आशीष दशोत्तर

रचनाकार का कोई परिचय नहीं होता। उसकी रचना स्वयं उसका परिचय देती है। किसी रचनाकार के भीतर प्रवेश करने के लिए उसकी रचनाएं ही माध्यम बनती हैं। उसकी पहचान रचना से ही होती है। एक रचना को आकार देने में रचनाकार अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देता है और जब वही रचना उसकी पहचान बनती है तो महसूस होता है कि रचना स्वयं रचनाकार के व्यक्तित्व से परिचित कराती है।

अपने गीतों के माध्यम से एक ऐसी ही रचनात्मकता का वातावरण निर्मित करने वाले रचनाकार श्री भंवरलाल भाटी जी भी अपनी रचनाओं के माध्यम से ही जाने जाते रहे। उनके जीवन के कई आयाम रहे। वे कई पक्षों को अपने साथ लेकर चलते रहे। 

मेरे गीत की लयताल में होता मुखर उपवन

कोकिला और मोर नाचने लगते

मुझको घेर चारों ओर।

मै नहीं एकाकी मैं एक -अनेक में समाया हूं

अनेक मुझमें समाये हैं। 

उनकी वैचारिकता अपनी जगह रही, रचनात्मकता अपनी जगह रही, शैक्षिक वातावरण अपनी जगह रहा और सामंजस्य की छवि अपनी जगह रही।  इन सब के बावजूद एक रचनाकार के रूप में जब भाटी जी का स्मरण किया जाता है तो उनकी रचनाओं में अद्भुत श्रंगार और एक अनुभवजन्य गहराई का आभास होता है। वे अपने गीतों में कई ऐसे प्रसंग उपस्थित किया करते थे जो उन्हें एक स्थापित साहित्यकार सिद्ध करता रहा।

तुम तट पर बैठे गीत प्रणय के गाते 

मैं तूफानों से प्यार किया करता हूं।

तुमको उजियाले ने हरदम भरमाया 

मुझको तो अंधियारा पथ पर ले आया 

तुम जगकर दिन में देखा करते सपने 

मैं स्वप्नों को साकार किया करता हूं।

जब प्यास तुम्हारी बढ़ती जलता जीवन 

मैं रच देता उस युग मैं सागर मंथन 

तुम मर- मर जाते अमृत पी-पी कर भी 

मैं पी लेता हूं गरल, जिया करता हूं।

तुम शून्य गगन में रहे खोजते जिसको 

मैं स्वयं वही हूं, भला खोजता किसको

तुम मंदिर, मस्ज़िद भटके करने पूजन 

मैं खुद ही का अभिषेक किया करता हूं।

रचनाकार मोहब्बत का पैरोकार होता है। नफ़रत के लिए उसके यहां कोई जगह नहीं होती। भंवरलाल भाटी जी इसी मोहब्बत को अपने तरीके से रचनाओं में प्रस्तुत करते रहे। उनके यहां मोहब्बत का अर्थ बेहतरी के लिए खत्म होना भी है, नए सृजन करना भी है, एक दीपक की तरह जलना भी है और अपने प्रियतम की यादों के सहारे जीवन व्यतीत करना भी। यह दृष्टि वैविध्य रचनाकार को व्यापक फलक़ प्रदान करती है। अंधकार का वरण करने वाला कभी सृजनशील नहीं हो सकता। सृजन के लिए उसे सामूहिक हित और हर व्यक्ति की पीड़ा को भी ध्यान में रखना पड़ता है। यही दर्द उसकी रचनाओं में व्यक्त होता है। जब रचनाकार इस दर्द से परिचित होता है, तभी वह अपने मनोभावों को रचना की शक्ल दे पाता है। भाटी जी के पास गहन अनुभव और विविध दृश्य मौजूद थे। वे उन्हें अपनी रचनाओं में ढालते रहे और अपने रचनात्मक फ़लक का विस्तार भी करते रहे।

दीपशिखा रातभर अश्रु बहाती रही,

कोई द्वंद्व है,कि कोई वेदना सता रही।

आर -पार तिमिर के देख रही नयन फार

संकेत कर रही हाथ उठा बार बार

जनम -जनम का जो मीत उसको बुलाती रही।

अपनी ही आग में,अपने ही प्रियतम को,

फूंकना पडेगा मुझे अपने ही प्यार को

यही सोच सोचकर,तिलमिलाती रही।

भाटी जी की रचनाएं छायावादी काव्य से काफी प्रभावित रहीं। शृंगार और प्रकृति वर्णन उनके यहां बार-बार दिखाई देता है। एक शिक्षाविद रहते हुए उन्होंने जीवन भर विद्यार्थियों को प्रकृति और मनुष्यता की इन्हीं बारीकियों से अवगत भी कराया। उनके पढ़ाए हुए विद्यार्थी आज उच्च पदों पर हैं मगर उन्होंने उनके भीतर जो संस्कार डाले थे वे उनका ज़िक्र करना कभी नहीं भूलते। रचनात्मक अभिव्यक्ति में भाटी जी शृंगार, प्रकृति चित्रण और आध्यात्मिक पुट के साथ गंभीर बात भी कहते हैं। उनके यहां चांद- सूरज, प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी, भाई-बहन या ऐसे ही कई रिश्ते आते हैं मगर सीधे-सीधे नहीं। वे इन संबंधों को इनके नाम से इतर अलग स्वरूप में लाकर अपनी बात बखूबी कह जाते हैं।

मंद-मंद फुहार,सुहावनी श्रावणी बौछार,

बरखा की फुहार।

लो उतर आई गगन से,सुरमई बौछार,

मेघ का देने जगत को,यह सजल उपहार।

व्योम धरती और बादल,हुए एकाकार

हो गए ओझल जगत के चल रहे व्यापार।

गंध सौंधी मनचली,गई फैल चारों ओर,

नृत्य छमछम और रिमझिम,गीत की झकझोर।

रचनाकार के भीतर एक द्वंद्व भी चलता रहता है और यह द्वंद्व ही उसको किसी एक पक्ष में खड़े रहना के लिए विवश करता है। यह रचनाकार की अपनी विशेषता भी होती है और उसकी पसंद भी। भाटी जी वैचारिक रूप से आरएसएस के क़रीब थे। एक प्रचारक के रूप में और सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में वे जीवन भर उससे जुड़े रहे मगर उनकी रचनात्मकता में यह द्वंद्व कभी उभर कर सामने नहीं आया। रचनात्मक अभिव्यक्ति में उनका आग्रह सदैव सृजन की तरफ ही रहा। यह उनकी ईमानदार अभिव्यक्ति रही और उन्होंने इस द्वंद्व से पार पाते हुए वैचारिक धरातल पर रहते हुए ऐसा काव्य संसार निर्मित किया जो प्रभावित भी करता है और आश्चर्यचकित भी।

चलो प्रिये उस पार चलें, चलो क्षितिज के पार चलें,

तुम और मैं, मै और तुम, हम तुम दोनों, दोनों हम।

धरा पवन धन नील गगन, चांद सूरज और गिरी कानन,

सागर अंगडाई लेता हो,जगती का उजला आंगन,

वन्य जीव और जड़ चेतन।

मै होऊं और तुम हो, पास हमारे कोई न हो,

नीरवता हो मलियानिल हो, प्रेम पिपासित हम दोनों,

तार बीन के झंकृत कर दूं,तुम बन जाओ स्वर सरगम।

शर चांदनी छिटकी हो, कल-कल सरिता बहती हो,

नाच रहा हो बेसुध उपवन, कोकिल कुहू-कुहू करती हो,

चंदा आकर झूला बांधे, झूला झूले दोनों हम।

व्यक्त करें युग-युग की स्मृतियां, नयनों की भाषा में हम,

द्वंद्व मिटे और हो अभेद, फिर एक रुप हो जाएं हम,

अद्वितीय संसार हो अपना, जीवन अपना हो अनुपम।

भाटी जी की विषय पर पकड़ मज़बूत थी। वे किसी भी विषय को लेकर चलते थे और उसे पूर्णता तक पहुंचाते थे। उन्होंने एकल अभिनय के साथ किए जाने वाले टेब्लो का भी सृजन किया। उनकी यही मंज़रकशी उनकी रचनाओं को पाठकों के क़रीब ले जाती रही। प्रभावी रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए यह आवश्यक होता है कि रचनाकार अपनी शैली के जरिए शब्दों में एक ऐसा अर्थ उत्पन्न करे जो सीधा पाठक के समक्ष एक दृश्य का निर्माण कर दे। भाटी जी की रचनाओं से गुज़रते हुए इसे समझा भी जा सकता है और महसूस भी किया जा सकता। 

कालातीत अदृश्य हाथों ने, सार दिया तिलक लाल,

आलोकित हुआ भाल, या कि अंकुर फूट पडा,

मृत्यु पर जीवन की विजय का,

या कि फिर प्राची के कपोल पर,

मल दी हो रोली किसी मनचले ने

या फिर फागुन की उड़ती गुलाल।

प्रकृति का मदिर मंद हास, या कि यौवन के आगमन की,

सुनकर पदचाप कोई मुग्धा लजाई हो।

कि सुषमा हुई साकार या सविता के स्वागत हित

पूजा का सजा थाल।

या कि त्याग अनुरागमयी ज्ञान भक्ति कर्म की

अरुण पताका फहराई अदृश्य ने। 

कवि अंधेरे का प्रतिकार करता है और उजाले का वरण करता है। भाटी जी के यहां उजाला एक अलग स्वरूप में उतरता है। उनकी रचनाएं बिम्बों और उपमाओं के ज़रिए आगे बढ़ती है। प्रकृति के साथ आबद्ध होकर गति प्राप्त करती है। उनकी अपनी शैली इस अंधियारे का प्रतिकार अलग तरीके से करते हुए कहती है कि अंधकार को सहने के बाद ही उजाले का वरण किया जा सकता है। रात के कठिन सफर से गुज़रते हैं तब आकाश में ऊषा नज़र आती है। 

हो माथे पर बिंदिया सौभाग्य की

या कि सिन्दूर भरी मांग सुहागिन की।

किसी देवालय का शिखर हो

या सौभाग्य सूर्य मनुज का

या सृजन की प्रथम किरण

या प्रकृति की खुली कोख

देती संदेश बाल रवि के जन्म का।

नीरभ्र नीलाकाश कर ज्योतित

छेडती भैरवी के मधुर मादक स्वर,

या कि निर्धूम धधकती वही ज्वाल

या कि माणिक भरी मंजूषा विशाल

सृष्टि के भाग्योदय का आलेख

या कि बिखरा पिंग पराग

प्राची के आनन पर अवगुण्ठन सी

महाकाश की बाहों में आबध्द ओ महाभाग

अम्बर का उदर चीर उतर कर आई हो

कौन हो, क्या हो

किसके हृदय की अभिलाषा हो

किस तत्व की परिभाषा हो

ओ रहस्यमयी जिज्ञासा।

तुम जैसे चैतना की ज्योति का सनातन जागरण

हुआ आत्म प्रकाश और तब जैसे

चटकी गुलाब की कली खिली और वह बोली

मै ऊषा हूं, हां ऊषा हूं ऊषा। 

भंवरलाल भाटी 'कुलिश' के उपनाम से लिखते रहे। उन्होंने जीवन के उन दृश्यों को अपनी रचनाओं का विषय बनाया जो अमूमन छूट जाया करते हैं। वे उन दृश्यों को क़ैद करने का हुनर जानते थे। वे अपनी दृश्यावली और शब्दावली को एकरूपता के साथ अभिव्यक्त निरंतर करते रहे मगर कहीं कुछ भिन्नता भी नज़र आती रही। यह उनकी अपनी शैली रही और इस शैली को उन्होंने जिया भी। भाटी जी का जन्म 15 अप्रैल 1926 को हुआ और अवसान 14 मार्च 2010 को हुआ। उनकी रचनाएं उन्हें आज भी उनकी मौजूदगी का अहसास करवाती हैं।

यह जो अस्तित्व है विद्यमान मेरे होने का प्रमाण

ये सब मुझसे है, मैं इनसे नहीं ये सब मेरे कारण है

मैं इनके कारण नहीं।

मैं सागर की उत्ताल तंरगों में हहराता हूं

बहता हूं उनचासो प्रभंजन में, मैं ही बहता हूं।

मैं ही अन्धकार बन लील लेता हूं जगत

और उद्भासित करता पुन: उसे

अपनी ही किरणों के प्रकाश में।

मेरी ही शीतल चांदनी में धरती नहाती है

तारों से मुसकाती है, मेरी ही मंद-मंद फुहार से

मलिन मुख धो लेती धरा।

मेरे अनेक रुप हैं, मैं अभिमान हूं,स्वाभिमान हूं

घमण्ड, दर्प, अंहकार भी, ये सब मेरी शाखाएं हैं

इस सृजन में इन सबका अपना स्थान

महत्व है मर्यादा है।

तुम समझ जाओगे गहरे में डूबो

सबकी अपनी अपनी लक्ष्मण रेखा है,

मेरी भी है मूल रुप से मैं ही सृष्टि का कारण हूं

इसलिए विवश हूं,कहना पड रहा है निवेदन है मेरा

दार्शनिकों। संतों। महन्तों।

मनीषियों, महापुरुषों, उपदेशकों, विचारकों

भक्तों, सत्गुरुओं, मेरे पीछे मत पड़ो

मत करो मेरी चरित्र हत्या

मैं संसार विनाश की जड़ नहीं।

मैं तो सृजन का सृष्टि का मूल हूं

मैं हूं तो आप भी है यदि समेट लिया मैंने

अपने आपको इस सृजन का इस अस्तित्व का

क्या होगा? कभी सोचा आपने? 

सृजनशील व्यक्ति सदैव सृजन की बात करता है। भंवरलाल भाटी जी ने भी अपने साहित्य में सदैव उसी सृजन का पक्ष लिया। वे अपने शिल्प और अभिव्यक्ति के ज़रिए निरंतर सृजन की ही बात  कहते रहे। उनका कला की विभिन्न विधाओं से जीवन तो संपर्क और उनकी रचनात्मक सक्रियता आज भी उनका अहसास करवाती है।

 आशीष दशोत्तर

-12/2, कोमल नगर,

 बरबड़ रोड

रतलाम (म.प्र.)

मो.नं. - 98270 84966

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Mon, 24 Jan 2022 03:54:49 +0530 Niraj Kumar Shukla
कवि और कविता : फिर न मिलेंगे दिन अलबेले, जीवन की सब साध मिटा लें : मोहनलाल उपाध्याय निर्मोही https://acntimes.com/poet-and-poetry-Mohanlal-Upadhyay-Nirmohi https://acntimes.com/poet-and-poetry-Mohanlal-Upadhyay-Nirmohi आशीष दशोत्तर 

कविता जीवन का निर्माण करती है। वही जीवन के लिए राह बनाती है। वही मंज़िल तय करती है और वही मंज़िल तक पहुंचने का हौंसला भी देती है। कविता व्यक्तित्व का निर्माण भी करती है। वह व्यक्ति को शब्दों के वापरने का सलीका सिखाती है, शब्दों के महत्व को समझाती हैं और शब्दों के प्रति सम्मान की भावना जागृत करती है। हर व्यक्ति के भीतर एक कवि मौजूद होता है, मगर जब कवि उसके व्यक्तित्व पर सवार होता है तो एक व्यापक रचनात्मक वातावरण का निर्माण होता है। ऐसा वातावरण न सिर्फ उसके वक्त को बल्कि आने वाले समय और कई नस्लों को रचनात्मक रूप से आबाद भी करता है।

अपनी रचनात्मक गतिविधियों एवं लेखनी के ज़रिए बहुआयामी व्यक्तित्व गढ़ने वाले अद्भुत शब्द संपदा के धनी श्री मोहनलाल उपाध्याय 'निर्मोही' ने ऐसे ही सारगर्भित रचनात्मक वातावरण को पोषित किया। उनका जीवन बहुत अल्प रहा मगर उनकी रचनात्मकता का फलक काफी विस्तृत। एक पत्रकार के रूप में, संपादक के रूप में, कवि, कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार के रूप में और उसके साथ ही साहित्यिक गतिविधियों को स्थापित करने वाले साहित्य सेवी के रूप में निर्मोही जी को सदैव याद किया जाता है। ख़ासतौर से अपनी मालवी बोली के लिए उन्होंने बहुत प्रयास किए। मालवी को उसका स्थान दिलवाने के लिए अपने स्तर पर महत्वपूर्ण कार्य भी किए।

निर्मोही जी कहानी, उपन्यास, नाटक, समीक्षा, कविता, पत्रकारिता, संपादन जैसी विभिन्न विधाओं में पारंगत थे। महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका 'वीणा' के मालवी अंक के संपादकीय में उन्होंने लिखा, 'बोलियों की दृष्टि से मध्यप्रदेश अत्यंत संपन्न है। यहां मालवी, निमाड़ी, बुंदेली, बघेली और छत्तीसगढ़ी जैसी पांच प्रमुख बोलियां बोली जाती हैं। इन बोलियों के अंतराल में इतिहास, समाजशास्त्र, नृत्य शास्त्र एवं मानव भूगोल विकास के अमूल्य तत्व निहित हैं। विडंबना है कि मालवा की माटी की जितनी सेवा होनी चाहिए थी, उतनी न हो सकी। अभी भी नव परिवेश में मालवी का भाषाई सर्वेक्षण अछूता पड़ा है, जो किसी मालवी ग्रियर्सन की बाट जोह रहा है।'

एक कुशल संपादक के साथ वे संवेदनशील रचनाकार भी थे। निर्मोही जी छायावाद और रहस्यवाद के दौर में अपना सृजन करते रहे और साहित्यिक गतिविधियों से भी जुड़े रहे। इसका प्रभाव उनकी रचनाओं पर भी देखने को मिलता है। उनकी रचनाएं रहस्यवाद से भी प्रभावित नज़र आती है। 

मैं महामिलन की ओर चली 

सखि! छोड़ जगत के लघु बंधन 

नव अज्ञात क्षितिज की ओर चली 

अस्तित्व मिटा तिल -तिल कर के 

मिट कर अपने प्रिय लोक चली 

मैं महामिलन की ओर चली। 

श्री मोहनलाल उपाध्याय ‘निर्मोही’ का जन्म 25 जनवरी 1921 को हुआ तथा 20 जनवरी, 1972 बसंत पंचमी के दिन वे स्वर्गवासी हुए। उन्हें उम्र बहुत कम मिलीं मगर उन्होंने अपनी रचनात्मकता से अपने जीवन को विशाल स्वरूप दिया। अध्ययन एवं साहित्य के प्रति उनकी रुचि इसी से परिलक्षित होती है कि अवसान से 15 दिन पूर्व ही उन्होंने अपना पीएच.डी. का शोध प्रबंध इंदौर विश्वविद्यालय में प्रस्तुत किया था।  

सन 1943 में ग्राम सुधार नामक पत्रिका के संपादक के रूप में उनकी सृजन यात्रा शुरू हुई। इससे पहले सन 1939 में श्री मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति, इंदौर में वे पहले पुस्तकालयाध्यक्ष बने और एक अंतराल के बाद  मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति इंदौर की महत्वपूर्ण पत्रिका ‘वीणा’ के वर्ष 1970 से लेकर 1972 में अवसान तक संपादक भी रहे। 1946 में उनका कहानी संग्रह 'कलम के हिमायती' प्रकाशित हुआ। स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत उनकी दो और कृतियां प्रकाशित हुईं। 1947 में कहानी संग्रह पंद्रह अगस्त तथा 1950 में नाटक रूपमती। इसके बाद 'नीलिमा' तथा 'निर्माल्य' उपन्यास तथा गीतिनाट्य 'मांडवी' उनकी उल्लेखनीय कृतियां रहीं।

वे रतलाम में जैनोदय प्रिंटिंग प्रेस से जुड़े और 1947 में रतलाम से प्रकाशित ‘दैनिक मालवा’ के संपादक बने। कुछ समय बाद निर्मोही जी पुनः इंदौर में यूनाइटेड प्रेस में व्यवस्थापक हो गए। पीयूषधारा प्रेस में भी कुछ समय तक उन्होंने कार्य किया। इंदौर के प्रमुख दैनिक समाचार पत्र 'इंदौर समाचार' तथा 'जागरण' के कुछ वर्ष तक वे संपादक भी रहे। निर्मोही जी ने अपने साहित्यप्रेमी साथियों के साथ मालव हिंदी विद्यापीठ की स्थापना की। यह अध्ययन ,अध्यापन का एक महत्वपूर्ण केंद्र साबित हुआ। 1956 में वे शासकीय सेवा में आ गए। 

निर्मोहीजी के सम्पादन में 'वीणा' के ग्राम संस्कृति अंक दो भाग में तथा मालवी अंक दो भाग में निकाले जो अब तक चर्चा एवं विमर्श के विशेषांक बने हुए हैं। मालवी पर ये आधिकारिक जानकारियों वाले संग्रहणीय अंक हैं। वे ग्राम संस्कृति और लोक संस्कृति के प्रबल हिमायती थे वहीं इनको भारत की आत्मा मानते थे। उनके विचारों की स्पष्ट झलक उनके संपादन में 1971 में प्रकाशित वीणा के ग्राम संस्कृति अंक व मालवी अंक (पूर्वार्द्ध एवं उत्तरार्द्ध) के संपादकीय में परिलक्षित होती है। एक संपादकीय में उन्होंने कहा 'इस देश की जनता का 90 प्रतिशत ग्राम और जनपदों में बसा है। उनकी संस्कृति ही देश के प्रधान संस्कृति है। हमारे राष्ट्र की समस्त शुभ परंपराओं को लेकर ग्राम संस्कृति का निर्माण हुआ। आज की आपाधापी वाली यंत्रवादी संस्कृति में ग्राम संस्कृति की चर्चा चौंकाने वाली अवश्य है, किंतु यह लोकधर्मी संस्कृति ही भारत की आत्मा है। इसका संबंध वास्तविक जनजीवन से है।'

निर्मोहीजी मालवी गीतों का भण्डार थे और सुकण्ठी गायक भी। उनकी रचनाएं वीणा, माधुरी, विश्वामित्र, नवयुग, स्वतंत्र अर्जुन, आज तथा कर्मवीर जैसी सम्मानित पत्र, पत्रिकाओं में छपी। उनके नाम पर इंदौर में अहिल्यापुरा स्थित उनका पुराना निवास निर्मोही संग्रहालय के रूप में संचालित है। उनकी रचनाओं पर छायावादी प्रभाव भी स्पष्ट दिखाई देता रहा।

साधना कब तक करूंगी, प्रिय मिलेंगे या न आली

क्या न धड़कन मौन होगी, क्या रहेगी अधर लाली,

जोगिया पहनूं बनूं क्या ,राख अंग-अंग में रमा लूं,

आज क्षण -क्षण कंप कैसा,क्यूं खड़ी ये रोमावली है,

बाहें क्यूं हो आकुल तरसती,क्यूं अवरूद्ध शब्दावली है।

अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपनी बोली के प्रति निर्मोही जी को काफी लगाव था। यह उनकी रचनाओं में भी अभिव्यक्त होता रहा। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान उन्होंने अपनी रचनाओं में स्वतंत्रता और देश प्रेम को प्रमुखता से स्थान प्रदान किया। वे आज़ादी के आंदोलन से प्रभावित भी थे और उन्होंने अपनी लेखनी के जरिए इस आंदोलन में अपनी सहभागिता की।

झूठे जग के सारे बंधन, मैं दुनिया में उन्मन-उन्मन,

कोई हंसता,कोई है रोता,निज जीवन के क्षण-क्षण खोता,

पलकों के कोमल अंचल में,अपना कंपन आज छुपा लें,

फिर न मिलेंगे दिन अलबेले, जीवन की सब साध मिटा लें। 

साहित्यिक मित्रों एवं वरिष्ठों के बीच बैठकर उनसे साहित्यिक चर्चा करना और उन चर्चाओं से कुछ प्राप्त करने की ललक रचनाकार की रचनाओं को परिमार्जित भी करती है और संस्कारित भी। एक समय साहित्यिक संगोष्ठियों के ज़रिए रचनाकारों को अपनी रचनाओं का महत्व भी पता चलता था, रचनाओं को वरिष्ठ साहित्यकारों की कसौटी पर खरे उतरने का अवसर भी मिलता और बहुत कुछ सीख भी मिलती थी। निर्मोही जी भी ऐसी संगोष्ठियों के ज़रिए अपने रचनात्मक संसार को समृद्ध करते रहे। उस दौर में हालावादी रचनाओं के प्रभाव से उनकी रचनाएं भी प्रभावित रहीं।

मैं इतनी मदिरा पी जाऊं 

खुद अपने ही में खो जाऊं 

तुम खो जाओ ,जग खो जाए 

पीड़ा के सपने सो जाएं 

रहो मौन तुम गीत मैं जब गाऊं 

गालों का अरुण रंग उषा छू ले 

मन मयूर नाच,  झूला झूले 

मैं खुद ही गाफ़िल हो सो जाऊं। 

उन्होंने साहित्यकार पंडित रामनारायण शास्त्री जैसे विद्वानों के साथ 'मालव साहित्यकार संसद' नाम की एक संस्था भी गठित की थी और इसके माध्यम से साहित्यिक एवं वैचारिक गोष्ठी आयोजित करते थे। डॉ. श्याम सुंदर व्यास, जानकीप्रसाद पुरोहित, नारायण देव आर्य जैसे साहित्यकार साथियों के साथ उन्होंने अपनी रचनात्मकता को ऊंचाइयां प्रदान की।

बीते क्षण- क्षण यूं कि सदियां बीत चलीं

विकल ह्रदय की प्यास प्रियदर्शन के लिए आस

आकुल नयनों से सतत दरस पथ बुहारती 

खड़ी द्वार बिरहिन अधीरा, अविरल निहारती 

उतरे तारक दल श्यामल कुंतल राशि बीच 

म्लान अंगों पर तरंगित सुकुमार दुकूल 

कमल मुख मानो, मुरझा उठा हो समूल। 

श्री मोहनलाल उपाध्याय 'निर्मोही' ने श्री मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति इंदौर की साहित्यिक मासिक पत्रिका वीणा का संपादन करते हुए वर्ष 1971 में मालवी पर दो भागों में विशेषांक प्रकाशित किया। इसके साथ ही ग्राम संस्कृति अंक भी दो भाग में प्रकाशित कर उन्होंने मालवी को स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। वीणा के मालवी अंक उत्तरार्द्ध के संपादकीय में निर्मोही जी ने लिखा 'वीणा के मालवी अंक का अप्रत्याशित रूपेण भारतवर्ष के समस्त वर्ग के विद्वानों द्वारा स्वागत हुआ है ।अपने 44 वर्षीय विगत काल में उसको इतनी अधिक सराहना और पाठक वृंद से सहृदय सद्भावना कभी प्राप्त नहीं हुई। इसको विद्वत समाज का औदार्य ही माना जा सकता है। कला और संस्कृति के विविध पहलुओं से मालव भूमि अत्यंत संपन्न है।'

रतलाम में 8 व 9 जून 1971 को मालवी मेले का भव्य आयोजन किया गया था।  इस आयोजन में  रामधारी सिंह 'दिनकर', डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन, आचार्य विनय मोहन, आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी, डॉ. शिव सहाय पाठक, डॉ. चिंतामणि उपाध्याय, बालकवि बैरागी, डॉ. भगवतशरण उपाध्याय, डॉ. श्याम सुंदर व्यास, चंद्रकांत देवताले सहित कई विद्वानों ने उपस्थित होकर मालवी को उसका गौरव दिलाने का संकल्प लिया।

निर्मोही जी के सुपुत्र और स्थापित मधुर गीतकार डॉ. प्रकाश उपाध्याय बताते हैं कि मालवी मेले के आयोजन की रूपरेखा उनके निवास पर ही बनाई गई थी।‌ पिताजी यानी निर्मोही जी और तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री बालकवि बैरागी उनके घर पर बैठकर ही इस मेले के आयोजन से संबंधित आयोजन को अंतिम रूप देते रहे। यह मेला इतना महत्वपूर्ण हुआ कि पूरे मालवा अंचल में इसकी गूंज फैली। इसके बाद से मालवा के विभिन्न क्षेत्रों में मालवी कवि सम्मेलन एवं मालवी प्रसंग आयोजित किए जाने लगे।

कोई भी रचनाकार अपनी ज़मीन को नहीं भूलता। जब व्यक्ति के मन में अपनी जन्मभूमि के प्रति स्नेह होता है तो वह उसकी रचना में भी अभिव्यक्त होता है। निर्मोही जी अपनी जन्मभूमि को कभी नहीं भूले और गृहनगर रामपुरा की स्मृति में भी उन्होंने अपनी रचना लिखी। 

उत्तुंग भवनों से सुशोभित ग्राम 

अतुल्य वैभव की सुगाथा मूर्तिमान 

जगमग अतीत का सुंदर गान 

मेरे प्रिय गृह नगर अभिराम 

ऐ, रामपुरा तुमको शत-शत प्रणाम ।

मस्तकासीन विंध्याचल पर्वत दर्पवान 

सीमांत अभिरक्षण रत चंबल प्रवाह मान 

कैसे हो विस्मृत तुम्हारा वैभव विलास 

वो गर्व भरा अमर इतिहास।

देश ,काल और परिस्थितियों का रचनात्मकता पर प्रभाव निश्चित रूप से पड़ता है। समय के अनुसार रचना की विषयवस्तु परिवर्तित होती रहती है, रचनाएं परिमार्जित होती रहती है और रचनात्मक वातावरण भी प्रभावित होता रहता है। निर्मोही जी ने अपने कार्यों से जिस वातावरण का निर्माण किया था वह निरंतर पुष्पित और पल्लवित होता रहा। उनकी रचनाएं, उनके कार्य और उनके प्रयास आज भी हमें प्रेरित करते हैं।

आशीष दशोत्तर

12/2, कोमल नगर

बरबड़ रोड, रतलाम - 457001

मो. नं. - 9827084966

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Sun, 26 Dec 2021 23:38:00 +0530 Niraj Kumar Shukla
कवि और कविता : मोह गिरवी है हमारा, उस विधि के हाथ मेंं https://acntimes.com/poet-and-poetry-peerulal-Badal https://acntimes.com/poet-and-poetry-peerulal-Badal आशीष दशोत्तर

कविता जीवन का सार है। इसे कोई समझे या न समझे, माने या न माने, मगर इस बात को महसूस तो अवश्य करेगा कि कविता हर व्यक्ति के जीवन में उसके साथ साथ चलती है। यह कविता कब उसकी भावनाओं को कागज़ पर उतार दे, यह कहा नहीं जा सकता। जब यह कागज़ पर उतरती है तो एक रचनाकार का जन्म होता है और उसे एक दिशा मिलती है। यह किसी रचनाकार पर निर्भर करता है कि वह अपने लेखन की दिशा को किस तरह प्रवृत्त करे, किस विचार के साथ चले, किन लोगों के पक्ष में अपनी बात कहे और अपनी रचना प्रक्रिया को किस तरह विस्तारित करे।

हिंदी मालवी और भीली में एक महत्वपूर्ण मुकाम हासिल करने वाले कवि श्री पीरुलाल 'बादल' ऐसे ही रचनाकार थे जिन्होंने अपनी रचनाओं के ज़रिए सामाजिक यथार्थ को सामने लाने की कोशिश की। हालांकि उन्हें एक मंचीय कवि के रूप में अधिक प्रसिद्धि मिली और उन्होंने अपने हाव-भाव, रहन-सहन एवं बोलचाल से लोगों को गुदगुदाने का प्रयास किया। इसमें वे सफल भी रहे मगर उन्होंने सही अर्थों में आम जन जीवन से जुड़ी रचनाएं लिखकर अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता समय-समय पर अभिव्यक्त की।

उड़ गए पखेरू प्रातः की तलाश में 

शाम सो गई है, रात के बहुपाश में,

जीवन की पीड़ा पी गई नौ मास में 

उठा लेगा काल हमें एक ग्रास में।

पीरूलाल बादल जी ने मंच के मनोविज्ञान को बेहतरी से समझा था। वे मंच की तरफ प्रवृत्त हुए और कई मंचों को उन्होंने लूट लिया। पचास वर्षों तक देश के मंचों पर अपनी कविताएं पढ़कर उन्होंने वाचिक परंपरा को तो समृद्धि किया ही साथ ही अपनी रचनाओं में ग्रामीण परिवेश, सरल शब्दावली और मेल-जोल की भाषा का प्रयोग कर साहित्य को जन-जन तक पहुंचाया।

उनकी कई लोकप्रिय रचनाएं लोगों की ज़ुबान पर चढ़ी रही। उन्होंने अपनी मंचीय कविताओं के ज़रिए राजनीति पर कटाक्ष किए, व्यवस्था पर व्यंग्य भी किए और अव्यवस्था पर प्रहार भी किए। इसके बावजूद उन्होंने मंच की निम्न स्तरीय भाषा से सदैव परहेज किया। यही कारण रहा कि वे मंच पर निरंतर सक्रीय रहने के बाद भी साहित्यिक वातावरण से जुड़े रहे। उन्होंने मंचीय प्रस्तुति में हिंदी के अतिरिक्त मालवी और भीली भाषा में भी रचनाएं सुनाकर लोगों को आनंद प्रदान किया। वे अक्सर इस बात को रेखांकित भी किया करते थे कि कविता ने उन्हें किस तरह मुसीबत से बचाया। ग्रामीण अंचल में नौकरी के दौरान सुनसान इलाके से गुज़रते समय जब उन्हें लूटने के इरादे से कुछ लुटेरों ने उन्हें घेर लिया तब कविता सुनाकर वे बड़ी मुसीबत में घिरने से बचे। इसीलिए बादल जी कविता की ताक़त को समझते थे और अपनी कविता को भी उसी ताक़त के साथ प्रस्तुत किया करते थे।

ये सागर है इसमें तेरी भी नाव है

कइयों का रोटी, धंधा चुनाव है।

माना शर्मिला तेरा स्वभाव है,

देश की छाती पे कई गहरे घाव हैं।

बादल जी मंच पर जितने सक्रिय रहे उतने ही गंभीर साहित्य सृजन में भी लगे रहे। वे किसी समय शहर में होने वाली गंभीर नशिस्तों में भी शामिल हुए जिसमें उस्ताद शायर और कवि उपस्थित हुआ करते थे। ऐसी नशिस्तों में उन्होंने अपनी रचनाएं भी पढ़ी। लिहाजा वे साहित्य के उस रंग से भी वाकिफ़ थे। उनकी रचनाएं निरंतर और गति पकड़ती यदि वे मंच की ओर उन्मुख नहीं हुए होते, मगर मंच पर आने के बाद उन्होंने अपनी रचनात्मकता को आम श्रोता की पसंद के मुताबिक ढालते हुए राजनीतिक एवं सामाजिक परिप्रेक्ष्य में अपनी रचनाएं लिखीं। उनकी रचनाएं ऐसी थी जिसमें भरपूर हास्य था। वे कई बार कहा करते थे कि मेरी रचनाएं सुनने के बाद कई लोग कहते हैं कि समझ में तो कुछ नहीं आया लेकिन मज़ा बहुत आया। मंच से मज़े के लिए उन्होंने काफी कुछ कहा और यहीं उन्हें इतनी लोकप्रियता दिला गया।

तू है पढ़ा-लिखा नहीं इसकी फिकर न कर

तू जेल भी गया मगर इसकी फिकर न कर,

तू हाथों हाथ भी बिका इसकी फिकर न कर,

तू गुंडों से सबकुछ सिखा इसकी फिकर न कर।

चांद पे मानव चढ़ा तू उसके माथे चढ़।

बादल जी के एक पैर में तकलीफ़ होने से वे ठीक से चल नहीं पाते थे, मगर इस ऐब को भी उन्होंने अपनी खूबी में बदल लिया था। बचपन में इलाज के दौरान उनके साथ हुए हादसे का ज़िक्र करते हुए भी बताते थे कि किस तरह नासमझी ने उनके अच्छे-भले पैर को यह पीड़ा दे दी। इसके बाद भी वे निरंतर सक्रिय रहे। 

जब कोई व्यक्ति रचनात्मकता से जुड़ता है तो उसका प्रभाव उसके जीवन पर भी पड़ता है। बादल जी के जीवन में भी यही सब कुछ होता रहा। वे जीवन में कई तरह के संघर्षों से गुज़रे और इन संघर्षों ने उन्हें लिखने की प्रेरणा दी। वे प्रकृति के गीत भी लिखते रहें। राजनीति पर उन्होंने काफी कटाक्ष किए। अपनी सरल भाषा में और सीधी- सीधी शैली में कही गई बात काफी प्रभावी ढंग से श्रोताओं तक पहुंचती रही।

चमचों की भीड़ में सदा घिरा रहेगा तू,

संसद की अंगूठी का हीरा रहेगा तू,

उमर खयाम तो कभी कबीरा रहेगा तू,

मतदाता डूब जाए पर तिरा रहेगा तू,

किस्मत पे अपनी आज तू अपना अंगूठा जड़।

अपने अंचल के लोगों में व्याप्त प्रवृत्तियों, प्रसंगों, तीज त्यौहार और जीवन शैली को भी उन्होंने अपनी रचनाओं में शामिल किया। मंच पर उनकी रचनाएं सुनना एक अलग अनुभव हुआ करता था मगर जब कभी वे काव्य के जानकारों के बीच में बैठते और वहां पर अपनी कविता सुनाते तो उस कविता को सुनकर उनके अलग ही रूप को देखा जाता था। यही कारण था कि वे गंभीर साहित्यिक आयोजनों में भी अपनी प्रभावशाली रचनाओं के माध्यम से सभी का स्नेह पाते रहे।

नीड़ सूना, बीड़ सूना

भोर चहुंओर सूना।

दर्द खर्च से हमेशा 

बढ़ रहा है और दूना।

हंसमुख और मिलनसार व्यक्तित्व के धनी रहे बादल जी अंतिम समय में शारीरिक पीड़ा से काफी परेशान रहे। इसके बावजूद उन्होंने कभी अपने चेहरे से मुस्कान गायब नहीं होने दी। ऑक्सीजन सिलेंडर के सहारे वे सांस लेते रहे मगर उनकी हर सांस में उनकी अपनी ज़िंदगी अभिव्यक्ति होती रही। मिलने आने वालों से उसी मुस्कुराहट के साथ मिलते। यह उनकी जीवटता थी। वे जीवन और मृत्यु के सत्य को भली भांति जानते थे। इसे उन्होंने अपनी रचनाओं में भी अभिव्यक्त किया।

जाने के साथ हैं 

मौत का संबंध 

लौट आना माझी 

तुझे मेरी सौगंध।

सूनी गैल में हमारे 

कौन होगा साथ में 

मोह गिरवी है हमारा 

उस विधि के हाथ में।

रचनाकार अपनी रचनाओं के साथ सदैव मुस्कुराता रहता है। बादल जी भी अपनी रचनाओं के ज़रिए आज भी अपनी मुस्कुराहट बिखेर रहे हैं। उनकी अपनी शैली, उनका अपना प्रभाव और उनके अपने तेवर भला कब विस्मृत हो सकते हैं।

आशीष दशोत्तर

12/2, कोमल नगर

बरबड़ रोड, रतलाम (म. प्र.)

मो. 9827084966

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Sun, 19 Dec 2021 17:28:40 +0530 Niraj Kumar Shukla
कवि और कविता :  दर्द का अनुवाद मेरी ज़िंदगी, अनकहा संवाद मेरी ज़िंदगी& स्व. बृजमोहन झालानी https://acntimes.com/Poet-and-poetry--translation-of-pain-my-life-untold-dialogues-my-life https://acntimes.com/Poet-and-poetry--translation-of-pain-my-life-untold-dialogues-my-life आशीष दशोत्तर 
 
रचनात्मकता व्यक्ति को सक्रिय तो रखती ही है सृजनशील भी बनाती है। कविता लिखने से भी महत्वपूर्ण है कविता को जीना। जो अपनी कविता को अपने जीवित संपर्कों से रचते हैं वे अपनी रचना प्रक्रिया के ज़रिए सामाजिक ताने-बाने से कई दृश्य उपस्थित करने में कामयाब होते हैं। कविता की यह भी एक प्रक्रिया है और इस प्रक्रिया से गुजरना सभी के बस में नहीं होता। 
 
अपनी सृजनात्मक गतिविधियों के ज़रिए निरंतर सक्रिय रहे कवि, गीतकार श्री बृजमोहन झालानी भी ऐसे ही रचनाकार रहे जिन्होंने अपनी जीवन पद्धति से कई रचनाओं को आकार दिया। उन्होंने कविताएं बहुत कम लिखीं मगर जो भी लिखीं वे उनके जीवन अनुभवों से और अधिक अभिव्यक्त हुई।
 
निरंतर आम लोगों से मिलना और उन्हीं के बीच अपनी अभिव्यक्ति देते रहना, साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाओं के जरिए नई पीढ़ी को प्रोत्साहित करना और उनके हमक़दम बनकर आगे बढ़ाना झालानी जी के व्यक्तित्व में शामिल रहा। अपनी संपन्न पारिवारिक पृष्ठभूमि से इतर वे साहित्यिक और सांस्कृतिक धरातल पर एक सामान्य व्यक्ति बने रहे। 
 
हर कदम पर आज दिखते शूल हैं
 
देख कर डरना यही तो भूल है 
 
मत डरो बढ़ते चलो, चलते रहो 
 
ये देखने में शूल, पर सब फूल हैं।
 
बृजमोहन जी ने अपनी रचनाओं में आम आदमी के दुःख- दर्द को अभिव्यक्त किया। उनकी कविताओं में भी यह दर्द मुखरित होता रहा। हक़ीक़त में हर रचनाकार अपने आसपास घटित हुई घटनाओं से प्रभावित होता है और उससे सरोकार भी रखता है। कविता में जीवंतता और ताज़गी भी तभी आती है जब वह प्राणवान रहे। और यह प्राण किसी भी रचना में वास्तविक स्थिति का सामना कर ही होता है। बृजमोहन जी ने अपनी रचनाओं में इसी प्राण को समाविष्ट करने की कोशिश की। 
 
वक्त की लकीरों से कट गया है आदमी 
 
अपने ही हाथों से बंट गया है आदमी।
 
भीतर और बाहर उलझन ही उलझन है 
 
प्रश्नों ही प्रश्नों से पट गया है आदमी।
 
दर्द पिघल बरसा है मन के आंगन में 
 
अख़बारी कागज़ सा फट गया है आदमी। 
 
पल-पल परिवर्तित होते समय की व्यथा उनकी रचनाओं में काफी अभिव्यक्त होती रही। अपने गीतों के माध्यम से उस सुखद वातावरण की तलाश करते रहे जो मनुष्यता के साथ जुड़ा रहना चाहिए। जब उन्हें यह दिखाई नहीं दिया तो पीड़ा उनकी रचनाओं में व्यक्त हुई। उन्होंने गीत भी लिखे, ग़ज़लें भी लिखीं, मुक्त कविताएं भी लिखीं, दोहे भी लिखे, छंद भी लिखे। उनके लिखने के साथ कहने का अंदाज़ भी निराला था। वे अपनी सामान्य बातचीत में भी काव्यात्मकता का समावेश इस तरह किया करते थे कि सुनने वाला उनकी कविता से अधिक उनकी प्रस्तुति से प्रभावित हो जाया करता था। झालानी जी की यह खूबी उन्हें सबका प्रिय बनाती रही। 
 
खो गई सब कामनाएं क्या करें 
 
सो गई संभावनाएं क्या करें।
 
पास जितनी सांस उतनी उलझनें 
 
यातना ही यातनाएं क्या करें।
 
रह गई है नाम की बस ज़िंदगी 
 
मर गई है भावनाएं क्या करें।
 
वरिष्ठ कवि डॉ. जयकुमार जलज ने बृजमोहन जी की कविताओं पर ठीक ही कहा है, 'बृजमोहन झालानी शिकायतों के कवि नहीं हैं। अपनी कविताओं में वे बड़बोलेपन से भी मुक्त हैं । वे अपनी कविताओं में अपना गुणगान करके अपनी प्रतिष्ठा नहीं बढ़ाते बल्कि उनमें खुद को विलीन करते हैं। उनकी कविताएं विवाद ,आक्रमण या विद्रोह की मुद्रा में नहीं, दुखती रग पर हाथ रखने और उसका उपचार करने की मुद्रा में है।' बृजमोहन जी ने अपनी कविताओं के ज़रिए इस बात को साबित भी किया। 
 
साथ छोड़ती अपनी छाया 
 
थकी- थकी सी बेबस काया ।
 
लेकिन फिर भी लिए साथ विश्वास 
 
ज़िंदगी जीता हूं ।
 
सारी दुनिया ने मुंह फेरा 
 
निर्मित कर प्रश्नों का घेरा 
 
लेकिन फिर भी लिए साथ में आस 
 
ज़िंदगी जीता हूं ।
 
हर पल अपने शूल बने 
 
सपने कागज़ के फूल बने 
 
लेकिन फिर भी लिए याद को पास 
 
ज़िंदगी जीता हूं।
 
 
रचनाकार अन्याय और अनीति का प्रतिकार करता है। झालानी जी के यहां पर भी एक नई रोशनी लाने की चाह दिखाई पड़ती है। वे अंधेरे पर प्रहार करते हैं और उजाले की कामना करते हैं। रचनाकार को यह सोच ही ताक़तवर बनाती है। हमारे आसपास बिखरे पड़े अन्याय के अंधकार को मिटाने की जद्दोजहद में रचनाकार उजाले के पक्ष में खड़ा होता है और उसका यही पक्ष उसे मज़बूत बनाता है। 
 
टूटते संदर्भों की सांझ 
 
उदासी जानी-अजानी 
 
और घिसी ध्वनियों से टकराती 
 
आवाज़ अब टूटती हुई बह रही है ।
 
और हम जहां के तहां कब से खड़े 
 
डोलते अंधियारे के पास सन्नाटे में 
 
अपने को छुपाए जाने किस को 
 
जाने किस क्षण को ढूंढ रहे हैं। 
 
रचनाकार हर बेहतर स्थिति को सहेजने की कोशिश करता है। उसके भीतर अच्छाइयों का विस्तार, बाहर भी अच्छाइयों को देखने की चाह रखता है। बृजमोहन जी अपनी रचनाओं में इसी अच्छाई के विस्तार पर जोर देते रहे ।उन्होंने अपनी सामाजिक मिलन सरिता की पृष्ठभूमि पर वे सब अनुभव लिए जो जीवन की विविधता को प्रदर्शित करते रहे। वे साहित्य के प्रति अपने समर्पित भाव से कभी अलग नहीं हुए। वे निरंतर साहित्य, साहित्यकारों और साहित्यिक वातावरण को लेकर चिंतित भी रहे और उस के माध्यम से एक बेहतर वातावरण बनाने की कोशिश भी करते रहे।
 
 
इससे पूर्व कि किरणें उतरे 
 
चुरा ले फूल चुपके से  
 
ले जा इन फूलों को 
 
जो सुधियों से सिंचित 
 
रात की काली माटी के नन्हें से गमले में 
 
निंदिया की डार पर 
 
सपनों के फूल बन आज खिले हैं। 
 
बृजमोहन जी के जीवन के कई आयाम रहे। उन्होंने साहित्य, संगीत, राजनीति, रंगकर्म के प्रति खुद को समर्पित कर रखा था। इसके साथ ही वे रत्न परीक्षा, हस्तरेखा, आयुर्वेद, ज्योतिष, नगर के इतिहास और सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के प्रति सदैव समर्पित रहे। लोकरंजन और लोकप्रेम उनके व्यक्तित्व में शामिल रहा। यही कारण रहा कि उन्होंने जीवन को अपनी तरह से परिभाषित किया। एक सामान्यजन की दृष्टि से जीवन को देखते हुए उन्होंने विसंगतियों को भी सामने रखा और उन से पार पाने का हौंसला भी दिया।
 
 
यह कैसा वक्त आया 
 
कैसी हवा चली है।
 
भटके हैं रास्ते सब 
 
उलझी हुई गली है।
 
नफ़रत की आग फैली 
 
जलने लगी दिशाएं 
 
ये किसने ज़हर बांटा 
 
जहरीली सब हवाएं।
 
जो लूटते हैं खुशियां बांटते हैं ग़म 
 
है इनके लिए मौत की सज़ा भी यहां कम। 
 
उनके जीवन में कई रंग शामिल होते रहे। उनसे हर दिन बतियाने वाले, उनके अनुभव से दो-चार होने वाले, उनके साथ आत्मीय रिश्ते रखने वाले लोग उन्हें बेहतर जानते थे। उन्होंने अपने जीवन में जितनी रचनात्मकता रखी उतनी ही रचनात्मकता में ज़िंदगी भी शामिल की। यही कारण है कि उनकी कविताएं और गीत जीवन के आसपास घूमते नज़र आते रहे।जीवन की विडंबनाओं और विषमताओं को उन्होंने बखूबी उभारा और उसे अपनी रचनाओं का विषय भी बनाया। 
 
क्यों पथरीला शहर लगता है
 
हवा -पानी में ज़हर लगता है। 
 
रोशनी कम अंधेरा बहुत है 
 
अपने साए से डर लगता है।
 
यह कैसा ज़माना आ गया है 
 
जीने मरने पर कर लगता है।
 
नदी में मछलियां नहीं दिखतीं 
 
शायद पानी में मगर लगता है। 
 
बृजमोहन जी रिश्तों को निभाते ही नहीं रहे, जीते भी रहे। उनकी कविताएं रिश्तों के आसपास केंद्रित रही। उनकी कविताओं में उनके अपने दुःख- दर्द शामिल रहे। उनके अपने संबंध, उनके अपने संदर्भ, उनकी रचनाओं से जुड़े रहे । वे इन रिश्तों के प्रति पूर्ण संवेदनशील भी रहे और उन्हें अपने तरीके से सहेजते भी रहे । 
 
यादों को भेज दिया आप नहीं आए 
 
बरस बने जुग जैसे ,अनजानी दूरी है 
 
कैसे बतलाऊं मैं किस की मजबूरी है।
 
डोले रे यहां वहां यादों के साए।
 
नैनों में तुम छाए, सांस -सांस तेरा नाम 
 
तुझको न भुला पाते सुबह और शाम 
 
बिना तेरे सच कहते दुनिया न भाए। 
 
किसी भी रचनाकार के लिए आत्मीय संबंध उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं जितने व्यक्तिगत संबंध।यह आवश्यक नहीं कि रिश्ते सिर्फ व्यक्ति से व्यक्ति के हों, एक रचनाकार के संबंध अपनी स्मृतियों से भी हो सकते हैं, अपनी प्रकृति से भी, अपने परिवेश से भी और अपनी परंपरा से भी। झालानी जी की रचनाओं में ये संबंध दिखाई देते हैं। 
 
दर्द का अनुवाद मेरी ज़िंदगी 
 
अनकहा संवाद मेरी ज़िंदगी। 
 
झेलते ही झेलते दुःख- दर्द को 
 
हो गई अवसाद मेरी ज़िंदगी ।
 
वक्त ने धोखा दिया हर मोड़ पर 
 
हो गई बर्बाद मेरी ज़िंदगी ।
 
आज अपने ही खड़े वादी बने 
 
क्या करे प्रतिवाद मेरी ज़िंदगी।
 
ब्रज रहे या न रहे बस चाह है 
 
तुम रहो आबाद मेरी ज़िंदगी।
 
झालानी जी की कविता और उनके गीत संख्या में बहुत कम रहे मगर उनका प्रभाव काफी गहरा रहा। वे एक रचनाकार के तौर पर ,साहित्य प्रेमी के तौर पर जाने गए। उन्होंने रतलाम शहर की साहित्यिक संस्थाओं के उन्नयन के लिए , उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए, स्थापित करने के लिए बहुत प्रयास किए। निश्चित रूप से अपनी रचनात्मक प्रक्रिया के साथ अपने शहर और अपने परिवेश में साहित्यिक वातावरण को बनाए रखना और उसे पल्लवित करना भी एक रचनाकार का दायित्व होता है और इसमें वे अंतिम वक्त तक लगे रहे । उन्होंने जो कामना की कि, ज़िंदगी सदैव आबाद रहे, तो उनकी रचनात्मकता और सक्रियता के साथ उनकी जीवन शैली सदैव याद और आबाद रहेगी।
 

आशीष दशोत्तर
12/2, कोमल नगर
बरबड़ रोड
रतलाम - 457001
मो. नं.  9827084966
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Tue, 23 Nov 2021 11:37:24 +0530 Niraj Kumar Shukla
Sharad Purnima Special में देखिए कवियों की नजर से सोलह कला में पारंगत 'ये पूनम का चांद' और अमृत बरसाता 'शरद की पूर्णिमा का चांद!' https://acntimes.com/sharad-purnima-special https://acntimes.com/sharad-purnima-special

चंद्रमा को सोलह कलाओं में पारंगत माना जाता है। जितनी इसकी कलाएं, लोगों के जीवन में उतने ही इसके महत्व हैं। किसी को यह चंदा मामा लगता लगता है तो किसी को इसमें अपनी प्रेमिका और प्रेमी नजर आती है। किसी के लिए यह अखंड सौभाग्य का प्रतीक है तो किसी के लिए चांदनी रात में खीर की कटोरी में अमृत बरसाने वाला देवता। इसके बिना ईद अधूरी है तो चौथ के चांद के बिना सुहाग भी। सूरज से तपते तन को शीतलता देने वाला चांद ही हर महीने की पूरणमासी पर सबका चहेता बन जाता है। ज्वार और भाटा लाने के लिए जिम्मेदार यही चांद शरद ऋतु की पूर्णिमा के आकाश पर सोलह शृंगार किए वहुए किसी नव यौवना से कम नजर नहीं आता। आइये, जानते हैं हमारे कवि और गीतकार शरद पूर्णिमा के चांद को किस रूप में देखते और ( Sharad Purnima Special ) परिभाषित करते हैं।

शरण की पूर्णिमा का चांद !

अज़हर हाशमी

रेशमी किरणों का गोला,
रंग जैसे धौला - धौला।
आसमां में जैसे थाली,
चांदनी की खीर वाली।

ऐसा दिखता है-
शरद की पूर्णिमा का चांद !

शून्य के आकार वाला,
तारों के दरबार वाला।
ज्योति ही देता है जग में,
घूमता रहता है नभ में।

कहीं न टिकता है -
शरण की पूर्णिमा का चांद !

इससे है अमृत बरसता,
जिससे आती है सरसता।
है गगन ही इसका दफ्तर,
और उजाला है रजिस्टर।

शुभ ही लिखता है-
शरद की पूर्णिमा का चांद।

Sharad Purnima Special

अज़हर हाशमी

32 - इंदिरानगर,
रतलाम (मप्र)
दूरभाष - 07412 260221

यह भी देखें... Ladli Laxmi Utsav : CM शिवराज ने प्रो. हाशमी की कविता ‘बेटियां पावन दुआएं हैं…’ सुनाकर बेटियों का महत्व पहचानने का आह्वान किया, बोले- ‘मुझे यह कविता बहुत पसंद है’

ये पूनम का चांद

आशीष दशोत्तर

इतराता, बलखाता आए ये पूनम का चांद
कितनी यादों को संग लाए ये पूनम का चांद।

उजला - उजला रूप है इसका निखरा - निखरा रंग
देखके इसको खूब निखारे गोरी अपने अंग ।
शरमाता, भरमाता आए ये पूनम का चांद ।
कितनी यादों को संग लाए ये पूनम का चांद।

काली-काली रात निखर कर गोरी गट्ट हुई
चांद को लेकर सब लोगों में लट्ठम - लट्ठ हुई
उलझाता, सुलझाता आए ये पूनम का चांद।
कितनी यादों को संग लाए ये पूनम का चांद।

दादुर - झिंगुर मौन हुए हैं, जुगनू है खामोश
फूल, कली, तितली, भंवरों ने खोये अपने होश
सबके मन में आग लगाए ये पूनम का चांद ।
कितनी यादों को संग लाए ये पूनम का चांद।

देख कलाएं सोलह इसकी हम सब हैं अभिभूत,
माना है 'आशीष' इसे ही श्यामसखा का दूत,
अमृत रस को जब छलकाए ये पूनम का चांद,
कितनी यादों को संग लाए ये पूनम का चांद ।

Sharad Purnima Special
आशीष दशोत्तर

12/2, कोमल नगर
बरबड़ रोड
रतलाम - 457001
मो. 9827084966

(Sharad Purnima Special)

यह भी देखें... Dussehra Special में पढ़िए युवा व्यंग्यकार आशीष दशोत्तर का व्यंग्य- ‘बढ़ता रावण, घटता मानव’

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Wed, 20 Oct 2021 16:16:45 +0530 Niraj Kumar Shukla
स्त्री एक तारा है : डॉ. मुरलीधर चांदनीवाला https://acntimes.com/Woman-is-a-star-Dr-Murlidhar-Chandniwala https://acntimes.com/Woman-is-a-star-Dr-Murlidhar-Chandniwala स्त्री एक तारा है
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स्त्री केन्द्र में है हमारे,
उसके आस पास ही बुनती है दुनिया ,
उसके भीतर से उमड़ता हुआ आता है
जीवन का युद्ध,
युद्ध का प्रयाणगीत,
गीत के सब छंद।
पूरा इतिहास बहता हुआ आता है
आदमी का, आदमी के मन का।

स्त्री भी मिट्टी की ही बनी हुई है,
उसके भीतर आकाश कुछ बड़ा होता है,
उसके भीतर बैठी हुई सनातन अग्नि को
कुछ ऋषियों ने छू कर देखा,
कुछ प्रदक्षिणा कर लौट आये,
कुछ छूते ही जल मरे
और कुछ ने सोने की डिब्बी में भर कर
उसे सितारा बन जाने दिया,
बहुत सारे तो वे थे
जो मिट्टी से खेलते रहे
और एक दिन मिट्टी में बदल गये।

नदी से लौट कर आती हुई
स्त्री को देखिए कभी,
माथे पर पानी का घड़ा धरे हुए
या उसे छोटे शिशु की तरह
बगल से चिपकाये,
वह नदी की कलशयात्रा के
रथ की तरह लगती है,
या माता का चलता हुआ मंदिर
जिसके चरण पड़ने से
धरती जी उठती है।

स्त्री कभी-कभी पानी बन जाती है,
कभी-कभी संजीवनियों का बादल बन कर
बरस जाती है पहाड़ों पर,
कभी नाच उठती है उमंग में
पंख फैलाये हुए मयूर की तरह
और कभी सिंहिनी की तरह गरजती हुई
धरती को कँप कँपा देती है।

कभी देखना, समुद्र है क्या ?
नदियों का बड़ा मेला।
वे लौट जाएँ मर्यादा छोड़ कर पीछे
फिर समुद्र को देखने के लिये
चाँद कभी नहीं उतरेगा धरती पर।
स्त्री को देखो, जैसे समुद्र को देखते हो।
स्त्री को देखो, जैसे आकाश को देखते हो।
स्त्री को इस तरह मत देखो
कि वह हल जोत रही है
और आप आकाश में तारे गिन रहे हैं।

स्त्री एक तारा है,
जो उतरता है धरती के आकाश में।

Screenshot_2019-04-11-13-07-52-505_com.facebook.katana

डॉ. मुरलीधर चांदनीवाला
साहित्यकार

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Mon, 08 Mar 2021 11:00:42 +0530 Niraj Kumar Shukla