WWW.ACNTIMES.COM & : पुस्तक समीक्षा https://acntimes.com/rss/category/book-review WWW.ACNTIMES.COM & : पुस्तक समीक्षा en Copyright @ ACNTIMES.COM | All Rights Reserved | Webmaster : HARSH SHUKLA पुस्तक चर्चा : अच्छी सोहबतों की 'सोहबतें' https://acntimes.com/Book-discussion-Sohabatein-of-good-companions https://acntimes.com/Book-discussion-Sohabatein-of-good-companions संजय परसाई 'सरल' 

वरिष्ठ रचनाकार आशीष दशोत्तर का सद्य: प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह 'सोहबतें' पाठकों के हाथों में है। जैसा कि पुस्तक के शीर्षक 'सोहबतें' से ही ज्ञात होता है कि यह रचनाएं सोहबतों का ही असर है। सोहबतों में रहकर ही इन रचनाओं ने जन्म लिया है।

सोहबत या संगति व्यक्ति के व्यक्तित्व और विकास का एक पायदान होती है। अच्छी सोहबत अच्छे और बुरी सोहबतें बुरे रास्ते पर ले जाती हैं लेकिन हमें खुशी है कि आशीष की सोहबत अच्छे और श्रेष्ठ लोगों से रही और उसी का परिणाम है की अच्छी सोहबतों की 'सोहबतें' हमारे हाथों में है।

आशीष की यह ग़ज़लें हर एक पायदान पर निखरती चली जाती हैं क्योंकि जैसे-जैसे अच्छे लोग मिलते गए अच्छी और उम्दा रचनाएं जन्म लेती गईं।

 मुश्किलों को देखकर हम भी अगर मुँह मोड़ते,

 जिंदगी तुझको यहां किसके भरोसे छोड़ते?

वहीं एक अन्य ग़ज़ल में वे अंधेरों को शिकस्त देने की बात कहते हुए कहते हैं-

हमें आ गया है चरागों सा जलना

पड़ेगा अंधेरों तुम्हें हाथ मलना

व्यवस्थाओं पर रोष जताते हुए वे कह उठते हैं-

हमें दिन के उजालों में भी अपना हक नहीं मिलता,

तेरी खातिर तो रातों में अदालत जाग उठती है।

मिट गए घर के घर आपने क्या किया,

हम हुए दरबदर आपने क्या किया।

आखिरी वक्त में कुछ न हासिल हुआ,

सोचिए, उम्र भर आपने क्या किया।

कहते हैं कि जो काम दवा नहीं कर पाती वह काम दुआएं कर जाती है। यही कारण है की बात-बात पर दुआओं में याद रखने की मिसाल दी जाती है।

दुआ किसकी न जाने जिंदगी को मोड़ क्या दे दे,

अगर बस में है तेरे तो सभी का तू भला कर दे।

वहीं ‘भरोसा’ शब्द पर शंका जाहिर करते हुए वह कहते हैं-

भरोसा क्या करें 'आशीष' अपने पे या गैरों पे,

यकीं जिस पर किया है क्या पता वही दगा कर दे।

जरूरतमंदों तक योजनाओं का लाभ न मिल पाने और लचर व्यवस्थाओं की पोल खोलते हुए वह कहते हैं-

भरे गोदाम हैं 'आशीष' राशन मुफ्त बांटा पर,

अभी भी खा रहे हैं रोटियां कुछ लोग बासी।

 वहीं आदमी की फितरत पर तंज कसते हुए वह कहते हैं-

साया है, धूप, फूल है, कांटा है आदमी,

 समझा नहीं है कोई भी क्या-क्या है आदमी।

चंद लम्हों में वो हर, नक्श मिटा देते हैं

काम निकला तो यहां लोग भुला देते हैं।

अतः कहा जा सकता है सोहबतों में रहकर आशीष ने बहुत सी अच्छी-बुरी बातों को गहराई से सीखने और समझने का प्रयास किया है। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में प्रेम, प्यार, जज्बात हैं तो खीझ, चोट, रुसवाई भी है। वे अच्छी सोहबतों का साथ चाहते हैं और कहते हैं-

तू हो सफर में साथ तो बेहतर लगे मुझे

तेरे बिना उदास यह मंजर लगे मुझे

यह मस्तियां, उधम ये शरारत ये शोरगुल

बच्चे ना हो तो घर भी कहां घर लगे मुझे।

अतः कहा जा सकता है कि सोहबतों ने आशीष की कलम को एक नई राह और रोशनी दिखाई है और इस रोशनी के पथ पर निर्भीक, निडर हो अपनी कलम को तेज करते हुए अंधेरे के पंखों को काटते हुए ऊंची उड़ान को अग्रसर हैं। वे सकारात्मक सोचते हैं और अन्य को भी सकारात्मक सोच की प्रेरणा देते हैं।

भूखे लोगों को रोटी मिली जब कभी,

मेरी बस्ती पे उस दिन शबाब आएगा।

वबा, तूफान, दहशत, भूख, आँसू और बेगारी

 हजारों गम हैं फिर भी देखना हम मुस्कुराएंगे।

आशीष की रचनाएं सकारात्मक संदेश देती प्रतीत होती है। यह संदेश सकारात्मक सोच और अच्छी सोहबतों का ही तो नतीजा है। यदि पाठक भी चाहते हैं कि अच्छी सोहबत उन्हें भी मिले तो उन्हें इंक पब्लिकेशन की यह 'सोहबतें' अवश्य पढ़नी चाहिए। 

 संजय परसाई ‘सरल’

 118, शक्तिनगर, गली नंबर 2

 (महाकाल मंदिर के सामने )

रतलाम (मप्र)

चलित दूरभाष : 98270 47920

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Tue, 16 Jul 2024 10:15:25 +0530 Niraj Kumar Shukla
समीक्षा : आशीष दशोत्तर का ग़ज़ल संग्रह ‘सम से विषम हुए’ सख्त राहों पर शब्दों का बिंदास सफरनामा& डॉ. प्रकाश उपाध्याय https://acntimes.com/Ghazal-collection-Even-to-odd-a-bold-journey-of-words-on-tough-paths https://acntimes.com/Ghazal-collection-Even-to-odd-a-bold-journey-of-words-on-tough-paths डॉ. प्रकाश उपाध्याय

हालात की सम-विषम राहों के उतार-चढ़ावों के बीच अपने बिंदास सफर पर निकली ग़ज़ल का जीवंत सफरनामा है "सम से विषम हुए" ग़ज़ल संग्रह। युवा ग़ज़लकार आशीष दशोत्तर के इस सद्यः प्रकाशित संग्रह में कुल 120 ग़जलें हैं। आशीष की ये ग़जलें बकौल उनके "एक बेहतर दुनिया के ख्वाब को शब्दों में ढालने की कोशिश है।" इस कोशिश में वे किन सीमाओं तक पहुँचने में कामयाब रहे हैं- इस तथ्य की बानगी बेहतरीन व पुख्ता रूप से प्रस्तुत करती हैं- ये ग़जलें।

समकालीन यथार्थ को गहराई से आत्मसात कर उसके आशय को रचनात्मक कैनवास पर रूपायित करना आज के सृजन की अनिवार्यता बन चुका है। अपने इर्दगिर्द के परिवेश से उपजी चुनौतियाँ कलमकार को जहाँ एक ओर शिद्दत से यथास्थितिवाद के खिलाफ लड़ने की ताकत देती हैं, तो वहीं दूसरी ओर अंतर्मन की वेदना को जुबान देते हुए सृजन की सार्थकता की तलाश में भी मददगार बनती हैं।

मौजूदा दौर में हमें अनेक नवोदित कलमकारों की रचनाएँ- गीतों, ग़ज़लों और कविताओं की शक्ल में देखने को मिल रही हैं। युवा कलम की ये सृजन-बयार निश्चित ही हिंदी रचना जगत के लिये एक बेहद ताज़गीभरा शुभ संकेत है। इन तमाम उदीयमान रचनाकारों के बीच आशीष दशोत्तर जैसे विचारशील व सृजनात्मकता का व्यापक फलक ग्रहण करने वाले युवा कवि व ग़ज़लकार न केवल अत्यंत प्रभावी ढंग से अनवरत लिख रहे हैं, बल्कि अपनी एक सर्वथा पृथक व विरल पहचान भी स्थापित कर चुके हैं।

आशीष के ताज़ा ग़ज़ल संग्रह "सम से विषम हुए" की ग़ज़लों पर विमर्शपरक दृष्टिपात् करने पर स्पष्ट होता है कि ये तमाम ग़जलें काफी सहजता लिये हैं। इनमें यथेष्ट संप्रेषणीयता है। इन ग़ज़लों में नानाविध अनुभूतियों के रंग लेकर रची गई खूबसूरत इंद्रधनुषी छवियाँ हैं। ये ग़जलें पाठकों को संवेदनाओं और प्रभावों के एक विरल अंतराल में ले जाती हैं। इतना ही नहीं, भीतर की दुखती रगों पर अंगुली रखती हुई, उस क्षोभ के लिये भी रास्ता बनाती है जो मौजूदा समय की नाना विसंगतियों और विरोधाभासों की उपज है।

आशीष की ये ग़ज़लें बखूबी सम-विषम जीवन अनुभवों के वैविध्यपूर्ण परिदृश्य प्रस्तुत करती हैं। प्रेम, स्नेह, हर्ष, विषाद, वेदना, अश्रु, उदासी, घुटन, संत्रास, रोष, विरोध व विक्षोभ जैसे अनेक मनोभावों को रूपायित करती हुई, उस उजास को भी आविष्कृत करती हैं, जो कठिन जीवन संघर्षों के बीच विकसित होते आशावाद से फूटता है। इन ग़ज़लों में- पेड़, नदी, परिंदे, आसमाँ, तितली, जुगनू, फूल, खुशबू, पतझर, बहार और बरसातें हैं, तो वहीं दूसरी ओर आग, आईने, पत्थर, जुल्म, हिंसा, नफरतें, बगावत और खुद्दारी के तेवर हैं। साथ ही साथ अनेक अश्रुभीगी स्मृतियाँ हैं, महानगरीय जीवन का विद्रूप है, दिन-ब-दिन विघटित होते रिश्तों और परंपरागत मूल्यों की टूटनभरी कसक है, विस्मृत गाथाएँ हैं, निःशब्द पीड़ाएँ हैं, मौजूदा असंगत स्थितियों और विरोधाभासों के खिलाफ कसमसाता आक्रोश है तथा प्रतिकूल हालातों के अँधेरे को चीरती प्रबल जिजीविषा की चमकती लौ है- और हैं इन सभी को रूपांकित करते विविध शब्द चित्र व ध्वनि बिम्ब।

"सम से विषम हुए" संग्रह की ग़ज़लों के अनेक परिदृश्य सोच के आयाम रचते हुए पाठकों का खासा ध्यान अपने तईं आकृष्ट करते हैं... 

ये भी नक्शा तेरे घर का नायाब है

कच्ची बुनियाद है, ऊँची मेहराब है

बहते दरिया कहाँ से कहाँ तक गए

कैद अपनी अना में ही तालाब है

* * *

ग़म-खुशी, आँसू-हँसी, अपने पराए सब तो हैं

रंग बिखरे हैं हज़ारों ज़िंदगी के रंग में

दुश्मनी को भूल जाएँ दो घड़ी के वास्ते

क्यूँ न हम-तुम डूब जाएँ दोस्ती के रंग में

* * *

ग़ज़लों पे मेरी मुझको मिली दाद सुनेगा

पर कौन मेरे दर्द का अनुवाद सुनेगा?

* * *

दुनिया की नज़र में है जो इंसान भला सा

सदियों से कतारों में खड़ा है वो ठगा सा

* * *

नफ़रतें, हत्या, बगावत, जुल्म, हिंसा देखकर

ज़िंदगी गुजरेगी आख़िर और क्या क्या देख कर।

भीड़ भी है, उलझनें भी, ख्वाहिशें भी, चाह भी

आदमी हैरतजदा है खुद को तनहा देख कर।

* * *

है कौन यहाँ जिसको अवसाद नहीं है

इक तू ही अकेला कोई अपवाद नहीं है

होलिका है दुनिया, कोई प्रहलाद नहीं है

होली का जो मकसद है, इसे याद नहीं है

* * *

जिंदगी जब भी मुस्कुराई है

जाने क्यों आँख डबडबाई है

ये जो विरसे की चारपाई है

मेरे हिस्से में यही आई है

* * *

तमगों से भला क्या मेरा ईमान बिकेगा

मुमकिन नहीं मेरे लिये लहजे को बदलना।

* * *

ये परिंदे, ये तितली, ये गुल औ धनक

इनको  रँगता  यहाँ  कौन  रंगरेज  है?

* * *

फूल, तितली, नर्म शाखें, अब कहाँ ठंडी हवा

हसरतों का एक जंगल, दूर तक फैला हुआ

* * *

छोटे दिये का कोई बड़प्पन भी देख ले

देकर सभी को रोशनी बेनूर हो गया।

* * *

खुशहाल जिंदगानी के हालात चाहिए

अम्नो अमा, सुकून के लम्हात चाहिए

आने को बेकरार है, फस्ले-बहार फिर

सूखी हुई ज़मीन को बरसात चाहिए।

* * *

कागजों पर जो नदी फैली हुई है दूर तक

उस नदी में अब सियासत नाव भी चलावाएगी।

* * *

दुनिया में अब न प्यार का रिश्ता तलाश कर

बेनूर आईने में न चेहरा तलाश कर।

* * *

ऐसी हो जाए आपकी दुनिया

जैसे खिलते गुलाब की दुनिया।

देखना खुद ही चल के आएगी

धूप के बाद छाँव की दुनिया।

* * *

कुल मिलाकर आशीष की ग़जलें अपने रचनागत कौशल तथा निरंतर परिपक्व होती विचार व भाव दृष्टि के बल पर नवीन संभावनाओं के आयाम तलाशती दिखाई देती हैं।

निज अनुभूतियों के विविध रंग लेकर सुंदर ग़ज़लों के धनक रचने वाले युवा कलमकार आशीष इसी तरह निरंतर सृजनरत रहें और खूब बेहतर और सार्थक लिखते रहें। सस्नेह अकूत मंगल कामनाएँ!!

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Fri, 17 Mar 2023 22:19:25 +0530 Niraj Kumar Shukla
पुस्तक समीक्षा : 'रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद (जीवन और दर्शन)' पुस्तक की समीक्षा श्रद्धा के भाव को तराजू पर तौलने के समान https://acntimes.com/Ramakrishna-Paramhansa-and-Swami-Vivekananda-Life-and-Philosophy-Book-Review-Like-weighing-the-spirit-of-reverence-on-a-scale https://acntimes.com/Ramakrishna-Paramhansa-and-Swami-Vivekananda-Life-and-Philosophy-Book-Review-Like-weighing-the-spirit-of-reverence-on-a-scale नवनीत मेहता

लेखिका 'श्वेता नागर' की प्रथम प्रकाशित पुस्तक 'रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद (जीवन और दर्शन)' जिसका प्रकाशन साहित्य अकादमी, म.प्र.के सहयोग से हुआ है। इस पुस्तक की समीक्षा करना यानी श्रद्धा के भाव को तराजू पर तौलने के समान है जो कि संभव नहीं है। श्रद्धा भाव 'समीक्षा' का विषय नहीं हो सकता है वह केवल 'अनुभूति' है जहाँ मस्तिष्क को तर्कों और हृदय को द्वंद भाव से मुक्त करना ही इसका मूल भाव है और यह पुस्तक भी श्रद्धा भाव का पर्याय है। लेखिका श्वेता नागर ने इस पुस्तक के संदर्भ में लिखे अपने मनोगत यानी मन के भावों को इस तरह व्यक्त किया है -

'प्रस्तुत कृति के लेखन के मूल में रामकृष्ण देव और स्वामी विवेकानंद के प्रति श्रद्धा भाव ही प्रमुख रहा है इसलिए इसमें जो कुछ भी मैंने अभिव्यक्त किया है वह तर्क की तुला पर तौल कर नहीं अपितु श्रद्धा की शिला पर अंकन है।'

इस पुस्तक को श्रद्धा भाव से पढ़ा जाए तो पाठक को वैसा ही अनुभव होगा जैसे कि स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस से वह साक्षात संवाद कर रहा है। चूँकि मैं रंगकर्म से जुड़ा रहा हूँ इसलिए मुझे इस पुस्तक के रामकृष्ण परमहंस वाले अध्याय ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे उनके (रामकृष्ण परमहंस) जीवन और दर्शन का मंचन हो रहा है। उल्लेखनीय है कि रामकृष्ण परमहंस और माँ शारदा देवी से जुड़े एक प्रसंग में शिव का अभिनय करते हुए रामकृष्ण देव भाव विभोर होकर स्वयं समाधि की अवस्था में आ गये थे और मंच पर अभिनीत इस दृश्य को देखकर माँ शारदा देवी जो कि उस समय एक छोटी बालिका थी  दिव्य अनुभूति हुई। इस प्रसंग की लेखिका श्वेता नागर ने अपनी पुस्तक में जीवंत प्रस्तुती दी है। 

इस पुस्तक का परिशिष्ट 1 जो कि रामकृष्ण परमहंस के प्रेरक प्रसंगों से जुड़ा है वास्तव में उल्लेखनीय और संग्रहणीय है। इसमें रामकृष्ण परमहंस और उनके शिष्यों के बीच जो संवाद है उसमें नैतिक शिक्षा की अनुगूंज तो है ही आध्यात्मिक मूल्यों की स्थापना का संदेश भी है। 

पुस्तक के परिशिष्ट 2 में रामकृष्ण परमहंस की सूक्तियाँ है जो गागर में सागर की तरह है। 

इस पुस्तक में स्वामी विवेकानंद और उनके चिंतन को सरल शब्दों के साथ ही छोटे-छोटे अध्यायों में विभाजित करके समझाने का प्रयास किया गया है जैसे इसका अध्याय 'श्रीमद भगवद् गीता का कर्म और स्वामी विवेकानंद' इसमें स्वामी विवेकानंद ने जो युवाओं को कर्म करने का संदेश दिया है उस संदेश की यह सारगर्भित प्रस्तुती है।

सारांश यह है कि यह पुस्तक रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के जीवन और दर्शन पर पढ़ने वाले पाठकों की प्यास बुझाती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता तो यह है कि आकार में छोटी इस पुस्तक में विराटता का समुद्र समाया हुआ है। 

इस विषय पर युवा लेखिका श्वेता नागर ने लिखकर युवा पीढ़ी के लिए आदर्श प्रस्तुत किया है। अतः लेखिका के इस श्रम-साध्य प्रयास को देखते हुए मुझे यह पंक्तियाँ याद आती है -

"नारी तुम केवल श्रद्धा हो
विश्वास रजत नग पग तल में
पीयूष स्त्रोत्र सी बहा करो
जीवन के सुंदर समतल में"

कवि जयशंकर प्रसाद की पंक्तियाँ श्वेता नागर की लेखनी को शीर्ष पर पहुंचने में सहायक होगी।

(नवनीत मेहता)

रंगकर्मी एवं सेवानिवृत बैंक अधिकारी,

रतलाम (मप्र)

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Mon, 23 May 2022 11:44:42 +0530 Niraj Kumar Shukla
ऑनलाइन और सोशल मीडिया में भी छपे हुए शब्दों का ऐतिहासिक महत्व है, काव्य संकलन का प्रकाशन बहुत मुश्किल& डॉ. जयकुमार जलज https://acntimes.com/Release-of-Kavyanubhuti-a-compilation-of-works-of-200-authors-published-by-Anubhuti-Sanstha https://acntimes.com/Release-of-Kavyanubhuti-a-compilation-of-works-of-200-authors-published-by-Anubhuti-Sanstha अनुभूति संस्था द्वारा प्रकाशित 200 रचनाकारों की रचनाओं के संकलन काव्यानुभूति का विमोचन

एसीएन टाइम्स @ रतलाम । ऑनलाइन और सोशल मीडिया के समय में भी छपे हुए शब्दों का विशिष्ट महत्व है। वे इतिहास की धरोहर होकर ऐतिहासिक दस्तावेज हैं। वोकल फॉर लोकल का नारा देश के साथ ही ग्रामीण अंचलों में भी प्रभावी है। किसी भी काव्य संकलन का प्रकाशन करना बहुत ही मुश्किल कार्य है। यह समय साध्य के साथ ही श्रम साध्य भी है। नये रचनाकारों व प्रतिभाओं को उभारने का काम अनुभूति संस्था लंबे समय से कर रही है।

ये विचार भाषाविद् व वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. जयकुमार जलज ने मुख्य अतिथि के रूप में साहित्यिक संस्था अनुभूति द्वारा अखिल भारतीय काव्य संकलन काव्यानुभूति के विमोचन समारोह में कही। समारोह का आयोजन एक निजी होटल में किया गया था।

अध्यक्षता शिक्षाविद् डॉ. मुरलीधर चांदनीवाला ने की। उन्होंने कहा कि काव्यानुभूति संकलन में रचनाकारों की पीढ़ियों का सुन्दर समन्वय है। संकलन में वैदिक ग्रंथ हैं कमतर नहीं है। इसमें कई खूबियां समाहित हैं। युवा पीढ़ी को वरिष्ठ रचनाकारों की पूजा भाव से पढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि बिना अध्ययन और चिंतन के लेखन में निखार नहीं आता है। डॉ. चांदनीवाला ने कालीदास एवं डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन के समय के कवियों को भी उधृत किया।

अनुभूति संस्था ने रतलाम के रचनाकारों का किया रोशन, डॉ. उपाध्याय ने प्रस्तुत किया गीत

संस्था के सरंक्षक अभिभाषक विशेष अतिथि रमणसिंह सोलंकी ने कहा कि साहित्य साधना की डगर कठिन होकर रोचक भी है। रतलाम नगर की माटी का नाम पूरे भारत में अनुभूति संस्था द्वारा रतलाम के रचनाकारों को पूरी निष्ठा के साथ साहित्य के विकास के लिए प्रतिबद्ध किया है। इस अवसर पर विशेष अतिथि नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रकाश उपाध्याय (क्षितिज) जावरा ने भी संबोधित किया। उन्होंने गीत प्रस्तुत किया। विशेष अतिथि संयुक्त आयुक्त पंचायती राज प्रशिक्षण राउ जिला इंदौर के प्रतीक सोनवलकर ने कहा काव्यानुभूति के प्रकाशन पर संस्था की पूरी टीम समर्पित भावना से कार्य किया। इसकी हम सराहना करते हुए शुभकामनाएं देते हैं। सोनवलकर ने स्व. दिनकर सोनवलकर की रचना का सस्वर संगीत के रूप में प्रस्तुत किया।

अनुभूति संस्था की 46 वर्षों की साहित्यिक विकास यात्रा पर डाला प्रकाश

अनुभूति के अध्यक्ष डॉ. मोहन परमार ने संस्था की ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि से लेकर 46 वर्षों की साहित्यिक विकास यात्रा की विशब्द व्याख्या की। सचिव रामचन्द्र गेहलोत अम्बर ने काव्यानुभूति के प्रकाशन के सबंध में विचार व्यक्त किए। संस्था सरंक्षक दिनेश जैन ने आगामी भविष्य की योजनाओं की विस्तार से जानकारी दी। सम्पादक मण्डल के वरिष्ठ सदस्य प्रणयेश जैन ने प्रकाशन में आई बाधाओं का उल्लेख करते हुए संकलन में कवियों, गीतों और गजलों की साहित्यिक पड़ताल कर टिप्पणी प्रस्तुत की।

इस अवसर पर मंत्रणा साहित्य परिषद् नागदा के अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीनारायण सत्यार्थी एवं नगर के वयोवृध्द गीतकार मणीलाल पोरवाल का संस्था सदस्यों द्वारा शाल से सम्मानित किया।

अतिथियों और रचनाकारों को किया स्वागत

कार्यक्रम का प्रारंभ सरस्वती वंदना व दीप प्रज्वलित कर शैलेन्द्र भट्ट एवं सामाजिक न्याय विभाग के प्रमुख कलाकार हेमन्त जोशी ने की। अतिथियों का स्वागत संस्था के वरिष्ठ साथी सुभाष यादव, रामचन्द्र फुहार, सतीश जोशी, सय्यद शौकत अली, श्रेणिक बाफना, अकरम शिरानी, प्रकाश हेमावत, जावरा के वरिष्ठ कहानीकार रमेश मनोहरा, डॉ. हरिकृष्ण बड़ोदिया, हास्य कवि वरिष्ठ साहित्यकार धमचक मुल्थानी, डॉ. शोभना तिवारी, आशारानी उपाध्याय, दिनेश उपाध्याय आदि रचनाकारों ने अतिथियों व सम्माननीय सदस्यों का स्वागत किया।

समारोह में ये रहे मौजूद

कार्यक्रम में राजेश कांठेड़, राजेन्द्र रघुवंशी, डॉ. हरिकृष्ण बड़ौदिया, प्रभुलाल रावल, सुरेश माथुर, राजेश रावल, डॉ. शोभना तिवारी, सोना नागर, आशा उपाध्याय, दिनेश उपाध्याय, मयूर व्यास, रमेश मनोहरा, सिद्धिक रतलामी, फैज रतलामी, अकरण रतलामी, डॉ. राजेश तिवारी, जगदीश चौहान सहित रतलाम जिले के अलावा इंदौर, उज्जैन, सैलाना, जावरा एवं नागदा जंक्शन के साहित्यकार एवं नगर के प्रबुद्ध जन मौजूद थे। संचालन आशीष दशोत्तर ने किया। आभार संस्था उपाध्यक्ष हरिशंकर भटनागर ने माना।

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Mon, 09 May 2022 22:50:32 +0530 Niraj Kumar Shukla
समीक्षा लेख : स्वाधीनता संग्राम के गुमनाम क़िरदारों को सामने लाने और समझ के नए द्वार खोलने का जतन 'भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की भूमिका' https://acntimes.com/Efforts-to-bring-to-the-fore-the-anonymous-characters-of-the-freedom-struggle-and-open-new-doors-of-understanding https://acntimes.com/Efforts-to-bring-to-the-fore-the-anonymous-characters-of-the-freedom-struggle-and-open-new-doors-of-understanding आशीष दशोत्तर

  भारत देश इस वक्त अपनी स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मना रहा है। हमारे देश को आज़ादी मिले 75 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। एक देश के लिए और उसके स्वतंत्र अस्तित्व के लिए यह गौरव की बात है। किसी भी देश की अस्मिता और अस्तित्व उसकी स्वतंत्रता के साथ ही जुड़ा होता है। परतंत्र देश की अपनी सीमाएं होती हैं, विसंगतियां होती हैं और मजबूरियां भी। 

  परतंत्र भारत और स्वतंत्र भारत के अंतर को वही समझ सकता है जिसने इन दोनों परिस्थितियों में सांस ली हो। आज की पीढ़ी, जो परतंत्रता की पीड़ा से अनजान है, उनके सामने उन तथ्यों, विचारों, प्रसंगों को सामने लाना आवश्यक है, जिनके माध्यम से वे यह जान सके कि भारत देश को आज़ादी कितने लंबे संघर्ष के बाद प्राप्त हुई। नई पीढ़ी जब तक अपने अतीत से परिचित नहीं होगी, न तो उसे वर्तमान का आभास हो सकेगा और न ही वह अपने भविष्य को गढ़ सकेगी।

   इस लिहाज से राजनीति शास्त्र की अध्येता एवं शिक्षाविद डॉ. मंगलेश्वरी जोशी की पुस्तक 'भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की भूमिका' समझ के नए द्वार खोलती है। डॉ. जोशी द्वारा किए गए शोध कार्य को इस पुस्तक में समाहित किया गया है, मगर यह सिर्फ शोध कार्य नहीं, यह इतिहास बोध का भी कार्य है। मुख्य रूप से पूर्व निमाड़ क्षेत्र में 1857 के स्वाधीनता संघर्ष के उपरांत उपजी परिस्थितियों का आंकलन करने के उद्देश्य से डॉ. जोशी ने इस कार्य को करने का निश्चय किया। 

  अपने इस उद्देश्य को निरूपित करते हुए वे स्वयं कहती हैं कि 'हमारे देश के स्वाधीनता संग्राम में अनेक महान नेताओं ने योगदान दिया है। इन महान नेताओं के नेतृत्व को सफल बनाने में अनेक आंदोलनकारी हुए, जिन्होंने उसे दृढ़ता प्रदान करने में प्रमुख भूमिका निभाई। ऐसे मूक एवं कर्मठ व्यक्तियों में भारत को आज़ादी प्रदान कराने में अपने त्याग व देश प्रेम द्वारा इस महान कार्य को पूर्णता दी है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता। पूर्व निमाड़ जिले को राष्ट्रीय परिदृश्य से अलग नहीं किया जा सकता। पूर्व निमाड़ जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का योगदान अनिवार्य ही नहीं अपितु चिंतन के लिए आवश्यक भी है। पूर्व निमाड़ जिले के स्वतंत्रता सेनानियों का भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में क्या योगदान है, ऐसे सेनानी जो प्रकाश में नहीं आए और उनके महत्वपूर्ण योगदान द्वारा हमारा देश स्वतंत्र हुआ, ऐसे व्यक्तियों के बारे में जानकारी होनी चाहिए। इससे हम वंचित न रह जाएं इस उद्देश्य को लेकर यह पुस्तक रची गई है।'

  जाहिरी तौर पर इस पुस्तक के पीछे जो उद्देश्य नज़र आता है, वह अपने उन सेनानियों को याद करने का है जिन्होंने देश के लिए अपने प्राण तो न्यौछावर कर दिए मगर वे अनसुने और अनजाने ही रह गए। जब हम किसी देश की स्वतंत्रता के लिए किए गए संघर्ष के परिदृश्य को अपने विचार में लाते हैं तो यक़ीनन उस देश के हर उस तबके को हम अपने सामने पाते हैं जो अपने अपने स्तर पर स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए संघर्ष करता है। हिंदुस्तान जैसे विविधवर्णी संस्कृति वाले देश में स्वतंत्रता आंदोलन किसी एक वर्ग, किसी एक समाज, किसी एक धर्म, किसी एक विचारधारा या किसी एक उद्देश्य के पीछे सीमित नहीं रहा । देश की स्वतंत्रता में सभी का बराबर और पूर्ण सहयोग रहा । इस पुस्तक में जिन क़िरदारों का उल्लेख किया गया है वे निश्चित रूप से पूर्व निमाड़ क्षेत्र के ऐसे महत्वपूर्ण व्यक्ति रहे जिन्होंने स्वाधीनता आंदोलन में अपना सर्वस्व न्यौछावर किया। डॉ. मंगलेश्वरी जोशी ने उन क़िरदारों पर रोशनी डाल कर उन्हें जीवंत करने का कार्य किया है। 

  अपने इतिहास के प्रति लगाव ही इस तरह की अभिव्यक्ति को जन्म देता है। यह पुस्तक मुख्य रूप से सात अध्याय में वर्गीकृत की गई है। पहला भाग 'स्वाधीनता आंदोलन से पूर्व निमाड़ की स्थिति' पर केंद्रित है, जिसमें पूर्व निमाड़ का वैविध्य है। वहां की भौगोलिक एवं राजनीतिक स्थिति, वहां के प्रमुख प्राकृतिक- धार्मिक स्थल, निमाड़ के नामकरण के पीछे मौजूद पौराणिक एवं ऐतिहासिक संदर्भ, वहां का धार्मिक एवं सामाजिक स्वरूप, राजनीतिक स्थिति, प्रमुख व्यक्तित्व, क्षेत्र में निवास करने वाली जातियां, लोक संस्कृति एवं लोक पर्वों का विस्तार से वर्णन किया गया है।

  दूसरा भाग 'अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति से अट्ठारह सौ पचासी तक पूर्व निमाड़ में राष्ट्रीय आंदोलन' पर केंद्रित है। इस महत्वपूर्ण खंड में 1857 के विद्रोह के पूर्व निमाड़ पर पड़े प्रभाव पर ध्यान केंद्रित किया गया है। ख़ासतौर से तात्या टोपे की पूर्व निमाड़ क्षेत्र में गतिविधियां, उनकी मौजूदगी और उनका प्रभाव कई सारे नए संदर्भों को सामने रखता है। इस दौरान क्षेत्र की रियासतों के स्वरूप और उनकी आज़ादी के आंदोलन में भूमिका पर भी प्रकाश डाला गया है। इसी भाग में ख़िलाफत तेहरीक़, खालसा तेहरीक़, जमीअत-उल्म-ए -हिंद, मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा, आर्य समाज, आर्य कुमार सभा के साथ ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं समाजवादी दल के इस क्षेत्र में पड़े प्रभाव को रेखांकित किया गया है।

  पुस्तक का तीसरा अध्याय 'भारतीय राजनीति में उग्रवादी युग तथा पूर्व निर्माण' पर केंद्रित है। इस भाग में राष्ट्रीय आंदोलन के साथ ही इस क्षेत्र में सक्रिय रहे क्रांतिकारी नगेंद्र मोहन चक्रवर्ती, देवीदयाल जानकी प्रसाद मिश्र, श्याम राव दयाराम लश्करे, हीरालाल सोनी, विनय कुमार पाराशर, बंशीलाल पीरचंद चौधरी जैसे क्रांतिकारियों के साथ बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, बटुकेश्वर दत्त, कमलनाथ तिवारी, विजय कुमार सिन्हा के पूर्व निमाड़ क्षेत्र में पड़े प्रभाव पर विस्तार से चर्चा की गई है।

  भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गांधीवादी युग की चर्चा के बगैर कुछ नहीं कहा जा सकता। महात्मा गांधी का क़िरदार भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ऐसा रहा जिसने न सिर्फ देशवासियों को एकत्र किया बल्कि आज़ादी के लिए आंदोलन कर रहे तमाम लोगों को एकजुटता में बांधा। पुस्तक का चौथा अध्याय 'गांधीवादी युग और पूर्व निमाड़' पर ही आधारित है। इसमें असहयोग आंदोलन, चरखा एवं खादी प्रचार, शराब की दुकानों पर पिकेटिंग, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, विदेशी वस्त्रों की होली जलाना, राष्ट्रीय स्कूलों की स्थापना, झंडा सत्याग्रह, ख़िलाफत आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन का इस क्षेत्र में जो प्रभाव पड़ा उस पर विस्तार से चर्चा की गई है।

  राष्ट्रकवि पंडित माखनलाल चतुर्वेदी यहीं पर थे। उन्होंने न सिर्फ अपनी रचनाधर्मिता के ज़रिए बल्कि इस आंदोलन में सक्रिय सहभागिता कर स्वतंत्रता आंदोलन को मज़बूत किया। पुस्तक में उनका ज़िक्र करते हुए कहा गया है कि 'पूर्व निमाड़ में असहयोग आंदोलन के समय जो राष्ट्रीय चेतना जागृत हुई, वह निरंतर व्यापक होती चली गई। विशेष रूप से माखनलाल चतुर्वेदी के निमाड़ जिला कांग्रेस अध्यक्ष बन जाने के बाद यहां आंदोलन में विशेष रुप से सक्रियता आई। विद्यार्थियों ने 1923 में प्रांतीय विद्यार्थी परिषद के द्वारा सफलतापूर्वक कार्य किए। 11 अप्रैल 1930 को खंडवा गांधी चौक में माखनलाल चतुर्वेदी की अध्यक्षता में एक विशाल सभा हुई, जिसमें अध्यक्ष महोदय ने सत्याग्रह की प्रतिज्ञा पढ़ी और 30 वीरों ने उसे दोहराया। पंडित माखनलाल चतुर्वेदी को 29 अप्रैल 1930 को जबलपुर में गिरफ्तार किया गया और इन्हें 2 वर्ष का सश्रम कारावास दिया गया। 'इसके साथ ही इस खंड में हरदयाल सिंह चौहान, सिद्धनाथ आगरकर, पंडित बाबूलाल तिवारी, रायचंद नागड़ा, रंजीत प्रसाद तिवारी, जाधव मारू, डॉ. जगन्नाथ महोदय, वीरेंद्र कुमार उपाध्याय, नंदकिशोर शुक्ल, अमोलकचंद जैन के योगदान को भी शिद्दत से याद किया गया है। यह और ऐसे ही संदर्भ इस खंड को राष्ट्रीय आंदोलन से सीधा जोड़ते हैं।

  भारत छोड़ो आंदोलन का इस क्षेत्र में प्रभाव और उस दौरान जिन सेनानियों ने अपनी सक्रिय सहभागिता से इस आंदोलन को पूर्व निमाड़ क्षेत्र में गति प्रदान की उनका स्मरण भी इस खंड में किया गया है। पूर्व निमाड़ के गांधीवादी जाधव मारू, रायचंद नागड़ा, देवीलाल खन्ना, अमोलक चंद जैन, रामकृष्ण पालीवाल, ताराचंद कर्बे के कार्य का यहां बहुत विस्तार से और तमाम संदर्भों के साथ ज़िक्र किया गया है। कर्बेजी का ज़िक्र करते हुए उनके जन जागरण गीतों का भी उल्लेख किया गया है। एक जगह लेखिका यह उल्लेख करती हैं कि 'कर्बेजी अपनी कविताओं में राष्ट्रीय भाव जगाते थे।'

देश के प्रहरी सजग हो, नींद में क्यों सो रहा 

देख आंखें खोल, तेरे देश को क्या हो रहा।

हाथ तो कट ही चुके हैं और न कट जाए अंग 

डंस न ले तेरी दुखी माता को ये काले भुजंग।

  कर्बेजी ने 1925 से 1986 तक साहित्य सृजन करते हुए बाईस खंड काव्यों की रचना के साथ राष्ट्रभक्ति पूर्ण सैकड़ों गीत, कविताओं का सृजन किया। यह जानकारी अपने आप में महत्वपूर्ण और प्रभावित करने वाली है। लेखिका ने ऐसे ही अनेक क़िरदारों पर विस्तार से रोशनी डालकर उन्हें प्रकाश में लाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।

  अध्याय पांच पूर्व निमाड़ के प्रमुख आंदोलनकारी और उनकी रीति-नीति पर केंद्रित है। इसमें पंडित माखनलाल चतुर्वेदी, ठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान, सिद्धनाथ माधव आगरकर, मार्तंड राव मजूमदार, पद्म विभूषण पंडित भगवंतराव मंडलोई, फकीरचंद नानकराम कपूर जैसे महत्वपूर्ण व्यक्तित्व के जीवन वृत्त एवं इस क्षेत्र के लिए उनके द्वारा किए गए विशेष कार्यों को रेखांकित किया गया है। इसके पश्चात अध्याय छह कांग्रेस के विभिन्न अधिवेशन से लगाकर भारत विभाजन तक केंद्रित है, जिसमें पूर्वी निमाड़ की इन सभी में सहभागिता और यहां के सेनानियों के योगदान को प्रकाश में लाया गया है। अंतिम अध्याय लेखिका ने अपने शोध कार्य एवं तथ्य विश्लेषण संबंधी जानकारी प्रदान कर उपसंहार के साथ पूर्ण किया है।

  इतिहास पर लिखना बहुत सावधानी का कार्य होता है। इसमें किसी तरह की कोई चूक नहीं होना चाहिए, ख़ासतौर से तब जबकि शोध कार्य के रूप में किसी पुस्तक को लिखा जा रहा हो तो उसमें किसी भी तरह की कमी की कोई गुंजाइश नहीं होती। पूर्व निमाड़ की स्थिति को लेकर डॉ. मंगलेश्वरी जोशी ने जितनी गहनता के साथ अध्ययन किया उसे इस पुस्तक में रखने का प्रयास किया। पुस्तक हमें यह बताती है कि पूर्व निमाड़ जिला स्वाधीनता आंदोलन में अपनी सक्रिय सहभागिता करता रहा। यहां के स्वतंत्रता सेनानियों ने देश के प्रमुख आंदोलनों में अपनी सक्रिय हिस्सेदारी की। राष्ट्रीय नेतृत्व का यहां प्रभाव पड़ा और स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ सामाजिक चेतना एवं जन जागरूकता के आंदोलन भी इस क्षेत्र में निरंतर होते रहे। यहां के आंदोलन में बुद्धिजीवियों ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया और यही कारण रहा कि यहां के बुद्धिजीवी वर्ग की सक्रिय सहभागिता का गवाह पूरा देश बना। इसके साथ ही इस क्षेत्र में मौजूद छोटी-छोटी जनजातियों ने भी आंदोलन में भाग लिया, जिनका ज़िक्र भी पुस्तक में है। यहां की अपनी परंपरा और यहां के विकास की गतिविधियों में भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी निरंतर सक्रिय रहे। पूर्व निमाड़ से भगवंतराव मंडलोई एवं गंगाचरण दीक्षित संविधान निर्माण समिति में भी सदस्य के रूप में शामिल रहे एवं कालांतर में मंत्री पद भी यह प्राप्त हुआ। न सिर्फ पुरुषों ने बल्कि क्षेत्र की महिलाओं कस्तूरी बाई उपाध्याय, राधादेवी आज़ाद, जानकीबाई वर्मा एवं ऐसी ही कई वीरांगनाओं ने स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी सहभागिता की।

  ऐतिहासिक तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में डॉ. मंगलेश्वरी जोशी की पुस्तक काफी कुछ कहती है। इस वक्त इतिहास का ज़िक्र पूरे देश में हो रहा है। इतिहास पर कुछ कहना ख़तरे से खाली नहीं मगर फिर भी लेखिका ने इस पुस्तक को ऐतिहासिक तथ्यों के साथ अपने तर्कों से संतुलित करने की कोशिश की है। यह पुस्तक न सिर्फ पूर्व निमाड़ के बल्कि इस तरह अलग-अलग जिलों के लिए भी ऐतिहासिक शोध कार्य की ओर प्रवृत्त करती है। यह उन गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों को सामने लाने की पहल करती है जिन्होंने अपना सर्वस्व देश के लिए कुर्बान कर दिया। ऐसे क़िरदारों को यदि हम इस अमृत महोत्सव वर्ष में पहचान सके, उनके कार्यों का स्मरण कर सके और उनकी पहचान को पूरे देश की पहचान बना सके तो यह हमारा सौभाग्य होगा, देश के लिए गौरव होगा और इस पुस्तक की एक उपलब्धि भी साबित होगा।

12/2, कोमल नगर

बरबड़ रोड

रतलाम - 457001

मो. - 9827084966

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Tue, 18 Jan 2022 10:36:41 +0530 Niraj Kumar Shukla
साहित्यकार प्रो. हाशमी की पुस्तक ‘संस्मरण का संदूक समीक्षा के सिक्के’ विमोचित, लेखक क्रांति चतुर्वेदी ने किया वर्चुअल विमोचन https://acntimes.com/Literary-writer-Azhar-Hashmis-book-Sammaran-Ka-Sanket-Samiksha-Ke-Sikes-released https://acntimes.com/Literary-writer-Azhar-Hashmis-book-Sammaran-Ka-Sanket-Samiksha-Ke-Sikes-released एसीएन टाइम्स @ रतलाम । साहत्यिकार व चिंतक प्रो. अज़हर हाशमी द्वारा ‘संस्मरण का संदूक समीक्षा के सिक्के’ शीर्षक से लिखी गई पुस्तक का गुरुवार दोपहर विमोचन हुआ। लेखक डॉ. क्रांति चतुर्वेदी ने वर्चुवल विमोचन किया। इस अवसर पर लेखक चतुर्वेदी ने कहा कि संस्मरण हिंदी साहित्य की वह विधा है जिसमें कवयित्री महादेवी वर्मा से लेकर अज्ञेय तक ने नूतन आयाम रचे हैं। प्रो. हाशमी ने संस्मरण पर लेखन कर संस्मरण की दिशा व दशा बदल दी है। उनके लिखे संस्मरण पढ़कर ऐसा लगता है जैसे वे बोलते हुए संस्मरण हैं।

पुस्तक संदर्भ प्रकाशन भोपाल द्वारा प्रकाशित की गई है। पुस्तक में देश के कई प्रसिद्ध साहित्यकारों, लेखकों, गीतकारों, योग विशेषज्ञ आदि से संबंधित संस्मरण व समिक्षाएं हैं। प्रो. हाशमी ने 296 पृष्ठ की इस पुस्तक में अनेक साहित्यकारों, लेखकों आदि से हुई उनकी मुलाकातों व यादों का साहित्यिक भाषा में बेहतर तरीके से विवरण किया है।

इन साहित्यकारों और विभूतियों से जुड़े संस्मरण हैं पुस्तक में

पुस्तक में साहित्यकार सत्यनारायण सत्तन से लेकर डॉ. मोहन गुप्त, कहानीकार हरिमोहन बुधोलिया से लेकर पद्मश्री मेहरुन्निशा परवेज, चिंतक डॉ. प्रेम भारती से लेकर बाल साहित्य के विशेषज्ञ डॉ. विकास दवे, कवि प्रदीप पंडित से लेकर लेखिका प्रवीणा दवेसर और शब्द शिल्पी जगदीश चतुर्वेदी से लेकर व्यंगकार शरद जोशी तक के बारे में कई जानकारियां हैं।

संस्मण और समीक्षा विधा पर प्रो. हाशमी की दूसरी पुस्तक

संस्मरण व समीक्षा विधा पर प्रो. हाशमी की यह दूसरी पुस्तक है। प्रकाशक राकेश सिंह ने पुस्तक के बारे में कहा है कि प्रो. हाशमी के लेखन की एक विशेषता है। उनकी लेखन दृष्टि एकांकी नहीं है। जो बात उनके दिल तक पहुंचती है, वही शब्दों में रुपाकार हो उठती है। पाठकों के दिलों में घुसपैठ करने की उनकी रचना प्रक्रिया इतनी प्रबल है कि उन्हें विषय तलाशने नहीं पड़ते। विषय तो उनके हृदय से गुजरते हुए उनकी कलम से झरने लगते हैं। इस पुतस्क को पढ़कर पाठकों को कुछ ऐसा ही एहसास होगा।

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Thu, 13 Jan 2022 23:45:09 +0530 Niraj Kumar Shukla
प्रो. अज़हर हाशमी के जन्मदिवस (13 जनवरी) पर विशेष : विचार और क़िरदार का विस्तार करती क़लम& आशीष दशोत्तर https://acntimes.com/Pro.-Azhar-Hashmis-birthday-special-on-13th-January https://acntimes.com/Pro.-Azhar-Hashmis-birthday-special-on-13th-January आशीष दशोत्तर
 सृजन से व्यक्तित्व निखरता है, कृतित्व विस्तारित होता है और कलम धन्य होती है। जब ऐसी क़लम से रचनात्मक अभिव्यक्ति होती है तो वह न सिर्फ अपने वक्त का आईना होती है बल्कि आने वाले वक्त के लिए दस्तावेज़ भी।
 निरंतर सृजनशील व्यक्तित्व, चिंतक, विचारक, कवि, प्रवचनकार, समीक्षक एवं लेखक प्रोफ़ेसर अज़हर हाशमी जी की क़लम भी ऐसी ही वैचारिक पृष्ठभूमि को रेखांकित करती है। हाशमी जी की क़लम से निकले हुए वैचारिक संस्मरण बीते समय के साहित्यिक आयोजनों, महत्वपूर्ण क़िरदारों का तो वर्णन करती ही है साथ ही साहित्य की उस विधा को भी पल्लवित करती है जो संस्मरण और जीवनवृत्त लेखन से जुड़ी है।
 हाशमी जी अपने संस्मरण और समीक्षाओं के जरिए 'सृजन के सहयात्री' पुस्तक में एक अलग ही रूप में नज़र आते हैं । अपने समकालीनों, वरिष्ठों एवं अनुजों पर समानदृष्टि डालने का हुनर उनके पास है । वे इस पुस्तक की शुरुआत में अपने अग्रज कवि गिरिजाकुमार माथुर, शिवमंगल सिंह सुमन पर जितनी गहनता से बात करते हैं, उतनी ही आत्मीयता से पुस्तक के आख़िर में अपनी सुशिष्या डॉ. प्रवीणा दवेसर के बारे में भी गंभीरता से बात करते हैं। यह उनके समानदृष्टा पक्ष को विस्तारित करता है।
'सृजन के सहयात्री' पुस्तक अग्रज से अनुज तक जाने का अनुष्ठान है। यह पुस्तक साहित्य की परंपरा का प्रतिमान है। यह पुस्तक सृजन का सम्मान है। यह पुस्तक हाशमी जी की कलम का कमाल है। साहित्य के ललाट पर गहनता की गुलाल है।
हाशमी जी की अपनी अलग शैली और गहन दृष्टि से हर व्यक्तित्व के भीतर जाकर पड़ताल करते हैं। वे इन क़िरदारों के साथ बिताए वक्त और उनसे जुड़े संस्मरणों का ज़िक्र तो करते ही हैं साथ ही उनकी साहित्यिक खूबियों से भी परिचित करवाते हैं। वे यहां साहित्यकार, व्यंग्य और हास्य, गीत, ग़ज़ल ,उर्दू एवं मराठी के लेखकों पर अपनी क़लम चला कर उनके साथ अपने संस्करणों को साझा करते हैं। यहां उल्लेखनीय है कि हाशमी जी निरंतर अपनी साहित्यिक यात्रा में शामिल रहे साहित्यिक क़िरदारों पर अपनी क़लम चलाते रहे हैं, और नवभारत समाचार पत्र में उनका यह स्तंभ कई वर्षों से प्रति रविवार को प्रकाशित भी होता रहा है, जो अब भी जारी है। ऐसे ही क़िरदारों में से 'सृजन के सहयात्री' में उन्होंने इन साहित्यकारों के साहित्यिक एवं लेखकीय पक्ष पर अपने संस्मरण साझा किए हैं।

 उनकी अपनी शैली से किसी भी व्यक्तित्व को आसानी से समझा जा सकता है। सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी के साथ अपने संस्मरण में वे एक वाक्य कहकर समूची व्यंग्य परंपरा की व्याख्या कर देते हैं। इस संस्मरण की शुरुआत में हाशमी जी कहते हैं "मेरे मत में पद्मश्री शरद जोशी व्यंग्य के विश्वविद्यालय थे।"  इस एक वाक्य से व्यंग्य की पूरी परंपरा पर वे दृष्टिपात भी कर जाते हैं और सभी को आईना भी दिखा जाते हैं। बालकवि बैरागी से जुड़े संस्मरण में वे कहते हैं "मेरे मत में बालकवि बैरागी ऐसे साहित्यकार हैं जो तूफान से तनावग्रस्त नहीं होते, झंझावात से पस्त नहीं होते, सुनामी से संत्रस्त नहीं होते।' 
 हाशमी जी ने पुस्तक में डॉ. प्रेम भारती पर सात संस्मरण लिखे हैं। ये सभी संस्मरण डॉ. प्रेम भारती का पूरा व्यक्तित्व उजागर कर देते हैं। कोई इन संस्मरणों को पूरा न भी पढ़े और सिर्फ हाशमी जी के इस वाक्य को ही पढ़ ले तो वह प्रेम भारती जी के पूरे व्यक्तित्व से परिचित हो सकता है। हाशमी जी कहते हैं " मेरे मत में डॉ. प्रेम भारती अक्षरों के अभिनेता हैं, शब्दों के नियंता हैं, व्याकरण के सारथी हैं, साहित्य के महारथी हैं, कविता उनके लिए तप है, लेखन उनके लिए जप है, उनकी कविता सृजन की साधना है, उनका लेखन लोकमंगल की आराधना है, वे जब रचनात्मकता का बीड़ा उठाते हैं, संस्कृति और साहित्य का सेतु बनाते हैं । वे अक्षरों के अभियंता हैं इसीलिए हिंदी व्याकरण के वैभव और महत्ता का महल निर्मित करते हैं।
 शब्द की शक्ति से निर्मित इस महल में बारहखड़ी की बारादरी है, वर्णमाला का विधान है, अल्पविराम का आरंभ द्वार है, अर्धविराम का आंगन है, पूर्ण विराम का प्रकोष्ठ है, संज्ञा की सीढ़ियां हैं, समाज के झरोखे हैं, सर्वनाम के दरवाज़े हैं, क्रिया की खिड़कियां हैं, संयोजक चिन्हों की दीवारें हैं, विशेषण की छत हैं।" इतना जान लेने के बाद शायद ही कोई ऐसा हो जो डॉ. प्रेम भारती के व्यक्तित्व से पूरी तरह परिचित न हो पाए। यही हाशमी जी की कलम का कमाल है।
 हाशमी जी 'सृजन के सहयात्री' में गिरिजाकुमार माथुर, शिवमंगल सिंह सुमन, नरेश मेहता, शरद जोशी, वीरेंद्र मिश्र, श्रीकृष्ण सरल, आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी, बालकवि बैरागी, प्रेम भारती, नर्मदा प्रसाद उपाध्याय, कुंज बिहारी पांडे, शैल चतुर्वेदी, प्रदीप चौबे, माणिक वर्मा, अटल बिहारी वाजपेयी, मुकुट बिहारी सरोज, पवार राजस्थानी, राजेंद्र अनुरागी, राम कुमार चतुर्वेदी चंचल, परशुराम शुक्ल विरही, बशीर बद्र, मेहरुन्निसा परवेज़, त्रिभाषा साहित्यकार डॉ. कवठेकर और डॉ. प्रवीणा दवेसर के व्यक्तित्व पर आत्मीयता से प्रकाश डाला है। हर एक संस्मरण में इन व्यक्तित्व के साथ बिताए हाशमी जी के पलों का भी ज़िक्र है।
 एक लंबे समय तक महाविद्यालय में अध्यापन के दौरान विद्वानों से सामीप्य, राष्ट्रीय मंचों पर अपनी प्रभावी उपस्थिति से वाचिक परंपरा के कवियों से आत्मीयता और शोध प्रेरक के रूप में शोधार्थियों को दिए मार्गदर्शन में हाशमी जी ने उनके व्यक्तित्व का गहनता से अध्ययन किया जिसे उजागर करने का महत्वपूर्ण कार्य पुस्तक में किया है। यह पुस्तक हर एक व्यक्तित्व के जीवन पर प्रकाश डालती है। पुस्तक उस समृद्ध परंपरा का भी ज़िक्र करती है जिसमें साहित्य को पूर्ण सम्मान था, साहित्य का अपना प्रतिमान था। आज साहित्य के प्रति संचार माध्यमों की अधिकता ने एक अलग तरह का माहौल बना दिया है, ऐसे में हाशमी जी की यह पुस्तक सृजन के नए द्वार भी खोलती है, सृजन के प्रति चेतना भी जागृत करती है, सृजन की परंपरा से भी अवगत कराती है और सृजन के प्रति नई पीढ़ी को आकर्षित भी करती है। इस पुस्तक के बाद भी साहित्य प्रेमियों को हाशमी जी की सृजन यात्रा के कई सारे संस्मरणों की प्रतीक्षा है जो निश्चित रूप से आने वाले समय में ऐसी ही पुस्तक के ज़रिए पूर्ण होगी।
12/2, कोमल नगर
बरबड़ रोड
रतलाम -  457001
मो. 9827084966
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Thu, 13 Jan 2022 12:00:46 +0530 Niraj Kumar Shukla