WWW.ACNTIMES.COM & : गेस्ट रिपोर्टर https://acntimes.com/rss/category/guest-reporter WWW.ACNTIMES.COM & : गेस्ट रिपोर्टर en Copyright @ ACNTIMES.COM | All Rights Reserved | Webmaster : HARSH SHUKLA प्रसंगवश : कला और कलाकार के बीच के रिश्ते& आशीष दशोत्तर https://acntimes.com/incidentally-the-relationship-between-art-and-the-artist-ashish-dashottar https://acntimes.com/incidentally-the-relationship-between-art-and-the-artist-ashish-dashottar आशीष दशोत्तर

एक विचार वरिष्ठ रंगकर्मी श्री कैलाश व्यास जी की ओर से कल की चर्चा में आया था कि क्या कारण है कि छायाकार श्री लगन शर्मा जी के सामने आते ही हमारा चेहरा अपने आप फोटो खिंचवाने के लिए तैयार हो जाता है?

यह सवाल कहने को तो बहुत सामान्य था मगर इस सवाल के पीछे मुझे कई सारे दृश्य घूमते हुए नज़र आए। प्रश्न सिर्फ़ यह नहीं है कि एक छायाकार जब कोई छायांकन करता है तो कैमरे के सामने खड़ा हुआ व्यक्ति उससे कितना इत्तेफ़ाक रखता है। दोनों का जुड़ाव कितना हो पाता है। कई बार यह होता है कि कैमरामैन के सामने खड़े कुछ लोग उससे जुड़ नहीं पाते, शायद जुड़ना नहीं चाहते हों तो उस तस्वीर को लेने में न तो छायाकार को आनंद आता है और न ही उस तस्वीर को देखने में किसी की कोई रुचि होती है। यह कला और कलाकार के बीच के संबंध की बात है।  

फ़ानी बदायूंनी कहते हैं-

 हम हैं उस के ख़याल की तस्वीर,

जिस की तस्वीर है ख़याल अपना।

कला और जीवन एक दूसरे पर आश्रित हैं। कलाकार, कल्पना और यथार्थ का समन्वय कर समाज के समक्ष आदर्श रूप प्रस्तुत करता है। इसी कारण जीवन का कला के स्वरूप पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। कलाकार जीवन के यथार्थ रूप को ही चित्रित नहीं करता, वरन् वह आदर्श रूप को भी प्रस्तुत करता है। यही कारण है कि कला चाहे जिस रूप में हो वह अपनी कलाकृति के यथार्थ से परिचित अवश्य होना चाहिए।

कलाकार की कला को प्रभावित करने वाले विश्वासों का एक उदाहरण पियरे ऑगस्टे रेनॉयर के कामों में देखा जा सकता है। उन्होंने कहा, 'कला सुंदर क्यों नहीं होनी चाहिए?' कला के प्रति उनके दृष्टिकोण का एक उदाहरण 1876 की 'ए गर्ल विद ए वाटरिंग कैन' में देखा जा सकता है। इसी संदर्भ में कवि प्रो. रतन चौहान कहते हैं-

बड़ी विकट होती है सुंदरता की चाह

एक पागलपन सवार हो जाता है

आदमी के माथे पर,

प्रकृति का सौंदर्य, स्त्री का सौंदर्य,

मनुष्य हृदय का सौंदर्य

कहां-कहां बिखरा पड़ा है सौंदर्य,

सौंदर्य की करोड़ों करोड़ छवियां।

सौंदर्य ढूंढती हर तस्वीर के पीछे बहुत सी तस्वीरें होती हैं। जैसा कि हम किसी कविता के लिए कहते हैं कि कविता वहां नहीं है जहां कुछ लिखा हुआ है, कविता तो लिखे हुए के बीच जो नहीं लिखा गया है, वहां है। ठीक उसी तरह एक फोटो में वह सब ही नहीं होता जो दिखाई देता है। बहुत कुछ ऐसा भी होता है जो दिखाई नहीं देता सिर्फ़ महसूस किया जाता है।

गुलज़ार कहते हैं-

जिसकी आवाज़ में सिलवट हो, निगाहों में शिकन

ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़े जाते।

यानी तस्वीर उसी की खींची जा सकती है जिस चेहरे में कोई जान हो। कई बार फोटोग्राफर को भी यह महसूस होता है कि कोई चेहरा इतना ख़ास है जिसकी तस्वीर ली जानी चाहिए। इसी तरह कई बार चेहरों को भी यह महसूस होता है कि उनकी कोई तस्वीर ले। यह दोनों के बीच का तादात्म्य ही किसी तस्वीर को मुकम्मल करता है। एक तस्वीर का मुकम्मल होना इस बात पर भी निर्भर करता है कि फोटोग्राफर और चेहरे की मानसिकता क्या है? उन दोनों का परिवेश क्या है? दोनों की परिस्थितियां क्या है और दोनों का कला के प्रति मापदंड क्या है। यदि इनमें कहीं कुछ कमी नज़र आती है तो तस्वीर मुकम्मल नहीं हो पाती है। विश्व प्रसिद्ध फोटोग्राफर फ़्रैंस लैंटिंग तो कहते भी हैं, 'मुझे लगता है कि एक तस्वीर के लिए व्यक्तिगत भागीदारी की ज़रूरत होती है।' यह व्यक्तिगत भागीदारी ही कैमरे और चेहरे के बीच का सामंजस्य है।

यहां जब हम सवाल करते हैं कि क्या कारण है कि चेहरा किसी फोटोग्राफर के सामने आते ही अपने आप को इस तरह तैयार कर लेता है कि वह ख़ूबसूरत दिखे, मुस्कुराने लगे, जीवंत लगने लगे, यह सब दोनों के बीच के तादात्म्य पर ही निर्भर करता है। शायद इसीलिए तस्वीर लेते समय फोटोग्राफर द्वारा यह कहने की शुरुआत हुई होगी- मुस्कुराइए। अर्थात् एक फोटोग्राफर चाहता है कि उसकी तस्वीर में हर चेहरा मुस्कुराए और हर चेहरा भी चाहता है कि वह अपने भीतर के तमाम दर्द को भीतर ही दबाते हुए चेहरे पर कुछ पल के लिए मुस्कुराहट लाए।

अज़हर इनायती कहते हैं-

अपनी तस्वीर बनाओगे तो होगा एहसास

कितना दुश्वार है ख़ुद को कोई चेहरा देना।

यहां हमें इस बात को समझना तो पड़ेगा ही कि फ़ोटोग्राफ़ी का मतलब सिर्फ़ कैमरा नहीं होता, बल्कि फ़ोटोग्राफ़र भी है। प्रसिद्ध फोटोग्राफर पीटर एडम्स ने कहा भी है, 'फ़ोटोग्राफ़ी का मतलब सिर्फ़ कैमरे, गैजेट और गिज़्मो नहीं है। फ़ोटोग्राफ़ी का मतलब फ़ोटोग्राफ़र है। कैमरा कोई बढ़िया तस्वीर नहीं बना सकता, जैसे टाइपराइटर कोई बढ़िया उपन्यास नहीं लिख सकता।"

फोटो में जान तो एक फोटोग्राफर ही डाल सकता है। जैसे कोई बहुत कीमती पेन लेकर लिखने बैठे तो वह महान लेखक नहीं बन जाता, ठीक उसी तरह कोई फोटोग्राफर कितना महंगा कैमरा लेकर फोटो खींचने लगे तो वह बड़ा कैमरामैन नहीं बन पाता। बहुत साधारण कैमरे से भी ख़ूबसूरत तस्वीरें खींची गई हैं। जैसा कि प्रसिद्ध फोटोग्राफर मार्क डेनमैन ने कहा था, 'सिर्फ़ एक कैमरा होना ही काफ़ी नहीं है। 'अर्थात एक कैमरे के अतिरिक्त भी बहुत कुछ होता है जो किसी कैमरामैन को सफल और चेहरों का प्रिय बनाता है। यह गुण भाई लगन शर्मा के पास हैं शायद इसीलिए हर चेहरा उनके कैमरे के सामने आते ही यह मान लेता है कि किसी ख़ूबसूरत तस्वीर का जन्म होना निश्चित है।

आशीष दशोत्तर

12/2, कोमल नगर

रतलाम - 457001

मो. 9827084966

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Sun, 14 Dec 2025 21:10:01 +0530 Niraj Kumar Shukla
बुरा न मानो होली है ! पत्रकारिता : 'होलियाना परिभाषाएं& प्रो. अज़हर हाशमी की कलम से https://acntimes.com/Holi-Special-Journalism-Holiyana-paribhasha-Prof-Azhar-Hashmi https://acntimes.com/Holi-Special-Journalism-Holiyana-paribhasha-Prof-Azhar-Hashmi प्रो. अज़हर हाशमी 

होली के 'रंग' और मौज-मस्ती की 'तरंग' में इस लेखक अर्थात् अज़हर हाशमी ने पत्रकारिता के 'ढोल की पोल' पर रिसर्च की है। यह रिसर्च टी.वी. चैनलों की 'चिल्ल-पों' पर नहीं बल्कि प्रिंट-मीडिया के गिरगिटीकरण' पर है। यह रिसर्च 'होली की हड़बड़ी में की गई है इसलिए 'निष्कर्षों में गड़बड़ी' हो सकती है। हड़बड़ी के लिए होली जिम्मेदार है और गड़बड़ी के लिए लेखक नहीं बल्कि वे जिम्मेदार हैं जिन पर रिसर्च की गई है। इसलिए लेखक की बुद्धि पर तरस खाएं या न खाएं, लेकिन मुस्कान के रंग जरूर बरसाएं। वैसे भी होली पर कवियों या लेखकों को अक्ल का अजीर्ण हो जाता है। इस लेखक ने भी 'अक्ल के अजीर्ण के साथ, प्रिंट मीडिया की जीर्ण-शीर्ण परिभाषाओं को होलियाना मूड में 'तीक्ष्ण' कर दिया है। 

प्रस्तुत हैं पत्रकारिता (प्रिंट मीडिया) की 'होलियाना' परिभाषाएं 

प्रधान संपादक 

इसकी दो प्रजातियां होती हैं।

प्रथम प्रजाति का प्रधान संपादक बुद्धिमान, धनवान, विद्यावान होता है। उसका सोच भी मौलिक होता है और लेखन भी मौलिक। हर विषय पर उसकी पैनी पकड़ होती है। यह संसार/संस्कार पर सर्वाधिक लिखता है किंतु व्यवहार में वैसा नहीं दिखता है।

दूसरी प्रजाति का प्रधान संपादक वह होता है जिसका अग्रलेख कोई दूसरा व्यक्ति लिखता है लेकिन नाम और फोटो इसी का (प्रधान संपादक का) छपता है।

प्रधान संपादक चाहे प्रथम प्रजाति का हो अथवा दूसरी प्रजाति का दरअसल 'घाघ' होता है, इसलिए कर्मचारियों की दृष्टि में 'बाघ' होता है। 

समूह संपादक 

यह वह व्यक्ति है जिसे अक्सर दौरे का दौरा पड़ता रहता है। समूह संपादक कहीं-कहीं कई बार स्टेट हेड अर्थात राज्य संपादक भी होता है। समूह को संभालने के चक्कर में इसका 'संपादकत्व’ खो जाता है और यह केवल 'टूरिस्ट' हो जाता है। यह इतने 'टूर' करता है वि चाहे तो संपादन छोड़कर किसी भी 'टूर एंड ट्रेवल’ एजेंसी का प्रबंधन कर सकता है। 

संपादक 

वह शख्स है जो किसी लेखक के आलेख की 'गर्दन' छोड़ देता है और 'हाथ-पांय-कमर' तोड़ देता है। विरोधी कर्मचारियों को संपादक 'शनि' की दृष्टि से देखता है और पनौती या साढ़े साती की तरह लग जाता है। 

समाचार संपादक 

यह वह व्यक्ति है जो समाचार का 'अचार' और अचार का 'समाचार' बना देता है। जैसे बिल्ली की नजर 'छींके' पर रहती है वैसे समाचार संपादक की नजर 'स्थानीय संपादक' की कुर्सी पर रहती है। कभी-कभी बिल्ली के भाग्य से छींका टूट भी जाता है।

संपादकीय पृष्ठ प्रभारी

यह है तो बहुत 'लायक' शख्स, लेकिन इसको कार्य के बोझ से इतना लादा जाता है, कि यह 'पीर बावर्ची, भिश्ती, खर' हो जाता है और खुद को 'बड़ा बाबू' समझकर की संत्रस्त रहता है। इस लायक शख्स के साथ कहीं-कहीं 'नालायक' जैसा व्यवहार किया जाता है।

मैनेजर 

यह वह शख्स है जो मालिक के सामने 'मिमियाता' है और 'खिसियाता' है, लेकिन संपादकीय विभाग पर 'दहाड़ता' है और कभी-कभी 'धकियाता' है। 

स्तंभकार 

ऐसा व्यक्ति है जो स्तंभ-लेखक के लिए विचारों का मलखंभ करते हुए विवादों के माउंट एवरेस्ट पर चढ़कर अपना ब्लड प्रेशर बढ़ा लेता है। 

लेखक 

शब्दों के 'उजास' के मोह में 'छपास-रोग' से ग्रस्त व्यक्ति यह "मैं" ही हूं यानी अज़हर हाशमी। 

समीक्षक 

यह नाबीना भी हो सकता है और नज़रवाला भी। नाबीना है तो 'खुन्नस' निकालेगा, नज़रवाला है तो 'खुलासा' करेगा।

ब्यूरो चीफ 

'बड़ा' 'चीप' से ही शायद 'ब्यूरो चीफ' बना है। इसके आस-पास दो-चार 'पालतू' यानी 'फालतू' बैठे रहते हैं। यह अर्थात ब्यूरो चीफ लोगों को 'चमकाता' रहता है, लेकिन सेर-को-सवा सेर मिलने पर खुद भी 'चमक' जाता है। 

मैगजीन इंचार्ज 

ऐसा शख्स जो 'तिल' को 'ताड़' बनाता है और 'संगीन' को 'रंगीन' करता है। 

विशेष संवाददाता 

ऐसा 'कलाकार' जो प्रायः दारू पीकर दारू के विरोध में विशेष संवाद भेजता है। 

संवाददाता

ब्यूरो चीफ नामक 'उस्ताद' का 'पट्ठा' जो अखबार के परिचय-पत्र को 'लट्ठ' की तरह लेकर घूमता रहता है।

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नोट : प्रिंट मीडिया की ये परिभाषाएं केवल और केवल - दो दिनों के लिए ही हैं। यानी होली जलने वाले दिन और धुलेंडी वाले दिन के लिए। धुलेंडी के बाद इन परिभाषाओं को मान्यता स्वतः समाप्त हो जाएगी। मान्यता के लाइसेंस का पुनर्नवीकरण नहीं होगा।

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Thu, 13 Mar 2025 22:02:12 +0530 Niraj Kumar Shukla
कलियुग के 'दुर्योधनों' और 'दुशासनों' ने मणिपुर की सड़कों पर सिर्फ औरतों का ही चीरहरण नहीं किया, हमारे देश की इज्जत भी लूट ली https://acntimes.com/Countrys-respect-was-also-looted-along-with-women-on-the-streets-of-Manipur https://acntimes.com/Countrys-respect-was-also-looted-along-with-women-on-the-streets-of-Manipur गरिमा सोनी 

महाभारत लगभग हम सभी ने देखी होगी। बचपन से मैंने भी लगभग 2-3 बार महाभारत देखी है। मनोरंजन के साथ ज्ञान हासिल करने का मौका देने वाले शो वैसे भी टीवी पर कम होते हैं। पता नहीं क्या जादू है महाभारत और रामायण में, जितनी बार देखो कुछ न कुछ नया सीखने को मिल ही जाता है। पर महाभारत के एक दृश्य ने मुझे हमेशा विचलित किया, इतना कि कभी-कभी रात भर सोचती रहती थी। न जाने क्या बीती होगी द्रौपदी पे जब दुशासन भरी सभा में घसीट के लाया होगा? मन ये सोचकर घबरा उठता था कि अगर भगवान श्री कृष्ण द्रौपदी को निर्वस्त्र (चीरहरण) होने से नहीं बचाते तो क्या होता? क्या स्वयं भगवान श्री कृष्ण भी खुद को माफ कर पाते? क्या कभी कोई भगवान के होने पे विश्वास कर पाता? 

ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनका जवाब शायद कभी नहीं मिल सकता था, पर आज जवाब मिल गया। एक द्रौपदी की मर्यादा बचाने के लिए महाभारत का युद्ध हो गया था, ताकि दुर्योधन और दुशासन जैसे पापियों का विनाश हो जाए, और कभी भारत में कोई और दुर्योधन और दुशासन न बने। पर क्या पता था एक ऐसा दिन भी देखना पड़ेगा जब भरी सभा नहीं, भरी सड़कों पे कई द्रौपदियों को निर्वस्त्र किया जाएगा, उनको इतना प्रताड़ित किया जाएगा कि हर इंसान (जिसमें इंसानियत बची है) उसकी रूह तक कांप जाएगी। जो हुआ वो लिखने की हिम्मत मुझमें नहीं है और अब उस हिम्मत से वैसे भी क्या हो जाएगा? हिम्मत शर्मिंदगी नहीं कम कर पाएगी क्योंकि कृष्ण ने तो द्रौपदी की इज्जत बचा ली थी पर अफसोस, मणिपुर की सड़कों पे जो बेरहमी दिखी उसने मणिपुर की औरतों के साथ साथ हमारे देश की इज्जत भी लूट ली।

सड़कों पर दुर्योधनों और दुशासनों का राज, धृतराष्ट्र बना समाज

ना जाने कितने दुर्योधन और दुशासन सड़कों पे घूम रहे थे। और हम यहां ‘बेटी पढ़ाओ - बेटी बचाओ’ कर रहे थे। ये बात किसी सरकार या पॉलिटिक्स की नहीं है, ये बात उस दिशा की है जहां हम बढ़ रहे हैं। हमारा समाज आज सिर्फ धृतराष्ट्र बन कर रह गया है, काली पट्टी बाँध ली है हमने अपनी आँखों पे। अपने मोह के ऊपर हमें कुछ नहीं दिखता। कलयुग का तो नहीं पता पर कालायुग ज़रूर देख लिया इस घटना के माध्यम से। बद से बेहतर होने की जगह बद से बद्दतर हो गए हम महिलाओं की सुरक्षा में। लानत है उन लड़कों पे जिन्होंने एक मिनट के लिए अपनी माँ, बहन, बीवी या बेटी का नहीं सोचा। ना जाने किस मुंह से अपने घर की महिलाओं को मुंह दिखाएंगे वो दरिंदे।

इन्हें पकड़ो, तब तक पीटो जब तक कि मौत की भीख न मांग उठें

मेरी कोशिश होती है लिखते समय भाषा की मर्यादा बनाए रखूँ पर इन हैवानों के लिए भी अगर मर्यादा का सोचा तो मैं अपनी ही नज़रों में गिर जाऊँगी। ऐसे लोगों को पकड़ो, पीटो और तब तक पीटो जब तक ये मौत की भीख न मांगे। कानून तो हाथ में नहीं लिया जा सकता, इसलिए अब कानून से ही उम्मीद है कि अगर हो सके तो फिर से महिलाओं का खोया हुआ विश्वास जीत लो। अगर हो सके तो ये बता दे कि अपनी सुरक्षा के लिए हिफ़ाज़त के लिए पुलिस के पास जाना चाहिए या पुलिस से दूर जाना चाहिए…। 

अब अर्जुन और कृष्णा तो नहीं आएंगे पर कानून को तो जगना पड़ेगा, वरना  फिर वही होगा कि कोई माँ नहीं चाहेगी उसकी कोख से कोई बेटी जन्म हो। अब हमें सोचना पड़ेगा कि हम आगे बढ़े या पीछे जाएं।

बचपन से महाभारत देख के कुछ जवाब जाना चाहती थी, जवाब तो नहीं मिले पर एक सवाल मन में आ गया है जो परेशान कर रहा है। क्या कभी ऐसे दिन आएंगे जब महिलों को अपनी इज़्ज़त की चिंता न सताए?

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(गरिमा सोनी पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं, लेखिका, ब्लॉगर हैं। मास्टर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन के साथ ही यूथ आईकॉन पुरस्कार से पुरस्कृत हैं और "LIFE SIMPLIFIED" पुस्तक की लेखिका हैं।)

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Thu, 27 Jul 2023 18:30:06 +0530 Niraj Kumar Shukla
इस भक्त की साधना है खास : MP के छोटे से गांव पंचेड़ के भक्तचरण की बांसुरी गूंज रही देशभर में https://acntimes.com/Bhaktacharans-flute-of-Panched-village-of-MP-is-making-a-splash https://acntimes.com/Bhaktacharans-flute-of-Panched-village-of-MP-is-making-a-splash आशीष दशोत्तर की कलम से 

एसीएन टाइम्स @ रतलाम । प्रतिभा किसी बैसाखी का सहारा नहीं लेती। वह अपने प्रयासों से मंजिलों को पा ही लेती है। ऐसा ही कमाल किया है मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के छोटे से गांव पंचेड़ के युवा भक्तचरण ने। देश के प्रमुख संगीतकारों एवं आध्यात्मिक संतों के सम्मुख अपने बांसुरी वादन से भक्तचरण ने अपनी मंज़िल की तरफ़ क़दम बढ़ा दिया है।

पंचेड़ के भक्तचरण सिंह पिता अरविंद चौधरी की प्रारंभिक शिक्षा रतलाम में ही हुई। इसके बाद उन्होंने 2016 में देहरादून जाकर वकालत की पढ़ाई शुरू की। उसी दौरान संगीत में अत्यंत रुचि जागृत हुई। संयोगवश ऋषिकेश में देश-विदेश में प्रसिद्ध एवं ए. आर. रहमान के साथ बांसुरी वादन करने वाले अश्विन श्रीनिवासन से उनकी भेंट हुई। उन्होंने बांसुरी वादन का प्रारंभिक प्रशिक्षण मुंबई में अश्विन से प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त किया।

तत्पश्चात पद्म विभूषण पंडित हरिप्रसाद चौरसिया से आशीर्वाद प्राप्त कर भुवनेश्वर स्थित वृंदावन गुरुकुल में गुरुकुल परंपरा के अनुसार बांसुरी वादन की शिक्षा प्राप्त की। देहरादून से वकालत की डिग्री पूरी कर वर्तमान में पुणे स्थित चिन्मयानंद विश्व विद्यापीठ  से भारतीय शास्त्रीय बांसुरी वादन में मास्टर्स की डिग्री विश्वविख्यात बांसुरी वादक पंडित  रूपक कुलकर्णी के सान्निध्य में जारी है।

श्री अवधेशानंद गिरि जी के सम्मुख दी प्रस्तुति, मिला आशीर्वाद

अभी नववर्ष की पूर्व संध्या पर ऋषिकेश में भव्य रूप से आयोजित न्यू एज म्यूजिक फेस्टिवल में भक्तचरण ने प्रस्तुति दी। 1 जनवरी को हरिद्वार में आयोजित धर्मसभा में जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी अवधेशानंद गिरी जी, महामंडलेश्वर कैलाशानंद गिरी जी, स्वामी चिदानंद सरस्वती जी, आचार्य बालकृष्ण जी, पूर्व राज्यपाल बेबीरानी मौर्य के समक्ष बांसुरी वादन किया। इसके लिए उन्हें स्वामी अवधेशानंद गिरी जी एवं बेबीरानी मौर्य द्वारा विशेष रूप से सराहना एवं आशीर्वाद प्रदान किया गया। 

भक्तचरण की प्रस्तुतियों का सफर

रतलाम के पंचेड़ गांव से निकलकर उत्तर भारत में आईआईटी रुड़की,फॉरेस्ट रिसर्च अकैडमी, यूपीईएस देहरादून,  दूरदर्शन केंद्र उत्तराखंड, 93.5 माय एफएम इंदौर, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम रायपुर, मसूरी विंटर कार्निवाल, मालदेवता पैराग्लाइडिंग फेस्टिवल, राजपुर फ्लावर फेस्टिवल, हयात रीजेंसी, अंतरा देहरादून, वर्ल्ड इंटीग्रिटी सेंटर, अनंता पुष्कर जैसे अन्य स्थानों पर आयोजित शास्त्रीय,  उप शास्त्रीय, गजल, बॉलीवुड एवं फ्यूजन  कॉन्सर्ट्स   में प्रस्तुति देकर परिजन एवं ग्राम पंचेड़ का नाम रोशन करने का सौभाग्य प्राप्त किया। भक्तचरण के बांसुरी वादन की रिकॉर्डिंग टी सीरीज, ज़ी म्यूजिक कंपनी, प्लोनेक्स प्रोडक्शन एवं बालाजी टेलिफिल्म्स के यूट्यूब चैनल पर भी जारी की जा चुकी हैं।

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Wed, 04 Jan 2023 14:04:00 +0530 Niraj Kumar Shukla
बड़ा सवाल ? क्या सड़क पर रहने वाले पशु हमारे नहीं https://acntimes.com/big-question-are-the-animals-on-the-street-not-ours https://acntimes.com/big-question-are-the-animals-on-the-street-not-ours शिमोन निगम

लोग कहते हैं कि कुत्ता भौंक रहा है कहीं लपक ना जाए, इसे पकड़वा दो। गाय-बैल घर के बाहर सड़क पर गोबर कर रही हैं, इसे भगाया जाए। बिल्ली दीवार पर चढ़कर चिल्ला रही है, इसे मार कर भगाया जाए, ये अपशकुन है। पर क्या यही लोग यह सोचते हैं कि हमने कभी इस कुत्ते को पत्थर या डंडे से फेंक कर मारा था जो यह हमें अनजान समझकर भौंक रहा है। और भोंकना तो उसकी भाषा है। क्या हम इसे रोटी या बिस्किट खिला कर दोस्ती नहीं कर सकते ? क्या हम भूखे गाय-बैल को रोटी देकर सड़क किनारे में नहीं हटा सकते ? क्या यह बिल्ली बिचारी भूखी-प्यासी नहीं होगी ? इतनी बदतर हालत हमने इन पशुओं की क्यों कर रखी है, क्योंकि यह सड़क पर रहते हैं इसीलिए ? इसमें इनकी क्या गलती ? हमने ही तो उनके घर उजाड़ रखे हैं। यह तो हमारे पहले से अपना अस्तित्व रखते हैं या उस एरिया में रहते हैं जहां हम इनके बाद में आए हैं और अपना घर बनाया है।

आवारा पशु को बचाने की जरूरत क्यों ?

अच्छा कहा, कि- एक जानवर है, जिसे हम बुलाना पसंद करते हैं- चार पैरों वाला, निडर और बिल्कुल शानदार ! चाहे वे कहीं भी रहें - एक घर में या सड़क पर, जानवर सच्चे प्यार, अपूरणीय विश्वास और बिना शर्त वफादारी का प्रतिनिधित्व करते हैंविशेष रूप से गली के कुत्ते, बिल्ली, गाय आदि पशु और पक्षी। इन सभी का प्रतिनिधित्व करने के बावजूद, भारत में सड़क पर रहने वाले जानवरों, विशेष रूप से कुत्तों को अज्ञानियों द्वारा और इन निर्दोष जानवरों के अधिकारों के बारे में सटीक जानकारी की कमी वाले लोगों द्वारा इन्हें एक 'खतरा' माना जाता है। वे शायद कभी नहीं समझ पाएंगे कि आप सड़क पर रहने वाले कुत्तों को क्यों खिला रहे हैं ? शायद इसलिए कि वे यह नहीं समझते कि एक 'इंसान' में जो चीज मानवता को जिंदा रखती है वह अक्सर 'कुत्ता' होता है। हमारे आवारा कुत्ते बिना किसी शर्त के हमारे घरों और गलियों की रखवाली करते हैंवे हमारे साथ बिताए कुछ पलों के लिए हमारी चिंताओं को दूर कर देते हैं, और सबसे बढ़कर, वे जीवन में छोटी-छोटी चीजों के लिए आभारी होने का शुद्ध आनंद सिखाते हैं। फिर उन्हें अपने होने के कारण नुकसान क्यों उठाना चाहिए- निडर, मिलनसार और स्वतंत्र ! अधिक से अधिक लोगों को जागरूक कर इनके विरुद्ध बढ़ते अपराधों पर रोक लगनी चाहिए ! 

आवारा पशुओं का महत्व

भारत में प्रत्येक जानवर का अपना महत्व है, विशेष रूप से श्वान (कुत्तों) का। कई वैदिक छंदों में श्वानों को शिव के भेरू के रूप में संदर्भित किया गया है और हिंदू पौराणिक कथाओं में इसका गहरा अर्थ है। सिक्किम और उत्तरी बंगाल के कुछ हिस्सों में पूजे जाने के बाद से, कुत्ते कालभैरव जैसे देवताओं के वाहक हैं। उन्हें स्वर्ग के साथ-साथ नर्क के द्वारों का रक्षक भी माना जाता है। कई मौकों पर मौत की रस्मों के दौरान कुत्तों को भोजन की पेशकश की जाती है। कुत्तों को इनरवर्ल्ड और पृथ्वी पर मौजूद प्राणियों के बीच एक कड़ी माना जाता है। ज्योतिष के अनुसार, राहु और शनि ग्रह के नकारात्मक प्रभाव से पीड़ित लोगों को काले कुत्तों को खिलाने से कुछ राहत मिलती है। पूरे वेदों और हिंदू धर्म में विभिन्न जानवरों ने अपनी भूमिका निभाई है या तो देवताओं का प्रतीक बनकर या उनके वाहन के रूमें। 16 श्राद्ध के दिन इन्हीं कुत्तों को मारने वाले लोग इन्हें रोटी देने के लिए जी जान लगा देते हैं। तब कौका भी महत्व बढ़ जाता है, लेकिन बाकी के 350 दिन का क्या ? फिर ऐसे शुद्ध तलवों को कैसे चोट लग सकती है? हम में से बहुत से लोग सुंदर लग्जरी नस्ल के कुत्ते चाहते हैं, ऐसे में हमारे मूल शुद्ध भारतीय कुत्तों के बारे में कौन सोचेगा, जिन्हें हम सिर्फ 'स्ट्रीट डॉग' या स्ट्रीट एनिमल्स कहते हैं।

फिर ऐसा क्यों नहीं कर सकते

आज भारत में कई पशु कल्याण संगठन, गैर सरकारी संगठन, यहां तक ​​कि लोगों के समूह भी हैं जो बिल्लियों, गाय, भैंस, पक्षियों सहित इन आवारा पशुओं की देखभाल कर रहे हैं। बस हमें उनका समर्थन करना है। हम अपने स्तर पर जागरूकता पैदा करने और अपराधों को रोकने और रिपोर्ट करने में मदद कर सकते हैं यदि उन्हें पथराव, लाठी से पीटना या उन पर तेजाब फेंकना, सड़कों पर छोटे पिल्लों को फेंकना, कठोर ड्राइवरों के द्वारा कुत्तों को मारना जैसे अपराधों के खिलाफ देखा जाए। हम सभी छोटे-छोटे गरीब जानवरों के लिए अपने घरों के बाहर पानी का कटोरा रख सकते हैं, हम स्थानीय कुत्ते व बिल्लियों को खिला सकते हैं और गोद ले सकते हैं। यदि प्रत्येक व्यक्ति प्रतिदिन कम से कम एक आवारा पशु को भोजन कराएगा तो सड़क पर कोई भूखा, बेचारा पशु नहीं रहेगा। सोशल मीडिया पर भी हम ऐसे समूहों और लोगों का समर्थन कर सकते हैं।

एक कहानी प्रेरणा वाली

भारत के मध्यप्रदेश में रतलाम राजबाग कॉलोनी निवासी निगम परिवार की कहानी भी प्रेरणा देने वाली हैउन्होंने एक कुत्ते के परिवार को गोद लिया है। वे उनकी पूरी देखभाल करते हैं, खाना पीना, दवाई, बारिश, ठंड में सरंक्षण देना आदि। उन्होंने उसकी पांच पीढ़ियों की सेवा की है पिछले तीन वर्ष मेंवे अभी भी परिवार में 10 कुत्तों के साथ जीवित हैंदुर्भाग्य से दुर्घटनाओं या मानव क्रूरता के कारण दो पीढ़ियों की मृत्यु हो गई। सभी कुत्ते इनके बहुत वफादार हैं। वे इसे बिना किसी स्वार्थ के, अच्छे कारण के लिए करते हैं। वे दयालुता के ऐसे कृत्यों के लिए लोगों को जागरूक भी कर रहे हैं। कई निवासियों को प्रेरणा भी मिलती है। वे गाय-बैल की सेवा भी कर देते हैं अगर कोई बीमार कॉलोनी या सड़क पर हो तो। वे पशु व प्रकृति प्रेमी हैं, घर में ही डेढ़ सौ से ज़्यादा पौधे की किस्में लगा रखी हैं

दयालु होने के लिए भी अब आईडी की आवश्यकता है

क्या आप एक सक्रिय एनिमल केअर टेकर व फीडर हैं जिससे आपके कृत्य के बारे में सवाल किया जाता है और कुछ उदार करने के लिए नीचे देखा जाता है ? खैर, वहाँ हम में से बहुत से लोग हैं, और जब आप ऐसे लोगों से लड़ते-झगड़ते थक जाते हैं, जो आवारा जानवरों को खिलाने के पीछे की भावना को नहीं समझते हैं, तो एक आईडी उनके दिमाग को शांत करने में मदद कर सकती है।

भारतीय पशु कल्याण बोर्ड आवारा कुत्तों व पशु को खाना खिलाने वालों के लिए आईडी जारी करता है। ये आईडी एक समर्थन के रूप में कार्य करती हैं और फीडर के कार्यों को 'वैध' होने के रूप में मान्य करती हैं और प्रमाणित करती हैं कि ये काम अवैध नहीं है। यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब हमें दयालु होने के लिए भी आईडी की आवश्यकता है ?

सेवा के लिए उठें, असहाय दर्शकों जैसे वीडियो बनाना बंद करें

सड़क पर रहने वाले जानवर 'सामाजिक जिम्मेदारी' कहलाते हैं। वे एक बेहतर समाज में रहने के भागीदारी हैं। जैव विविधता में समृद्ध देश के नागरिक के रूप में, हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारे जानवर स्वस्थ, सुरक्षित और न्याय के हकदार हैं। उन्हें बिना किसी डर, संकट या दर्द के प्राकृतिक व्यवहार व्यक्त करने की अनुमति दी जानी चाहिए, और जैसा कि न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा है कि, "हमें उनकी ओर से बोलने की आवश्यकता है"। कभी-कभी, फर्क सिर्फ उन जानवरों के प्रति नि:स्वार्थ होने के बारे में है जो खुद के लिए नहीं बोल सकते। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 9 के तहत आवारा पशुओं को नुकसान पहुंचाने के इरादे से पकड़ना अवैध है। पशु क्रूरता अधिनियम, 1960 की धारा 11 के तहत आवारा कुत्तों को जहर देना गैरकानूनी है। जानवरों के प्रति क्रूरता अधिनियम, 1960 की धारा 428 और 429 के तहत, आप किसी भी एनीमल केअर टेकर या आवारा कुत्ते को नुकसान पहुंचाने वाले लोगों की रिपोर्ट कर सकते हैं। हमारी सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा है कि फीमेल बिल्ली या कुत्ते को व उनके बच्चों को आप जन्म स्थान से नहीं हटा सकते। हमारे पास नियम और कानून हैं, खास बात यह है कि सिर्फ उनका सख्ती से पालन करना व करवाना है। हालाँकि यह हर दिन और हर नुक्कड़ पर होता है, लेकिन यह हम पर निर्भर है कि हम आवारा पशु की सेवा के लिए उठें और असहाय दर्शकों जैसे वीडियो बनाना बंद करें।

चार पैर वाले दोस्तों के लिए आशा और खुशी लाना जरूरी

जैसा कि हम अपनी दैनिक गतिविधियों से छोटे अंतर कर जानवरों के जीवन को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकते हैं जिनके साथ हम अपने ग्रह को साझा करते हैं। लेकिन, हमारे जानवरों को हमारी जरूरत है- पहले से कहीं ज्यादाजानवर हमें हमारे अस्तित्व का सार सिखाते हैं। अभिभावकों को अपने बच्चों को जानवरों के प्रति अच्छा व्यवहार सिखाना चाहिए। वे छोटे होते हैं तभी उनके मन का डर निकालना चाहिए कि इन से दोस्ती करें, बजाइनसे भगाने के या घृणा करने या पत्थर मारकर उनको और खुद को मन का भय दिलाने में। एक समुदाय के रूप में, जितना संभव हो उतने आवारा पशुओं को भोजन खिलाने के लिए सेवा करेंएक दिन में दो बार का भोजन उनके पेट के लिए काफी पर्याप्त है। इसके अलावा, यदि आप आवारा कुत्तों या पशु के खिलाफ कोई क्रूरता देखते हैं, तो इसकी सूचना अवश्य दें। लोग जितनी अधिक रिपोर्ट दर्ज करते हैं, सरकार पशु क्रूरता के मुद्दे के प्रति उतनी ही जागरूक होती रहेगी। हम मानते हैं कि यह छोटे-छोटे प्रयास हैं जो हमारे घरों और सड़कों की रक्षा करने वाले चार-पैर वाले दोस्तों के लिए आशा और खुशी लाने में एक लंबा रास्ता तय करते हैं और ये जरूरी है।

(शिमोन निगम युवा पत्रकार हैं जो आर्टिस्ट बाय पैशन और जॉर्नलिस्ट बाय प्रोफेशन हैं। सेवियर स्वर्म सोशल वेलफेयर ग्रुप की फाउंडर शिमोन यूट्यूब चैनल की सोशल मीडिया मैनेजर तथा देवांशी इंटरप्राइजेस की प्रबंध संचालक भी हैं।)

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Thu, 01 Dec 2022 14:08:19 +0530 Niraj Kumar Shukla
अमानवीय युग में जी रहा है इंसान, मनुष्य होना भी याद दिलाना पड़ रहा है https://acntimes.com/Human-is-living-in-inhuman-age https://acntimes.com/Human-is-living-in-inhuman-age शिमोन निगम

इंसान बनो, इंसान बनो, इंसानियत की खातिर, ऐसा मानवीय काम करो… करुणा दिखाने के लिए भी कहना पड़ रहा है या उसे 'मनुष्य होना' याद दिलाना पड़ रहा है। यह दुख की बात है कि आज के समय और युग में, हम मनुष्य प्रजाति सबसे अमानवीय बने हुए हैं।

क्या हमने सोचा कभी, इसका क्या कारण है ?

इसके बारे में सोचो। मनुष्य खाद्य शृंखला के शीर्ष पर होने और सभी का श्रेष्ठ मस्तिष्क होने के कारण, भगवान की सबसे शक्तिशाली रचना है, लेकिन हमने उस श्रेष्ठता के साथ क्या किया है? हाँ, हम अपने लिए एक बेहतर जीवन, अपने आराम, अपने आनंद - 'हमारी' प्रगति के लिए आगे बढ़े हैं। हालाँकि, मुझे यकीन नहीं है कि क्या सभी से अधिक शक्तिशाली होने का मतलब सिर्फ अपने आप को देखना था ? मतलबी होना था? क्या हमें कम विशेषाधिकार प्राप्त प्राणियों के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई थी ? उन लोगों की तलाश करने के लिए जो स्वयं की तलाश नहीं कर सकते ? उन लोगों की रक्षा और पोषण करना जो यह नहीं जानते कि यह कैसे करना है ? रुको, मैं अन्य प्रजातियों के बारे में कहाँ बात कर रही हूँ, जब हम इंसानों ने अपने ही बीच  मानवता का अर्थ खो दिया है ?

इसका परिणाम क्या निकला !

आइए, एक नज़र डालते हैं कि हम क्या बन गए हैं, जो दुनिया हमने अपने लिए बनाई है। हमारी भीड़भाड़ वाली जेलें उन लोगों के कृत्यों के बारे में जोर-जोर से चिल्लाती हैं, जिन्होंने या तो अपने साथियों को 'जानबूझकर' नुकसान पहुंचाया है या किसी ऐसे व्यक्ति के कार्य ने उन्हें उनके गुप्त मकसद के लिए उन दीवारों के अंदर फंसा दिया है। कोर्ट में केस फाइल उठाइए तो आप पाएंगे कि भाई आपस में लड़ रहे हैं, दंपति एक-दूसरे के गले दबा रहे हैं, बच्चे अपने माता-पिता से झगड़ रहे हैं, एक-दूसरे के खून के प्यासे अजनबी हैं, लोग एक-दूसरे के मांस के टुकड़े के भूखे हैं।

वह व्यक्ति जो अन्य प्राणियों की प्रशंसा के लिए बनाया गया था, अब अस्पष्टीकृत क्रोध और छल से भर गया है। सड़कों पर एक साधारण सैर करें और आप निष्पक्ष व्यवहार के उदाहरण देखेंगे। बड़े ऊंचे कार्यालय भवन और घर पीठ में छुरा घोंपने और ईर्ष्या की योजनाओ से भरे हुए हैं। आज किसी और को नुकसान पहुँचाने से पहले पलक नहीं झपकाता इंसान जाना-पहचाना, यहाँ तक कि कोई गली का जानवर भी!

हम ये क्यों चुनते हैं?

मनुष्य ही एकमात्र ऐसी प्रजाति है जिसमें 'पसंद' करने की क्षमता है, कार्य करने का विकल्प है, यह तय करना है कि किस रास्ते पर जाना है... और हम क्या चुनते हैं ? हमने जानबूझकर अपने साथियों को दर्द देना चुना। हर दिन लोग भावनात्मक, शारीरिक और मानसिक रूप से पीड़ित होते हैं जो हम एक दूसरे के साथ करते हैं... हमारे साथी का बड़ा वर्ग अपनी ऊर्जा योजना बनाने में लगाता है, दूसरे की कमजोरियों का पता लगाता है और उसके बाद अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए जाता है। हाँ, और हम उन सभी को 'मनुष्य' कहते हैं, मनुष्य जो स्वेच्छा से और जानबूझकर न केवल अपनी तरह का, बल्कि प्रकृति की दूसरी सृष्टि को भी नुकसान पहुँचाते हैं। यहां कही गई कोई भी चीज 'मनुष्य होने' का काम कैसे हो सकती है और हम अपने ऐसे कार्यों को इतनी आसानी से टैग कर देते हैं- 'जानवरों की तरह ?'

जानवर जैसा ? जानवर ने ऐसा लेबल लगाने के लिए क्या किया है ? मनुष्य के विपरीत, जब जानवर उछलता है या हमला करता है, तो वह अपने भोजन का शिकार करने या अपनी रक्षा करने के लिए करता है- वे दुनिया को रहने देते हैं। यदि वह पशु जैसा व्यवहार है, तो मुझे लगता है कि हम मनुष्यों को जल्दी से सीखना चाहिए और उनके जैसा बनने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि 'मानव' शब्द का अर्थ खो गया है।

हम मनुष्य न केवल गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार करते हैं बल्कि अपनी शक्ति का दुरुपयोग भी करते हैं। हाँ, हम सबसे श्रेष्ठ प्रजाति हैं, हमारे पास चीजों को बनाने की बुद्धि है, हमारे पास चुनाव करने की क्षमता है, और हमारे पास शक्ति है, सबसे शक्तिशाली है। लेकिन हम इस सब के साथ क्या कर रहे हैं? केवल अपने स्वार्थ के लिए उपयोग कर रहे हैं। हमारे लिए हर चीज के लिए जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता क्यों है ? जैसे धरती बचाओ, जानवर बचाओ, हिंसा रोको, बलात्कार मत करो ? क्या हम अनपढ़ हैं ?

आइए, आत्मनिरीक्षण करें

आइए, एक पल के लिए रुकें और आत्मनिरीक्षण करें ? क्या हम अपनी रचना के उद्देश्य को पूरा कर रहे हैं ? क्या हमें मानवता और प्रकृति पर ऐसा दर्द देने के लिए भेजा या सृजित किया गया था ? ये ऊपरवाला भी सोच रहा है । क्या हम यहां केवल अपनी आत्म-गति, आनंद, विकास और प्रजनन के लिए हैं ? क्या हम बहुत सारे नियम नहीं तोड़ रहे हैं ? क्या हम हमें दी गई शक्ति का दुरुपयोग नहीं कर रहे हैं ? यदि हम उस पथ पर चलते रहें जिस पर हम चलते हैं, तो क्या हमारे स्थान पर हमसे बेहतर और अधिक शक्तिशाली कोई रचना नहीं आएगी ? क्या हम जिम्मेदार हो रहे हैं ? क्या हमें पता है कितने जन्मों और पुनर्जन्मों के बाद भगवान इंसान को बनाता है ? और क्यों ? भगवान राम, भगवान कृष्ण सभी ने मानव जीवन व्यतीत किया है और अपनी जिम्मेदारियों को पूरा किया है। हम कई पथों में उनका अनुसरण करते हैं, मानव पथ होने के बारे में क्या ? 

'महान शक्ति के साथ बड़ी जिम्मेदारी आती है।' हाँ, यह सच है। हम मनुष्यों के पास शक्ति है (अभी के लिए) लेकिन कहीं न कहीं हम उस जिम्मेदारी को भूल गए हैं जो इसके साथ आती है। हमारे साथ ऐसा नहीं होता कि जो दिया जाता है, वह वापस लिया जा सकता है। हम यह नहीं समझते हैं कि हम मूल्यांकन के अधीन हो सकते हैं, जिसमें हम काफी हद तक विफल हो रहे हैं। हमें इस बात का एहसास नहीं है कि यह शक्ति हमें दी गई है, शायद एक उद्देश्य के लिए, और जब तक हम यह नहीं समझते कि यह क्या है, हमें इसका समझदारी से उपयोग करना चाहिए... यदि नहीं, तो अन्य सभी रचनाओं की तरह, हम भी विलुप्त हो जाएंगे। और हमारा विलुप्त होना पढ़ाया भी नहीं जाएगा।

हमारा विलुप्त होना सबसे बड़ी त्रासदी नहीं होगी, क्या बात होगी कि हमारे जाने के बाद भी हम इंसान हमेशा के लिए सबसे अमानवीय प्रजाति के रूप में जाने जाएंगे ! इसलिए स्वार्थी अमानवीय बनने के बजाय, धन, शक्ति या तकनीक का गुलाम बनने के बजाय, बस अपने एक अनमोल जीवन का उपयोग मानव बनने के लिए करें... जुनून और पेशे दोनों से एक वास्तविक मानव बनें..., मानवता सबसे बड़ा धर्म है, ये मत भूलना। ‘मैं’ छोड़कर ‘हम’ बनें।

शिमोन निगम

(लेखिका आर्टिस्ट बाय पैशन और जॉर्नलिस्ट बाय प्रोफेशन हैं। सेवियर स्वर्म सोशल वेलफेयर ग्रुप की फाउंडर शिमोन यूट्यूब चैनल की सोशल मीडिया मैनेजर तथा देवांशी इंटरप्राइजेज की प्रबंध संचालक भी हैं।)

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डिस्क्लेमर

ये विचार पूर्ण रूप से लिखिका के निजी हैं। इससे या इसकी विषय वस्तु अथवा किसी हिस्से से एसीएन टाइम्स सहमत हो यह जरूरी नहीं है।

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Sun, 09 Oct 2022 01:09:00 +0530 Niraj Kumar Shukla