WWW.ACNTIMES.COM & : शुक्र है... https://acntimes.com/rss/category/shukra-hai WWW.ACNTIMES.COM & : शुक्र है... en Copyright @ ACNTIMES.COM | All Rights Reserved | Webmaster : HARSH SHUKLA शुक्र है... एक सुपारी, सब पर भारी https://acntimes.com/shukra-hai-one-betel-nut-outweighs-everything-else https://acntimes.com/shukra-hai-one-betel-nut-outweighs-everything-else आशीष दशोत्तर 

अब सुपारी सिर्फ़ सुपारी नहीं रही। वह अपने नाम और रसूख़ का बहुत विस्तार कर चुकी है। अपने आकार और प्रकार में कई तब्दीलियां कर चुकी है। अब सुपारी छोटी भी है और बड़ी भी। छोटी सुपारी के आशय छोटे हैं और बड़ी के बड़े। हर सुपारी के मतलब अलग निकाले जाते हैं।

इस सुपारी के लंबे और मुश्किल भरे सफर पर नज़रें तो घुमाइए। हर बड़े आदमी की सफलता के पीछे एक न एक सुपारी खड़ी मिलेगी। छोटी उम्र तक आदमी सिर्फ़ पूजा की सुपारी से ही परिचित होता है। स्कूल के दिनों में मीठी सुपारी अक्सर उसकी जेब में पाई जाती है, जो कॉलेज तक आते-आते पान वाली सुपारी में बदल जाया करती है। यही समय होता है जब वह चिकनी सुपारी, चिप्स सुपारी, कतरन सुपारी, छीलन सुपारी जैसे कई विचित्र प्रकारों से परिचित होता है। उसे यहीं आकर मालूम होता है कि इंसान ठान ले तो उसके लिए लचीला या कठोर कुछ नहीं होता। वह कुछ भी और कैसे भी कर सकता है। कठोर से कठोर चीज़ को भी इंसान कई शक्लों में ढाल सकता है। सुपारी इसका जीता जागता प्रमाण है। समय के साथ उसका बचपन ही नहीं, सुपारी जैसी एक छोटी सी चीज़ भी कितने ही रूपों में तब्दील हो जाया करती है।

एक सुपारी का इतना बड़ा संसार उसके सामने जब आता है तो वह तय नहीं कर पाता है कि उसे किस सुपारी के साथ रहना है। वह असमंजस में होता है लेकिन सुपारी नहीं। वह सुपारी को मुंह लगाने की हिम्मत नहीं कर पाता लेकिन सुपारी उसके मुंह लग जाया करती है। एक बार जो सुपारी उसके मुंह लग जाए, वह उम्रभर उसका साथ नहीं छोड़ती। उसके चाहने पर भी सुपारी उसके मुंह का साथ कभी नहीं छोड़ती। उसकी बत्तीसी के सिंहासन पर विराजमान हो जाती है। धीरे-धीरे उसके मुखमंडल के बीच इतना महत्वपूर्ण स्थान कायम कर लेती है कि उसकी बत्तीसी को बाहर निकाल कर ही दम लेती है। बत्तीसी हिलने से लेकर निकलने तक के सफर में उसका सुपारी से संघर्ष जारी रहता है।

इस बीच जब वह जीवन पथ पर कदम रखता है तो एक ख़ास तरह की सुपारी से उसका सामना होता है। यह ऐसी सुपारी होती है जो ली भी जाती है और दी भी जाती है। चूने-कत्थे की दुनिया से निकलकर सुपारी की इस अजीब दुनिया में उसका प्रवेश जब होता है तो यहां सिर्फ़ सुपारी ही सुपारी नज़र आती है और कुछ नहीं।

किसी ज़माने में सुपारी देना बहुत बड़ी घटना हुआ करती थी, मगर यह अब हर दिन सुपारी दी जा रही है। हर कोई एक-दूसरे की सुपारी देने के लिए बेताब दिखता है। सुपारी देने की होड़ सी लगी रहती है। ज़रा सा कोई तेज़ चला तो समझो उसकी सुपारी किसी ने दी। सुपारी लेने वाले तो जैसे कदम-कदम पर खड़े मिलते हैं। सुपारी देने वालों की इतनी उत्सुकता को देखते हुए सुपारी लेने वालों की तो पौबारह होने लगी है। वे एक ही समय कितनों की ही सुपरियां ले लिया करते हैं। इनका धंधा खूब चल रहा है। कभी मंदी नहीं। कभी घाटा नहीं। कोई उधारी नहीं। कोई बकाया नहीं। लेन-देन का कोई चक्कर नहीं। हिसाब-किताब का कोई टोटा नहीं।

ईमानदारी के साथ कोई समझौता नहीं। काम में किसी तरह की ढिलाई नहीं। सब कुछ साफ़ और समय पर। एक यही धंधा है जो निरंतर विकास का पर्याय बना हुआ है। सुपारी लेने वालों ने आज तक कभी किसी मुआवजे की मांग नहीं की। यही उनके सशक्तिकरण का प्रतीक है। सुपारी लेन-देन जैसे धंधे तो निरंतर विकसित होना चाहिए। सरोते से सुपारी काटते-काटते कई हाथों में अभाव की लकीरें गाढ़ी हो गईं, मगर सुपारी लेने वालों के हाथों में रत्न जड़ित अंगूठियों के लिए उंगलियां कम पड़ रही हैं। एक सुपारी की पहुंच कहां से कहां तक हो गई है।

आशीष दशोत्तर

12/2, कोमल नगर

बरबड़ रोड, रतलाम- 457001

मो.नं. 98270-84966

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Fri, 29 Sep 2023 00:31:03 +0530 Niraj Kumar Shukla
शुक्र है... चुनाव वर्ष : कार्यकर्ताओं की तलाश https://acntimes.com/shukra-hai-Election-Year-Search-for-workers https://acntimes.com/shukra-hai-Election-Year-Search-for-workers गोपाल चतुर्वेदी

चुनाव-वर्ष में देश में खुशहाली छा जाती है। हमने कई बार अपने-आपसे सवाल किया है कि चुनाव हर साल क्यों नहीं होता। पंचायतों के दिन फिरते हैं, नगरपालिकाओं के भाग्य चेतते हैं। पूँजीपतियों की थैली खुलती है। कुछ रैली के नाम पर अस्थायी रोज़गार पाते हैं, कुछ जवाहर योजना के। सरकार धड़ाधड़ हर व्यक्ति के लिए 'पैकेज' का ऐलान करती है। कभी किसानों का कल्याण होता है, कभी महिलाओं का। हमारे हिसाब से सरकार ने सबको 'कवर' कर लिया है। बस बच्चे बचे हैं। उनको बगैर इम्तहान एक क्लास आगे प्रमोट किया जा सकता है। कुछ नहीं तो पर्वतारोहियों के सामान से भारी स्कूल बैग का वज़न कम कर उनकी कमर ही सीधी रहने दें। पर ऐसा नहीं होगा। बच्चे वोटर नहीं हैं।

ऐसा नहीं है कि तरक़्क़ी के कार्यक्रम इसी चुनाव की देन हैं। हर चुनाव के पहले प्रगति के वादे, सुधार की घोषणाएँ, हर क्षेत्र को आर्थिक रियायतें, इलेक्शन प्रक्रिया का अनिवार्य अंग हैं। एक अज्ञानी जानना चाहता है, इस सबके बावजूद देश क्यों वहीं का वहीं टिका है। 'हमारा हिंदुस्तान तो शर्तिया जापान होता। बस जनसंख्या से मार खा जाता है।' हम प्लानिंग कमीशन का पढ़ाया पाठ दोहराते हैं। इस बार भी लोग सर्दी से मर रहे हैं, पर बिना ख़बर बने। उनसे चौगुने जन्म ले रहे हैं, बावजूद 'हम दो हमारे दो' की पुकार सुने। दूरदर्शन, रेडियो और अख़बारों का वातावरण भाषणों और उद्घाटनों का है। अब जो जिसके बस में है, वही तो करेगा। कुछ शिला पूजते हैं, कुछ शिलान्यास करते हैं। 'पर इन घोषित कार्यक्रमों और कारनामों में से कितनों पर अमल होता है।' हमारे जिज्ञासु मित्र फिर पूछते हैं। उन्हें कौन समझाए कि यह सब शुगल की बातें हैं, चुहल की हो सकती हैं पर अमल की क़तई नहीं।

परेशान इंसान ही तो ज्योतिषी के पास जाता है। ज्योतिषी वर्तमान भुलाकर उसे अतीत की स्मृति, भविष्य का अभय देता है। चंद सिरफिरों का धर्म भी जनता की सेवा रहा होगा, अब तो राजनेता का कर्म केवल सत्ता हथियाना है। समस्याएँ नहीं रहीं तो सब्जबाग दिखाकर वोट कैसे मिलेंगे? राजनीतिक ज्योतिष का उसूल है कि करो न करो पर कहो तो जरूर।

मंच से कहने के लिए कार्यक्रम बनते हैं। किसी को आरक्षण से रिझाया जाता है, किसी को संरक्षण से। उसमें बड़े बजट की फ़िल्म-सा-सेक्स, मारधाड़, संगीत का मसाला मिलाया जाता है। फिर भी अनिश्चित रहता है कि सियासत की फ़िल्म टिकट खिड़की पर टिकेगी या पिटेगी। फ़िल्म वाले विज्ञापन से काम चला लेते हैं। राजनीतिक दल घर-घर अलख जगाते हैं। जो रैली से बचे या जवाहर योजना के रोजगार से, उनकी चाँदी हो जाती है। दल के दफ्तर के सामने भीड़ लगी है। सब कार्यकर्ता बनना चाहते हैं। एक पदाधिकारी प्राथमिक चयन की औपचारिताएँ निभा रहे हैं-

'तो आप कार्यकर्ता बनेंगे!'

'जी हाँ!'

'इस काम का कोई अनुभव है?"

'पिछले चुनाव के दौरान तो स्कूल में था, पर अब तक तीन बसें जलायी हैं और दस-पंद्रह के काँच तोड़े हैं। स्कूल के दिनों में 'मिस' की मेज़ पर छिपकली और बैग में मेढक डाला था। प्रिंसिपल ने स्कूल से ही निकाल दिया था।'

'आपका सैद्धांतिक दृष्टिकोण क्या है 'मैं आपका सवाल नहीं समझा।'

'मेरा मतलब है कि आपकी कोई 'पॉलिटिकल आईडियोलॉजी' है ?'

'मैं किसी दूसरे पर यकीन नहीं करता। मुझे सिर्फ अपने बाहुबल पर भरोसा है।'

प्रत्याशी चुन लिया गया है। दूसरे की गुहार लगती है।

'आप क्यों हमारे दल के लिए काम करना चाहते हैं?’

'घर में बेकार रहने से तो बेहतर है कि कुछ किया जाए। फिर राजनीति में मेरी रुचि भी है।'

'वह कैसे?'

'मैंने मार्क्स, गांधी और लोहिया को पढ़ा है। मेरे विचार से पॉलिटिक्स जनता की सेवा का सशक्त माध्यम है।'

'बड़ा नेक इरादा है आपका। कार्यालय के बाहर पान की दुकान खोलकर आप फिलहाल हम लोगों की सेवा करें। इस तजुर्बे से आप बिना कार्यकर्ता बने नेता बन जाएँगे।

इस सलाह के साथ प्रत्याशी की छुट्टी हो गयी। छोटे नेता ने अपनी सूची बड़े नेता के सामने पेश की।

'रामसेवकजी! आपने तो लिस्ट में अधिकतर बी.ए., एम.ए. रखे हैं। काम कैसे 'चलेगा!' बड़े नेता ने टिप्पणी की।

'क्या करें सर! इधर पढ़े-लिखे और बेकार किस्म के ही लोग मिल रहे हैं। मैं छँटनी तो बहुत की है पढे-लिखों प्रतिशत बढ़ गया। अनपढ़ों में कोई रिक्श चला रहा है, कोई अपने धंधे में लगा है। उनका 'रेट' भी ज्यादा है सर!' छोटे न सफ़ाई दी।

बड़े नेता ने विवश हो इसी कच्चे माल से अपनी चुनाव-वाहिनी चुनने का फैसला किया, 'कल इन लोगों को मेरे सरकारी कार्यालय बुला लीजिए।'

बड़े नेता का कमरा वैसा ही था जैसा गरीब देश के ख़ास जनसेवकों का होता है। सोफा, कारपेट, चार एअरकंडीशनर, हर रंग के फ़ोन, ताज़े गुलाव एक छोटा-सा कम्प्यूटर उनकी बड़ी मेज़ पर लाडले बच्चे-सा बैठा था। इंटरव्यू शुरू हुआ-

'आपकी क्वालिफिकेशन।'

'राजनीतिशास्त्र में एम.ए. किया है। 'भारतीय प्रजातंत्र में कुछ परिवारों के योगदान' पर रिसर्च कर रहा हूँ।'

'इनके लिए दुम मँगवायी?' बड़े नेता ने छोटा-सा सवाल किया। छोटे ने कपड़े की एक लाल दुम प्रत्याशी के पार्श्व भाग में लगा दी।

'इसे हिला सकते हैं?'

प्रत्याशी ने कोशिश की। उसने उछल-कूद की। वह हिला तो दुम साथ हिली, पर स्थिर रहकर वह दुम को हिला नहीं पाया। ‘राजनीतिक कार्यकर्ता बनना कोई हँसी-खेल नहीं है। दुम तो हम लगवा देते हैं। पर उसे सही समय पर हिलाने के लिए अभ्यास और प्रशिक्षण जरूरी है। हम आपको पंद्रह दिन की ट्रेनिंग इस हुनर में महारत हासिल करने के लिए देंगे। इसके बाद 'दुम हिलाओ प्रतियोगिता' के रिजल्ट पर आपका सिलेक्शन मुनहसिर है।' साक्षात्कार समाप्त हो गया।

'सर! लड़का ज़रूरतमंद और अनुशासित है। बिना चूँ-चपड़ के उसने दुम लगवा ली।' छोटे ने राय दी। बड़े ने कम्प्यूटर के बढ़न दबाकर उसकी स्क्रीन को ताका और निर्णय सुनाया,' 'पोटेंशियल' है। ट्रेनिंग में मेहनत कर ले तो काम का आदमी है।'

दूसरे कैंडिडेट को बुलाया गया।

'आप पढ़े-लिखे हैं?'

'पाँच साल पहले बी.ए. किया था।'

‘क्या करते हैं?'

'पैसे लेकर जरूरतमंद की अर्जी लिखता हूँ। मुकदमों में पुलिस की ओर से गवाही देता हूँ। जनता के हित में खाने-पीने की दुकानों का माल चखकर उनके स्तर की निगरानी रखता हूँ। सर! इसी तरह के समाजसेवा के कामों में वक्त गुज़र जाता है।’

'आपका किस वाद में यकीन है?'

'जो भी आपका वाद हो सर!'

'भ्रष्टाचार के बारे में आपका क्या ख़्याल है?’

'यही तो आज का आचार-विचार और समय की पुकार है सर! पैसा नहीं जोड़ा तो पार्टी चुनाव कैसे लड़ेगी? अगर चुनाव नहीं हुए तो प्रजातंत्र कैसे चलेगा? लोकतंत्र के लिए भ्रष्टाचार लाज़मी है सर!'

‘देश का नेता कैसा हो?' बड़े नेता ने पूछा।

'बिल्कुल आपके जैसा हो।' प्रत्याशी ने उत्तर दिया।

उसके जाने के बाद नेता ने कम्प्यूटर का बटन दबाया। अट्टहास गूँजा। 'यह बिना ट्रेनिंग के ‘परफ़ैक्ट' है। इसे नियुक्ति पत्र दे दें।' बड़े नेता ने छोटे को आदेश दिया।

दलों को फिर भी दिक्कत है। सही कार्यकर्ताओं के अभाव है। पढ़-लिखकर लोगों के जिस्म में आदर्शों का जहर घुल जाता है। नेता के प्रति निष्ठा संदेहास्पद हो जाती है। दुम दें भी तो हिला नहीं पाते। महँगाई को भ्रष्टाचार से जोड़ते हैं। गांधी की बात करते हैं। लुब्बे-लुबाव यह कि जम्हूरियत के उसूल नहीं मानते। हर तरकीब से कार्यकर्ताओं की खोज हो रही है। कहीं कम्प्यूटर जैसे सलाहकार से, कहीं जात-पात के विचार से। कुछ अभिनय कला के कलाकार तलाश रहे हैं तो कुछ जेल गए गुनाहगारों में से उम्मीदवार। बेरोज़गारी के कल-कारख़ानों के प्रोडक्ट तो बेशुमार हैं, योग्यता वाले कार्यकर्ता बनने के हक़दार कम। हाल पर इस मुल्क के रोता है क्या! आगे-आगे देखिए होता है क्या!

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लेखक परिचय

गोपाल चतुर्वेदी (१५ अगस्त १९४२) हिंदी  के एक लेखक और व्यंग्यकार हैं। वे भारतीय रेल सेवा के अधिकारी भी रह चुके हैं और वर्तमान में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। चतुर्वेदी की रचनायें प्रतिष्ठित प्रकाशनों द्वारा छापी गयी हैं और उनके लेख, व्यंग्य और अन्य रचनायें कई पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही हैं। चतुर्वेदी को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा "यश भारती" और केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा "सुब्रमण्यम भारती पुरस्कार" से सम्मानित किया जा चुका है। उपरोक्त व्यंग्य डायमंड बुक्स (डायमंड पॉकेट बुक्स) द्वारा प्रकाशित व्यंग्य संग्रह 51 श्रेष्ठ रचनाएं : गोपाल चतुर्वेदी पुस्तक से साभार लिया गया है। संपादक डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल द्वारा संपादित यह पुस्तक आप बुक स्टोर से अथवा www.dpd.in पर ऑर्डर कर के भी मंगवा सकते हैं। विशेष आग्रह,- पुस्तकें सच्ची मित्र होती हैं। इसलिए ये जहां भी मिलें, सहेजें और इनसे मित्रता कर लें।)

डिस्केलमर

यह व्यंग्य सिर्फ स्वस्थ मनोरंजन के उद्देश्य से साप्ताहिक व्यंग्य शृंखला शुक्र है... में लिया गया है। हमारा उद्देश्य किसी सरकार, किसी राजनीतिक दल अथवा नेता पर सवाल उठाना नहीं है। इसलिए सिर्फ पढ़िए और आनंद लीजिए।

एसीएन टाइम्स

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Fri, 15 Sep 2023 09:54:05 +0530 Niraj Kumar Shukla
शुक्र है… महिमा जूते की... https://acntimes.com/shukra-hai-Glory-of-shoes https://acntimes.com/shukra-hai-Glory-of-shoes गर्मियों की छुट्टी हुई तो जैसे सभी बच्चे अपने रिश्तेदारों के यहां जाते हैं तो हम भी अपनी नानी के घर गुना गए जूते पहनकर। एक दिन हमने देखा कि नानाजी जी अपने पैर की मरहम-पट्टी कर रहे हैं।

हमने उनसे पूछा, क्या हुआ ?

वो बोले- जूते ने काट लिया।

हम हैरान-परेशान... तो क्या ‘जूता’ काटता भी है?

एक दिन हमने उन्हें जूते में तेल लगाते पाया। हमने पूछा क्या हुआ?

बोले ये ‘जूता’ चूं चूं करता है।

कमाल है 'जूता' बोलता भी है!

एक दिन उन्हें कहते सुना कि फलाना तो बस ‘जूते’ का यार है...

हम समझ गए कि ‘जूते’ तो दोस्ती भी करते हैं।

कल चाचा जी बेटे को डांट रहे थे, कि- तू तो ‘जूते’ खाये बिना मानेगा नहीं।

तब पता चला कि ‘जूते’ खाये भी जाते हैं, यानी भूख मिटाते हैं।

होली में देखा कि एक मूर्ख को चुना जाता है और गधे पर बैठाकर गले में ‘जूते का हार’ पहनाया जाता है।

तब जा कर पता चला मूर्खाधिराज को ‘जूतों’ का हार पहना कर सम्मानित किया गया है।

कमाल है... ‘जूते’ सम्मान प्रदान करने के काम भी आते हैं।

फुटबॉल में सबसे अधिक गोल स्कोर करने वाले खिलाड़ी को 'गोल्डन बूट' दिया जाता है।

वाह...! पुरस्कार में भी सोने का ‘जूता/ दिया जाता है।

कल ही हमें किसी ने बताया कि वेस्टर्न टेलीविज़न और मूवीज इंडस्ट्री में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता को

‘गोल्डन बूट अवॉर्ड’ दिया जाता है।

समझ नहीं आया कि सम्मान अभिनेता का हो रहा है कि ‘जूते का !

जब किसी को मिर्गी का दौरा आता है तब सब कहते हैं कि ‘जूता’ मंगवाओ, इसे ‘जूता’ सुंघाओ।

तब ज्ञान मिला कि ‘जूता’ तो औषधf भी है।

शादी में दूल्हे की सालियां दूल्हे के ‘जूते’ चुराती हैं। उन्हें वापस करने के लिए रुपए मांगती हैं।

ओह ! नो... ‘जूते’ का 'अपहरण भी हो जाता है।

जूता काटता है, जूता बोलता है, जूता दोस्ती-यारी करता है, जूता खाया जाता है। जूता सम्मान प्रदान करता है। जूता औषधf है और तो और जूते के अपहरण का भरा-पूरा व्यवसाय है।

पंडित जी ने बताया कि श्री भरत जी ने ‘राम’ के ‘जूते’ अर्थात खड़ाऊं राजगद्दी पर विराजमान करके चौदह वर्षों तक अयोध्या का राजकाज चलाया।

जय हो ‘जूता’ महाराज की जय हो।

और तो और माँ बाप अपने बच्चों की ‘पूजा’ अक्सर ‘जूते’ से ही करते हैं। तभी तो ‘जूता’ पूज्यनीय माना गया है।

'जूता' चाटने के काम भी आता है, बशर्ते जूता किसी नेता अथवा अफसर का हो।

कुल मिलाकर मुझे तो लगता है कि 'जूते में जीवन' है।

अथ् ‘श्री जूता कथा’ इति।

बोलिये, ‘जूताधिराज’ की जय।

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डिस्क्लेमर

साप्ताहिक कॉलम 'शुक्र है...' के रूप में प्रस्तुत यह रचना किसकी है, यह हम नहीं जानते। सोशल मीडिया पर उपलब्ध यह रचना हमें अच्छी लगी इसलिए अपने पाठकों के लिए यहां उपयोग कर ली अज्ञात लेखक से क्षमायाचना के साथ। हमारा यह प्रयास पसंद आए तो प्रतिक्रिया अवश्य दीजिए, पसंद नहीं भी आए तब भी जरूर बताएं, ताकि आप की पसंद और नापसंद के बारे में पता चल सके।

एसीएन टाइम्स

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Fri, 08 Sep 2023 14:30:47 +0530 Niraj Kumar Shukla
शुक्र है...! इस 'पाथ' के 'फुट' कहां जाएं? https://acntimes.com/shukra-hai-is-paath-ke-foot-kahan-jayen-ashish-dashottar https://acntimes.com/shukra-hai-is-paath-ke-foot-kahan-jayen-ashish-dashottar आशीष दशोत्तर

फुटपाथ तो फुटपाथ होता है। इसमें समझने वाली कोई बात है ही नहीं। जिस 'पाथ' पर आप 'फुट' रख सकें वही ‘फुटपाथ’ होता है। फुटपाथ के होने से इस बात की प्रामाणिकता सिद्ध होती है कि 'फुट' यानी पैर, 'पाथ' यानी ज़मीनी राह पर ही रखे जाते हैं। इसे यूं ही समझ सकते हैं कि ज़मीन पर पैर रखने वाले लोगों का हिस्सा ही फुटपाथ होता है। यह अक्सर सड़क के दोनों सिरों पर होता है जो बहुत छोटा और पूरी सड़क के मुकाबले सबसे कम क्षेत्रफल का होता है। इससे यह बात भी प्रमाणित होती है कि ज़मीन पर पैर रखकर चलने वालों के लिए सबसे कम जगह हुआ करती है। जो लोग ज़मीन पर पैर नहीं रखते उनके लिए ज़मीन का बहुत बड़ा हिस्सा उपलब्ध होता है। जो लोग ज़मीन पर पैर नहीं रखते वे कभी फुटपाथ के बारे में सोचते भी नहीं हैं।  

जो लोग फुटपाथ पर होते हैं, उनकी नज़र हमेशा ज़मीन पर पैर न रखने वाले लोगों पर ही होती है। यह सोचते-सोचते ये फुटपाथ से उतरकर सड़क के उस हिस्से में आने की कोशिश करते हैं जहां पैर रखने की उन्हें मनाही होती है। इधर आने की चाह में जैसे ही इनसे फुटपाथ छूटता है, वह कहीं और विलीन हो जाता है। फुटपाथ गायब होकर कहां जाता है आज तक किसी को नहीं पता चला। इस विलीनीकरण की न तो प्रक्रिया दिखती और न ही कोई चिन्ह नज़र आते हैं। देखते ही देखते किसी दिन फुटपाथ अचानक गायब हो जाता है और उस पर पैर रखकर चलने वाले लोग अपने पैर कहां रखें इस चिंता में ही कभी आगे कदम बढ़ा ही नहीं पाते हैं। फुटपाथ पर चलने के लिए अभिशप्त लोगों के अतिरिक्त फुटपाथ बहुत से लोगों का होता है। 

असल में देखा जाए तो फुटपाथ अघोषित रूप से उनका ही होता है जो बाकी राह पर काबिज़ होते हैं। यह उस दुकानदार का होता है, जो इस विलीनीकरण का प्रमुख पात्र होते हुए भी सदैव इससे अनजान बना रहता है। यह तो उसकी सदाशयता होती है कि वह इसे फुटपाथ कहलाने देता है। वह फुटपाथ से जितना प्रेम करता है उतना शायद अपने मकान से भी नहीं करता होगा। उसकी नज़रें फुटपाथ पर ही जमी होती हैं। एक न एक दिन वह उस पर अपना प्रभुत्व जमाता है, तभी उसकी आत्मा को शांति मिलती है।

फुटपाथ से इतना प्रेम आपके शहर में नहीं दिखाई देगा। अपने इधर तो कई दुकानदार तो फुटपाथ को अपनी सुविधानुसार बना लेते हैं। यह सड़क पर सबसे अलग दिखता है। आसपास से ऊंचा। यह फुटपाथ पर अपने आधिपत्य की शुरुआत होती है। धीरे - धीरे यह फुटपाथ दुकान का आमुख हो जाया करता है।

आप आश्चर्य करेंगे कि फुटपाथ फुट को महरूम करने के कृत्य पर अपना सरकारी अमला कुछ क्यों नहीं करता है? अब सरकारी अमला करे भी तो क्या करे? क्या-क्या हटाए और कहां-कहां हटाए? महीनों से जो गाड़ियां फुटपाथ पर खड़ी हुई दिखती हैं, उन्हें हटाए? या फिर फुटपाथ पर अपनी दुकान बढ़ा चुके लोगों को हटाए? इस पचड़े में न पड़ते हुए अमला कुछ नहीं हटाता है।

अपने शहर की तो यह ख़ासियत है कि यहां फुटपाथ का भी सौदा होता है। दुकानदार अपनी दुकान के आगे के फुटपाथ को किराए से देता है। वहां खड़े होने वाले छोटे व्यापारी से बाकायदा पैसे वसूलता है। क्या कहा? इसकी जानकारी सरकारी अमले को नहीं है? अरे जनाब! सरकारी अमला सब कुछ जानता है, मगर फुटपाथ पर 'फुट' रखने से वह भी तो घबराता है।

अपने शहर को यूं ही सबसे अव्वल नहीं कहा जाता। यहां की हर बात कमाल होती है। हर काम बेमिसाल होता है और हर मिसाल ऐसी होती है जिसे सभी को स्वीकारना भी पड़ता है और उसे अपनाना भी पड़ता है।

ज़मीन पर पैर रख चलने को मजबूर आज भी अपने फुटपाथ को ढूंढ रहा है। इधर, फुटपाथ के कब्जेधारी उसे अपनी ज़मीन पर पैर नहीं रखने दे रहे हैं। अब आप ही बताइए इस 'पाथ' के 'फुट' कहां जाएं?

12/2, कोमल नगर

बरबड़ रोड, रतलाम - 457001

मो.नं. : 9827084966

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बेशक, यह देश के तमाम शहरों की बड़ी समस्या है लेकिन इसके लिए आप क्या, कोई भी कुछ नहीं कर सकता क्योंकि कुछ करने के लिए हम और आप नहीं, हमारी आत्मा भी तो तैयार होनी चाहिए। यदि फुटपाथ की आत्मा के इस यक्ष प्रश्न को पढ़कर अपने शहर की इस समस्या के लिए आप की आत्मा खुद को दोषी मानते हुए ग्लानि महसूस करने लगे तो, हम माफी चाहते हैं। यकीन जानिए- हमारा उद्देश्य ऐसा करने का कतई नहीं हैं।

एसीएन टाइम्स

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Fri, 01 Sep 2023 10:23:12 +0530 Niraj Kumar Shukla
'शुक्र है' : नेताजी के चमचे की डायरी& प्रो. अज़हर हाशमी https://acntimes.com/shukra-hai-neta-ji-ke-chamache-Diary-Pro-azhar-hashmi https://acntimes.com/shukra-hai-neta-ji-ke-chamache-Diary-Pro-azhar-hashmi नेताओं से ज्यादा चमचे महत्वपूर्ण होते हैं और वे नेता की हर बात को फॉलो करते हैं। नेता अगर चाय है तो चमचे केतली और यह केतली हमेशा चाय से ज्यादा गर्म होती है। ऐसे ही चमचों से जुड़ी एक बात एसीएन टाइम्स की साप्ताहिक व्यंग्य शृंखला 'शुक्र है...' में पेश है। पढ़िए और आनंद लीजिए, पसंद आए तो इसे औरों से साझा जरूर कीजिए। 

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अज़हर हाशमी

    प्रिय पाठकों । आजकल के नेता का चमचा अगर डायरी लिखेगा तो यह अलीबाबा चालीस चोर के किस्से से बढ़कर होगा। कल्पना कीजिए कि नेताजी का चमचा डायरी लिख रहा है। उसकी डायरी के कुछ अंश प्रस्तुत हैं। 

    आज नेताजी ने जल्दी गुडनाइट कर दिया। सामान्यतः नेताजी इतनी जल्दी गुडनाइट नहीं करते हैं। चलो अच्छा हुआ। मुझे आज रात 10 बजे ही डायरी लिखने का मौका मिल गया। वरना वह नेता रात एक बजे तक मुझसे 'चिलम' भरवाता रहता। ठीक है, दिन में इसके मुँह पर मुझ सहित इसके सारे चमचे (सर) - (सर) कहते रहते हैं लेकिन वास्तव में है तो यह 'सिरफिरा' ही। इतनी जल्दी गुडनाइट करने की वजह नेता जी ने यह बताई कि उन्होंने बहुत अधिक 'माल' खा लिया। इससे उन्हें 'बदहजमी' हो गई है। खट्टी डकारों से परेशान हैं और गेस्टिक टूबल भी है, इसलिए बेडरूम में गैस्टिक ट्रबल दूर कर रहे हैं। 

    आज भी नेताजी ने महफिल जल्दी खत्म कर दी। उस दिन महफिल जल्दी खत्म करने की बात तो समझ में आई थी कि उन्होंने खबोड़े बच्चे की तरह माल ज्यादा खा लिया था। परन्तु आज बात समझ में नहीं आई। नेताजी के अन्य चमचे से जब बहुत कुरेदकर पूछा तो उसने मुझसे किसी से न कहने का वादा लेते हुए बताया कि 'पार्टी' ने रात 12 बजे का समय लिया है। पार्टी के साथ 'सूटकेस' भी होगा। सूटकेस में क्या होगा? यह अंदर की बात है। 

    आज तो नेताजी ने छक के दारू पी। वैसे भी नेताजी को खाने-पीने का शौक है। नेताजी को खाने में 'रिश्वत' व पीने में 'दारू' पसंद है। नेताजी को रिश्वत उतनी ही अच्छी लगती है, जितनी 'ड्रग एडिक्ट' को ड्रग्स। नेताजी को दारू उतनी ही प्रिय है 'जितनी विजय माल्या को कैलेंडर गली'। वैसे नेताजी दारू पीने में सुबह व रात के साथ सम्मान व्यवहार करते हैं। उनका मत है कि दारू पीने में समय के साथ समदर्शी होना पड़ेगा। उनकी मान्यता है कि सभी समय भगवान के हैं। इसलिए रात को पीना और सुबह को नहीं पीना, वास्तव में सुबह का अपमान है। इसलिए सुबह और शाम का अंतर नहीं करना चाहिए। पक्षपात से बचने के लिये हर समय पीना चाहिए। परन्तु आज उन्होंने सुबह का 'कोटा' भी रात को समाप्त कर लिया। पूछने पर बताया कि कल 'मद्यपान की बुराइयों' पर स्कूल में भाषण देना है। इसलिए रात में ही एक बोतल को निपटा दिया। 

    आज नेता जी ने मुझे विश्वसनीय समझकर 'आत्मकल्याण' का तरीका बताया। आत्मकल्याण का जो अर्थ नेताजी ने समझाया उससे मेरे 'ज्ञानचक्षु' खुल गए। नेताजी ने बताया कि आत्मकल्याण के बिना लोक कल्याण संभव नहीं है। मेरे निवेदन करने पर उन्होंने स्पष्ट किया कि आत्मकल्याण का अर्थ है कि- सबसे पहले अपना पेट भरो। क्योंकि 'भूखे भजन न होए गोपाला'। इसलिए पहले स्वयं 'माल' सूतो, फिर जग का कल्याण कूतो। जो स्वयं भूखा है वह दूसरों को क्या खिलाएगा? इसलिए पहले अपनी भूख मिटाओ, यह आत्मकल्याण की पहली सीढ़ी है। अर्थात् आंशिक आत्मकल्याण है। फिर सगे-संबंधियों, चाटुकारों अर्थात् चमचों को खिलाओ। जो अपने लोग हैं, वे अपनी आत्मा के अंश हैं। इसलिए यह आत्मकल्याण की दूसरी सीढ़ी है। अर्थात् पूर्ण आत्म कल्याण है। नेताजी से ज्ञात हुआ कि उपहार लेना 'वेजीटेरियन फूड' है और घोटाला 'करना' नानवेजीटेरियन फूड' है। नेता को आत्मकल्याण के लिये वेजीटेरियन एवं नॉन वेजीटेरियन दोनों तरह का फूड खाना चाहिए। 

    नेता जी ने बताया कि आत्मकल्याण के बाद ही लोक कल्याण की ओर बढ़ा जा सकता है। इसके पक्ष में नेता जी ने कहावत सुनाई कि पहले अपने घर में दीया जलाओ फिर दूसरी जगह। नेता जी से आज यह कोडवर्ड समझ आया कि 'दीया जलाने' का मतलब माल बनाना है। 

    आज नेताजी के ड्राइंग रूम में भीड़ थी। मैं समझ रहा था कि मैं ही उनका विश्वसनीय चमचा हूँ, परन्तु आज अन्य चमचे नजर आए। उन्होंने बताया कि कुछ 'बिचौलिए' नेताजी का दीया जलाने को तैयार हैं। नेताजी ने फौरन ट्रांसफर ट्रिक तैयार करके कैश काउंटर खोल दिया। यहाँ यह भी बात समझ आई कि इस कैश काउंटर का रिकॉर्ड नहीं होता। इसे बिना हिसाब का दीया जलाना कहते हैं। 

प्रो. अज़हर हाशमी

(व्यंग्य प्रोफेसर, साहित्यकार, व्यंग्यकार एवं कवि अज़हर हाशमी के व्यंग्य संग्रह ‘मैं भी खाऊँ तू भी खा’ से साभार)

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Fri, 25 Aug 2023 00:00:00 +0530 Niraj Kumar Shukla
‘शुक्र है’ : पुष्पा'स डिज़ायर& आशीष दशोत्तर https://acntimes.com/Shukra-hai-Pushpas-Desire-Ashish-Dashottar https://acntimes.com/Shukra-hai-Pushpas-Desire-Ashish-Dashottar

व्यंग्य किसी भी बात को कहने की एक प्रभावक शैली है। सामान्य बात को अलग अंदाज में कहने का यह तरीका लोगों सोचने के लिए तो विवश करता ही है, व्यवस्थाओं से जुड़ी निष्क्रियता और सक्रियता की क्षमता को भी काफी हद तक प्रभावित करता है। जो बात खुल नहीं कही जा सकती या कहने में संकोच होता है, वह एक व्यंग्य के रूप में कही जा सकती है जिसकी स्वीकार्यता भी है। व्यंग्य के इसी महत्व को ध्यान में रखते हुए एसीएन टाइम्स द्वारा व्यंग्यों की एक शृंखला शुरू की जा रही है। इस शृंखला का शीर्षक ‘शुक्र है’ नियत किया गया है जो प्रति सप्ताह शुक्रवार को इसी प्लेटफॉर्म पर पढ़ने को मिलेगी। व्यंग्य लिखने, पढ़ने और समझने का यह सिलसिला चलता रहे, इसके लिए जरूरी है कि आपका प्रोत्साहन और सहयोग मिलता रहे।

हमारा यह प्रयास पसंद आए तो इसे औरों तक पहुंचाने में हमारी मदद करें। पसंद आए और नहीं पसंद आए, तब भी अपनी प्रतिक्रिया कमेंट बॉक्स जरूर दें। तो पढ़ते हैं शृंखला शुक्र है की पहली कड़ी के रूप में व्यंग्यकार और लेखक 'आशीष दशोत्तर' का यह व्यंग्य। 

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पुष्पा'स डिज़ायर

आशीष दशोत्तर 

'सभी बच्चे हिंदी बुक ओपन करेंगे। टुडे वी लर्न पुष्पा'स डिज़ायर। यू नो पुष्पा?'

पुष्पा नाम की बालिका हड़बड़ा कर उठी। 'नहीं मैडम मुझे नहीं मालूम।'

'ओह! तुम, नहीं पुष्पा। आई मीन पुष्पा... पुष्पा।'

मैडम ने ज़ोर दे कर कहा तो पुष्पा फिर बोली,' मैडम मैं ही पुष्पा हूं।'

'अरे, तुम पुष्पा नहीं। वो माकन लाल वाली।'

'मैडम, मेरे ही पप्पा का नाम माकनलाल है।'

'ओह, डिस्गस्टिंग। माकन मतलब वो कृष्णा वाला।'

इस बार कृष्णा ने खड़े होकर स्थिति स्पष्ट की, 'मैडम मेरे पप्पा का नाम माकनलाल नहीं रामचन्द्र है।'

'ओके। सिटडाउन। कृष्णा मतलब ईश्वर वाला। यू नो ईश्वर?'

'मेरे को तो कुछ पताइ नी है।' यह ईश्वर की आवाज़ थी।

'ओह ! गॉड। क्या मुसीबत है। इन्हें कैसे समझाऊं कि पुष्पा क्या है?'

मैडम को अचानक गौरी के बालों की क्लिप में फ्लावर की डिज़ाइन दिखी। उन्होंने तत्काल गौरी को बुलाया। 'यह क्लिप निकाल कर मुझे दो।'

'मैडम, मम्मी ने मना किया है। यह किलिप तो पड़ौस वाली आंटी से मांग कर मम्मी ने पहनाई है।' मासूम गौरी बोली।

'अरे ! मैं ले थोड़ी रही हूं। समझा रही हूं।'

क्लिप हाथ में लेते ही मैडम ने बच्चों से पूछा, 'व्हाट इस दिज़?'

बच्चे चिल्ला उठे, 'बालों में लगाने का किलिप।'

मैडम ने फिर कहा, 'गौर से देखो! इसमें क्या बना हुआ है।'

बच्चे काफ़ी देर देखते रहे। उन्हें कुछ समझ नहीं आया।

मैडम ने ख़ुद कहा, 'देखो, इसमें फ्लावर दिख रहा है? यही पुष्पा है।'

इतने में गौरी बोल पड़ी, 'नहीं मैडम यह मेरा है।'

'क्लिप तुम्हारा है लेकिन यह फ्लावर पुष्पा का है।'

'ऐसा कैसे हो सकता है? मैं अपने किलिप में से कुछ भी पुष्पा को नहीं दूंगी।'

'अरे, देना नहीं है। मैं समझा रही हूं कि पुष्पा क्या है।'

इतने में राजू उठकर बोल पड़ा, मैडम जी ! मैं बताऊं। ये तो गेंदे का फूल है।'

'राइट। वेरी गुड। कितना इंटेलिजेंट बच्चा है। यही तो मैं समझा रही हूं। दिस इस पुष्पा।'

पुष्पा फिर खड़ी हो कर कुछ बोलती, इसके पहले मैडम ने उसे डांट कर बैठा दिया। 'बैठ जाओ। अब कोई कुछ नहीं बोलेगा। अब हम 'पुष्पा'ज डिज़ायर' पढ़ेंगे।'

बच्चों को कुछ समझ नहीं आया। शोर होने लगा।

इस बार मैडम ने झल्लाते हुए कहा, 'हम कविता पढ़ रहे हैं। यूं नो कविता?'

कविता ने तत्काल खड़े हो कर कहा, 'नी मैडम मुझे कुछ नी पता।'

'ओके... ओके। बुक में जो पोयम है, हम उसे पढ़ेंगे।'

मैडम कविता की पहली पंक्ति पढ़ने की कोशिश करती रही। वे पंक्ति पढ़ पाती उसके पहले ही पीरियड बदलने की घंटी बज गई। मैडम ने होमवर्क डायरी में लिख दिया, 'कल सभी बच्चे इस पोयम को लर्न करके आएंगे।'

अगले दिन बच्चे रटी रटाई 'पुष्प की अभिलाषा' का पाठ कर रहे थे। मैडम अपनी सीख पर इतरा रही थी। कविवर 'माखनलाल जी' की आत्मा क्या कह रही होगी, आप महसूस कर सकते हैं।

आशीष दशोत्तर

12/2, कोमल नगर

बरबड़ रोड, रतलाम - 457001

मो. नं. 9827084966

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Fri, 18 Aug 2023 11:15:58 +0530 Niraj Kumar Shukla