WWW.ACNTIMES.COM & : नीर_का_तीर https://acntimes.com/rss/category/Neer_ka_Teer WWW.ACNTIMES.COM & : नीर_का_तीर en Copyright @ ACNTIMES.COM | All Rights Reserved | Webmaster : HARSH SHUKLA नीर का तीर : होशियार ! त्योहार आया, सरकारी अमले जागे..., ये सीजन है ‘रबड़ी’ खाने का, PM के कद के बराबर हुआ युवा नेता कद का... https://acntimes.com/ratlam-tyohar-sarkari-jagran-neer-ka-teer-vyangya https://acntimes.com/ratlam-tyohar-sarkari-jagran-neer-ka-teer-vyangya नीरज कुमार शुक्ला

रतलाम । होशियार ! होशियार !! होशियार !!! हमारे सारे सरकारी अमले जाग गए हैं, आखिर त्यौहार जो आ गए हैं। खाद्य नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग के जिम्मेदार जाग गए हैं और उन्हें फिर से आवासीय क्षेत्र के गैस गोदाम नजर आने लगे हैं। हर बार की तरह एक बार फिर गैस गोदामों को शहर से बाहर स्थानांतरित करने का फरमान जारी हो चुका है, वरना...। यह ‘वरना’ विभाग के जिम्मेदारों की त्योहारी जरूरतें पूरी करने के लिए काफी है। बाकी विभागों का अमला भी कमर कस चुका है मैदान में उतरने के लिए।

त्योहार आते ही नजर आए गैस गोदाम, अभी तक कहां सो रहे थे श्रीमान् 

हर बार त्योहार से पहले गैस गोदाम और पटाखों के गोदामों को लेकर ऐसी चेतावनी जारी होती है और ‘वरना...’ का डर दिखा दिया जाता है। यह बात दीगर है कि त्योहारी जरूरत पूरी होते ही मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। इस बार भी परंपरा अनुसार ऐन त्योहार से पहले जिला आपूर्ति अधिकारी ने हम सब को बताया दिया है कि इंडेन गैस डीलर ललित गैस सर्विस, अल्पा गैस सर्विस और अंशुल गैस सर्विस तथा एचपी गैस डीलर रतलाम गैस सर्विस के गोदाम घनी आबादी वाले इलाकों और कॉलोनियों में स्थित हैं। अधिकारी द्वारा बताया गया है कि कलेक्टर साहब ने सभी गैस गोदाम 10 दिन में शहर से बाहर करने का निर्देश दिया है। अच्छा हुआ विभाग ने हमें बता दिया। अब हमे डरने का एक और कारण मिल गया है। कुछ दिन इससे डरने के बाद हम भी भूल जाएंगे और आबादी वाले इलाकों में स्थित गैस गोदाम या पटाखों के गोदामों के साथ गलबहियां करेंगे, ठीक उसी तरह जिस तरह प्रशासन हर बार चेतावनी देने के बाद भूल जाता है।

सीजन गड़बड़ी छिपाने के लिए रबड़ी मिलने का

अभी तक टारगेट पूरे करने जितनी कार्रवाई करने वाला खाद्य विभाग और नाप-तौल विभाग का अमला भी जाग चुका है। इन विभागों के अधिकारियों-कर्मचारियों को सालभर मोतियाबिंद की बीमारी रहती है जिस कारण उन्हें दुकानों-संस्थानों में कोई गड़बड़ी नजर नहीं आती। इन्हें न तो किसी वस्तु की एक्सपायरी डेट दिखाई देती है और न ही एमआरपी से ज्यादा की जाने वाली वसूली। वस्तु की मात्रा कम या ज्यादा (वैसे ज्यादा होने के तो सवाल ही नहीं उठता) से तो इन्हें कोई लेना-देना है ही नहीं रहता। चूंकि त्योहार आ गए हैं इसलिए इन सभी विभागों को खाने-पीने की वस्तुओं की दुकानों और प्रतिष्ठानों की अनियमितताएं भी दिखने लगी हैं और यहां उपयोग होने वाले अमानक और अप्रमाणित बांट और तराजू भी। जल्दी ही नमकीन और मिठाई की दुकानों पर खाद्य विभाग से जुड़ी (मधु)मक्खियां भी भिन-भिनानें लगेंगी क्योंकि गड़बड़ी छिपाने के नाम पर ‘रबड़ी’ त्योहारी सीजन में ही खाने को मिलती है।

सोने की चमक तले दबे नियम और कानून

शहर के बजना रोड के डिवाइडर को खरीदने वाले एक स्वर्ण आभूषण निर्माता और विक्रेता के शो-रूम के उद्घाटन के लिए प्रदेश के मुखिया इसलिए नहीं आए थे क्योंकि उन्हें शोरूम निर्माण में नियमों की अनदेखी की भनक लग गई थी। उन तक यह खबर भी पहुंच गई थी कि आवासीय कॉलोनी में जहां सिर्फ सर्विस शॉप ही खुल सकती है वहां रतलाम शहर में निर्धारित ऊंचाई से ज्यादा ऊंची इमारत बन गई वह भी बिना सक्षम अनुमति के। एमओएस और बेसमेंट का नियम भी सोने की चमक तलते ही दफन कर दिया गया है। इसलिए, चाहते हुए भी प्रदेश के मुखिया ने बदनामी का करंट लगने से बचने के लिए घातक ‘DP’ से दूर रहना ही उचित समझा। (बता दें कि, विद्युत ट्रांसफार्मर वाले सब स्टेशन को आम बोलचाल की भाषा में ‘DP’ ही कहते हैं जिसका शाब्दिक अर्थ ‘ड्युअल पोल’ होता है।) सुनहरी इमारत के नियमों की कब्र पर खड़ी होने की जानकारी नगर सरकार से लेकर जिला सरकार तक के सभी अफसरों को है लेकिन उसकी स्वर्णिम चमक की चकाचौंध उनकी पलकों को ऊपर उठने ही नहीं देती। ऐसे ही चकाचौंध एक अन्य स्वर्ण आभूषण निर्माता और विक्रेता की भी है जिसने पूरे यतायात अमले को ही चौंधिया दिया है और इसका प्रमाण शहर की सड़क के हर डिवाइडर पर हर कदम पर टंगा है।

...और भीड़ में शामिल हो गए युवा नेता

यह त्यौहार कई नई सूचनाएं, संभावनाएं लेकर आया है। ‘रतलाम’ का प्राचीन नाम ‘रत्नपुरी’ भी रहा है। यहां के रत्नों की चर्चा उनकी खूबियों के कारण होती आई है। ऐसे ही एक युवा रत्न रतलाम शहर में और हैं जिनकी एक खूबी अखबार और सोशल मीडिया में सुर्खी बन चुकी है। कद में लंबे इस युवा की महत्वाकांक्षा का तो क्या ही कहना। भले ही इनके सीने पर युवा नेता का तमगा लटका हो लेकिन इनकी महत्वाकांक्षा तमाम स्थानीय नेताओं के राजनीतिक कद से ऊपर उठते हुए प्रधानमंत्री के कद के बराबर तक जा पहुंची है। नमो-नमो की माला जबते हुए इन्होंने ऐसी ‘मैराथन दौड़’ लगाई कि पोस्टरों और बैनरों में ये ‘प्रधानमंत्री की बराबरी’ में जा चिपके।

शायद यही वजह है कि पितृ संगठन ने इन्हें अपना हिस्सा बनाते हुए जिले का ‘दो नंबरी’ नेता बना दिया। इनके और इनके पितृ संगठन में इनकी उपलब्धियों से जलने वालों की भी कमी नहीं है, वे जहां प्रधानमंत्री से बराबरी को अनुशासनहीनता बता रहे हैं। विरोधियों का कहना है कि युवा नेता जी का प्रमोशन नहीं हुआ है बल्कि उन्हें तो भीड़ में (8 लोगों वाले पद) शामिल किया गया है। ऐसे सभी विरोधियों की नजरें उनकी एक नंबर की कुर्सी पर गड़ी हुई हैं।

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Tue, 23 Sep 2025 15:02:53 +0530 Niraj Kumar Shukla
नीर&का&तीर : ये बिल्लियां आंख खोलकर चाट रहीं रबड़ी, शुतुरमुर्ग मुंह छिपाने के लिए रेत में गड़ा रहे गर्दन, कुत्ते इतराने लगे और गेंडे तो शर्माने ही लगे https://acntimes.com/neer-ka-tee-3-july-2025 https://acntimes.com/neer-ka-tee-3-july-2025 नीरज कुमार शुक्ला

जीव विज्ञान (Biology) की एक परिभाषा के अनुसार मानव (Homo sapiens) भी एक पशु ही है। यह एक स्तनधारी प्राणी है जो प्राइमेट्स (primates) के क्रम में आता है। मनुष्यों में भी अन्य पशुओं के समान ही कोशिकाएँ, आनुवंशिक सामग्री, फेफड़े, तंत्रिका तंत्र, हृदय, मस्तिष्क और अन्य शारीरिक अंग होते हैं। दोनों में सिर्फ मेरुदंड (रीढ़ की हड्डी) का ही फर्क है। मनुष्यों में मेरुदंड सीधा-खड़ा होता है जबकि पशुओं में लेटा हुआ सा। समझ और तर्क करने की क्षमता के लिहाज को मनुष्य को पशु से श्रेष्ठ माना जाता है, बशर्ते यदि किसी मनुष्य में मनुष्यता हो और उसका मेरुदंड भी सीधा हो।

आज का ‘नीर-का-तार’ का इस तरह विज्ञान सम्मत होना आपको थोड़ा भारी-भरकम लग रहा होगा, लेकिन देश-दुनिया के सिस्टम और मौजूदा हालातों को देखते हुए यहां इसका उल्लेख जरूरी जान पड़ता है। वजह यह कि, खुद को पशुओं से श्रेष्ठ मानने वाले कतिपय मनुष्य अपने आचरण-व्यवहार और क्रिया-कलापों के कारण अब इस लायक भी नहीं रह गए हैं कि उनकी तुलना किसी भी पशु से किसी भी स्तर पर की जा सके। पशुओं ने अपनी प्रकृति नहीं छोड़ी, अपना आचरण भी नहीं बदला लेकिन हम कुछ मनुष्य इस मामले में सारी सीमाएं लांघ चुके हैं। आइये, इसे इन कुछ संकेतों के माध्यम से समझने की कोशिश करते हैं।

बिल्लियों से श्रेष्ठ ये इंसानी बिल्लियां...

कहते हैं कि बिल्लियां दूध पीते समय आंखें मूंद लेती हैं। मनुष्यों का ही मानना है कि बिल्लियों को लगता है कि उनके आंखें मूंद लेने से किसी और को भी उनका दूध पीना नजर नहीं आएगा। भ्रष्टाचार को अपना शिष्टाचार बना चुके अधिकारी-कर्मचारियों ने भी बिल्लियों के इस आचरण को अपना आदर्श बना लिया है। इतना ही नहीं वे बिल्लियों से अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए अब अपनी आंखें मूंदकर घूस रूपी दूध-मलाई नहीं चाटते, वरन आंखें खोलकर और इसे रबड़ी की तरह औंटा कर ग्रहण करते हैं। जब उनकी इस कारगुजारी पर नजर रखने वाले (गैर)जिम्मेदारों ने खुद ही आंखें मूंद रखी हों तो फिर उन्हें किस बात का डर। अब यदि कोई घूसखोरी का विकास तेजी से होने और परसेंटेज 15-20 फीसदी से बढ़कर 40 से 45 फीसदी तक पहुंचने का आरोप लगाए, तो लगाता रहे। सीमेंट की जगह राख मिलाकर बनाए गए रोड, ब्रिज, भवन आदि उखड़ते और बहते हैं, तो बहते रहें।

इन शुतुरमुर्गों को अंडे नहीं सहेजना, अपना मुंह छिपाना है

द्वापर में एक दृष्टिहीन धृतराष्ट्र के कारण इतनी बड़ी महाभारत हुई लेकिन मौजूदा सिस्टम में तो खुली आंखों वाले अनेकों ही धृतराष्ट्र फल-फूल रहे हैं। इनमें अफसर भी शामिल हैं और जनप्रतिनिधि भी। इन खुली आंखों वाले धृतराष्ट्रों को न तो उखड़ी-अधूरी सड़कें दिखती हैं, न ही घूस लेते कारिंदे और समस्याओं से जूझती जनता। किसी का काम हो या न हो, इनकी बला से। इनका रवैया शुतुरमुर्ग के एक रवैये जैसा ही है। ये खुद पर मुसीबत आने पर शुतुरमुर्ग की तरह अपनी गर्दन बेशर्मी रूपी रेत में गाड़ लेते हैं। यह बात दीगर है कि शुतुरमुर्ग मुसीबत से बचाने के लिए ऐसा व्यवहार नहीं करता। दरअसल, वह अन्य पक्षियों की तरह उड़ नहीं सकता और न ही पेड़ों या किसी ऊंची जगह पर घोंसला बनाकर अंडा सहेज सकता है। उनके अंडे लगभग नारियल के आकार के होते हैं। इसलिए जैसे ही मादा शुतुरमुर्ग अंडे देती है वैसे ही यह नर व मादा पक्षी रेत में गड्ढा खोदकर न अंडों को दबा देते हैं। वे अपने इन्हीं अंडों को पलटते रहने और सहेजने के लिए अपना मुंह और गर्दन रेत (गड्ढे) में गाड़ते हैं।

कुत्तों के तो भाव ही बढ़ गए !

लोकशाही में लोक (जनता) गौण हो गई और अफसरशाही हावी। अव्वल तो यहां जनता की सुनवाई होती नहीं, यदि किसी की हो भी रही है तो यह तय मानिए कि वह राजनीति प्रेरित ही होगी। कहते हैं कि मजबूरी में लोग गधे तक को बाप बना लेते हैं। पूर्व में ऐसी अनेक घटनाएं हो चुकी हैं जिनमें समस्याग्रस्त लोगों ने अफसरों के बजाय जानवरों से आगे गुहार लगाना ज्यादा उचित समझा। ऐसी ही एक घटना मध्यप्रदेश के एक कस्बे में हुई जहां मूलभूत सुविधाओं और समस्याओं के निराकरण की मांग लेकर पहुंचे लोगों ने अफसर के नहीं मिलने पर कुत्ते को ही ज्ञापन सौंप दिया। इसे लेकर तरह-तरह के कटाक्ष हो रहे हैं। कोई कह रहा है कि कुत्ता तो वैसे ही वफादारी की मिसाल है तो कुछ लोगों का कहना है कि इस घटना के बाद से उनके इलाके के कुत्तों के भाव बढ़ गए हैं और वे गली-मोह्लों में अकड़ कर चलने लगे हैं।

गेंडा से भी मोटी चमड़ी वाली प्रजाति !

अगर किसी जिम्मेदार ने ठान ही लिया है कि उसे किसी की बात नहीं सुननी है तो फिर कोई कुछ भी कर ले, उसके कानों पर जूं तक नहीं रेंगेगी। गुहार लगाने वाले बच्चे हों, बूढ़े हों, महिलाएं हों, पुरुष हों, विद्यार्थी हों, शिक्षक हों, किसान हों या फिर व्यापारी हों, उनकी आवाज ‘नक्कारखाने में तूती’ और ‘भैंस के आगे बीन बजाने’ जैसी ही प्रतीत होगी। यदि उसने मान लिया है कि ‘यहां के हम हैं राजकुमार या सरकार’ तो उसे अपनी जगह से न तो हिलाया जा सकता है और न ही कुर्सी से उठाया जा सकता है। प्रायः ऐसे (गैर)जिम्मेदारों के आगे जनप्रतिनिधि ही नहीं, सरकारें भी बौनी ही नजर आती हैं। अगर यह कहा जाए कि ये उस प्रजाति के जीव हैं जिनकी चमड़ी गेंडे की चमड़ी से भी ज्यादा मोटी है, तो कदाचित अतिश्योक्ति तो नहीं होगी।

डिस्क्लेमर

‘नीर-का-तीर’ में लिखने की चुल मची थी इसलिए जो समझ आया, लिख दिया। अव्वल तो इसमें किसी को भी केंद्र में रखकर कुछ भी नहीं लिखा गया है और न ही हमें किसी को आईना दिखाने की ही गरज है। फिर भी, यदि किसी को अपने कार्य, व्यवहार, आचरण तथा ऊपर लिखे गए किसी हिस्से या उक्ति से साम्यता नजर आए तो हम माफी चाहते हैं। यकीन मानिए, हम इस साम्यता को ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ नहीं मानेंगे।

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Thu, 03 Jul 2025 19:16:38 +0530 Niraj Kumar Shukla
नीर का तीर : ये कुर्सियां फेविकोल के जोड़ वाली हैं, जो बैठता है चिपक ही जाता है, जहां 'श्री' से हो 'शृंगार' वहां इज्जत जाए पर कुर्सी न जाए https://acntimes.com/neer-ka-teer-Glory-of-chair-and-love-for-chair https://acntimes.com/neer-ka-teer-Glory-of-chair-and-love-for-chair नीरज कुमार शुक्ला

किसी ने कहा है कि, कुर्सी, सत्ता और प्रेम, ये तीनों ही तत्व प्रायः एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। कुर्सी का मोह, सत्ता का लालच और प्रेम की चाहत, ये भावनाएं मनुष्य के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। कुर्सी और सत्ता से प्रेम को लेकर बहुत सारे जुमले प्रचलित हैं और कई रचनाकारों ने तो कुर्सी और उससे लोगों के प्रेम को लेकर बहुत सारे दोहे और कविताएं भी रची हैं।

पहले पढ़िए रामचंद्र दीक्षित ‘अशोक’ के ये दोहे और फिर बात करेंगे कि ‘नीर-का-तीर’ का विषय कुर्सी पर केंद्रित रखने की वजह...

 कुर्सी से जुड़े दोहे

कुर्सी ऐसी नायिका, जिसके रूप हजार ।

इसको पाने के लिए, लंबी लगे कतार ।।

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कुर्सी के क्रेता यहां, होते लाख - हजार ।

ऊंची बोली बोलते, बीचों - बीच बजार ।।

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कुर्सी किस्मत की धनी, बिकती बीच बजार ।

लेता इसे खरीद जो, तिकड़म करें हजार ।।

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कुर्सी की सेवा करो, मेवा मिलती धाय ।

धन दौलत इतना मिले, घर में नहीं समाय।।

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कुर्सी पर जो बैठता, दूध - मलाई खाय ।

करें आचमन दूध से, दूधै रहा नहाय ।।

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कुर्सी ही अधिकार है, कुर्सी शिष्टाचार ।

कुर्सी पर ही बैठि के, होता भ्रष्टाचार ।।

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कुर्सी की अति लालसा, हुआ बहुत उपहास ।

सोचे जनता की नहीं, खुद का करें विकास ।।

***

अब मुद्दे की बात...

मध्यप्रदेश में हाल ही में तबादला उद्योग शुरू हुआ है। रोज दर्जनों अधिकारियों-कर्मचारियों के तबादला आदेश जारी हो रहे हैं। इनमें वे कारिंदे भी शामिल हैं जो एक ही जगह और एक ही कुर्सी पर चिपक गए थे। किसी को पांच, दस तो किसी को इससे भी ज्यादा समय हो गया था। दूध-मलाई देने वाली कुर्सी का जोड़ तो फेवीकोल के जोड़ से भी ज्यादा मजबूत होता है। कुछ कारिंदे हिलती-डुलती कुर्सी को भी इस करीने से जमाते और खुद भी जमते हैं कि भले ही जान चली जाए, कुर्सी न जाने पाए।

पांच साल, तो किसी से 10 साल चिपकी रही कुर्सी !

वैसे तो ऐसी कुर्सियां हर जगह हैं लेकिन सोने की नगरी रतलाम में ‘करामाती कुर्सियों’ कुर्सियों की संख्या ज्यादा है। जिले के परिवहन विभाग की सबसे बड़ी कुर्सी तो बीते 5 साल से एक ही लोकसेवक को अपने से चिपकाए हुए थी। कहते हैं कि इस कुर्सी पर बैठने वाला खुद तो दूधों नहाता ही है, उसकी सात पुश्तें भी तर जाती हैं। हमें तो लग रहा था कि सिर्फ रतलाम की ही कुर्सी ज्यादा चिपकने वाली है लेकिन पता चला है कि अब जो यहां की कुर्सी पर बैठने आने वाले हैं वे खंडवा में अपनी पुरानी कुर्सी पर लगभग 10 वर्षों से चिपके थे। उन्हें कुर्सी से उठाने के लिए लोगों को खासी मशक्कत करना पड़ी लेकिन कामयाबी नहीं मिली। भला हो सरकार का जिसने कुर्सी (स्थान) एक्सचेंज करने की सुविधा दे दी जिससे दोनों अफसरों को एक-दूसरे की जगह जाने का अवसर मिल गया।

MD से ज्यादा नशीली यहां की कुर्सियां !

रतलाम की नगर सरकार के कार्यालय की कुर्सियां भी लाभप्रद हैं, फिर चाहे कुर्सी स्वास्थ्य अधिकारी की हो, लेखापाल की हो या फिर अन्य साहबान की। यहां की कुर्सियां तो अयोग्य और बिना अनुभव वाले को भी वर्षों तक अपने से चिपकाए रहती हैं। ये कुर्सियां अपने ऊपर काबिज होने वालों को सिर्फ दूध से ही नहीं नहलातीं, अपितु उन पर रुपयों की बारिश में भीगने का सुअवसर भी देती हैं। जिन्हें भी इस बारिश में भीगने का चस्का लगता है वह या तो कुर्सियों से हटता नहीं और यदि हटना बी पड़े तो जोड़-तोड़ कर फिर उसी पर आ धमकता है। लोगों की मानें तो यहां की कुर्सियां मादक पदार्थ MD से भी ज्यादा नशीली हैं। जिन पर भी इसका नशा चढ़ता है, वे ऐन-केन-प्रकारेण फिर से आ ही जाते हैं। यहां के कुछ कारिदों को न चाहते हुए भी कुर्सी छोड़कर जाना पड़ रहा है, हालांकि वे कसम खाकर जा रहे हैं कि वे यहां एक बार अवश्य आएंगे और उसी कुर्सी पर लद कर दूध-मलाई खाएंगे।

इज्जत जाए, कुर्सी न जाए !

रतलाम के ही शिक्षा से जुड़े विभाग की कुर्सियों का चुम्बकीय प्रभाव भी काफी प्रभावी है। उधार (प्रतिनियुक्ति) के अधिकारियों-कर्मचारियों के भरोसे चलने वाले इस विभाग की कुर्सियों के चुम्बकत्व के प्रभाव का इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसके लिए लोग अपनी इज्जत तक दांव पर लगा सकते हैं। इसकी वजह यहां हर काम के लिए ‘श्री’ (लक्ष्मी) से ही ‘शृंगार’ होना बताया जा रहा है। बीते घटनाक्रमों पर नज़र डालें तो पाएंगे कि सार्वजनिक रूप से इज्जत खो चुके कतिपय कारिंदों ने ‘जिम्मेदारों’ को ऐसे साधा कि उन्होंने फिर से उन्हें कुर्सियां सौंप दी। ये वही हैं जिन्होंने अपने कृत्यों से खुद की इज्जत का तो फालूदा बनवाया ही, विभाग की इज्जत भी तार-तार करवाने में कोर-कसर बाकी नहीं रखी। यहां औरों को मौका देने के नियम भी ताक पर ही धरे नज़र आए।

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Wed, 18 Jun 2025 16:05:55 +0530 Niraj Kumar Shukla
मैं रतलाम का पोलो ग्राउंड (नेहरू स्टेडियम) हूं, मुझे ‘अक्षय’ रखने की जिम्मेदारी आप की है, आप मुझ पर खेलिए या मुझसे खेलिए, मर्जी है आपकी https://acntimes.com/I-am-Ratlams-Polo-Ground-play-on-me-or-play-with-me-its-your-choice https://acntimes.com/I-am-Ratlams-Polo-Ground-play-on-me-or-play-with-me-its-your-choice नीरज कुमार शुक्ला 

मैं रतलाम का पोलो ग्राउंड (अब नेहरू स्टेडियम) हूं...। जी हां, मैं वहीं पोलो ग्राउंड हूं जहां रतलाम राज्य के तत्कालीन शासक पोलो खेला करते थे। इसलिए ही मुझे लोग पोलो ग्राउंड कह कर बुलाते हैं। कालांतर में मेरे ऊपर देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के नाम पर नेहरू स्टेडियम लिखवा दिया गया। देश के महान क्रिकेटर सुनील गावस्कर के नाम पर मेरे पैवेलियन का नाम भी रहा। आप कहेंगे यह सब तो इतिहास के पन्नों पर पढ़ चुके हैं। सही बात है, मैं और मेरी ये पहचान इतिहास ही तो है जो सिर्फ पन्नों में दफन होने के लिए ही तो होता है। शायद कतिपय लोग इसी पर अमल करते हुए मेरे अस्तित्व का ‘क्षय’ करने पर आमादा हैं। ये वही लोग हैं जिन पर मुझे ‘अक्षय’ (सदा बना रहने वाला  / अविनाशी / अमर) रखने की जिम्मेदारी है।

(बच्चों और खिलाड़ियों का इस तरह खेलता देखकर अच्छा लगता है)

कहने को तो मैं खेल मैदान ही हूं लेकिन कभी-कभी मेरे प्रति लोगों के आचरण को देख कर यह कोरा भ्रम ही जान पड़ता है। मुझ पर बच्चे और युवा खेलें, बुजुर्ग वर्जिस करें और सुबह-शाम की सैर करें तो मेरा तन-मन प्रफुल्लित हो उठता है लेकिन जब मेरे अस्तित्व से ही खेल होने लगता है तो बहुत पीड़ा होती है। दुःख होता है जब आयोजनों के नाम पर जब मेरी सूरत और सीरत बिगाड़ने से तक से लोग गुरेज नहीं करते।

(ऐसा कुछ हो तो भी अच्छा लगता है, क्योंकि इससे मेरी छाती चौड़ी होती है, छलनी नहीं होती)

किसी के लिए अपनी सामाजिक / राजनीतिक / व्यवसायिक दुकान चमकाने का स्थल हूं तो किसी के लिए अपना रौब और रुतबा दिखाने का जरिया। ऐसे लोग मुझे मयखाना और कचरा डम्पिंग स्थल बनाने से भी बाज नहीं आते। प्रायः अपने हित साधने के लिए होने वाले आयोजनों के बाद पानी के पाउच, पानी की खाली बोतलें, पतंग बनकर जहां-तहां उड़ते कागज और शराब की खाली बोतलें ही नजर आती हैं।

(कोई मेरे अस्तित्व के साथ ऐसा करे तो अच्छा नहीं लगता, मुझे भी और मेरी खातिरी चाहने वालों को भी)

क्रिकेट के लिए स्टम्प, अन्य खेलों की नेट बांधने के लिए पाइप गाड़े जाते हैं तब मेरी छाती चौड़ी हो जाती है इस उम्मीद से कि यहां खेलने वाले और प्रैक्टिस करने वाले खिलाड़ियों में से ही कोई नमन ओझा बनेगा तो कोई आशुतोष। कोई कृतज्ञा शर्मा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंच पर दौड़ते हुए भारतीय परचम (तिरंगा) लहराएगी। इसके उलट ही जब जब शामियाने तानने के लिए बड़े-बड़े पाइप गाड़ दिए जाते हैं तो मेरी झाती झलनी-झलनी हो जाती है। इतना तक तो मैं झेल ही लेता हूं लेकिन जब यहां खेलने या फिजिकल फिटनेस के लिए यहां आने वालों को मेरी दुर्दशा देखकर जो तकलीफ होती है, वह बर्दाश्त नहीं होती।

(ऐसा तो कतई अच्छा नहीं लगता। अगर लोग चाहते हैं कि मेरा अस्तित्व इतिहास के पन्नों में दफन होकर न रह जाए तो आयोजन करने वालों को आयोजन के पश्चात मेरी दुर्दशा न हो, यह जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए। यह चित्र आज दिनांक 16 फरवरी, 2025 की सुबह का

कभी-कभी तो लगता है कि खुद ही खुद को मिटा लूं या फिर जो लोग मेरी सलामती की ख्वाइश रखते हैं, जो इसके लिए दुआ करते हैं या प्रयास करते हैं, उन सभी से चिल्ला-चिल्ला कर कहूं, कि- आप भी आइये और मेरी छाती पर मूंग दलिए और चलते बनिए। बच्चों, खिलाड़ियों और फिट रहने की चाह में मेरे जैसे मैदान तलाशने वालों का क्या है, वे तो अपने-अपने घरों की छतों (यदि कहीं बची हो तो) पर भी खेल / टहल लेंगे। अगर यह भी संभव नहीं हुआ तो कुछ इंच लंबे और चौड़े मोबाइल फोन की स्क्रीन रूपी मैदान पर अपनी उंगलियों से खेल लेंगे। 

डिस्क्लेमर

मेरी इस भावना का हाल के दिनों में हुए आयोजन और की गई मेरी दुर्गशा से कोई सरोकार नहीं है। यह तो सिर्फ मन की भड़ास थी, सो निकाल दी। आप तो अपने हाल में रहिए, जैसा चाहें उस हाल में मुझे रखिए। मेरा क्या है, एक दिन मैं भी इतिहास के पन्नों में दफन हो जाऊंगा और लोग उसे पढ़ कर कह दिया करेंगे- ‘एक था पोलोग्राउंड (नेहरू स्टेडियम) !’

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Sun, 16 Feb 2025 13:06:48 +0530 Niraj Kumar Shukla
नीर का तीर : सिस्टम का नाकारापन, लेखक और उसकी आत्मा का द्वंद्व https://acntimes.com/Neer-Ka-Teer-The-ineffectiveness-of-the-system-the-conflict-between-the-writer-and-his-soul https://acntimes.com/Neer-Ka-Teer-The-ineffectiveness-of-the-system-the-conflict-between-the-writer-and-his-soul नीरज कुमार शुक्ला 

रतलाम । काफी अरसा बीत गया ‘नीर का तीर’ दागे हुए। सुधि पाठकों ने भी कहा कि बहुत दिनों से कोई तीर नहीं छोड़ा। त्योहारी सीजन और घर में चल रहे रिनोवेशन के अंतिम दौर के काम के चलते मामला आज-कल पर टलता रहा। स्थितियां सामान्य हुईं तो सोचा कुछ लिख ही डालूं।

रात के करीब 11.30 बज रहे थे। मैंने जैसे ही लिखना शुरू किया, कमरे में आहट हुई। आहट वाली तरफ नज़र दौड़ाई तो वहां अपने ही प्रतिबिंब को पया। बता दूं, कि उस जगह पर कोई आईना नहीं है। ‘खुद’ को सामने देख शरीर में सिहरन दौड़ गई।

‘डरो नहीं, मैं तुम्हारी आत्मा हूं।’ (दूसरी ओर से आवाज आई)

मेरी आत्मा... ? (मेरे मुंह से निकला)

हां, तुम्हारी आत्मा..., वैसे तुम इतनी रात को क्या कर रहे हो (आत्मा ने पूछा)

यह तो मेरा रुटीन है। मैं ‘नीर का तीर’ कॉलम लिखने की तैयारी कर रहा हूं, पर तुम यहां क्या कर रही हो...? (मैंने कहा)

आत्मा : अरे ! कुछ नहीं, बस यह बताने आई हूं कि चाहे जितने तीर दाग लो, कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। तुम्हारे तीर गेंडे की चमड़ी तो भेद सकते हैं, सिस्टम की चमड़ी नहीं। सिस्टम की चमड़ी इतनी मोटी है कि तीर उससे टकरा कर उल्टे तुम्हें ही चोटिल कर देगा।

मैं : ऐसा नहीं है। भ्रमित मत करो, यहां से जाओ और मुझे लिखने दो।

आत्मा : चली जाऊंगी..., चली जाऊंगी...। पहले यह तो बताओ कि, पूर्व में जिन मसलों को उठाया या जिनके बारे में लिखा, क्या वे अंजाम तक पहुंचे?

मैं : जैसे कि, कोई उदाहरण... ?

आत्मा : एक नहीं, अनेक हैं। अब अवैध और अवकसित कॉलोनी को ही ले लो। अगर पूरे जिले की बात करें तो ऐसी कॉलोनियों में तकरीबन 50 हजार लोग मूलभूत सुविधाओं के अभाव में नारकीय जीवन जी रहे हैं। बारिश में जाकर देखो, रूह कांप जाएगी।

मैं : हां, यह बड़ा मुद्दा है, लेकिन ऐसी कॉलोनियों के कॉलोनाइजरों पर पूर्व के कलेक्टर एफआईआर दर्ज करवा चुके हैं।

आत्मा : सही कहा, परंतु सिर्फ नवाबों की नगरी कहलाने वाले जावरा कस्बे में ही एफाईआर दर्ज हुईं थी। कुछ एक कार्रवाई स्वर्ण नगरी रतलाम में भी हुईं लेकिन वह पुलिस के रोजनामचे तक ही सीमित हैं।

आत्मा : याद है न एफआईआर दर्ज करवाने वाले कलेक्टरों के हस्र ? जमीनों के जादूगरों ने उन्हें ही जिला निकाला दिलवा दिया था। उनके बाद आए कलेक्टरों ने पहले वालों का हस्र जानने के बाद जेहमत ही नहीं उठाई कॉलोनाइजरों के गिरेबान में हाथ डालने की। अधीनस्थ तो वैसे ही कुछ भी करने रहे वह भी तब जबकि कॉलोनियों में अनियमितताओं वाली फाइलों पर कॉलोनाइजरों ने ‘वजन’ रख छोड़ा हो।

मैं : बेशक, अभी तक कुछ नहीं हुआ लेकिन सुना है कि 16 दिसंबर 2024 से शुरू होने वाले मप्र के विधानसभा सत्र के लिए इस मुद्दे को लेकर सवाल लग चुका है। सवाल भी सत्तापक्ष के जनप्रतिनिधि ने ही लगाया है। उन्हें संतुष्ट करने के लिए सरकारी महकमे को कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा।

अत्मा : अच्छी बात है, लेकिन रतलाम शहर के उस स्कूल की जांच का क्या हुआ जहां एक मासूम बच्ची का यौन शोषण हुआ था?

मैं : उसमें तो आरोपित बाल अपचारी पर केस दर्ज हो गया था और उसे बाल संप्रेक्षणगृह भी भेज दिया गया था। स्कूल संचालक के विरुद्ध भी केस दर्ज हो चुका है।

आत्मा : यह सब तो हुआ लेकिन मजिस्ट्रियल जांच के आदेश भी तो हुए थे और एसपी ने एसआईटी भी गठित की थी। तब इसका खूब प्रचार हुआ था। मजिस्ट्रियल जांच के लिए तो 15 दिन की डेडलाइन दी गई थी।

मैं : हां, यह हुआ था...

आत्मा : ... तो फिर उस जांच का क्या हुआ ?, एसआईटी द्वारा चाही गई जानकारियों का क्या हुआ ? क्या किसी ने इनसे बारे में जिम्मेदारों से जानने की कोशिश की ?

आत्मा : एक मजिस्ट्रियल जांच रतलाम शहर में गणेश चतुर्थी वाली रात गणेश भक्तों पर हुई पुलिस की बर्बरता और उसमें घायल हुए युवक की मौत के मामले में भी शुरू हुई थी। उसका भी निष्कर्ष किसी ने नहीं बताया।

मैं : अनुत्तरित, सिर्फ आत्मा की ओर देखता रहा...

आत्मा : ऐसी जांचें और जांच कमेटियों का गठन जनता और मीडिया को शांत करने के लिए होता है जो समय बीतते ही फाइलों में दफन हो जाती हैं।

मैं : प्रशानिक जांचों का तो पता नहीं लेकिन पुलिस विभाग से जुड़ी जांचें तो अंजाम तक पहुंचेंगी, मौजूदा पुलिस कप्तान की हरफन मौला ‘कप्तानी’ पारी देखकर तो यह भरोसा किया ही जा सकता है।

आत्मा : मौजूदा पुलिस कप्तान कम्युनिटी पुलिसिंग के लिहाज से तो काफी बेहतर हैं, और वे उसमें काफी हद तक खरे भी उतरे हैं। वे हर मोर्चे पर खुद ही पहुंचते हैं ताकि विभाग के कामचोर और नगद नारायण के प्रभाव में आ चुके अधीनस्थों की जंग छुड़ा सकें, लेकिन सवाल यह है कि वे ऐसा करते हुए यहां कितने दिन तक टिक पाएंगे ?

मैं : ऐसा क्यों ?

आत्मा : क्या तुम्हें याद नहीं कि कलेक्टर हो या एसपी, जिसने भी ‘स्वहित’ से परे ‘जनहित’ के लिए कुछ भी करने का प्रयास किया तो उन्हें अपना बोरिया बिस्तर समेट कर यहां से जाना ही पड़ा। नगर निगम के पूर्व आयुक्त को ही देख लो, यहां दो कार्यकाल बिताने वाले आयुक्त को भी प्रतिकूल माहौल के चलते ही रतलाम छोड़ना पड़ा।

मैं : ऐसा सबके साथ हो, यह जरूरी तो नहीं।

आत्मा : सुनने में आया था कि मौजूदा कप्तान की ही एक कार्रवाई से सत्ता से जुड़े कतिपय लोग नाराज हो गए थे। यह नाराजगी कितनी जायज थी, यह क्षणिक थी या दीर्घकालिक है, यह दावे से नहीं कह सकते।

मैं : यह तो सुना था।

आत्मा : पिछले दिनों एक बैठक में पुलिस कप्तान ने थाना प्रभारियों को रसूखदारों से जुड़े लंबित प्रकरणों में जल्द से जल्द कार्रवाई करने की हिदायत दी थी, शोकॉज नोटिस भी जारी किए थे। सोचकर बताओ, इस हिदायत के बाद कितने रसूखदार सलाखों के पीछे पहुंचे? पीड़ित पक्ष के आवेदन पर आवेदन दिए जाने के बावजूद सभी छुट्टे सांड की तरह स्वच्छंद घूम रहे हैं।

मैं : पुलिस कप्तान ने आदेश दिया है तो वे फॉलोअप भी लेंगे ही... आज नहीं तो कल।

आत्मा : जिले के एक गांव में तालाब घोटाला हुआ है। पंचायत सचिव ने राशि का गबन हुआ है। जांच में संबंधित को दोषी भी पाया गया है। क्या उस पर कार्रवाई हुई ?

मैं : जांच करने वालों ने ईमानदारी से जांच की। सरकारी पैसे का दुरुपयोग करना पाया गया है। जिला पंचायत सीईओ ने दोषी पर कार्रवाई करने के लिए भी कहा गया है, और क्या चाहिए।

आत्मा : बस, इतना ही। सीईओ ने कार्रवाई का सिर्फ कहा है, कार्रवाई हुई तो नहीं अब तक। अरे ! कार्रवाई होगी भी कैसे, जब बचाने वाले ज्यादा दमदार हों तो दोषी ऐसे ही खुले घूमते रहेंगे। जहां आर्थिक हित जुड़ जाएं, वहां ज्यादा की उम्मीद भी नहीं रखनी चाहिए।

मैं : जांच हुई है और निष्कर्ष भी निकला है। कोई किसी को कब तक बचा लेगा, कार्रवाई तो एक न एक दिन होकर ही रहेगी।

आत्मा : तुम्हारा यह भरोसा कामय रहे। चलो, इन मामलों को छोड़ो और यह बताओ कि मेडिकल कॉलेज के पहले दीक्षांत समारोह में जिले के जनप्रतिनिधि (सांसद व विधायक) नदारद क्यों रहे?

मैं : अपनी-अपनी व्यस्तताओं के चलते नहीं आ पाए होंगे। मेडिकल कॉलेज की डीन का कहना है कि उन्होंने तो सभी को आमंत्रित किया था।

आत्मा : व्यस्तताओं के चलते नहीं, बल्कि वे उपेक्षा के चलते नहीं आए। दरअसल, डीन द्वारा सांसदों और विधायकों को इस समारोह में बतौर अतिथि नहीं, भीड़ जुटाने के लिहाज से ही आमंत्रण पत्र भेजे थे। यह जनप्रतिनिधियों को नागवार गुजरा। पता चला है कि कुछ जनप्रतिनिधियों ने डीन के इस कृत्य की उच्च स्तर पर शिकायत भी की है अथवा करने वाले हैं।

मैं : भला डीन जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा करेंगी ? इससे उनका क्या भला होगा ?

आत्मा : वह इसलिए कि वे जिस इंदौर शहर से आई हैं वहां के मेडिकल कॉलेज के डीन की कुर्सी पर उनकी नजर है। अभी जो इस कुर्सी पर काबिज हैं (जो पहले रतलाम में भी डीन रह चुके हैं) आगामी दिनों में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। अतः रतलाम की डीन जो भी कर रही हैं वह इंदौर की कुर्सी पर काबिज होने के लिहाज से ही कर रही हैं। संभव है कि जनप्रतिनिधियों की नाराजगी उनकी रतलाम से जाने की राह आसान कर दे।

मैं : तुम्हें तो बाल की खाल निकालने की आदत है। हर बात में नकारात्मकता ही खोजती हो। कभी तो सकारात्मक रह लिया करो। कभी-कभी लगता है कि तुम मेरी आत्मा हो भी या नहीं? एक बात जान लो कि कोई कुछ करे/कहे, कैसा भी हो... मैं सिस्टम के नाकारापन से हार मान कर लिखना बंद करने वालों में से नहीं हूं।

आत्मा : अरे… अरे... ! नाराज़ मत हो। मुझे पता है कि तुम किसी के कहने से भी मानोगे नहीं फिर सचेत करना मेरा फर्ज है। मुझे जो कहना था, कह दिया। अब तुम्हें जो करना/लिखना है वह करो/लिखो। मैं तो चली... गुडनाइट। 

अपनी बात

‘नीर का तीर’ में लिखने के लिए तो बहुत कुछ है, लेकिन मेरी आत्मा ने मुझसे जो कहा वह भी गलत नहीं है। इसलिए दिमाग का दही हो रहा है। आत्मा से इस साक्षात्कार ने दुविधा में डाल दिया है नए तीर दूंगा या नहीं ? जब तक इस दुविधा बरकरार है तब तक मेरा और मेरी आत्मा का यह संवाद ही पढ़ लीजिए। पसंद आए तो औरों तक भी बढ़ा दीजिए। अगर पसंद नहीं आए तो कमेंट बॉक्स में अथवा वाट्सएप नंबर पर प्रतिक्रिया जरूर दीजिए। आपकी प्रतिक्रिया ही सुधार के लिए प्रेरित करती है।

नीरज कुमार शुक्ला

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Fri, 22 Nov 2024 16:02:58 +0530 Niraj Kumar Shukla
नीर का तीर : तीन घटनाएं, संगठनात्मक चुनाव का दौर और सत्ताधारी दल के जिला स्तरीय मुखिया के ‘वजूद’ पर उठते सवाल ! तीर और भी हैं... https://acntimes.com/Neer-Ka-Teer-Three-incidents-and-questions-raised-on-the-existence-of-the-district-level-Mukhiya-of-the-ruling-party https://acntimes.com/Neer-Ka-Teer-Three-incidents-and-questions-raised-on-the-existence-of-the-district-level-Mukhiya-of-the-ruling-party नीरज कुमार शुक्ला

केंद्र से लेकर नगर की सरकार तक काबिज राजनीतिक दल के रतलाम जिले के मुखिया के ‘वजूद’ पर ‘अपने’ ही सवाल उठा रहे हैं। इसकी वजह बीते कुछ समय में जिले में घटित कुछ घटनाएं हैं। इनमें इस राजनीतिक दल से जुड़े लोगों पर ही खाकी वाले अमले का गुस्सा उतरना है जिससे जिले के मुखिया की सत्ता और संगठन पर पकड़ को लेकर चर्चा छिड़ गई है। संगठनात्मक चुनाव के दौर में यह ‘अविश्वास’ आगे भी उनके मौजूदा कुर्सी पर बने रहने पर संदेह उत्पन्न कर रहा है।

‘अपनी सरकार’ हो तो सत्ताधारी दल और उसके सिपहसालारों पर जिम्मेदारी के साथ ही ‘अपनों’ की अपेक्षाएं भी बढ़ती हैं। संगठन को भी ऐसे ही कंधों की तलाश रहती है जो सत्ता और सरकार के बीच समन्वय बैठाकर ‘अपनों’ की अपेक्षाओं पर खरा उतर सकें। संगठन ने इसी उम्मीद पर ऐसे कंधे पर जिले की जिम्मेदारी डाली थी परंतु अब उसकी क्षमताओं पर संगठन के साथ ही उसके स्थानीय सिपाहियों को भी शंका होने लगी है। इसकी वजह तीन घटनाएं हैं। पहली घटना जिले के आदिवासी बहुल इलाके बाजना की है जहां धर्म परिवर्तन का मामला उजागर करवाने वालों के विरुद्ध ही केस दर्ज हो गया। दूसरा मामला जिला मुख्यालय पर स्टेशन रोड थाने पर संगठन से जुड़े पदाधिकारियों पर उतरी एक एसआई की खीज है जिसके लिए उन्हें लाइन हाजिर करना पड़ा। इसी की परिणिति अगले दिन गणेश प्रतिमा के जुलूस पर पथराव का विरोध करने उमड़े गणेश भक्तों पर लाठियों के रूप में कहर बनकर टूटी। आरोप है कि इस क्रूरता ने एक युवक की जान ले ली। नतीजतन खाकी वालों और संगठन को आमने-सामने होना पड़ा।

इन मामलों ने ऐसी सुर्खियां बटोरीं कि प्रदेश स्तरीय सिपहसालारों को नियंत्रण की लगाम अपने हाथों में लेनी पड़ी। यहां तक कि विरोध स्वरूप निकले आंदोलन की कमान भी एक हिंदू संगठन को सौंपनी पड़ी थी। अगर जिले के मुखिया के स्तर पर ही बात संभाल ली गई होती तो यह नौबत नहीं आती। जिले के मुखिया का युवाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले एक अति महात्वाकांक्षी युवा तथा विकास प्राधिकरण की कुर्सी की ओर आस लगाए एक होटल व्यवसायी के साथ मिलकर नया गुट बना लेना भी वरिष्ठों और कनिष्ठों को नागवार गुजर रहा है। इसलिए आगामी दिनों में संगठनामक चुनाव के दौरान यदि जिले की कुर्सी को लेकर कोई नया निर्णय हो जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए और वह भी तब जबकि उम्र का बंधन भी हट जाए।

यहां अविश्वास या मोहभंग

सत्ताधारी दल के जिले के मुखिया की आस्था को लेकर पहले भी चर्चाएं होती रही हैं। उनकी आस्था पहले एक शक्ति केंद्र तक ही निर्भर रहती थी लेकिन जब राजनीतिक परिदृश्य बदला तो आस्था भी बदल गई। हालांकि संगठन की जिले की सबसे बड़ी कुर्सी मिलते ही आस्था मध्यस्थ की भूमिका में आ गई। शक्ति के पुराने और नए केंद्र के बीच समन्वय बैठाने के प्रयासों को कुछ हद तक सफलता मिलती नजर भी आई लेकिन हाल के एक घटनाक्रम ने इस पर भी संशय उत्पन्न हो गया। जिन माननीय पर पहले उनकी आस्था थी वही जब शहर की सड़कों की बदहाली को लेकर नगर सरकार के साबह से मिलने पहुंचे तो संगठन के जिला प्रमुख को न ले जाकर अपने अन्य अस्थावानों को ले गए। अब सवाल यह उठता है कि माननीय का पुराने आस्थावान रहे जिला स्तरीय मुखिया से मोह भंग हो गया है या फिर उनकी आस्था पर यकीन नहीं रहा।  

खाकी की इस कृपा को क्या कहें

कप्तान बदलते ही खाकी की सक्रियता नजर आने लगी है। कम्युनिटी पुलिसिंग को मजबूत बनाने के प्रयासों के चलते एक साथ कई मोर्चों पर काम शुरू हो गया है। थानों में धूल खा रहे रोजनामचों में दफन आरोपी और अपराधी अचानक ही खाकी वालों की आंखों में खटने लगे हैं और सीखचों के पीछे भी पहुंचने लगे हैं। यह बात दीगर है कि खाकी वालों के हाथ कुछ रसूखदारों के गिरेबान तक पहुंचने में संकोच कर रहे हैं। इनमें जमीनों की जादूगरी करने वाले और ब्याज के तौर पर लोगों का खून चूसने वाले शामिल हैं। दूसरे की जमीन भी डकार जाने वाले जादूगर तो खाकी वालों को ही नजर नहीं आ रहे वह भी उनकी सार्वजनिक मौजूदगी के प्रमाण देने के बाद भी। आखिर यह कृपा क्यों और कहां से आ रही है?

पार्किंग तो तय कर दी पर शुल्क कौन तय करेगा ?

शक्ति की आराधना के पर्व के चलते शहर के कालिकामाता मंदिर परिसर में मेला भी शुरू हो गया है और धार्मिक अनुष्ठान भी। इसलिए यहां श्रद्धालुओं की उपस्थिति भी बढ़ने लगी है। श्रद्धालुओं को आवागमन में परेशानी न हो और शहर का यातायात भी बाधित न हो इसकी व्यवस्था उजली वर्दी (सफेद शर्ट - नीली पैंट) वाले विभाग ने तय कर दी है। मेला परिसर के आसपास वाहनों की पार्किंग के स्थल चिह्नित कर दिए गए हैं और वहां वाहन रखने की अनिवार्यता भी तय की गई है। इसका लोग स्वागत कर रहे हैं लेकिन यह सवाल भी कर रहे हैं कि पार्किंग की जगह तो तय कर दी गई है लेकिन पार्किंग का शुल्क निर्धारित दर से ज्यादा नहीं वसूला जाएगा, यह कौन तय करेगा। अगर ऐसा होता तो शिकायत कहां और किससे करनी होगी। 

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Thu, 03 Oct 2024 17:13:11 +0530 Niraj Kumar Shukla
नीर का तीर : ‘मुर्दों’ के शहर में ‘धृतराष्ट्रों’ की हुई ‘पौ बारह’, कहीं दिल के अरमां आंसुओं में बह गए तो कहीं हवाई किले फूंक मारने से ढह गए https://acntimes.com/neer-ka-teer-25-9-2024 https://acntimes.com/neer-ka-teer-25-9-2024 नीरज कुमार शुक्ला

(कु)व्यवस्थाओं से अविचलित और (अ)सुविधाओं से जूझते हुए भी चुप रहने वाले रतलामियों की वजह से कुछ लोग रतलाम को मुर्दों का शहर कहने से नहीं चूकते। जहां सिर्फ माल ही नहीं, जान भी चली जाए तो किसी को तनिक फर्क नहीं पड़ता हो वहां ‘खुली आंख वाले धृतराष्ट्रों’ की ‘पौ बारह’ होना तय ही है। ऐसे ‘धृतराष्ट्र’ राजनीति में भी हैं और सरकारी महकमे में भी। इनकी गेंडे जैसी खाल पर न तो सड़क धंसने के कारण मजदूर की मौत होने से सिहरन होती है और न ही सांड के उत्पात से किसी की जान जाने से। ऐसे दिलदहला देने वाले हादसों से जमीन में दस गज नीचे दफन मुर्दे की रूह भले ही कांप जाए लेकिन हर हाल में ‘जिंदा लाशों’ की तरह मदमस्त रहने वाले टस से मस तक नहीं होते।

अरे ! ओ सरकारी सिस्टम के निष्क्रिय निकम्मों, किसी को कुछ भी हो जाए लेकिन तुम टीवी पर दिखाए जाने वाले ‘फाइव स्टार चॉकलेट’ के विज्ञापन के मुख्य किरदार की तरह ही कुछ मत करना, सिर्फ चॉकलेट चबाते रहना अथवा भैंस की तरह पगुराते रहना। अगर मुर्दा अपना भला चाहेगा तो वह खुद-ब-खुद उठ बैठेगा। जिस तरह तुम्हारी आत्मा मर चुकी है, जमीर सड़ चुका है, वैसे ही सभी को मर जाने देना, संवेदनाओं को सड़ जाने देना।

एक बात जनता के उन नुमाइंदों (जिन्हें खुद जनता ने ही अपनी अनदेखी के लिए चुनाव है), से भी कहनी है, कि- आपको भी कुछ करने की जरूरत नहीं है। जनता को यह भ्रम है कि उसने आपको अपने हितों के रक्षण / संरक्षण के लिए चुना है। शायद उन्हें यह नहीं पता है कि उन्होंने तो आपको सरकारी सुविधाओं का भक्षण करने का लाइसेंस दिया है। इसलिए आप बेफिक्र होकर निष्क्रियता रूपी सांड को लोगों के घरों के चिराग बुझाने दीजिए और अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते रहिए। अभी हुआ ही क्या है, सांडों ने चार महीने में सिर्फ दो ही तो जाने ली हैं। चार महीने पहले एक परिवार का बुजुर्ग छीन लिया था और आज एक बुजुर्ग दंपति से उसके बुढ़ापे का सहारा। हां, एक बात और याद रखिएगा, कि- समय (अच्छा भी और बुरा भी) तो सब का आता है, आज हमारा समय आया है तो तो कल आपका भी आ सकता है।

...और दिल के अरमां आंसुओं में बह गए

राजनीति के अंधों को हर वक्त ‘अवसर’ की तलाश रहती है फिर चाहे वक्त अच्छा हो या बुरा। कुछ समय पूर्व तक कतिपय ‘राजनीतिक अंधों’ की महात्वाकांक्षाएं बल्लियों उझल रही थीं। यह वह दौर था जब नगर सरकार के मुखिया गंभीर बीमारी से ग्रस्त होकर उपचाररत थे। कहते हैं कि अच्छे और बुरे की पहचान ऐसी विपत्ति के समय होती है। यह बात इस दौरान भी देखने को मिली। सद्भावना रखने वाले लोग नगर सरकार के मुखिया के स्वस्थ होने की प्रार्थनाएं करने लगे तो ‘अवसरवादी’ और ‘महात्वाकांझी’ बिल्ली के भाग से छींका फूंटने की (ईश्वर न करे किसी अन्य के साथ ऐसा हो)। यह बात दीगर है कि, स्वस्थ होने की प्रार्थनाएं तो स्वीकार हो गईं लेकिन छींका फूटने की आस चकनाचूर ही होनी थी, सो हो गई।

डायरी से ख़ौफज़दा ख़ाकी

जिले के खाकी वाले महकमे में उस समय खुशी की लहर दौड़ गई जब उनके तत्कालीन कप्तान (मुखिया) का तबादला हुआ। खाकी वालों को उम्मीद थी कि कप्तान के साथ ही ‘साप्ताहिक डायरी’ वाला भूत भी चला जाएगा। ईश्वर से भी नहीं डरने वाले कतिपय खाकी वाले भी इस ‘साप्ताहिक डायरी’ से भयभीत थे, अतः उनकी खुशी स्वाभाविक भी थी, हालांकि वह क्षणिक साबित हुई। नए कप्तान ने जैसे ही अपनी प्राथमिकताएं गिनाते हुए अपने पत्ते खोले और ‘साप्ताहिक डायरी’ व्यवस्था पहले से भी ज्यादा सख्ती से लागू करने की बात कही तो अधीनस्थों की खुशी काफूर हो गई। अब सारे खाकी वाले अपनी डायरी सुधारने और नए कप्तान के सामने अपनी छवि निखारने की कोशिश में जुट गए हैं। अचानक ही उनका मुखबिर तंत्र भी मजबूत हो गया है और उनके चश्मे से अपराध और अपराधी भी साफ-साफ नजर आने लगे हैं।

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Wed, 25 Sep 2024 19:28:01 +0530 Niraj Kumar Shukla
नीर&का&तीर : आखिर, मजिस्ट्रियल जांच के औचित्य पर क्यों उठे सवाल, पुराने कप्तान ठंडे दूध से जले इसलिए नए छांछ फूंक रहे, ऐसा कोई नहीं जिसे ‘झांसा&नी’ दिया https://acntimes.com/Neer-ka-Teer-Why-questions-were-raised-on-the-legitimacy-of-magisterial-investigation-There-are-more-arrows https://acntimes.com/Neer-ka-Teer-Why-questions-were-raised-on-the-legitimacy-of-magisterial-investigation-There-are-more-arrows नीरज कुमार शुक्ला

रतलामवासियों के लिए पूरे साल में सितंबर का महीना ज्यादा ही चिंता वाला होता है। वजह पूर्व की कुछ घटनाएं हैं जिन्होंने शहर का साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने में कोई कसर नहीं रखी थी। ये सितंबर में घटित हुईं थी जिनकी आंच तब जन-जीवन के साथ ही तीज-त्यौहारों पर भी आई थी। इस साल भी गणेश चतुर्थी की रात ऐसा ही कुछ घटित होते-होते रह गया। गनीमत रही कि, संयमित शहरवासियों की सूझ-बूझ ने कुछ भी अप्रिय नहीं होने दिया, हालांकि खाकी दागदार जरूर हो गई।

खाकी के दाग छिपाने के प्रयास में कुछ अफसर और कर्मचारी नप गए तो कुछ और के आगामी दिनों में नपने की संभावना है। गणेश प्रतिमा के जुलूस पर पथराव का आरोप लगाने वाली भीड़ पर रात के अंधेरे में खाकी का कहर टूटा। बहती गंगा में खाकी वाले अमले के ‘दो-नंबर’ के साहब ने भी खूब दौड़ लगाई, उनके अदने हुक्म बजाने वालों ने तो डंडे तक चटकाए इस भरोसे में कि उन्हें ‘एक-नंबर’ वाले साहब बचा ही लेंगे।  मामले ने तूल पकड़ा तो उनके मनसूबों पर पानी फिर गया। उन्हें जिन पर बचाने का भरोसा था वे खुद ही नहीं बच पाए और जिले से बाहर फेंक दिए गए। राजस्व विभाग के एक कारिंदे को भी दफ्तर हाजिर कर दिया गया है जिनके ‘क्रिया-कलापों’ पर सोशल मीडिया पर लोग लिखने से नहीं चूकते।

इस जांच से किसी पर आएगी आंच ?

पथराव, पथराव का विरोध, खाकी की सख्ती और आदिवासी युवक की मौत के मामले में कौन-कितना सही या गलत है, यह जांचने के लिए मजिस्ट्रियल जांच होनी है। जांच के बिंदुओं पर किसी को कोई "शक-ओ-शुब्हा" नहीं है लेकिन जांच करने वाले अधिकारी को लेकर सवाल जरूर उठ रहे हैं। तीन दिन में कुछ आशंकाएं-कुशंकाएं सुनाई भी दी हैं। 1. खाकी के जिस कप्तान की भूमिका पर सवाल उठे और पत्रकार वार्ता के दौरान उनके पास की कुर्सी पर जो अफसर पूरे समय बैठे रहा हो क्या वह बिना प्रभाव में आए ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ कर पाएंगे ? आरोपित अफसर के कैडर के मुकाबले जांच अधिकारी का कैडर निम्मतर है इसलिए क्या यह जांच ठीक से होगी ? 3. यदि सरकार को मामले की निष्पक्ष जांच करानी है तो फिर न्यायिक जांच (न्यायिक व्यवस्था से जुड़े व्यक्ति से) या फिर बाहर के किसी उच्चाधिकारी को इसकी जिम्मेदारी क्यों नहीं सौंपी गई ?

ये सवाल उठाने वालों का तर्क है कि- ‘न्यायिक जांच से तात्पर्य न्यायालय या न्यायिक प्राधिकरण द्वारा आपराधिक मामले में की जांच से है। इसमें स्थापित प्रक्रियाओं और साक्ष्य के नियमों का पालन होता है। इस जांच के निष्कर्षों का कानूनी कार्यवाही और मामले के अंतिम परिणाम पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है। वहीं, मजिस्ट्रेट जांच से तात्पर्य मजिस्ट्रेट द्वारा की जांच से है, जो सीमित शक्तियों वाला एक न्यायिक अधिकारी होता है। ऐसी जांच अक्सर ऐसे मामलों में की जाती है जहां कथित अपराध बहुत गंभीर नहीं हो। इस जांच का प्राथमिक उद्देश्य यह निर्धारित करना है कि क्या औपचारिक सुनवाई के लिए पर्याप्त सबूत हैं या मामले को खारिज किया जा सकता है।’ 

...क्योंकि, अभी कोई चुनाव जो नहीं है

रतलाम में पिछले दिनों एक युवक की मौत हुई तो हिंदू समाज ने लामबंद होकर मौन जुलूस निकाल कर ज्ञापन सौंपा। परिजन का आरोप है कि युवक की मौत खाकी की लाठी से हुई। जिस घटना के बाद रतलाम का हिंदू समाज उद्वेलित हुआ उसे लेकर अब तक न तो प्रभारी मंत्री जिले में नजर आए और न ही विपक्षी दल के प्रदेश अध्यक्ष। कोई उस आदिवासी समाज के युवक के घर बैठने तक नहीं गया जिस समाज की चिंता देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी करते हैं। शायद सही समय पर बरती जाने वाली इसी उपेक्षा का ही परिणाम है कि जिले की आदिवासी सीट सैलाना न तो कांग्रेस के पास रह सकी और न ही भाजपा को ही ले पाई। शायद मौजूदा बेरुखी और उपेक्षा की वजह यह है कि अभी कोई चुनाव नहीं है

मीडिया से परहेज नहीं, साहब छांछ फूंक रहे हैं !

रतलामी गुस्से की गाज सबसे पहले खाकी वालों के तत्कालीन कप्तान पर गिरी जिन्हें घटना का कवरेज करने वाले मीडियावाले तत्समय असामाजिक तत्व ही नजर आ रहे थे। पुलिस की कार्रवाई से उद्वेलित शहर के हालत के बारे में ‘रतलामी संजय’ के माध्यम से सरकार के मुखिया तक पहुंची तो खाकी वर्दी वालों के ‘कप्तान’ को जिले से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। नए कप्तान की आमद हो चुकी है किंतु उनका मिजाज कैसा है और उनकी नज़र में मीडियावाले क्या हैं, यह जानने के लिए सभी उत्सुक हैं। पदभार ग्रहण करने से लेकर अब तक मीडिया की ओर से कई प्रयास हो चुके हैं कि नए कप्तान का रुख जान सकें और आगे क्या-कुछ होने वाला है, यह जान सकें। हालांकि, अभी तक इसमें सफलता नहीं मिल सकी है। इस बारे में विभागीय सूत्रों का मानना है कि- ऐसा नहीं लगता कि नए कप्तान को मीडिया से परहेज है। दरअसल, पुराने कप्तान रतलाम के ठंडे दूध से ही झुलस गए, इसलिए नए साहब छांछ में भी फूंक मार रहे हैं। जब उनके मुताबिक छांछ ठंडी हो जाएगी तब शायद वे रतलामी मीडिया से रूबरू हो पाएं।

‘गैंग वाले समाजसेवी’ से सावधान !

रतलाम में वर्चस्व की कई लड़ाइयां पूर्व में देखने को मिल चुकी हैं। प्रायः जिले और शहर में वर्चस्व जमाने के लिए अलग-अलग गैंग वालों में जूतम-पैजार और खून-खराबा होता है लेकिन अब समाज में वर्चस्व स्थापित करने के लिए ‘गैंग वाले समाजसेवी’ भी सक्रिय हो गए हैं। पिछले दिनों ऐसे ही कुछ ‘गैंग वाले समाजसेवियों’ का चेहरा समाज के सामने आया तो सभी हैरान रह गए। लोगों को यकीन ही नहीं हुआ कि ‘डफलिया’ और ‘शवानी’ जैसे ‘गैंग वाले समाजसेवियों’ से उन्हें भी हर पल सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि ये कभी भी, किसी की भी सुपारी किसी गैंगेस्टर को दे सकते हैं।

इनके झांसे से कोई नहीं बचा ! 

रतलामी जमीनों के जादूगरों के कारनामे जग-जाहिर हैं। ये सिर्फ जमीनें ही नहीं हथियाते या बेचते, इन्होंने तो अपने जमीर तक बेच दिए हैं। जमीनों को निगल रही भूख कम होने का नाम ही नहीं ले रही। इनके झांसे से सिर्फ स्थानीय निवेशक ही नहीं, वरन् अन्य राज्यों के धन-कुबेर भी फंसने से बच नहीं पाए हैं। कुछ गुजराती बंधुओं ने रुपयों की फसल काटने के लिए जमीनों के एक जादूगर के माध्यम से रतलाम की जमीन पर बोए थे। रुपयों की फसल काटना तो दूर, उन्हें बिजवारे के रूप में बोए (निवेश) किए गए रुपए भी नहीं मिल रहे। कुछ समय पूर्व उक्त गुजराती बंधु रतलाम का पग फेरा भी कर चुके हैं लेकिन उनके साथ ‘लौट के बुद्धू’ घर को आए वाली कहावत चरितार्थ हुई। अब गुजराती बंधु को यह कौन समझाए कि ऐसा कोई नहीं जिन्हें इन्होंने ‘झांसा-नी’ (धोखा नहीं) दिया।

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Mon, 16 Sep 2024 16:08:09 +0530 Niraj Kumar Shukla
कलेक्टर के नाम ‘रतलाम की आत्म’ का पैगाम... साहब, यह आपने क्या कर दिया, बर्रैया के छत्ते में हाथ क्यों डाल दिया ? अब सारी बर्रैया आपके पीछे पड़ जाएंगी ! https://acntimes.com/Neer-ka-Teer-Message-of-Ratlam-ki-Atma-to-the-collector https://acntimes.com/Neer-ka-Teer-Message-of-Ratlam-ki-Atma-to-the-collector नीरज कुमार शुक्ला

श्रीयुत् राजेश बाथम साहब (कलेक्टर, रतलाम)। सादर नमस्कार।

महोदय,

          आप सोच रहें होंगे कि आखिर मुझे क्या हो गया जो मैं इस तरह आपको पत्र लिख रहा हूं। मैं बता दूं कि, यह पत्र मेरी ओर से नहीं, बल्कि ‘रतलाम की आत्मा’ का एक पैगाम है जो उसी के अनुरोध पर आप तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा हूं। जी, हां ! आपने सही पढ़ा, मैंने ‘रतलाम की आत्म’ ही लिखा है।

          दरअसल, हुआ यूं कि बीती रात मेरे सपने में ‘रतलाम की आत्मा’ आई थी। काफी बेचैन और हड़बड़ाई हुई थी। कह रही थी, ‘कलेक्टर साहब नए हैं, उन्हें रतलाम में आए ज्यादा वक्त नहीं हुआ है। इसलिए अभी तक ठीक से परिचित नहीं हूं। आप तो पत्रकार हैं, आपको तो वे जानते ही होंगे, मेरा पैगाम उन तक पहुंचा दीजिए।’ पहले तो मैंने टालने का की कोशिश की लेकिन जब वह नहीं मानी तो उसकी मदद के लिए हामी भर दी।

          कोरे आश्वासनों के तले दबी ‘रतलाम की आत्मा’ ने न जाने किस उम्मीद के साथ मेरा आश्वासन भी झेल लिया। उसने बताया कि- ‘मैंने सुना है कि कलेक्टर साहब ने वर्ष 1956-57 के भू-अभिलेख में दर्ज शासकीय भूमि को लेकर अधीनस्थों से रिपोर्ट तलब की है। इन भूमियों के स्वीकृत और अस्वीकृत नामांतरण तक की जानकारी भी मांगी है। शायद, किसी ने उनसे कह दिया है कि पूर्व में जो शासकीय भूमि थी, वह जमीनों की जादूगरी में महारथ लोगों की कलाकारी से अब निजी हो चुकी है। अब जिसने भी उन्हें यह जानकारी दी है, उसका इसके पीछे क्या उद्देश्य या हित है, यह तो वही जाने लेकिन यह जानकारी ‘रतलामी सोने’ की ही तरह बावन तोला पाव रत्ती है।’

          मैंने पूछा, ‘कलेक्टर द्वारा यह जानकारी मांगने से तुम्हें क्या तकलीफ है?’ रतलाम की आत्मा ने कहा- ‘अरे, तकलीफ मुझे क्यों होने लगी। इससे तो रतलाम और रतलामवासियों का ही भला होगा। मुश्किल तो उन्हें होगी जिनके पैरों तले से जमीन खिसक सकती है। मुझे तो कलेक्टर साहब का यह कदम बर्रैया के छत्ते में हाथ डालने जैसा प्रतीत हो रहा है।’ सो कैसे ? मैंने पूछा।

          रतलाम की आत्मा ने कहा- ‘आप तो जानते ही हैं कि यहां के जमीनों के जादूगर जमीन हथियाने के लिए एक-दूसरे को काटने से नहीं चूकते। वे इसके लिए कुछ भी कर सकते हैं। वही जब उन पर कोई मुसीबत / मुश्किल आती है तो उसे टालने के लिए ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ बन जाते हैं। वे उनके पैरों के तले की जमीन खिसकाने या सोचने वाले की ही जमीन बदलने (देश निकाला देने) के लिए हाथ धोकर पीछे पड़ जाते हैं, जैसे छत्ते में हाथ डालने पर बर्रैया पीछे पड़ जाती हैं।’

          ‘इतिहास गवाह है कि, यहां जब भी किसी ने लोकहित या रतलाम हित को सर्वोपरि रख कर ऐसा कुछ भी करने का प्रयास किया है तो उसे यहां से जाना ही पड़ा है। यकीन न हो तो जो साहब पहले यहां थे, उनसे पूछ लो। उन्होंने भी कुछ कबरबिज्जुओं पर नजरें टेढ़ी की तो सारे कबरबिज्जुओं ने मिल कर उन्हें ही निपटा दिया। बीते तीन दशक में ऐसा कईयों के साथ हो चुका है।’

          ‘यह दीगर बात है कि इस दौरान कुछ ऐसे लोग भी आए जिन्होंने इसे अवसर माना और सबका साथ – सबका विकास की सोच से परे ‘लोकहित’ को बला-ए-ताक पर रख कर स्व-हित साधना ही उचित समझा। ऐसे लोग यहां के दौलत-रामों को खूब भाए और उनकी पारियां भी लंबी रहीं। यहां के दौलत-राम नई घोड़ी नया दाम वाली स्थिति से निबटने के लिए हर वक्त तैयार रहते हैं और इस कोशिश में रहते हैं कि दाम कुछ भी लग जाए, उनका काम न रुकने पाए। आप ही ने तो बताया था कि कई वर्ष पहले एक भू-माफिया ने आप से कहा था कि आप लोग जो खबरें लिखते हैं, उससे होता जाता कुछ नहीं। सिर्फ जिम्मेदारों तक पहुंचाई जाने वाली अटैची का आकार जरूर बढ़ जाता है! (मैंने सिर हिलाकर सहमति जताई)’

          रतलाम की आत्मा की बात जारी रही... ‘मुझे याद आ रहा है कि मौजूदा कलेक्टर साहब को रतलाम आए कुल जमा 36 दिन (11 मार्च से 15 अप्रैल) ही हुए हैं और उन्होंने इतने कम दिनों में जमीनों के जादूगरों से 36 का आंकड़ा बनाने की ठान ली। डर है कि इससे कहीं रतलाम में उनकी भी पारी जनहित के बारे में सोचने वाले अन्य कलेक्टरों की तरह छोटी न रह जाए। वैसे मेरी तो यही दुआ है कि उनकी यहां उनकी पारी लंबी चले (जिसकी उम्मीद कम ही है) और सरकारी से निजी हो चुकी जमीनों को फिर से सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज करवाने (नामुमकिन काम) के साथ ही जनहित के कुछ और काम भी कर पाएं।’

‘रतलाम की आत्मा’ के अनुसार ऐसे भी चल सकती है लंबी पारी

  • जमीनों के जादूगरों से दूर रहें, वे जो कर रहे हैं या करना चाह रहे हैं, उन्हें स्वच्छंद होकर करने दें। वे चाहे सिविक सेंटर निगल जाएं या फिर रणजीत विलास पैलेस अथवा कलेक्टोरेट। अब तो जबलपुर में एसपी कार्यालय की रजिस्ट्री करवाने वाला समदड़िया समूह भी रतलाम तक आ पहुंचा है।
  • सेवा, सोना, साड़ी और स्ट्राबेरी की तरह प्रसिद्ध और सट्टे की तरफ तो आंख उठा कर के नहीं देखना चाहिए। सट्टा यहां का प्रमुख खेल है और उससे कई बेरोजगारों का परिवार पलता है। इस वजह से ही इस खेल में अनेक प्रतिष्ठित लोग तन-मन-धन से जुड़े हैं।
  • राशन माफिया को भी न छेड़ें। गरीबों के नाम पर आने वाले राशन से सिर्फ दुकानदारों ही नहीं, कई सफेदपोश और उनके अट्ठे-पट्ठे भी पल रहे हैं। गरीबों को नुकसान हो जाए तो चलेगा, राशन माफिया को कुछ नहीं होना चाहिए। अगर उनके राजनीतिक आका जाग गए तो फिर आप जानो।
  • रतलाम नगर महानगर बन रहा है। इसलिए अगर कहीं कोई विकास कार्य (सड़क या पुल) वर्षों या महीनों से रुका हुआ है तो उसे चालू करवाने का जोखिम नहीं उठाएं। बेशक इससे लोग परेशान हो रहे हों या फिर मर ही क्यों न जाएं, काम यूं ही रुका रहने दें। उम्मीद है कि अगले विधानसभा चुनाव से पहले तो काम हो ही जाएगा।
  • यहां के कतिपय ब्याजखोर पुलिस और प्रशासन के लिए सर्वोच्च सम्माननीय व प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। अगर आपके समक्ष या जनसुनवाई में इसे लेकर किसी ने कोई शिकायत की हो तो उसे रद्दी की टोकरी में डाल दें, पुलिस विभाग और जनसुनवाई की शिकायतों के मामले में नगर निगम भी ऐसा ही करता है।
  • बेशक, आप जिले के कलेक्टर हैं लेकिन नगर निगम के कार्यों या कार्यप्रणाली में कतई दखल न दें, क्योंकि यहां का हर अफसर और कर्मचारी अपने आप में कलेक्टर है। जब वे जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधियों को ठेंगा दिखा देते हैं, तो फिर आप ठहरे उन्हीं की तरह एक अफसर।
  • अवैध और वैध कॉलोनियों से भी दूर ही रहिए क्योंकि इन्हें विकसित करने वाले समुद्र में डूबे हिमखंड की तरह हैं जो ऊपर सिर्फ 25 फीसदी नजर आते हैं शेष 75 फीसदी अंदर हैं। यानी आप उन्हें देख कर उनकी ताकत का अंदाजा नहीं लगा सकते। उन पर कार्रवाई के चक्कर में आप भले ही प्रभावित हो जाएं, उनका बाल तक बांका नहीं होगा। कुछ तो एफआईआर के बाद भी खुले घूम रहे हैं।
  • बसों और अन्य वाहनों की ओवरलोडिंग को भी सर्वथा नजरअंदाज करें। अगर आप RTO पर नकेल कसने की सोच रहे हैं तो ऐसा न करें क्योंकि वे अमरौती खाकर आए हैं जिससे उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। यकीन न हो तो कोशिश कर के देख लें, गुना-ग्वालियर तक फोन घनघना जाएंगे।
  • रतलाम में स्थायी, अस्थायी अतिक्रमण पर कार्रवाई करना तो पापा है। जिसने भी यह पाप किया उसके लिए यह अभिशाप है। आपने भूले से भी इन्हें छू लिया तो तमाम अतिक्रमण प्रेमी ही नहीं, उनके राजनीतिक आकाओं का भी खून खौल जाएगा।
  • शहर का यातायात सुधारने के प्रयास भी आपके पहले वाले यहां रह चुके अनेक कलेक्टर साहबन कर चुके हैं, लेकिन मजाल है यह सुधर जाए। शहर का यातायात वह कुत्ते की पूछ है जिसे सीधा करने के प्रयास में न जाने कितने ही सिधार गए। इसलिए, आप भी इस संक्रामक बीमारी से बच कर ही रहिएगा, यातायात पुलिस और उसके मुखिया की तरह। 
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Tue, 16 Apr 2024 04:13:29 +0530 Niraj Kumar Shukla
नीर का तीर : रतलाम बिक रहा है ! बोलो& खरीदोगे ? पसंद आपकी, कीमत ईमान बेच चुके जिम्मेदारों की, फिर मत कहना कि& हमें बताया नहीं’ https://acntimes.com/Neer-Ka-Teer-Ratlam-is-being-sold-Tell-me-will-you-buy https://acntimes.com/Neer-Ka-Teer-Ratlam-is-being-sold-Tell-me-will-you-buy नीरज कुमार शुक्ला

रतलाम । बहुत पहले एक फिल्म देखी थी जिसमें ‘नितिन मुकेश’ का गाया गीत था ‘खन खन की सुनो झनकार, ये दुनिया है कालाबाजार, पैसा बोलता है...’ यह गीत आज के हालात में ज्यादा ही मौज़ू लग रहा है। कल रतलाम की नगर सरकार का साधारण सम्मेलन के दौरान भी यह बात पुष्ट हो गई। कहने को तो यह ‘साधारण’ सम्मेलन था लेकिन ‘शांति’ के ‘लाल’ के ‘अशांत’ होने और 'सिंह' की ‘शक्ति’ जागृत होने से यह ‘असाधरण’ साबित हो गया।

एक ओर देश-दुनिया में ‘रामराज्य’ (राज) स्थापित होने का इंतजार कर रही है, वहीं यहां ‘दौलत-राज’ के तमाम ‘इंद्र’ सबकुछ खरीद लेने पर तुले हैं। दोष सिर्फ ऐसे खरीददारों को देना गुस्ताखी कहलाएगी, और हम यह ‘पाप’ अपने सिर-माथे नहीं लेना चाहेंगे। वैसे भी जहां के जिम्मेदार ‘दौलत’ को अपना ‘ईमान’ और ‘भगवान’ मान चुके हों, वहां सरकार किसी की भी हो, ‘राज’ ऐसे ‘इंद्र’ ही करेंगे।

बिल्लियां आंख मूंद कर मलाई चाटती रहेंगी और ‘दौलत रामों’ से अपने हाथ कटवा चुके ‘ठाकुरों’ की 'इजलास' में आप सिर्फ मेमने की मिमियाते ही रहेंगे। तभी तो कहते हैं कि ‘बाप बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रुपैया...।’ इसे यूं भी समझ सकते हैं कि ‘इक्ष्वाकु वंश’ में जन्मे ‘सिद्धार्थ’ को तो ‘बोधि’ वृक्ष के नीचे बुद्धत्व प्राप्त हुआ था लेकिन इन सौदागरों के लिए तो रुपयों का पेड़ ही ‘बोधि’ वृक्ष है।

आप सोच रहे होंगे कि, आखिर यह सब आपको क्यों बताया जा रहा है? तो इसका जवाब सिर्फ यह है कि जिस नगरी में सबकुछ टके सेर बिक रहा हो वहां आप ही घाटे में क्यों रहें। अगर आप भी ‘दौलत-राम’ हैं और मोल-भाव करने के थोड़े भी गुर जानते हैं तो ‘बहती गंगा में हाथ धो लीजिए।’ जहां ‘धृतराष्ट्रों’ का राज हो और ‘गांधारियां’ आंखों पर पट्टी बाधें बैठी हों, वहां कोई भी और कुछ भी खरीद अथवा बेच सकता है।

इस ‘लोक’ के ‘इंद्र’ का ‘भवन’ तो बहुत पहले ही बिक चुका है, अब शेष रतलाम को अपना बना लेने की कवायद है। खबर तो यह भी रही है कि ‘रण’ में ‘जीत की याद दिलाने वाले ‘पैलेस’ में ‘विलास’ भोगने का भी प्रयास हुआ था लेकिन कुछ नादान ‘नारदों’ के कारण यह ख्वाइश अधूरी रह गई थी। अब तो  नारद भी धृतराष्ट्र और गांधारी जैसी भूमिका में हैं। नतीजतन जिम्मेदार चंद टुकड़ों के लिए सिर्फ केवल कुछ भूखंड अथवा भवन ही नहीं, पूरा रतलाम ही बेचने के लिए तैयार बैंठे हैं।

हमारी और आपकी ‘सांसों का सौदा’ तो किसी ‘अमदड़िया’ और ‘समदड़िया’ को हो ही चुका है, कब आप का जिस्म भी दांव पर लग जाए, कह नहीं सकते। फिर यह भी जरूरी नहीं कि अगली बार कोई ‘शांति का लाल’ आपके लिए अशांत हो या किसी ‘सिंह’ की ‘शक्ति’ जागृत हो। इसलिए, या तो खुद बिक जाइए या फिर आप भी सबकुछ खरीद लीजिए।  

डिस्क्लेमर

यह ‘नीर का तीर’ किसी के चरित्र हनन के लिए नहीं चलाया गया है और न ही यह किसी के चरित्र का प्रमाण पत्र ही है। यह लिखने वाले की ‘भड़ास’ है जिसे निकालने के लिए फिलहाल कहीं-कोई सार्वजनिक मंच नजर नहीं आया। अतः इसके किसी भी शब्द, शब्द रचना, वाक्य अथवा उल्लेखित परिस्थिति से स्वयं को कतई ना जोड़ें। फिर भी किसी को ऐसा प्रतीत होता है कि यह उसके चरित्र को परिभाषित करता है या उससे थोड़ा भी मेल खाता है तो यह महज एक संयोग अथवा दुर्योग हो सकता है। ऐसे विचार को ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ कह सकते हैं। चूंकि हम किसी के लिए इतने नेक विचार नहीं रखते, इसलिए हमारे इस दुस्साहस के लिए हमसे किसी प्रकार की क्षमा-याचना की अपेक्षा नहीं रखें।

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Fri, 08 Mar 2024 13:03:32 +0530 Niraj Kumar Shukla
नीर_का_तीर : रतलाम में नए भाजपा जिला अध्यक्ष की नियुक्ति के क्या हैं मायने, ‘समन्वय का कमल’ खिलेगा या ‘गुटबाजी के कांटे’ https://acntimes.com/neer-ka-teer-What-is-the-meaning-of-the-appointment-of-new-BJP-district-president-in-Ratlam https://acntimes.com/neer-ka-teer-What-is-the-meaning-of-the-appointment-of-new-BJP-district-president-in-Ratlam नीरज कुमार शुक्ला

बीते कुछ महीनों में रतलाम की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। जनसंघ और भाजपा के लिए जिंदगी खपा देने वाले डॉ. लक्ष्मीनारायण पांडेय की ही तरह उनके पुत्र डॉ. राजेंद्र पांडेय के हिस्से भी चौथी बार भी सिर्फ विधायकी ही आई। वहीं, ‘हर तरह से सक्षम’ माने जाने वाले भैया जी यानी चेतन्य काश्यप तीसरी बार में ही मंत्री बन गए। नतीजतन, रतलाम की राजनीति के सुर भी बदल गए। जो लोग काश्यप का टिकट कटने की कामना से घी के दीपक जला रहे थे, बाद में उन्हें ही उनके स्वागत के लिए उत्साहित होते और शान में कसीदे गढ़ते देखा गया। कमोबेश, ऐसी ही स्थिति भाजपा जिला अध्यक्ष बदलने के बाद भी नजर आ रही है। इस नई नियुक्ति के क्या मायने हैं, यह पार्टी में समन्वय का कमल खिलाएगी या गुटबाजी के काटें, यह आगामी दिनों में पता चलेगा।

देश के तीन प्रमुख राज्यों (मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान) में मुख्यमंत्री चयन को लेकर जब चौंकाने वाले निर्णय हुए हों तो रतलाम भाजपा में ‘सीनियर’ के बजाय ‘जूनियर’ को तवज्जो मिलना बहुत छोटी बात मानी जाएगी। खैर, हम बात करते हैं ताजा घटनाक्रम की। कांग्रेस में जितने लोग उतने ही गुट हैं। इस लिहाज से भाजपा की स्थिति थोड़ी बेहतर है यहां गुटों की संख्या प्रायः सीमित ही रहती है। संगठन में कोई नियुक्ति हो और यह चर्चा और कयास लगना स्वाभाविक ही है कि उससे किस गुट को महत्व मिलेगा, कौन कमजोर होगा या फिर सभी गुटों में समन्वय होगा। ऐसे कयासों और चर्चाओं का आधार संबंधित व्यक्ति का आचरण, काम करने के तौर-तरीके, व्यवहार, संलग्नता और पुरानी घटनाएं होती हैं।

कुछ घंटे पहले ही रतलाम जिला भाजपा की कमान दो कार्यकाल से महामंत्री प्रदीप उपाध्याय को सौंपी गई है। बदलाव होते ही राजीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। उपाध्याय को मिली नई जिम्मेदारी के साथ ही लोग अपने ‘अनुभवों की कसौटी’ पर उन्हें परख रहे हैं और अपने ‘मतलब की तराजू’ पर तौल रहे हैं। इस नियुक्ति के हितार्थ जाने, समझे, जांचे और गिनाए जा रहे हैं। जितने मुंह उतनी बातें, कुछ हमारे कानों तक भी आईं।

इस वफादारी को क्या नाम दें

कहा जा रहा है कि जिला अध्यक्ष नियुक्ति होते ही प्रदीप उपाध्याय सबसे पहले पूर्व गृह मंत्री एवं भाजपा के कद्दावर नेता रहे हिम्मत कोठारी के पैलेस रोड स्थित निवास पहुंचे। यह वही जगह है जहां से कभी भाजपा नियंत्रित होती थी लेकिन बाद में एक दौर ऐसा भी आया जब महात्वाकांक्षियों ने किनारा कर लिया था दूरिया बना ली थीं। इसके बाद से भाजपा में सत्ता का केंद्र स्टेशन रोड स्थित विसाजी मेंशन सिफ्ट हो गया था और आज भी बरकरार है। चर्चा है कि उपाध्याय यहां कोठारी परिवार को उनके प्रति अपनी पुरानी ‘वफादारी’ याद दिलाने पहुंचे थे। कोठारी परिवार के तीनों प्रमुख सदस्यों ने उनका स्वागत किया। उन्होंने भी सोशल मीडिया पर प्रदर्शित करने के लिए तीनों के साथ अलग-अलग फोटो खिंचवाए। जैसे ही लोगों को यह पता चला तो उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि- ‘अब जिला भाजपा में हिम्मत जी का दबाव / प्रभाव फिर बढ़ेगा और काश्यप जी के लिए नया टेंशन शुरू हो गया है। यानी कोठारी से उपाध्याय की पुरानी वफादारी मंत्री काश्यप की छाती पर मूंग दलेगी।’ यह वैसी ही टेंशन होगी जैसी रतलाम विकास प्राधिकरण (RDA) अध्यक्ष ‘अशोक पोरवाल’ ने दे रखी है।

कस्मे, वादे, प्यार, वफा सब....

इतिहास बताता है कि रतलाम जिले की भाजपा जोशी (पूर्व मुख्यमंत्री पं. कैलाश जोशी) और पटवा (पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा) की गुटीय राजनीति से प्रभावित रही है। ऐसे में महज 35 किलोमीटर की दूरी में भी हिम्मत कोठारी और डॉ. लक्ष्मीनारायण पांडेय के बीच वैचारिक मतभिन्नता रही है। इसका असर संगठन में देखने को मिलता रहा है। इसके इतर, प्रदीप उपाध्याय दोनों ही परिवारों (कोठारी और पांडेय) को साधने में सफल रहे। इसके बाद जब सत्ता का केंद्र पैलेस रोड से विसाजी मेंशन शिफ्ट हुआ तो, उन्होंने यह प्रदर्शित करने की पूरी कोशिश की कि उनकी भी आस्था बदलकर अब इस ओर हो गई हैं। अभिनेता ‘प्राण’ पर फिल्माया गया गीत ‘कस्मे वादे प्यार वफा सब बाते हैं बातों का क्या...’ करा जिक्र यहां मौज़ू लगता। यानी किसका, किससे और कब मोह भंग हो जाए या लगन लग जाए, कहा नहीं जा सकता। राजनीति में ऐसे दावे करना नादानी ही कहलाएगी।

पुराने से तो नए के ‘दाग’ ही अच्छे हैं

नई जिम्मेदारी मिलने के बाद उपाध्याय के कार्य-व्यवहार, आस्था-विश्वास आदि में कितना बदलाव होगा, यह कहना मुश्किल है। फिर भी पार्टी से जुड़े लोगों का कहना है कि बड़ी-बड़ी मूछों वाले ‘ठाकुर साहब’ से तो छोटी मूछों वाले ‘भैया’ सभी को साधने में सफल रहेंगे। दरअसल, लोगों को साध लेने के उपाध्याय के इस गुण को उनसे ‘राजनीतिक ईर्ष्या’ रखने वाले ‘चापलूसी’ का नाम देते हैं। भला, अब हम यह कहने वालों की जुबान कैसे पकड़ें कि- ‘हिम्मत कोठारी जैसे बड़े नेता का वरदहस्त होते हुए भी जो पार्षद के चुनाव में बुरी तरह पराजित हुआ हो, उसे ‘पद रूपी आशीर्वाद’ ऐसे ही तो नहीं मिले होंगे। अब यह देखने वाली बात होगी कि रतलाम भाजपा में इस नियुक्ति से ‘समन्वय का कमल’ खिलेगा या ‘गुटबाजी के कांटे’ उगेंगे।

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Sat, 27 Jan 2024 11:18:42 +0530 Niraj Kumar Shukla
नीर का तीर : कहीं ‘गुमान’ ध्वस्त तो, कहीं गुल हुआ ‘डीपी’ का करंट, ‘शेर’ दहाड़ते और ‘प्रभु’ इंतजार करते रहे, इसलिए कहते हैं कि कुछ भी पालो पर मुगालता मत पालो https://acntimes.com/Neer-Ka-Teer-and-ticket-distribution-for-elections https://acntimes.com/Neer-Ka-Teer-and-ticket-distribution-for-elections नीरज कुमार शुक्ला

बड़े-बुजुर्ग कह गए हैं कि कुछ भी पाल लो, मुगालता मत पालो। विधानसभा निर्वाचन 2023 के लिए रतलाम जिले की विधानसभा सीटों से टिकट चाहने वालों को राजनीतिक दलों ने भी यही संदेश दिया है। प्रमुख राजनीतिक दलों में से किसी ने किसी का ‘गुमान’ उतार दिया तो कहीं किसी ‘डीपी’ का करंट ही गुल कर दिया। राजनीतिक पार्टियों ने न तो ‘वीरों के इंद्र’ की सुनी और न ही ‘इंद्रियों को जातने’ वाले की। ‘शेर’ की दहाड़ को भी अनसुना कर दिया, यहां तक कि ‘प्रभु’ को भी आईना दिखा दिया। हम यहां केवल संकेत देंगे, पहचानना आपको है।

गुमान ध्वस्त होन के बाद गूंजा विजय का संगीत

विशेष प्रकार के कांटों के लिए प्रसिद्ध इलाके में चुनाव की सरगर्मी बढ़ते ही ‘नारायण-नारायण’ और ‘विजय का संगीत’ सुनाई देने लग था। यह उस समय धीमा हो गया जब पिछले आम चुनाव में अच्छा खासा जनसमर्थन जुटाने वाले एक नेताजी की सक्रियता ज्यादा बढ़ गई। दिल्ली वाले इन नेता जी की इस सक्रियता ने टिकट के दावेदार स्थानीय नेताओं की धड़कनें बढ़ा दीं। परंतु वे अपना दर्द खुलकर जाहिर नहीं कर सके। उनमें से केवल एक को तब राहत मिल गई जब पार्टी ने टिकट की आस लगाए बड़े नेताजी का ‘गुमान’ ध्वस्त कर दिया।

दोबारा जनता के बीच भेजने लायक नहीं समझा

दिल्ली वाले नेताजी की दाल एक जगह नहीं गली तो उन्होंने दूसरे इलाके की ओर रुख कर लिया। इलाका ‘सूरज’ की किरणों से रोशन हो गया। इससे उन स्थानीय नेताजी की आंखें चौंधिया गईं जिन्हें जनता की याद चुनाव जीतने के करीब चार साल बाद आई थी। इनका नाम और भगवान श्री राम के पूर्वज रहे इच्छाकु वंश के एक राजा का नाम एक ही है। उन्हें जिस बात का डर था, वही हुआ। पार्टी ने उन्हें जनता के बीच दोबारा भेजने लायक नहीं समझा। इसकी वजह उनकी ईमानदारी पर उठी उंगलियां, घटती लोकप्रियता, समर्थकों के कारण दो समाजों में बढ़ी दूरी और निजी सहायक की कारगुजारियां बताई जा रही हैं। बता दें कि, यहां दिल्ली वाले नेताजी भी तीर नहीं मार पाए।

...और इन पर नहीं बरसी कृपा

स्वर्ण नगरी में अवसरवादियों की भरमार है। एक पार्टी में पहले सनातनियों की एकजुटता के नारे सुनाई दिए। बाद में एक नेता ने टिकट के लिए धर्म को जरिया बना लिया। भजन-कीर्तन के साथ धार्मस्थल की यात्रा तक करवाई। धार्मिक की किताबों का वितरण भी किया फिर भी टिकट रूपी ‘प्रभु’ की कृपा नहीं बरसी। जिसे सब चुनाव लड़वाना चाहते थे उसके आड़े कानूनी अड़चन आ गई और जिसके लड़ने की संभावना लगभग क्षीण लग रही थी, उसे टिकट मिल गया। यहां दूसरे राजनीतिक दल के एक नेताजी और उनके समर्थक आखिर तक बड़े बदलाव की बात कहते हुए ताल ठोंकते रहे लेकिन पार्टी ने उनकी दावेदारी को विचार करने लायक भी नहीं समझा।

बाहरी व आयातितों को नहीं मिली तवज्जो

नवाबों की नगर के हाल तो सबसे जुदा हैं। यहां एक राजनीतिक पार्टी के कई बाहरी नेता टूट पड़े और खुद को जनता का सेवक साबित करने में जुट गए। इनमें एक ‘वीरों का इंद्र’ है तो दूसरा वह शख्स जिसके लिए किसान आंदोलन के वक्त सीएम शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि- ‘इस डीपी में करंट नहीं आना चाहिए।’ खुद को एक समाज का ‘शेर’ बताने वाले एक युवा भी यहां राजनीतिक ‘जीवन’ तलाशना रहा है। हालांकि, पार्टी ने न तो आयातितों (बाहरियों) को अहमियत दी और न ही उक्त समाज प्रमुख को। पार्टी ने स्थानीय व्यक्ति पर भरोसा जताया जो बाहर से आकर जमीन तलाश रहे लोगों को नागवार गुजर रहा है। यहां दूसरी पर्टी ने भी आयातित (अन्य पार्टी छोड़कर शामिल हुए) व्यक्ति के बजाय पुराने चेहरे पर ही भरोसा जताया।

द्वंद्व पुराने चावलों का

जिले के सबसे दूरस्थ इलाके में भी टिकट को लेकर घमासान तगड़ा था। दोनों ही पार्टियां टिकट को लेकर पूरे समय असमंजस में रहीं। हालांकि एक पार्टी ने नाम तय करने में ज्यादा देर नहीं की और अपने पुराने ‘चावल’ को ही फिर से चुनाव रूपी आग में पकने चढ़ा दिया है। यह टिकट मांग रहे अन्य दावेदार को रास नहीं आ रहा जो पूर्व में विधानसभा में इसी क्षेत्र का नेतृत्व कर चुके हैं। पार्टी ने उनकी नहीं सुनी तो पिछले दिनों उन्होंने मजमा लगाकर भारी समर्थन होने का दावा किया, इस दौरान वे अचेत भी हो गए। इसके विपरीत दूसरे राजनीतिक दल ने तमाम दबावों के बाद भी पुराने प्रत्याशी पर भरोसा नहीं किया। भले ही उनका नाम ‘इंद्रियों को जीतने वाला’ हो लेकिन वे चुनाव में जीतेंगे, इसकी संभावना पार्टी को नजर नहीं आई।

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डिस्क्लेमर
यह किसी की भावना को ठेस पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि एक व्यंग्य स्वरूप विश्लेषण है। पसंद आए तो सराहना कहने में संकोच न करें और पसंद नहीं आए तो जी भर कर भला-बुरा कहिए। यानी प्रतिक्रिया जरूर दीजिए।

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Sun, 22 Oct 2023 19:58:52 +0530 Niraj Kumar Shukla
नीर का तीर : यह रतलाम है साहब, यहां जनता, जनप्रतिनिधि और अफसर तक सभी ‘प्रभु’ भरोसे हैं https://acntimes.com/neer-ka-teer-Here-everyone-trusts-God https://acntimes.com/neer-ka-teer-Here-everyone-trusts-God नीरज कुमार शुक्ला

‘भ’ से भगवान होता है और भरोसा भी। जब किसी को ‘किसी’ पर भी भरोसा नहीं रह जाए तो समझिए कि वह ‘भगवान भरोसे’ है। रतलाम इस मामले में पूरे प्रदेश में अव्वल है। अव्वल नहीं भी हो तो किसी से कम भी नहीं है। जनता से लेकर जनप्रतिनिधि तक और इन दोनों की सेवा के लिए गढ़ी गई अफसरों की जमात भी यहां ‘प्रभु’ (भगवान) भरोसे ही है।

गांवों में (अभि)नेताओं की आमद, आश्वासनों के पुल

चुनावी साल है, इसलिए जो न हो सो कम है। जो (अभि)नेता चार साल या या इससे भी ज्यादा समय तक अपने हाल में मस्त थे, उन्हें अचानक ही जनता और उसकी तकलीफें याद आने लगी हैं। रतलाम जिला मुख्यालय के आसपास के गांवों में तो विकास कार्यों की बाढ़ ही आ चुकी है। यहां लाखों-करोड़ों रुपयों के काम के भूमि पूजन हो रहे हैं। ऐसी जगह, जहां हर बारिश में घुटनों-घुटनों या कमर और इससे ऊपर तक पानी भर जाता है, वहां ‘आश्वासनों के पुल’ बन रहे हैं। टपकती छत तले अपना भविष्य संवारने की जद्दोजहद करने वाले स्कूलों में (अभि)नेताओं की आमद बढ़ गई है और बच्चों के साथ बैठकर भोजन करने की रस्म अदायगी भी। जिन बच्चों को मध्याह्न भोजन के वक्त कटोरी में रखे नमक-मिर्च मिले पानी में सब्जी के टुकड़े और दाल के दाने ढूंढे नहीं मिलते, उन्हें पूड़ी और खीर खाने को मिल रही है। यानी (अभि)नेताओं को चुनाव आते ही इन बच्चों में ‘भगवान’ और अभिभावक ‘वोट रूपी प्रसाद’ देने वाले पुजारी अथवा सेवादार नजर आने लगे हैं।

नाव के सवार ही नहीं, ‘मांझी’ भी ‘प्रभु’ भरोसे

‘प्रभु’ की भक्ति भी यकायक बढ़ गई है। भजन-कीर्तन तो कोई कथा-यात्रा करवा रहा है। रतलाम शहर से हर सप्ताह एक धार्मिक यात्रा निकल रही है। इसके आयोजक महाकाल को प्रसन्न करने के लिए पसीना बहा रहे हैं। आयोजकों का दावा है कि इस फ्री की यात्रा का सैकड़ों लोग लाभ ले रहे हैं लेकिन उनकी सुरक्षा और एहतियात के तौर पर सामूहिक बीमे जैसी व्यवस्था से जुड़े सवाल का जवाब  किसी के पास नहीं है। दावों में गिनाए जा रहे श्रद्धालुओं और वाहनों की संख्या में तालमेल नजर नहीं आ रहा। दरअसल, हर वाहन में यात्री के बैठने की क्षमता (संख्या) नियत है, यदि उससे अधिक लोग सवार हों तो मोटर व्हीकल एक्ट के तहत चालान हो सकता है। कहने वाले कह रहे हैं कि- श्रद्धालु से लेकर ऐसी कार्रवाई के लिए जिम्मेदार विभाग के अमले तक, सभी ‘प्रभु’ भरोसे हैं। अब जिस नाव का ‘मांझी’ खुद ‘प्रभु’ भरोसे हो, उसकी सवारी करने वाले का भगवान ही मालिक है।  

...और प्रकट हो गए नए ‘जनसेवक’

चुनाव की नाव में बैठने वालों की कमी नहीं हैं। पिछले दिनों रतलाम शहर में एक ‘जनसेवक’ अचानक ही प्रकट हो गए हैं। राजनीतिक घराने से ताल्लुकात रखने वाले इस ‘जनसेवक’ का इस तरह अचानक प्रकट होना फिलहाल आमजन की समझ में नहीं आ रहा है वह भी तब जबकि वे जिस पार्टी से संबंध रखते हैं उससे टिकट लगभग तय है। फिर भी कथित ‘जनसेवक’ के नजदीकी दावा कर रहे हैं कि उनका टिकट फाइनल हो गया है, परंतु कहां, कब और कैसे, ऐसे सवालों का सवाब उनके पास नहीं है। इसलिए सफाई दी जा रही है कि अगर अपनी पार्टी टिकट नहीं देती है तो दूसरी पार्टी तो है ही और यदि वहां भी पूछ-परख नहीं हुई तो फिर निर्दलीय के रूप में मैदान में कूदने से भला कौन रोक सकता है। शायद यही वजह है इन स्वयं-भू ‘जनसेवक’ के सोशल मीडिया पर जारी प्रचार में शुरुआत में किसी पार्टी का सिम्बॉल नज़र नहीं आ रहा था।

नगर-सरकार और चाय से ज्यादा गर्म केतली

पिछले दिनों रतलाम शहर में खबरचियों की प्रतिनिधि संस्था ने भव्य समारोह आयोजित किया। इसमें ‘खास’ ही नहीं, ‘आम’ लोग भी आमंत्रित किए गए। जनप्रतिनिधि भी आए और अफसर भी, परंतु ‘नगर-सरकार’ नहीं बुलाया। बताते हैं, कि- खबरचियों ने जानबूझ कर ‘नगर-सरकार’ को दरकिनार किया। दरअसल, खबरचियों को ऐसा पता चला है कि ‘नगर-सरकार’ और उनके सिपहलसालारों को उनकी ‘खोज-खबर’ लेने/रखने वाले खबरची पसंद नहीं हैं। इसलिए खबरचियों ने अपनी नाराजगी जाहिर करने के लिए उन्हें ‘नगर-सरकार’ से दूरी बना ली। इस दूरी की एक वजह नगर सरकार में ‘चाय से ज्यादा केतली का गर्म’ होना भी है। इस ‘केतली की गर्मी’ पिछले दिनों एक समारोह के दौरान भी महसूस की गई थी। यह ‘दूरी’ और ‘गर्मी’ आगे क्या गुल खिलाती है, फिलहाल कहना मुश्किल है।

चलते-चलते... पुड़िया में भरोसे की भैंस

रतलाम मालवा का हिस्सा है और यहां एक कहावत काफी प्रचलित है कि- ‘भरोसे की भैंस पाड़ा ही जनती है।’ कहने का आशय यह है कि बेशक आप किसी पर भी भरोसा कीजिए लेकिन आंख मूंद कर नहीं, खोल कर। ऐसा इसलिए कि कहीं आपके भरोसे की भैंस भी पाड़ा न जन जाए। भरोसा खुली आंख से करेंगे तो उसके टूटने पर या टूटने का अंदेशा होने पर संभलना आसान होगा। इसे जावरा विधानसभा के उन कांग्रेसियों से जोड़कर न देखें जो टिकट के लिए जारी दौड़ में एक-दूसरे को निपटाने की होड़ में लगे हैं। इनमें से एक दावेदार ने तो विरोधी पार्टी के लोगों को ही पुड़िया देने शुरू कर दी है, कि- ‘मेरा टिकट नहीं हो रहा है, मैं तो आपके लिए काम कर रहा हूं।’

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Fri, 04 Aug 2023 18:53:35 +0530 Niraj Kumar Shukla
नीर&का&तीर : आश्वासनों के सैलाब पर चुनाव की नाव और बरसाती व चुनावी मेंढकों की टर्र&टर्र https://acntimes.com/Neer-ka-teer-Election-boat-on-flood-of-assurances-and-noise-of-rainy-and-election-frogs https://acntimes.com/Neer-ka-teer-Election-boat-on-flood-of-assurances-and-noise-of-rainy-and-election-frogs नीरज कुमार शुक्ला

रतलाम । बधाई हो, मानसून सक्रिय हो गया और चुनाव का मौसम भी आ गया है। चार साल से भी ज्यादा लंबे चले उम्मीदों के अकाल के बाद अचानक ही आश्वासनों की मूसलधार बारिश शुरू हो गई है और जनता के दिलों पर ‘उम्मीदों के नए पुल’ बांधने की कवायद भी तेज हो गई है।

जिस तरह मौसम विभाग के विशेषज्ञ अच्छी बारिश का अनुमान जताते हैं, उसी तरह चुनावी मौसम में ‘अच्छे दिनों’ का मानसून सक्रिय होने के कयास लगाए जा रहे हैं। अच्छे दिनों की आस में बरसाती मेंढकों की ही तरह चुनावी मेंढक भी खुश हैं। इनकी टर्र-टर्र चहुं ओर सुनी जा सकती है। टांग खींचने में माहिर इन मेंढकों के बीच टांग खिंचाई की रस्म अदायगी भी बदस्तूर जारी है। गाहे-ब-गाहे यदि इन्हें एक पलड़े पर रखकर तौलने के लिए किसी 'बाहरी' को इनके बीच भेज दिया जाता है तो ये ‘राग-एकता’ भी टर्राने लगते हैं। ‘बाहरी’ के बाहर जाते ही खेमेबंदी शुरू हो जाती तो। ऐसों की भी कमी नहीं है जिन्हें अपनों की भीड़ में चलने से ज्यादा ‘एकला चलो रे’ पर यकीन है।

‘फूल’, ‘हाथ’ और ‘वो’

अब तक तो ‘फूल’ और ‘हाथ’ के चोली-दामन के किस्से सुने ही सुने और सुनाए जाते रह हैं लेकिन अब इनके बीच ‘वो’ भी आ गई है। कुछ राज्यों में सफाई कर चुकी ‘झाड़ू’ रूपी ‘वो’ दोनों के लिए ही ‘दूर के ढोल सुहावने’ जैसी नजर आ रही है। कुछ ‘हाथ’ अपनी किस्मत आजमाने के लिए ‘झाड़ू’ थामने को बेताब हैं तो कुछ हाथ ‘फूल’ को सहला रहे हैं। इसी तरह कुछ ‘फूल’ (इसे अंग्रेजी वाला न समझें, अगर समझ भी लिया है तो हमारी बला से) ‘झाड़ू’ की शान में कसीदे काढ़ रहे हैं, इस उम्मीद से कि ‘वो’ उनके लिए अच्छे दिन लाने में सहायक होगी। कहते हैं कि जब तक महात्वाकांक्षा की आग नहीं भड़कती तब तक ही ठीक है, अगर भड़क गई तो वह दूसरों से पहले खुद को ही जलाने का काम करती है। यह आग हर तरफ जल रही है जिससे ‘झाड़ू’ की सींकें एक-दूसरे को ही चुभ रही हैं, फूल को ‘फूल’ ही नोच रहे हैं और हाथ ही ‘हाथ’ को काट रहे हैं। सामान्य की तुलना में चुनावी महात्वाकांक्षा ऐसी ही होती है।

(चु)नाव में बैठने और कूदने का दौर

वैतरणी को पार करने के तीन ही तरीके हैं, या तो खुद कूद पड़ो और तैर कर पार कर लो या फिर ब्रिज बनाओ और उस पर से गुजर जाओ। तीसरा तरीका है नाव में सवार होकर दूसरे पार चल जाओ लेकिन यदि बीच भंवर में वह हिचखोले खाने लगे और डगमगाने लगे तो उससे कूदकर ही जान पचायी जा सकती है। ऐसा करते समय यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि या तो आपको तैरना आता हो या फिर पास में कोई सुरक्षित नाव हो, अन्यथा डूबना तय है। राजनीति और चुनाव की बात करें तो शुरू के दो उपाय के बारे में सोचना बेमानी ही होगी। पहला ब्रिज बनाने का उपाय तात्कालिक रूप से संभव नहीं और दूसरा तैर कर पार करने के लिए तत्समय धारा के विपरीत बहने जितना साहस होना चाहिए। ऐसे में तीसरा तरीका नाव का सहारा लेना ही उचित है जिसके डगमगाने और हिचखोले खाने का डर बना रहता है। बावजूद ‘(चु)नाव’ से किनारा पाने वाले और खतरा महसूस होते ही कूदकर दूसरी नाव में सवार होने वाले इन दिनों ज्यादा सक्रिय हैं। जाति, धर्म और सम्प्रदाय का झंडा थामकर चलने वाले ऐसे अवसरवादियों से सावधान रहने में ही भलाई है क्योंकि उनके लिए जाति, धर्म, सम्प्रदाय, रिश्ते-नाते गौण हैं, ‘स्व-हित’ सर्वोपरि।

सच्चाई ! बताई तो हंगामा हो गया

किसी ने कहा है कि ‘सच मत कहो, सच कड़वा होता है’ और यदि सच बोलना जरूरी है तो बहुत धीरे से और मधुर शब्दों में बोलो। लोगों ने यह सुना तो है लेकिन अमल करते समय चूक हो ही जाती है। खासकर चिकित्सकीय पेशे से जुड़े व्यक्ति के लिए इस प्रोटोकॉल का पालन करना मुश्किल भरा होता है क्योंकि उसने से तो यही पढ़ा है कि दवाई कड़वी होगी तो असर जल्दी करेगी। इसका असर इस बात पर भी निर्भर करता है कि डॉक्टर इंसानों के हैं या पशुओं के। पिछले दिनों पशुओं के एक डॉक्टर ने भरी सभा में कुछ ऐसा कह दिया जिसकी अपेक्षा वहां मौजूद लोगों ने नहीं की। इसके लिए उन्हें फटकार खानी पड़ी। उन्हें फटकारा इसलिए नहीं गया कि उन्होंने कुछ गलत कह दिया था, बल्कि इसलिए फटकारा गया क्योंकि उन्होंने एक ‘कड़वा सच’ जोर से कहा। कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि अगर इस 'कड़वे सच' की जांच हो जाए तो उसकी आंच सत्ता से जुड़े कुछ ‘सफेदफोश’ पर भी आ सकती है जिसकी कानाफूसी बीते काफी समय से चल रही है, खासकर रतलाम ग्रामीण क्षेत्र में पदस्थ शासकीय कर्मचारियों के बीच।

‘प्रभु’ के नाम पर कुछ देदे रे बाबा

पुरुषोत्तम मास और चातुर्मास में एक स्थान पर धर्म-ध्यान कर पुण्य अर्जित करने का प्रयास होता है। इसी पुनीत उद्देश्य से साधु-संतों का आगमन हो चुका है और धार्मिक अनुष्ठान भी शुरू हो चुके हैं। इसके उलट कुछ लोग अपने स्तर पर धार्मिक दुकानें सजा कर अपनी राजनीतिक स्वार्थ की सिद्धि के लिए भी प्रयासरत हैं। इसका सिलसिला चातुर्मास से पहले ही भजन और कथा के आयोजन से शुरू हो गया था और चुनाव आने तक जारी रहेगा। जिला पंचायत का तेल निकाल चुके ऐसे ही कुछ लोग जिले में धर्म की आड़ लेकर कहते फिर रहे हैं, कि- ‘प्रभु’ के नाम पर कुछ देदे रे बाबा। अभी भगवान से आशीर्वाद और धन्नासेठों से चंदा मांगा जा रहा है फिर पार्टियों से टिकट तथा उसके बाद जनता से वोटों की मांग होगी। 

चलते-चलते...

एक दिन पूर्व जिले के एक माननीय ने सीएम को पत्र लिखा है। इसमें माननीय ने अपने ही कार्यक्षेत्र के एक गांव की पुलिया के क्षतिग्रस्त होने का जिक्र है। सवाल यह है कि अगर पुलिया क्षतिग्रस्त हो गई है तो उसे संबंधित विभाग से कह कर ठीक करवाइये, अब इतने से काम के लिए भी क्या सीएम को यहां आना पड़ेगा। इससे तो यही प्रतीत होता है कि स्थानीय स्तर पर अफसर आपकी सुनते नहीं हैं, सुन भी लेते होंगे तो अगले ही पल दूसरे कान से निकाल देते होंगे। वैसे भी चार साल तक सिर्फ अपनी सोचते रहो तो भला कोई आपकी क्यों सुनेगा। अब कहने वालों की जुबान कौन पकड़े, जब से क्षतिग्रस्त पुलिया को लेकर सीएम को पत्र लिखने की बात लोगों ने सुनी है, वे कह रहे हैं कि सीएम आगामी चुनाव इन्हीं माननीय के क्षेत्र से ही चुनाव लड़ लें तो ज्यादा बेहतर होगा।

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Thu, 06 Jul 2023 16:02:00 +0530 Niraj Kumar Shukla
क्या आप जानते हैं ? बुद्धिजीवी क्या है, कौन है, क्यों है? बुद्धिजीवी, प्रबुद्ध या विचारक वो शख्स है जो... https://acntimes.com/Do-you-know-What-is-an-intellectual-who-is-he-why-is-he-there https://acntimes.com/Do-you-know-What-is-an-intellectual-who-is-he-why-is-he-there बुद्धिजीवी और प्रबुद्ध वर्ग : सोशल मीडिया के जमाने में आज हर तरफ बुद्धिजीवी और प्रबुद्ध वर्ग की भरमार है। कहने को तो ये दोनों ही शब्द समान ही लगते हैं लेकिन उनके उपयोग के आधार पर इनमें थोड़ी भिन्नता भी नजर आती है। यह तो हिंदी की व्याकरण सम्मत बात है लेकिन मौजूदा दौर के बुद्धिजीवा और प्रबद्धजन की एक अलग प्रजाति है। यह अलग-अलग शहर में अलग-अलग वृत्ति और प्रवृत्ति के पाए जाते हैं। मौजूदा दौर के बुद्धिजीवी और प्रबुद्ध वर्ग की परिभाषा ढूंढने के दौरान हमारी नजरें नवभारत टाइम्स के एक ऑर्टिकल पर ठहर गईं। ऊपर से नीचे तक पढ़ा तो लगा कि जिसकी हमें तलाश थी, वह शायद यही है। अच्छी चीज अच्छे प्लेटफॉर्म पर मिली जिसे यहां ज्यों का त्यों उपयोग किया जा रहा है। आप भी पढ़िए और आनंद लीजिए...

डेफिनेशन : वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बुद्धिजीवी, प्रबुद्ध या विचारक वो शख्स है जो अपनी बुद्धि के दम पर अपनी जीविका माने रोजी-रोटी (विद बटर) ताबड़तोड़ ढंग से हासिल करने में सक्षम हो।

लक्षण

  • स्वान्त: सुखाय के लिए छपने वाले प्रकाशनों से लेकर सर्कुलेशन के सरताज अखबारों तक में रेगुलरली कलम तोड़ते नजर आते हैं।
  • पीएचडी हासिल कर ली हो या एनरोल होने की फिराक में हों।
  • कुछ स्वनामधन्य संस्थाओं से फेलोशिप हासिल कर रखी हो।
  • कम से कम 2-3 किताबें चेंप (लिख) चुके हों। वर्ना इंटरनैशनल लिटरेचर का अनुवाद जरूर किया हो।
  • संगोष्ठी और विचार मंच पर नियमित अटेंडेंस (सिर्फ अखबार में छपने वाले लेबल के कार्यक्रम ही)।
  • न्यूज चैनलों में खलिहरों की तरह मौजूदगी दर्ज कराएं, विषय के बारे में न जानते हुए भी बकबकाने का कॉन्फिडेंस जरूरी।
  • एकाध साहित्यिक चोरी के आरोप लगे हों, तो सोने पर सुहागा।

ऐसे बनें बुद्धिजीवी

धारा से उलटा बहें : प्रबुद्ध बनने के लिए सबसे जरूरी है, आम जनमानस की राय से बिलकुल उलट विचार रखें। हाल में हुई टुंडा की गिरफ्तारी को विचार मंच पर लोकतंत्र की हत्या करार देकर एक अच्छी शुरुआत कर सकते हैं। रेफरेंस बुक के तौर पर कुछ इंग्लिश लिट् शिरोमणियों के आर्टिकल कंसल्ट कर सकते हैं। हर घटना या मुद्दे को छद्म सेकुलर अथवा भगवा एंगल से देखने की प्रतिभा विकसित करें।

ब्लॉग लिखें, गालियां सुनें : शुरुआत में हो सकता है कि आपको वैचारिक उलटी करने के लिए प्लेटफॉर्म न मिले। अपना ब्लॉग बनाएं और बेझिझक लिखें। कॉमेंट सेटिंग को इस तरह रखें कि कोई भी साइबर राहगीर भूले बिसरे भी आपके पेज तक पहुंच गया हो, तो आपको गालियां बके बिना वहां से न जा पाए। जितनी गालियां, उतने ही आप सुपरहिट।

पारंपरिक मुद्दों से बनाएं दूरी : दूरदृष्टि अपनाएं। कश्मीरी पंडितों के विस्थापन या बुंदेलखंड के किसानों पर सोचने के लिए बहुत लोग हैं। कुछ अलग करें, लीबिया और इजिप्ट के बिगड़ते हालात पर बात करें। सीरिया में बशर अल असद की सरकार के गिरने, उठने पर राय जाहिर करें। सूडान, सोमालिया की गरीबी पर चर्चा करें, सोलोमन आइलैंड के भूकंप के बाद वहां बिगड़े हालात पर पैनी नजर रखें।

हटकर हो साहित्यिक टेस्ट : कोई आपकी साहित्यिक पसंद जानना चाहे तो भूलकर भी प्रेमचंद, परसाई, प्रसाद, पंत, बच्चन का नाम न लें। बाहर के विचारकों को भले न पढ़ें, लेकिन उनकी कुछ रचनाएं, कोट्स जरूर याद रखें। काफ्का के ट्रांसलेटेड पत्रों, मार्खेज की रचनाओं से शुरुआत कर सकते हैं। किसी साहित्यकार का नाम भले ही पहली बार सुना हो लेकिन कॉन्फिडेंस लूज न करें। अपने पड़ोसी के नाम में प्रोफेसर जोड़कर उसे कोट करें। यकीन मानिए, लोग पूछ लेंगे कि फलां कहां के विचारक हैं।

हुलिया और पहनावा : शेविंग, नहाने-धोने से परहेज रखें। सिर्फ दो जोड़ी कपड़ों का इस्तेमाल करें। थोड़ी गंदी हो तो और फबेगी। आधुनिक विचारक दिखना चाहते हों तो अवांछित ड्रेस कॉम्बिनेशन अपना सकते हैं। मसलन, लाल पैंट पर पीले जूते, साथ में हरी कैप, यदा कदा चप्पल में भी दफ्तर आ सकते हैं। चश्मा इस्तेमाल करते हों तो ध्यान रखें कि वो मोटे फ्रेम वाला जरूर हो।

किताबों के दोस्त दिखें : मोटी-मोटी किताबों के साथ दफ्तर में वॉक करने की आदत डालें। जेब अलाउ करे तो नई किताबें खरीद सकते हैं, नहीं करे तो लोगों से उधार मांग सकते हैं। नई किताबों के नाम रेगुलर बेसिस पर अपडेट करें। इसके लिए फ्लिपकार्ट पर बेस्ट सेलिंग सेगमेंट में जाकर किताब और उसके डिस्क्रिप्शन की जानकारी लें। बुक पढ़ें न पढ़ें, रिव्यू जरूर पढ़ें।

सिलेक्टिव अखबार और वेबसाइट बांचें : बाजार में टॉप पर काबिज अखबार और मैगजीन कतई पढ़ते न दिखें। हिंदी अखबार तो भूल कर नहीं। अति गंभीर, लीक से हटकर और सर्कुलेशन की दौड़ से बाहर के प्रकाशनों का रुख करें। हर बात में इंटरनैशनल वेबसाइट्स का हवाला दें। पाकिस्तान का मामला हो तो देसी न्यूज एजेंसियों के बजाए जियो न्यूज, एक्प्रेस ट्रिब्यून, डॉन को जरूर कोट करें।

सोशल नेटवर्क को बनाएं हथियार : नियमित तौर पर विवादित फेसबुक अपडेट और ट्वीट करने की आदत डालें। गूगल स्टेटस अपडेट में नॉर्मल बातें तो बिल्कुल न लिखें। वहां आप कुछ बड़े विदेशी साहित्यकारों की रचनाओं के बदतर से बदतर हिंदी अनुवादों को स्टेटस अपडेट बना सकते हैं। रचनाओं का क्रेडिट देना न भूलिएगा, वर्ना लोग जान ही न पाएंगे कि आप ऐसे महान लोगों को जानते हैं>

गैर पारंपरिक हॉबीज बताएं : अपना पसंदीदा खेल पारंपरिक क्रिकेट के बजाए सॉकर, बेसबॉल, रग्बी, रिदमिक जिम्नैस्टिक बताएं। भले ही भारत की आधी जनता फेसबुक और ट्विटर पर हो, लेकिन किसी के पूछने पर अपना पसंदीदा सोशल प्लेटफॉर्म कम प्रचलित गूगल प्लस को बताएं। गजल सुनते हों तो जगजीत के बजाए गुलाम अली या मेंहदी हसन की परंपरा का वाहक बनें। नॉनवेज भले कभी-कभार खाते हों, लेकिन बीफ फेस्टिवल की हिमायत करें।

(नवभारत टाइम्स से साभार)

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Tue, 11 Apr 2023 00:41:36 +0530 Niraj Kumar Shukla
नीर का तीर : भीड़ बढ़ाने बुलाए गए ‘प्रबुद्धजन’ करते रहे ‘संवाद’ का इंतजार, सीएम ने अपनी बात कही और आभार व्यक्त कर चलते बने, लोग बोले& ये तो प्रबुद्धजनों का अपमान है https://acntimes.com/Enlightened-kept-waiting-for-dialogue-and-CM-expressed-gratitude https://acntimes.com/Enlightened-kept-waiting-for-dialogue-and-CM-expressed-gratitude नीरज कुमार शुक्ला

रतलाम । मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान रतलाम आ रहे हैं, वे ये करेंगे, वो करेंगे, प्रबुद्धजन से संवाद भी करेंगे... ऐसी मुनादी विगत कई दिनों से कराई जा रही थी। उद्देश्य शायद इतना भर था कि कि प्रदेश के मुखिया के आयोजन में भीड़ भर जुट जाए। अब भीड़ कैसी भी, आयोजकों इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जब उद्देश्य सिर्फ भीड़ जुटा ही हो तो आमांतरण-निमंत्रण में उपयोग किए गए शब्दों की महत्ता भी मायने नहीं रखती।

चुनावी साल में ज्यादा से ज्यादा भीड़ जुटे और वह ज्यादा से ज्यादा वोटों में तब्दील हो, इस उद्देश्य से सत्ताधारी दल कुछ भी करने को तत्पर रहते हैं। अब इसमें सरकारी तंत्र भी झोंकना पड़े तो इसमें कतई कोताही नहीं बरती जाती। इससे फायदा यह होता है कि लोगों को लुभाने का कोई भी आयोजन सरकारी बना कर प्रस्तुत किया जा सकता है। खैर, मुद्दा यह नहीं है, सरकारी सिस्टम की स्थिति तो जिसकी लाठी उसकी भैंस जैसी ही है और फिर सत्ता में काबिज लोगों की उंगली पर नाचना सरकारी सिस्टम की मजबूरी है। उसके किस काम से कब कौन खुश हो जाए और कब कौन नाराज, कह नहीं सकते।

दो दिन पहले प्रदेश के गृह मंत्री हिम्मत कोठारी नाराज हुए तो उन्हें मनाने कलेक्टर को उनके घर जाना पड़ा। वे मान भी गए और आयोजन में भी पहुंचे। वे अपनी पार्टी के लिए समर्पित हैं इसलिए उनका और उनके समर्थकों का वोट तो आगामी चुनाव में सत्ताधारी दल को मिल ही जाएगा लेकिन अब उनकी नाराजगी का क्या शनिवार को हुए ‘प्रबुद्धजन संवाद’ में ‘अपमानित’ हुए। चौंकिए नहीं, हम अपनी ओर से कुछ नहीं कह रहे, जो हुआ वही बता रहे हैं। इस आयोजन में आमंत्रित किए जाने पर पहले जो लोग पहले काफी उत्साहित थे, समारोह खत्म होने के बाद हाल से बाहर निकले तो उनके अंदाज में उतनी ही ज्यादा तल्खी भी थी। किसी का कहना था कि जैसे-जैसे चुनाव पास आएगा, ऐसे आयोजन बढ़ते जाएंगे तो कुछ ने इसे ‘प्रबुद्धनों का अपमान’ ही निरूपित कर दिया।

...और काफूर हो गई संवाद नाम की चिड़या

दरअसल प्रबुद्धजनों को इस भरोसे के साथ आमंत्रित किया गया था कि मुख्यमंत्री उनसे संवाद करेंगे। इसलिए अपने-अपने क्षेत्र के जानकारी इसकी तैयारी भी कर के पहुंचे थे ताकि वे अपनी बात प्रदेश के मुखिया के समक्ष रख सकें और उनका उत्तर पा सकें। तय समय से करीब डेढ़ घंटे की देरी से शुरू हुए आयोजन में भूत, वर्तमान और भविष्य की बात तो हुई लेकिन 'संवाद नाम की चिड़िया' कब और कहां काफूर हो गई, कोई समझ ही नहीं पाया। सभी संवाद शुरू होने का इंतजार करते रह गए और मुख्यमंत्री ने अपनी बात करने के बाद सबका आभार भी ज्ञापित कर दिया।

बदल तो नहीं गई संवाद की परिभाषा?

संवाद शब्द की एक सामान्य परिभाषा हमने भी स्कूल के जमाने में पढ़ी थी। वह यह कि- "जब दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी विशेष मुद्दे पर आपस में बातचीत करते हैं तो उसे संवाद कहते हैं।" संवाद दो शब्दों से मिलकर बना है सम् और वाद। इस प्रकार संवाद का शाब्दिक अर्थ समान रूप से विचारों का आदान-प्रदान होता है। अब मुख्यमंत्री के आगमन पर आयोजित किया गया ‘प्रबुद्धजन संवाद’ से आयोजकों का क्या आशय था, समझ नहीं आया। वैसे यह जरूरी भी नहीं कि हर बात, हर किसी की समझ में आ ही जाए। इस मामले में हम ठहरे निपट अनाड़ी। यदि आप को कुछ समझ आए तो कमेंट बॉक्स में प्रतिक्रिया जरूर दीजिएगा।

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Sat, 08 Apr 2023 19:19:46 +0530 Niraj Kumar Shukla
नीर&का&तीर : पटवारियों की हड़ताल यानी सूत ना कपास, जुलाहों में लट्ठम&लट्ठा, अफसर उदार थे तब तक सब ठीक था, आईना दिखाया तो बुरा मान गए https://acntimes.com/Neer-Ka-Teer-Patwaris-strike-means-no-yarn-or-cotton-weavers https://acntimes.com/Neer-Ka-Teer-Patwaris-strike-means-no-yarn-or-cotton-weavers एसीएन टाइम्स @ रतलाम । प्रशासनिक अफसरों का संवेदनशील होना जनता के लिए  तो अच्छा है लेकिन कर्मचारियों को यह नागवार ही गुजरती है। इसके साइड इफेक्ट किस रूप में कब सामने आ जाएं, कह नहीं सकते। सीएम से लेकर जिला स्तर के जनप्रतिनिधि और अधिकारी तक सभी जनता को सुशासन देने की बात कर रहे हैं और इसके प्रयास भी कर रहे हैं। जनता इसे सराह रही है जबकि सरकारी कारिंदों की नजर में यह खटक रहा है। पटवारियों की हड़ताल इसका ताजा उदाहरण है, जो सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठम लट्ठा वाली कहावत चरितार्थ कर रही है।

जनता को सुशासन देने के लिए अमले पर नकेल कसना जरूरी है। ऐसी ही एक कार्रवाई कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी ने हल ही में कर डाली। उन्होंने दो लापरवाह पटवारियों को निलंबित करने का निर्देश दिया तो वे सारे पटवारी बुरा मान गए। निलंबित करने के निर्देश का उद्देश्य अन्य लापरवाह पटवारियों और अमले को सबक सिखाना था लेकिन हो गया इसका उल्टा। कलेक्टर के मौखिक फरमान से पटवारी इतने आहत हुए कि वे लामबंद होकर तीन दिन की हड़ताल पर ही उतर गए। 

दर्द पेट में, बता रहे पैर में

प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार जिस मौखिक आदेश से पटवारी खफा हैं, वह अभी तक कागज पर उतरा ही नहीं है। यानी निलंबन का आदेश जारी होना तो दूर, अभी तक किसी पटवारी को नोटिस तक जारी नहीं हुआ है। बावजूद इसके पटवारियों के हड़ताल पर उतरना समझ से परे है। हड़ताल को लेकर लोगों का कहना है कि दर्द तो पटवारियों के पेट में है लेकिन वे बता रहे है पैर। लोगों में पेट में दर्द से आशय पटावारियों की कारगुजारियां अफसरों की नजर में आना है। कहा जा रहा है कि पटवारियों को यह डर सताने लगा है कि अगर वे हावी नहीं हुए तो अफसर उन पर हावी हो जाएंगे। 

पद छोटा, रुतबा बड़ा

राजस्व विभाग की सबसे छोटी इकाई पटवारी ही हैं। कहने को यह पद छोटा जरूर है लेकिन इनका रुतबा काफी बड़ा है। पटवारी होने के मायने कोई किसानों और ग्रामीणों से पूछे। पटवारियों के पेन की एक छोटी सी लकीर भी किसी जिला अधिकारी से कम नहीं है। जिले में ऐसे पटवारियों की संख्या काफी है जिनके उपलब्ध साधान-संसाधन और सुख-सुविधाएं किसी बड़े अफसर के पास उपलब्ध वस्तुओं से कहीं ज्यादा हैं।

कहीं अनुकंपा ज्यादा तो नहीं हो गई

प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक जिन कलेक्टर ने पटवारियों को निलंबित करने का निर्देश दिया, वही दिन समय पूर्व तक पटवारियों पर अनुकंपा बरसाने में कोई कसर नहीं रख रहे थे। अनुकंपा नियुक्ति हो या फिर पटवारियों की उनकी पसंद वाले स्थान पर पदस्थ करना अथवा उनकी बहाली, कलेक्टर सहित अन्य बड़े अफसर काफी उदारता बरत रहे थे। उदारता बरतने तक तो सब ठीक रहा लेकिन जैसे ही अफसरों ने पटवारियों की लापरवायों की मॉनिटरिंग शुरू की वैसे ही कलेक्टर और अन्य अफसर उनकी आंखों में खटकने लगे। ये पटवारियों की नजर में कब तक खटकेंगे, कह नहीं सकते।

इधर, पता चला है कि अब तक उदारता दिखाते आ रहे अफसरों का रुख अचानक ही बदल गया है और अब उन्होंने अपनी नजरें टेढ़ी कर ली हैं याती अब उनकी नजर पटवारियों के क्रियाकलापों पर लग गई हैं। उनकी हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही है, उनकी कर्मकुंडली भी तैयार करना शुरू कर दी गई है।

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Tue, 14 Mar 2023 00:22:20 +0530 Niraj Kumar Shukla
नीर&का&तीर : ‘अंधों के हाथ बटेर’ लगी या ‘बंदर के हाथ उस्तरा’, यह रतलाम की पब्लिक है सब जानती है https://acntimes.com/Neer-ka-Teer-Quail-in-the-hands-of-the-blind-or-Razor-in-the-hands-of-a-monkey https://acntimes.com/Neer-ka-Teer-Quail-in-the-hands-of-the-blind-or-Razor-in-the-hands-of-a-monkey नीरज कुमार शुक्ला

रतलाम कहते हैं कि ‘भरोसे की भैंस पाड़ा जनती है’, पाड़ा जने तब तक तो ठीक है, क्योंकि वह तो फिर भी काम ही आता है। इस मामले में रतलामवासियों की नियति दूसरों से ज़ुदा है। यह विडंबना ही है कि यहां उनके भरोसे की भैंस प्रायः जुमले ही जनती है। नियति के हाथों छली जा चुकी जनता इन दिनों ‘अंधों के हाथ बटेर लगने’ और ‘बंदर के हाथ उस्तरा लगने’ जैसी लोकोक्तियां और मुहावरे एक-दूसरे से सुन-सुना रहे हैं।

तलाश सुपारी लेने वालों की...

कहने में तो यह सब हमें भी बुरा लग रहा है लेकिन क्या करें हमारा पेशा ही दृष्टि होते हुए भी आंखें मूंद लेने वालों को समय-समय पर जगाने का है। हम और हमारी जमात के लोग इस प्रयास में लगे भी हैं लेकिन दिक्कत उन ‘गांधारियों’ से है जिन्होंने अपने ‘धृतराष्ट्रों’ को खुश करने/रखने के लिए अपनी आंखों में ‘अनदेखी की पट्टी’ बांध ली हो। खबर है कि ऐसे धृतराष्ट्र ऐसे लोगों की तलाश कर रहे हैं जो उनके ‘सुख-चैन’ में खलल डालने वालों की सुपारी ले सकें। उन्हें ये गुमान है कि यदि सुपारी लेने वाला नहीं मिला तो वे खुद सुपारी कतर सकते हैं।

ये रत्न हैं कमाल के...

रतलाम का प्राचीन नाम रत्नपुरी भी बताया जाता है जहां बेशकीमती रत्न भी हैं और बे-कीमती भी। कई बार लोग भ्रमवश अपने मुकुट में बेशकीमती रत्न की जगह बे-कीमती रत्न सजा लेते हैं। ऐसे ही कुछ कथित रत्नों की पोल हाल के दिनों में खुली है, ये ‘नगर के सिंहासन’ से लेकर ‘राजनीतिक दलों की कुर्सियों’ तक में जड़े हैं। अपना पानी (चमक) उतारने में ये खुद ही लगे हुए हैं और जगहंसाई की वजह बन रहे हैं, क्योंकि ये पब्लिक है सब जानती है। नगरीय निकाय चुनाव के दौरान ऐसे कई प्रयोग हुए जो अब भरोसे की भैंस वाली कहावत को ही चरितार्थ कर रहे हैं।

यह अंधेरा यूं ही कायम रहे...

शहर छोटा है इसलिए बंद कमरे की चर्चाएं भी कानों तक पहुंच जाती हैं और अगर बात सार्वजनिक जगहों पर कही गई हो तो फिर उसका दबा रह पाना मुश्किल है। ऐसे ही खबर शहर के पटरी पार के एक रत्न से जुड़ी बताई जा रही है। हुआ यूं कि- किसी ने सैलाना बस स्टैंड चौराहे और राम मंदिर के सामने लगने वाले जाम के लिए एक समाधान सुझाया। रतलाम में समस्या का समाधान, ऐसे भला कैसे हो सकता है। चर्चा के दौरान मौजूद सत्ताधारी दल के मुकुट में जड़े एक रत्न ने तपाक से कह दिया, कि- अगर समस्या हल हो जाएगी तो पटरी पार क्षेत्र और हमारा रुतबा कैसे पता चलेगा ? कहा जा रहा है कि इस रत्न को लोग ‘शिव-परिवार’ के सदस्य की सवारी के रूप में पहचानते हैं।

हर गांधी महात्मा नहीं होता...

‘गांधी’ शब्द सुनते ही सिर श्रद्धा से झुक जाता है, लेकिन जिसके लिए सिर झुकता है वे मोहनदास करमचंद गांधी थे जिन्हें सब राष्ट्रपिता कहते हैं। अब जरूरी नहीं कि जिस भी नाम के आगे गांधी लगा हो वह भी उनके जितना ही सद्चरित्र, सात्यनिष्ठ और कर्त्तव्यनिष्ठ हो। जी, हां ! आप सही समझे। हमारा शहर के उन्हीं ‘गांधी’ की तरफ है जो हाल में कहीं सुर्खी बने। ये गांधी उन सतरंगी कागजों के लेन-देन के कारण चर्चा में जिन पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की तस्वीर छपती है। उन्होंने गांधी छाप कागज किसके कहने पर क्यों लिए, इसकी सफाई देकर खुद को उसी प्रकार पाक-साफ बता दिया जिस प्रकार पीएम नरेंद्र मोदी के स्वच्छता अभियान से प्रेरित होकर रतलाम शहर को स्वच्छ और सुंदर बताया जा रहा है।

किसकी हिम्मत से हिट हुई पिक्चर

कभी दशकों तक सत्ता में काबिज रहे पार्टी के स्थानीय नेता एक बार फिर सत्ता में वापसी का ख्वाब देख रहे हैं। यह ख्वाब उनकी आंखों में भी पल रहा है जिन्होंने कुछ महीनों पहले सत्ताधारी दल के लोगों का नींद और चैन चुरा लिया था और उनकी आंखों में भी है जो तब भी सोए रहे। ऐसे स्वप्नदर्शा सत्तापक्ष के लोगों की हर छोटी-बड़ी गलती को लपने और उसे भुनाने का अवसर नहीं छोड़ रहे। एक आयोजन में बजरंगबली का अनादर हुआ तो वे भी जागृत हो गए जिन्हें पार्टी ने केवल सोने का ही जिम्मा सौंप रखा है। गनीमत रही कि हमेशा जागृत रहने वाले और सत्ताधारी दल की कथित ‘हिम्मत’ मिल गई और पिक्चर हिट हो गई।

...और अब रतलामी होली

यह रचना रतलाम शहर के सोशल मीडिया ग्रुपों में काफी वायरल हो रही है। हमने सोचा होली के खास मौके पर रची गई ये पंक्तियां आपको भी पढ़वाई जाए, इसलिए आपकी खिदमत में पेश है...)

‘शिव’ के भक्त ‘प्रहलाद’ ने ऐसा फैलाया रंग।

‘काश्यप’ धर्मसंकट में फंसे, हुई ‘पार्टी में जंग’।

बॉडी बिल्डिंग के फेर में पड़ गई रंग में भंग।

जब बजरंग बली के सामने खुले अंग-प्रत्यंग।

*** 

‘धर्म-अधर्म’ संग मुद्दा बन गया ‘नारी का सम्मान’।

आग में कूदे ‘अति - उत्साहित’ छोड़ के सारे काम।

‘विशाल’ ‘जलज’ को मिल गया रोजनामचे में स्थान।

‘पारस’ को ‘हिम्मत’ ऐसी मिली हुआ देश में नाम।

***

मैं ‘मुर्दों के शहर’ की बेचारी सी निर्मल जनता हूं।

पोहे, तर कचौरी खाकर मुझे सब कुछ लगे हसीन।

सुशील, नीरज, सुरेंद्र, नरेंद्र और लिख रहे असीम।

पर ‘गुमान’ से भरे नेताओं को दिखती नहीं जमीन।

***

बुरा ना मानो ये रतलामी होली है...

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Tue, 07 Mar 2023 23:32:58 +0530 Niraj Kumar Shukla
नीर का तीर : होली व रंगपंचमी पर फाइटर से होगा ‘दवा&दारू’ का छिड़काव, बाद में इसके निःशुल्क प्याऊ भी खुलेंगे ! https://acntimes.com/Neer-Ka-Teer https://acntimes.com/Neer-Ka-Teer नीरज कुमार शुक्ला

रतलाम । मुख्यमंत्री के रूप में गुजरात को चमकाने वाले नरेंद्र मोदी ने पीएम बनते ही देशभर के शहर और गांवों को साफ-सुथरा रखने के लिए स्वच्छता अभियान छेड़ दिया। उन्होंने गंदगी साफ करने का आह्वान किया था लेकिन कुछ लोगों ने इस ‘सफाई’ को अलग ही अर्थों में ले लिया। कई तो सफाई करने और देने के मामले में ‘गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड’ बनाने में ही जुट गए हैं। सफाई भी ऐसी जो व्यवस्थाओं, जिम्मेदारियों, समझ और पद की प्रतिष्ठा का ही ‘कचरा कर’ रही है। आइये, जानते हैं रतलाम के ऐसे ही कुछ सफाई वीरों के बारे में...।

सफाई वीरों में सबसे ऊपर हैं रतलाम शहर की एक संस्था के मुखिया, नाम तो आप जानते ही हैं। कुछ महीनों पूर्व इनकी ‘भक्ति’ अखबारों की सुर्खियां भी बनीं थी। राजनीतिक गलियारों में लोग इनकी तुलना भी एक राष्ट्रीय पार्टी के प्रमुख किरदार जिन्हें लोग ‘पप्पू’ पुकारते हैं, से करने लगे हैं। वजह, इनकी जुबान कब-कहां फिसल जाए, कह नहीं सकते। इसके लिए वरिष्ठ अकेले में और कई दफा सार्वजनिक तौर पर भी इनकी ‘चेतना’ जागृत करने का प्रयास कर चुके हैं लेकिन सारी कोशिशें उल्टे घड़े पर पानी डालने वाली ही साबित हुईं। सुना है कि इन्हें शहर में कुत्ते फूटी आंख नहीं सुहाते और इनका बस चले तो ये कुत्तों को गोली ही मार दें। ठीक है, आप भक्त हों या भगवान, हमें क्या। आप जो करें सो कम है। आपको नाचने-गाने का शौक है तो भी हमें क्या। हमने या किसी और ने कब अपने शौक पालने से रोका है, लेकिन इतना तो कहना बनता ही है, कि- पद की गरिमा भी तो कोई चीज है। जरूरी तो नहीं कि हर बात का ही करचा कर दो।

उधर, राजधानी में ‘उमा’ और ‘शिव’ में ‘मय’ के लिए ठनी रार के कारण हुए मंथन में नई शराब नीति बाहर आई तो इधर, दारू ‘दवा’ बन गई। दारू के दवा बनते ही पियक्कड़ों की बांछें खिल गईं, उन्हें नगर सरकार के बजट का बेसब्री से इंतजार है। सभी को उम्मीद है कि इस बार के बजट में सार्वजनिक प्याऊ की तरह शहर में जगह-जगह ‘दवा-दारू’ के निःशुल्क काउंटर खोले जाने का ऐलान जरूर होगा। उम्मीद तो यह भी की जा रही है कि जिस तरह कोरोना काल में सेनेटाइजर का छिड़काव किया गया था, उसी तरह होली और रंगपंचमी पर नगर निगम के फायर फाइटर से शराब का छिड़काव भी होगा।

बाकी बातें छोड़ो... आप तो केवल ‘कचरा कर’ दो

जिम्मेदार तो पहले ही स्वच्छता अभियान का कचरा कर चुके हैं। स्वच्छता में श्रेष्ठता हासिल करने के नाम पर कागजों पर इतनी सफाई हुई कि नगर सरकार का बजट तो साफ हो गया, गलियां और सड़कें (कुछ विशेष सड़कों को छोड़कर) गंदी कि गंदी ही रहीं। कई कॉलोनियों और मुहल्लों में तो किसी जिम्मेदार ने झांका तक नहीं। चुनाव में वोट के लिए जनता के आगे गिड़गिड़ाने वाले भी गधे के सिर से सींघ की तरह नदारद हैं। जिन्हें जनता ने चुनाव कर नगर सरकार का हिस्सा बनाया वे या तो सेल्फिश हो गए या फिर सिस्टम के मकड़जाल में उलझ कर हेल्पलेस हो गए। इनमें भी सेल्फिश की तादाद ज्यादा है। इसलिए खुद जनता को ही अपनी बात और समस्या बताने के लिए जिम्मेदारों तक जाना पड़ रहा है। यह जनता का दुर्भाग्य ही है कि जिम्मेदार उन्हें समाधान के बजाय समस्या बताकर चलता कर रहे हैं। हाल ही में एक जिम्मेदार ने लोगों से कह दिया कि- बाकी बातें छोड़ो, आप तो केवल ‘कचरा कर’ दो।

नकल की पर अक्ल अपनों को रेवड़ी बांटने में लगाई

पद का कचरा करने के मामले में कुछ संगठन और उनके नेता भी कम नहीं हैं। बानगी एक राष्ट्रीय पार्टी की जिसे लोग ‘डूबता जहाज’ मानने लगे हैं। हर दूसरे-चौथे दिन कोई न कोई इस जहाज से कूदता नजर आता है और ‘वे कभी उसका हिस्सा थे’, यह कहने तक से कतराते / डरते हैं। कहते हैं कि ‘नकल में अक्ल’ की भी जरूरत होती है लेकिन राजनीति में इस पर अमल हो, जरूरी नहीं। उक्त राष्ट्रीय पार्टी में यह बात देखने को मिली जिसमें हाल ही में एक पद सृजित हुआ, संगठन मंत्री का। रतलाम शहर में यह पद पार्टी के ऐसे योद्धा को नवाजा गया है जो पार्षद जैसे छोटे से चुनाव में अपनी पत्नी तक को नहीं जिता पाया। ऐसी नियुक्ति का विधानसभा और फिर लोकसभा चुनाव पर क्या असर होगा, यह सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है। नेतृत्व के दृष्टिहीन होने में कोई बुराई नहीं लेकिन हर जगह ‘अपनों’ को ही ‘रेवड़ी’ बांटना समझदारी नहीं है।

…इन्होंने तो विकास यात्रा का ही कचरा कर दिया

शहर लेकर गांव तक ‘सबका साथ - सबका विकास’ का नारा गूंज रहा है। सरकारी खर्च पर यात्राओं के नाम पर राजनीतिक विकास दौड़ लगा रहा है। यह दौड़ रतलाम शहर में भी हुई। मंच सजे, ढोल बजे, कस्में हुईं और वादे भी हुए। कुछ इच्छा से शामिल हुए, कुछ अनिच्छा से। इच्छा से शामिल हुए नेताओं ने विकास की बात की, विजन भी बताया जबकि अनिच्छा से आए नेता या तो नींद निकालते रहे या ऊंघते रहे। एक आयोजन में आरडीए अध्यक्ष के एक दावेदार पूरे समय उबासी ही लेते रही। इसी तरह खुद को रतलाम शहर का अगला विधायक मान बैठे सत्ताधारी दल के जिले के तीसरे नंबर के पदाधिकारी ऊंघते रहे। वहीं दूसरी ओर जिले के पिपलौदा विकासखंड में विकास यात्रा के एक मंच पर वहीं के एक स्थानीय नेता ने अपनी ही पार्टी के जनप्रतिनिधि के खिलाफ अनाप-शनाप बोल कर सार गुड़ गोबर कर दिया।

 

 

 

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Thu, 23 Feb 2023 08:42:10 +0530 Niraj Kumar Shukla
जिम्मेदारों को फुर्सत नहीं थी इसलिए नवरात्रि के 8वें दिन रात 9 बजे जारी हुआ ट्रैफिक डायवर्सन प्लान, मुस्कराइये क्योंकि आप रतलाम में हैं https://acntimes.com/neer-ka-teer-Traffic-diversion-plan-released-at-9-pm-on-the-8th-day-of-Navratri https://acntimes.com/neer-ka-teer-Traffic-diversion-plan-released-at-9-pm-on-the-8th-day-of-Navratri नीरज कुमार शुक्ला

रतलाम सुकून का शहर है। यहां के भाईचारे और सौहार्द की मिसालें दी जाती हैं। संयम और धैर्य का तो यह पर्याय ही है। रोज समस्याओं से जूझने के बाद भी हम जिम्मेदारों को नहीं कोसते, क्योंकि हमें पता है कि इससे होना जाना कुछ भी नहीं है। सोने की शुद्धता और सेंव के स्वाद की ही तरह यहां की शांत स्वभाव वाली तासीर भी देश-दुनिया में ख्यात है। इसलिए यहां सरकारी महकमों में काबिज होने आने वाले भी खुद जीयो और दूसरों को भी जीने दो के सिद्धांत पर काम करते हुए चाकरी का अपना समय गुजारने की नीति पर अमल करते हैं।

आप सोच रहे हों कि हम भी ये क्या जुमले लेकर बैठ गए। अगर ऐसा सोच रहे हैं तो चलिए हम सीधे विषय पर आते हैं। विषय है नवरात्रि में शहर की यातायात व्यवस्था। नवरात्रि के आज (सोमवार) पूरे 8 दिन हो चुके हैं। इस दौरान सैलाना बस स्टैंड से राम मंदिर चौराहे के बीच रात 8 बजे बाद आवागमन करने वाले जाम की समस्या से जूझते रहे। कहने को तो यह फोरलेन है लेकिन स्थिति टू-लेन से भी गई बीती है। एक लेन गरबे का आयोजन हो रहा है।

आयोजकों को उम्मीद थी कि गरबों के दौरान यातायात पुलिस वाहनों की आवाजाही को सुगम बनाने में सहयोग करेगी लेकिन पहले दिन से शुरू हुई जाम की समस्या 8वें दिन तक रही। एक ही लेन से दोनों तरफ का ट्रैफिक गुजरने के दौरान लगभग आठो दिन वाहन गुत्थम-गुत्थम होते रहे। बीते दो-तीन दिन में कुछ जवान यातायात सुचारू बनाने का प्रयास करते नजर आए लेकिन लोगों की परेशानी का स्थायी समाधान नहीं कर पाए।

इतनी भी क्या जल्दी थी, दो दिन और गुजर जाने देते

सैलाना बस स्टैंड से राम मंदिर चौराहे तक लगने वाले जाम को लेकर लगभग रोज ही लोगों ने प्रतिक्रियाएं जाहिर की और समाधान को लेकर सुझाव भी रखे गए। हालांकि यह सोशल मीडिया तक ही सीमित रही, जिम्मेदारों के कानों या नजरों के सामने तक नहीं पहुंची। इस तरह नवरात्रि के 7 दिन गुजर गए और लोग परेशान होते रहे। सोमवार को यातायात पुलिस ने यातायात का एक प्लान जारी कर दिया। जिस वक्त यातायात का प्लान मीडिया को प्रचार प्रसार के लिए जारी किया गया, रात के 8.58 बज रहे थे। यानी यातायात पुलिस को व्यवस्था में सुधार का 4 बिंदुओं वाला प्लान जारी करने का निर्णय लेने में 8 दिन का समय लग गया।

त्योहार का समय है, अमले की व्यस्तता भी समझ में आती है लेकिन प्राथमिकता क्या हो, यह समझ नहीं आया। देर से ही सही लेकिन यातायात का प्लान तो आ ही गया है। सोशल मीडिया पर यह साझा होते ही लोगों ने प्रतिक्रिया देना भी शुरू कर दी है। लोगों का कहना है कि- आखिर इतनी भी क्या जल्दी थी, सिर्फ दो ही दिन तो शेष थे। जैसे इतने दिन गुजर गए थे, वैसे ही दो दिन और गुजर जाने देते। नाहक ही नवरात्रि के आखिरी दिनों में रूट डायवर्ट कर वाहन चालकों का टेंशन बढ़ा दिया।

किसी को आपकी फिक्र हो या न हो लेकिन आप ये सावधानी जरूर बरतें

ट्रैफिक प्लान यहां ज्यों-का-त्यों चिपका रहे हैं। इसमें क्या व्यवस्था दी गई है, वह आप खुद ही जान और समझ लीजिए। 1 अक्टूबर को जारी एक आदेश के अनुसार अब दो पहिया वाहन चालकों को हेलमेट अनिवार्य रूप से लगाना होगा। ऐसा नहीं करने पर आपके विरुद्ध चालानी कार्रवाई न हो, इसलिए हमारी अपील है कि दोपहिया वाहन चलाते और सवारी करते समय हेलमेट जरूर पहने। अगर आप चारपहिया वाहन चलाते हैं तो सीट बेल्ट लगाना न भूलें। ये सावधानियां चालान से तो बचाती ही हैं, जान का जोखिम भी कम से कम करती हैं।

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Mon, 03 Oct 2022 22:28:38 +0530 Niraj Kumar Shukla
जातीय संतुलन की चिड़िया हुई काफूर, जिस OBC के लिए सुप्रीम कोर्ट तक मचा घमासान उसे MIC में नहीं मिला उचित सम्मान https://acntimes.com/BJPs-Sabka-Saath-Sabka-Vikas-did-not-show-in-Ratlam-MIC https://acntimes.com/BJPs-Sabka-Saath-Sabka-Vikas-did-not-show-in-Ratlam-MIC नीरज कुमार शुक्ला

एसीएन टाइम्स @ कैप्शन । पहले टिकट वितरण को लेकर भाजपा पर सवाल उठे थे और अब एमआईसी गठन सवालों के घेरे में है। जिस ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) के आरक्षण को लेकर प्रदेश सरकार से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक ऊहापोह की स्थिति मची थी उसी को महापौर परिषद में (MIC) उचित सम्मान नहीं मिल सका। अल्पसंख्यक को प्रतिनिधित्व देने के मामले में पार्टी का सबका साथ – सबका विकास वाला नारा सही साबित नहीं हुआ। पार्टी के कुछ लोग इस मामले में प्रदेश हाईकमान से शिकायत करने की तैयारी कर रहे हैं।

महापौर प्रहलाद पटेल के 10 सदस्यीय मंत्रिमंडल (एमआईसी) का गठन शुक्रवार देर शाम हो गया। कहने के तो यह महापौर का मंत्रिमंडल है लेकिन हकीकत इससे इतर नजर आ रही है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि एमआईसी गठन में सभी पक्षों को साधने और संतुलन बनाने का प्रयास किया गया है लेकिन ऐसा दिख नहीं रहा है। इसका बड़ा उदाहरण ओबीसी फैक्टर है जिसे एमआईसी में पर्याप्त सम्मान नहीं मिला है।

सुप्रीम कोर्ट से 27 फीसदी आरक्षण ओबीसी को देने के दिशा-निर्देश जारी हुए थे। तब पार्टी ने इससे ज्यादा टिकट इस वर्ग को देने की बात कही थी। पार्टी दावा कर रही है कि महापौर ओबीसी से बनाया जबकि सच्चाई यह है कि इसमें पार्टी का खुद का कोई निर्णय नहीं था बल्कि यह आरक्षण के रोस्टर और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के परिपालन में हुई एक प्रक्रिया के तहत हुआ है। अतः भाजपा द्वारा इसका श्रेय लेना समझ से परे है। एक जानकारी के अनुसार शहर में 1 लाख से ज्यादा मतदाता ओबीसी के जो 49 वार्डों में रहते हैं। अगर 30 फीसदी सीटें भी इस इस वर्ग की मानें तो 15 वार्ड ओबीसी के होते हैं।

मिलने थे तीन पद, मिला एक

जिस वर्ग के लिए पार्टी इतनी उदार थी उसी को एमआईसी में प्रतिनिधित्व देते समय जिम्मेदारों की सोच संकुचित हो गई। आरक्षण की शर्त और पार्षदों के टिकट वितरण की ही तरह एमआईसी में भी संतुलन बनाया गया होता तो 10 सदस्यीय एमआईसी में से 3 पद ओबीसी के होते। जबकि सिर्फ एक ही पद (वार्ड क्रमांक 18 के पार्षद मनोहरलाल सोनी उर्फ राजू सोनी) इस वर्ग के हिस्से आया। वहीं सबसे ज्यादा फायदे में ब्राह्मण वर्ग रहा जिसके हिस्से 40 फीसदी (यानी चार पार्षद गिरधारी सिंह पुरोहित, विशाल शर्मा, धर्मेंद्र व्यास और सपना त्रिपाठी) पद आए। यहाँ तक कि निगम अध्यक्ष का पद भी इसी वर्ग को मिला। पूर्व एमआईसी सदस्य भगतसिंह भदौरिया, अक्षय संघवी तथा दिलीप गांधी को भी इसमें जोड़ लें तो 10 में से 7 पद तो सामान्य श्रेणी को दे दिए गए हैं।

अल्पसंख्यक किस चिड़िया का नाम है

एमआईसी के स्वरूप को देखें तो कोई भी यह सवाल पूछ सकता है कि इसमें अल्पसंख्यक नाम की चिड़िया कहां है। दरअसल अल्पसंख्यक को प्रतिनिधित्व देने के मामले में भी पार्टी कंजूस ही नजर आई। अव्वल तो पार्टी के टिकट पर लड़ने वाले सबसे बड़े अल्पसंख्यक वर्ग मुस्लिम समुदाय के प्रत्याशी जीत नहीं पाए। जोड़-तोड़ कर के एक कांग्रेसी को भाजपा की सदस्यता दिलाई गई। राजयोग प्रबल थे जो वह निर्विरोध जीत भी गया। माना जा रहा था कि इस अल्पसंख्यक समुदाय के एकमात्र पार्षद को एमआईसी में प्रतिनिधित्व देकर महापौर सभी को चौंका सकते हैं लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

जिला अध्यक्ष की नहीं चली एमआईसी में

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि एमआईसी गठन में सभी धड़ों को साधने का प्रयास हुआ सिवाय जिला अध्यक्ष को छोड़कर। सूची देखने से भी प्रथमदृष्ट्या यही प्रतीत हो रहा है कि भाजपा जिला अध्यक्ष की लगभग उपेक्षा ही हुई है। माना जा रहा है कि यदि जिला अध्यक्ष की चलती तो ओबीसी के योगेश पापटवाल को प्रतिनिधित्व मिल सकता था। ऐसा इसलिए पापटवाल के परिवार के सदस्य एच.एल. पापटवाल अध्यक्ष के काफी नजदीकी हैं और फिर खुद योगेश पूर्व एमआईसी सदस्य सुरेश पापटवाल के भतीजे हैं और भाजयुमो से भी जुड़े हैं। योगेश की भाजयुमो जिला अध्यक्ष से नजदीकता भी बाधा बताई जा रही है। इसी तरह अध्यक्ष के नजदीकी परमानंद योगी और शक्तिसिंह भी जगह नहीं बना सके।

अनुशंसित सूची लीक होने पर उठ रहे सवाल

सूत्रों की मानें तो भाजपा के कुछ लोग एमआईसी के लिए जिला अध्यक्ष द्वारा अनुशंसित सूची सोशल मीडिया में लीक होने को भी अनुचित बता रहे हैं। उनका कहना है कि एमआईसी का गठन बेशक, सत्ता, संगठन के लोग और महापौर बैठकर समन्वय स्थापित कर के करते हैं लेकिन नामों की घोषणा महापौर ही करते हैं। बाकी जो भी प्रक्रिया है वह गोपनीय होती है। बावजूद इस बार जिला अध्यक्ष द्वारा अनुशंसित सूची गठन होने से पहले ही सोशल मीडिया पर आ गई थी।

किसे, क्यों मिला एमआईसी में स्थान

भगतसिंह भदौरिया : पूर्व पार्षद और एमआईसी सदस्य होने का अनुभव। शहर विधायक की पसंद। निगम अध्यक्ष पद पर प्रबल दावेदारी होने के बाद भी वंचित रखने की नाराजगी दूर करना।

गिरधारीसिंह (पप्पू पुरोहित) : पूर्व जिला अध्यक्ष व वरिष्ठ भाजपा नेता बजरंग पुरोहित से संबंध। पूर्व अध्यक्ष पुरोहित के प्रदेश स्तर पर संबंध। ब्राह्मण समाज को साधना। पटरी पार इलाके में पार्टी को मजबूत करना।

अनीता कटारा : जातिगत समीकरण। हालांकि एक अन्य सदस्य भी इस वर्ग से हैं लेकिन कटारा को पूर्व परिषद का अनुभव है। माइक पर बोल सकने में सक्षम।

मनोहरलाल सोनी (राजू सोनी) : शहर विधायक की पसंद हैं। प्रवीण सोनी का महापौर का टिकट कटने से समाज को साधने की एक कोशिश।

विशाल शर्मा : कल्याण गुरु से जुड़ाव व खुद का अपना वजूद। प्रदेश स्तर निगम अध्यक्ष बनाने को लेकर दबाव था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ब्राह्मण समाज को साधना। पूर्व धर्मस्व मंत्री मोतीलाल दवे के बेटे व पूर्व पार्षद संजय दवे जैसे व्यक्ति को हराना।

अक्षय संघवी : भाजपा नेता अशोक जैन लाला से जुड़ाव। जैन का विधायक काश्यप से जुड़ाव।

धर्मेन्द्र व्यास : सिंधिया खेमे के भाजपा प्रदेश कार्य समिति सदस्य निमिष व्यास से जुड़ाव जुड़ाव। पूर्व गृह मंत्री हिम्मत कोठारी की सहमति। फिर इन्हें लेकर ब्राह्मण समाज को ज्यादा प्रतिनिधित्व देने का संदेश भी भाजपा ने देने का प्रयास किया है।

दिलीप गांधी : जैन समाज को प्रतिनिधित्व देना। पूर्व गृह मंत्री हिम्मत कोठारी और विधायक चेतन्य काश्यप की पसंद। लंबा राजनीतिक अनुभव।

रामलाल डाबी : विधायक चेतन्य काश्यप की पसंद। जातिगत समीकरण।

सपना त्रिपाठी : पूर्व गृह मंत्री हिम्मत कोठारी की पसंद। पूर्व निगम अध्यक्ष और आरडीए अध्यक्ष विष्णु त्रिपाठी के प्रति संवेदना जाहिर करना। इस बार के चुनाव में यह भी माना जा रहा था कि सिखवाल ब्राह्मण समाज का समर्थन महापौर प्रत्याशी मयंक जाट को मिल सकता है। इस भ्रम या कयास को खत्म करने के लिए भी त्रिपाठी परिवार को एमआईसी में जगह देना एक वजह हो सकती है।

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Sat, 20 Aug 2022 16:09:52 +0530 Niraj Kumar Shukla
नीर का तीर : ‘विवादों की विधि’ के बीच ‘अव्यवस्थाओं की शपथ’, पहले ही कानों में जूं तक नहीं रेंगती, अब आंखों में पट्टी ही बांध ली https://acntimes.com/neer-ka-teer-Oath-of-disarray-amid-law-of-disputes https://acntimes.com/neer-ka-teer-Oath-of-disarray-amid-law-of-disputes नीरज कुमार शुक्ला

बात रतलाम की... जनता जनार्दन ने नगर सरकार के लिए एक बार फिर ‘फूल वालों’ की सेना पर भरोसा जता दिया। हालांकि इसके सेनापतियों को ही अपनी सेना की कद्र है न ही फिक्र। जब आप अपनों के द्वारा ही अपमानित किए जा रहे हैं तो फिर सरकारी नुमाइंदों से मान-सम्मान की उम्मीद रखना बेमानी ही है। ऐसी अपेक्षा रखना तब और भी उचित नहीं जब जिम्मेदारों को शहीदों और देश की शान तिरंगे के सम्मान की ही फिक्र न हो। इसकी बानगी फूलछाप नगर सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में देखने को मिली। सीधे शब्दों में कहें तो यहां ‘विवादों की विधि (नियम)’ के बीच ‘अव्यवस्थाओं की शपथ’ हुई।

शुरुआत करते हैं राष्ट्रीय ध्वज और शहीदों से। ये दोनों ही हमारा गर्व हैं। इसके सम्मान के लिए ही कई लोगों ने अपने प्राणों आहुतियां तक दे डाली। हालांकि इसकी फिक्र नगर सरकार का शपथविधि समारोह आयोजित करने वालों को नहीं रही। जिस सभागार में आयोजन हुआ, उसकी छत पर शहीदों के पोस्टर ऐसे लटकाए दिए गए जैसे सुखाने के लिए गीले कपड़े टांग दिए जाते हैं। आजादी के अमृत महोत्सव के मौके यहां सिर्फ शहीदों का ही अपमान नहीं हुआ बल्कि उनके पोस्टर के नीचे प्रिंट किए गए राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के प्रतीक तिरंगी पट्टी के मान-सम्मान तक का भी ध्यान नहीं रखा गया। सभी पोस्टर में यह तिरंगी पट्टी उल्टी ही छाप दी गई। अब बात करते हैं आयोजन से जुड़े अन्य पहलुओं की जिन्हें आप (अ)व्यवस्था भी कह सकते हैं। आयोजन में और कहां मान-सम्मान दरकिनार हुआ इससे पहले यह जान और समझ लीजिए कि- जब जड़ों में ही गुटबाजी रूपी जहर घुला हो तो फिर पौधे में ‘शूल’ ही उगेंगे, ‘सौहार्द के फूल’ की अपेक्षा रखना तो बेमानी ही है। ऐसे में किसका, कैसा मान और कैसा सम्मान...।

पहले पैर जमीन पर नहीं थे, अब आसमान की सैर होगी

प्रदेश में ‘राज’ कर रहे ‘शिव’ एक ‘भक्त’ को ‘विजयी भव:’ का आशीर्वाद देकर ऐसे गए कि रत्नपुरी की ओर पलट कर ही नहीं देखा। भक्त के पैर तो पहले ही धरती पर नहीं पड़ते थे, अब तो ‘सिंहासन’ भी मिल गया है इसलिए अब अगर उड़ान भी आसमान तक ही सीमित रहे तो कदाचित् आश्चर्य नहीं होना चाहिए। गुप्त वार्ता तंत्र से अपुष्ट खबर मिली है कि भक्त ने किसी ‘धरती के नारद’ (संचार दूत) से यहां तक कह दिया कि- मेरा सिंहासन छोटा है। यह न तो नरों के इंद्र के सिंहासन जैसा है और न ही शिव के राज जैसा ही है। इसलिए जो कुछ भी मिला है, उसी में मौज करो। यह बात संचार दूतों में जंगल की आग की तरह फैल रही है। इससे कहीं कोई ‘आहत’ है तो कहीं किसी को ‘राहत’ भी है। इससे तय है कि आगामी दिनों में राहत पाने वाले ‘भक्त-मंडली’ को हर अवसर पर राह दिखाने और अपने नंबर बढ़वाने का प्रयास करेंगे तो आहत होने वाले ‘आह!’ दिखाने का। यह सिलसिला पंचवर्षीय योजना का रूप भी ले सकता है।

अभिषेक से पहले सिंहासन हथियाने की होड़, 'हिम्मत' के आगे घुटनों पर

नगर सरकार के ‘राज्य + अभिषेक’ को देखने ‘मान-सम्मान’ रूपी चिड़िया भी पहुंची थी जो ‘विवादों की विधि (नियम)’ के बीच ‘अव्यवस्थाओं की शपथ’ देख कहीं दूर जा बैठी। कहते हैं कि राज्याभिषेक के लिए आमंत्रण पाती तो छपी लेकिन बंटी सिर्फ अपनों को वह भी ‘अंधे की रेवड़ी’ की तरह। आम ही नहीं, कई खास के पास भी यह नहीं पहुंची। मंच पर भी कुर्सी प्रेमियों की ही भीड़ ज्यादा नजर आ रही थी। ऐसे में कुर्सी हथियाने की होड़ और तोड़-फोड़ स्वाभाविक है। यह देखकर उपेक्षा का शिकार एक खास ने तो ऐसी ‘हिम्मत’ दिखाई कि कल तक ‘नल’ और ‘जल’ का ख्वाब दिखाने वाले उनके सामने घुटनों पर आ गए और कान भी पकड़ लिए। दोनों के बीच कुछ बात भी हुई लेकिन आसपास वाले सुन नहीं। इस खास को मनाकर आयोजन स्थल पर ही रोक सके, इतनी हिम्मत वहां किसी में नजर नहीं आई।

मूछें हों तो नत्थूलाल जैसी, वरना न हों

मान-सम्मान रूपी चिड़िया के नगर सरकार के राज्याभिषेक से दूर रहने और आमंत्रण पाती में सिर्फ नाम लिखभर देने (बुलावा नहीं भेजने) से नाराज ग्रामीण इलाके के मुखिया भी ज्यादा देर चुप नहीं रह सके। उन्होंने फूल वालों के सेनापति से अपनी पीड़ा साझा कर डाली लेकिन करने के लिए सेनापति अफसोस जताने और अपनी मूछों में ताव देने से ज्यादा कुछ भी नहीं कर सके। जिसे भी इस बारे में पता चल रहा है, वह यही कह रहा है कि- ऐसी मूछें किस काम की जो किसी को मान-स्मान ही न दिला सकें। ‘मूछें हों तो नत्थूलाल जैसी’ ताकि कम से कम फिल्मों या कहीं और उदाहरण देने के तो काम आ सकें।

दल - दल में निर्दलीयों की फजीहत

जमाना दलों का है इसलिए जिनका कोई दल नहीं है उनकी फजीहत होना तय है। नगर सरकार का राज्याभिषेक भी इससे अछूता नहीं रहा। यहां भी एकदलीय व्यवस्था हावी नजर आई। नतीजतन दलों से दूर (निर्दलीय) रहकर जनता का आशीर्वाद पाने वालों के साथ भी वैसा ही व्यवहार हुआ जैसा फूल वाली सेना के खास लोगों के साथ हुआ। यह हाथ वालों ने पहले ही भांप लिया था। इसलिए उन्होंने एक दिन पहले ही बिना किसी औपचारिकता के शपथ ग्रहण कर ली।

चलते-चलते...

जवाब मांगने के लिए 20 दिन पहले तक नगर सरकार के पूर्व मुखिया को जनता-जनार्दन ढूंढ रही थी वह नई नगर सरकार के राज्याभिषेक के दौरान कुर्सी पर नजर आई तो हर कोई हैरान रह गया। लोग बोले- यह भी ईद के चांद के दीदार से कम नहीं। 

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Mon, 08 Aug 2022 18:02:05 +0530 Niraj Kumar Shukla
नगर सरकार का परिणाम यानी विधानसभा चुनाव 2023 के लिए खतरे का ‘अलार्म’, वोटों के गणित से जाने किसकी होगी ‘अग्निपरीक्षा’ https://acntimes.com/This-result-of-the-city-government-is-not-a-danger-alarm-for-the-assembly-elections-2023 https://acntimes.com/This-result-of-the-city-government-is-not-a-danger-alarm-for-the-assembly-elections-2023 एसीएन टाइम्स @ रतलाम । शायर इरफ़ान सिद्दीक़ी ने लिखा है कि- उठो ये मंज़र-ए-शब-ताब देखने के लिए, कि नींद शर्त नहीं ख़्वाब देखने के लिए। यानी इस उजली रात का जो नजारा है वह देखने के लिए जागने की जरूरत है। भविष्य की रातें भी उजली होंगी, यह जरूरी नहीं है, क्योंकि इस उजली रात के आगोश में कुछ काले पक्ष भी छिपे हैं। रतलाम की नगर सरकार के परिणाम भी इसी ओर इशारा कर रहे हैं। हार-जीत के आंकड़ों पर गौर करें तो ये 2023 के विधानसभा चुनाव में जीत के ख्वाब देख रहे सत्ताधारी दल भाजपा के लिए अप्रत्याशित खतरे का अलार्म ही प्रतीत हो रहे हैं। यह अलार्म ही शायर महशर बदायूंनी की लिखी इस बात  बात साबित करेगा कि- अब हवाएँ ही करेंगी रौशनी का फ़ैसला, जिस दिए में जान होगी वो दिया रह जाएगा।

नगर सरकार चुनने के लिए पिछले दिनों हुए चुनाव में महापौर पद के लिए कुल 1,47,932 वोट डले। इनमें से 3498 वोट निर्दलीय चुनाव लड़े मुस्लिम प्रत्याशियों के हिस्से आए जबकि भाजपा के निर्दलीयों को मिले 551 वोट। वहीं कांग्रेस को 67,646 और भाजपा को 76,237 वोट मिले जिससे भाजपा की 8,591 के अंतर से जीत गई।

कहने वाले कह रहे हैं कि जीत तो जीत होती है फिर चाहे वह एक वोट से ही क्यों न हो। दिल बहलाने को गालिब ये ख्याल अच्छा है लेकिन जिस राजनीतिक दल की सत्ता केंद्र से लेकर नगर सरकार तक रही हो, उसके लिए नगरीय निकाय चुनाव में मिली जीत का आंकड़ा संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। यह आंकड़ा उस हालात में तो कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता जब कांग्रेस के प्रतिकूल माहौल होने के बाद भी उसके प्रत्याशी को पूरी सरकार और संगठन को सड़क पर उतरना पड़ा हो।

अब यदि विधानसभा की दृष्टि से वोटों का आंकलन करें और यदि वार्ड वार मुस्लिम समुदाय के वोटों को कांग्रेस को अभी मिले वोटों और निर्दलीय के भाजपा को मिले वोटों में जोड़ें तो दोनों दलों के वोटों की संख्या क्रमश: 71,144 और 76,788 हो जाती है। इसमें महज 5644 का ही अंतर बचता है। अगर आगे भी यही ट्रेंड बना रहा और भाजपा नगरीय निकाय चुनाव में कम हुई लीड के कारणों की समीक्षा कर उनका समाधान नहीं करती है तो भाजपा का एकतरफा जीत का सपना विधानसभा चुनाव में ‘सपना’ ही न रह जाए।

यह 23.13 फीसदी बदल सकता था परिणाम

आइये, अब जरा वार्ड में पार्षद प्रत्याशियों को मिले वोटों की भी बात करते चलें। यदि महापौर को मिले वोट व निर्दलीयों को मिले वोटों से तुलना करें तो स्थिति और गंभीर है। सभी भाजपा पार्षद प्रत्याशियों को कुल 69,344 वोट मिले। वहीं कांग्रेस के पार्षद प्रत्याशियों को कुल 51,993 वोट मिले। आंकड़ों से साफ है कि कांग्रेस के विद्रोहियों के वोट महापौर पद पर कांग्रेस प्रत्याशी को ही मिले जिसका अंतर 15 हजार 653 (महापौर प्रत्याशी के वोट 67646 से कांग्रेस पार्षद प्रत्याशी के वोट 51993 घटाने पर) होता है। अर्थात कांग्रेस के टिकट वितरण से नाराज पार्षद कुल 23.14 % वोटों की ताकत रखते थे। यदि कांग्रेस ने पार्षद प्रत्याशियों का चयन सही किया होता तो कांग्रेस के प्रचार और वोट की ताकत में 23.13 फीसदी का इजाफा और हो गया होता। तब परिणाम कुछ भी हो सकता था।

कितने दिन रहेगा पार्टी के अनुशासन के चाबुक का असर

इसी प्रकार भाजपा के सभी पार्षद प्रत्याशियों की बात करें तो उन्हें कुल 69,344 वोट मिले। जो माहपौर प्रत्याशी को मिले वोट 76,237 से 6893 कम हैं। प्रतिशत में 9.04 होता है। यह नुकसान कम नहीं है। अगर भाजपा आगामी दिनों में यह आक्रोश थाम ले तो विधानसभा चुनाव में ये 9.04 फीसदी वोट भी भाजपा के हिस्से आ सकते हैं। कांग्रेस की ही तरह टिकट वितरण का आक्रोश भाजपा में कम नहीं था लेकिन संगठन द्वारा चलाए अनुशासन के चाबुक और भविष्य की चिंता के कारण अधिकतर समय रहते काबू कर लिए गए। अगर भाजपा के इन नाराज वार्ड प्रत्याशियों ने अपने गुस्से को भुनाते हुए गलती से भी महापौर प्रत्याशी के रूप में कांग्रेस के मयंक जाट का नाम चला दिया होता या मेहनत हो गई होती तो भी परिणाम कुछ और हो सकते थे।

खोने के लिए कुछ नहीं, पाने के लिए कुछ भी संभव है

भाजपा के पास अपने असंतुष्टों को साधने का पहला अवसर नगर सरकार की शपथ के बाद एमआईसी गठन का ही आएगा। यदि पार्टी अपनी विचारधारा के अनुरूप जीते पार्षदों को एमआईसी में लेती है और एल्डरमैन जैसे पदों से नवाजती है तो भविष्य को देखते हुए कुछ पॉजिटिव हो सकता है। भाजपा भले ही ऐसा न करे लेकिन कांग्रेस उन्हें आकर्षित करने का प्रयास तो करेगी ही। वैसे भी जो असंतुष्ट चुनाव जीते हैं उन्हें पहले ही भाजपा बाहर कर चुकी है जिससे अब उसके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है।

...तो विधायक काश्यप की होगी अग्नि परीक्षा

एक बात और गौर करने वाली यह है कि पार्षद पद के जिन दावेदारों को इस चुनाव में टिकट नहीं मिला अथवा जिन्हें पार्टी से बाहर होने के दबाव में नाम वापस लेना पड़ा, उनका व्यवहार विधानसभा में कितना सहयोगात्मक रहेगा, यह कह नहीं सकते। इसमें कोई दो राय नहीं कि विधानसभा चुनाव में शहर विधायक काश्यप चेतन्य काश्यप की व्यक्तिगत इमेज ही ज्यादा महत्वपूर्ण रहेगी परन्तु यह भी सही है कि दो कार्यकाल के बाद की एंटी इन्कम्बेंसी और भाजपा के 50 वर्ष से पुराने कार्यकर्ताओं के ठंडे रुख को नजरअंदाज करना नादानी ही साबित होगी। निकाय चुनाव में कार्यकर्ताओं के विरोध की आग प्रदर्शन के रूप में विसाजी मेंशन तक पहुंच ही चुकी है। पिछले चुनाव के पूर्व तक कभी भी ऐसी कोई स्थिति नहीं थी। यानी काश्यप के लिए कार्यकर्ताओं को साधना किसी ‘अग्नि परीक्षा’ से कम नहीं होगा। वैसे ताकत तो इस चुनाव में भी विधायक काश्यप सहित पूरी भाजपा लगा चुकी है जिसका परिणाम सबके सामने है।

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डिस्क्लेमर

इस विश्लेषण में आंकड़ों का पूरी तरह ध्यान रखा गया है फिर बी मानवीय त्रुटि किसी से भी संभाव्य है। यदि किसी को ऐसी कोई त्रुटि नजर आए तो वाट्सएप नंबर 9826809338 पर अवश्य अवगत कराएं। आपका सहयोग ही एसीएन टाइम्स परिवार का संबल है।

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Sun, 24 Jul 2022 20:00:15 +0530 Niraj Kumar Shukla
मैं दीनदयालनगर हूं... : समस्याओं से मेरा गहरा नाता है, उपेक्षा ही मेरी पहचान है https://acntimes.com/i-am-deendayalnagar-have-a-deep-connection-with-problems-neglect-is-my-identity https://acntimes.com/i-am-deendayalnagar-have-a-deep-connection-with-problems-neglect-is-my-identity नीरज कुमार शुक्ला

कभी प्रदेश के सबसे साक्षर शहर का तमगा हासिल करने वाले रतलाम शहर की पहली सबसे बड़ी कॉलोनी होने का सम्मान मेरे ही नाम है। मेरे लिए ही करीब चार दशक पूर्व मप्र हाउसिंग बोर्ड को विश्व बैंक ने उधार दिया था। मेरी पहचान जनसंघ और भाजपा के पितृपुरुष स्व. पं. दीनदयाल उपाध्याय के नाम से है। जी, हां ! मैं दीनदायलनगर हूं।

मैं सिर्फ एक कॉलोनी भर नहीं हूं, बल्कि यहां रहने वालों की सुख-सुविधाओं और मूलभूत जरूरतों से जुड़ी उम्मीद हूं। आप सभी सोच रहे होंगे कि- क्या मेरी पहचान बस इतनी सी ही है ? नहीं, जनाब ! मेरी पहचान समस्याओं और उपेक्षाओं से भी है। समस्याओं से मेरा गहरा नाता है और उपेक्षा ही मेरी प्रमुख पहचान है।

एक वक्त था (मेरी स्थापना का) शहर में सबसे चौड़ी सड़क मेरी ही थी। सड़क के दोनों तरफ चौड़ी-चौड़ी क्यारियों में पौधे लहलहाते थे और पेड़ झूमते थे। घरों और इन क्यारियों के बीच 8 से 10 फीट जगह भी हुआ करती थी। बगीचों के लिए लगभग सभी स्थानों पर पर्याप्त जगह भी छोड़ी गई थी, कुछ जगह बगीचे संवारे भी गए थे।

पेयजल पाइप लाइन और सीवरेज लाइन व्यवस्थित रूप से सबसे पहले मेरे हिस्से ही आई थी। मुझे यह बताते हुए खुशी होती है कि तब लोग बाहर से आने वाले अपने मेहमानों को मेरे (कॉलोनी) के दर्शन करवाने जरूर लाते थे क्योंकि तब मैं आज के जैसा कुरूप नहीं था। आज सिस्टम के लिए भले ही मप्र हाउसिंग बोर्ड बदनाम है लेकिन तब मेरी स्थापना के लिए उसके इंजीनियरों ने आधारभूत संरचना काफी अच्छे से तैयार की थी।

खुशी कम, ज्यादा गम

कहते हैं कि खुशी ज्यादा दिन नहीं रहती लेकिन मुसीबतें लंबी दूरी तय करती हैं। मेरा अब तक का व्यक्तिगत अनुभव भी यही है। जिन खाशियतों के कारण मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता था, उन्हीं को अपनी आंखों के सामने मरते देख रूह कांप जाती है। ज्यादा कुछ नहीं, सिर्फ मुख्य सड़क ही देख लीजिए कि वह किस हाल में है। सीवरेज लाइन बिछाने वाले ने इसे जैसे चाहा, जितना चाहा वैसे और उतना ही छलनी कर दिया। मेरे वाशिंदे (रहवासी) रोज जूझते रहे। किसी से सुना था कि 60 लाख रुपए में सीमेंट-कांक्रीट की सड़क बनने वाली है। यह भी कहा गया था कि टेंडर भी हो चुका है। इंतजार की इंतहा हो चुकी है लेकिन न तो अभी तक टेंडर नजर आया और न ही सड़क बनी।

हड्डी-पसली एक होने से लेकर प्रभु मिलन तक की व्यवस्था 

जिम्मेदारों को मक्कारी से फुर्सत नहीं मिलती, इसलिए जिसकी जितनी इच्छा हुई, उसने उतनी जमीन पर कब्जा कर लिया। किसी की दुकान सज गई है तो किसी के मकान की बाउंड्रीवाल अपनी हदे लांघ कर सड़क तक आ पहुंची हैं। कब्जा करने के मामले में जब कतिपय जिम्मेदार ही लिहाज न पालें तो भला जनता पर कोई कैसे लगाम कस सकता है। मेरे मुहाने पर (दीनदयालनगर के प्रवेश वाले रोड के नाले पर बनी पुलिया पर) नगर निगम की इंजिनियरिंग का मकबरा भी बना है। कहते हैं यह तभी हट सकता है जब कोई भगवान विश्वकर्मा जी से इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर आए। जब तक ऐसा नहीं होता, सभी को इसके आगे शीश नवाकर ही आगे बढ़ना है, अन्यथा हड्डी-पसली कब एक हो जाए या प्रभु मिलन हो जाए, कह नहीं सकते।

बच्चे-बूढ़ों की सुख-सुविधा जिम्मेदारों की बला से

मुझसे अपने छोटे-छोटे बच्चों की पीड़ा देखी नहीं जा सकती। वे न चाहते हुए भी घरों में कैद रहते हैं और मनोरंजन के नाम पर मोबाइल गेम तक सीमित रहते हैं। उनका शारीरिक विकास न हो, इसका पूरा बंदोबस्त हमारे ही कुछ ‘खास’ लोगों ने कर रखा है। बगीचों के नाम के नाम पर जो जगह बच्चों, बुजुर्गों सहित सभी के लिए छोड़ी गई थी वहां अब निजी मल्कियत हो गई है। बगीचों में पेड़-पौधों और बच्चों के लिए झूले आदि छोड़कर हर चीज है। कहीं मूर्ति विराजमान है तो कहीं कारों का विश्राम स्थल है। रही सही कसर लोगों की कथित आस्था ने धार्मिक स्थल में तब्दील कर पूरी कर दी है। सही भी है, बच्चों को तो एक दिन बड़ा होना ही है, ऐसे में उनके लिए खेलने-कूदने की स्थायी जगह रखने की जरूरत ही क्या है। गलियां हैं उनके खेलने के लिए। रही बात बुजुर्गों की तो उन्हें भी तो एक दिन दुनिया से जाना ही है। इसलिए उनकी सुविधा के लिए भी सोचना बेमानी ही है।

कोई ‘शाह’ महाराष्ट्र की तरह न कर दे ‘ठीकरा’

गंदगी से बजबजाती नालियों की खूबसूरती भला दूसरा क्या जाने। दूसरे इलाकों के लोगों को यहां से गुजरने में अगर बदबू आती है तो यह उनकी बला से। जरूर उनकी सूंघने की शक्ति अच्छी नहीं होगी। हमें और हमारे वाशिंदों को तो अब नालियों से आने वाली बदबू भी मोगरे की खुशबू जैसा अहसास कराती है। जगह-जगह प्लॉट और सड़कों पर जो कुछ भी आपको नजर आता है वह कचरा नहीं है, वह तो मेरे शृंगार की चीजें हैं जो मुझे खूबसूरत बनाए रखने के लिए नगर निगम द्वारा खास तौर पर छोड़ा गया है। सीवरेज लाइन जैसी ही है, हमें उसी हाल में स्वीकार करनी है अन्यथा कोई ‘शाह’ हमें भी महाराष्ट्र की तरह ‘ठीकरे’ में तब्दील कर देगा।

विकास के नाम पर मुझे किया खंड-खंड

बता दूं, कि- पहले मेरा वजूद नगर निगम के एक वार्ड के रूप में था लेकिन विकास के नाम पर अपने हित साधने के लिए लोगों ने मुझे दो हिस्सों में बांट दिया। अब मेरा एक हिस्सा वार्ड क्रमांक 19 तो दूसरा वार्ड क्रमांक 20 कहलाता है। भरोसा दिलाया गया था कि अगर मैं दो खंडों (वार्डों) में विभाजित हो जाऊंगी तो मेरे विकास की गति और तेज होगी, बजट में दोहरा मिलेगा लेकिन कुछ मामलों में यह कोरी कल्पना ही साबित हो रही है। मेरी मुख्य सड़क भी शायद इस लिए ही नहीं बन रही कि दोनों ही हिस्सों में काबिज रहे जनता के नुमाइंदों का अहम् टकरा रहा था। पहले जो जगह थाने के लिए आरक्षित बताई गई थी, वह भी किसी और की हो गई। नतीजनत दीनदयालनगर के नाम से थाना तो है लेकिन उसे कॉलोनी से देशनिकाला दिया जा चुका है।

मुंह दिखाने का संकट, योग्यता व चरित्र पर सवाल, आधी रोटी में दाल लेने की जुगत 

पिछले सात साल से मेरे वाशिंदों की तरह ही मुझे भी उन लोगों का इंतजार था जो मेरी सूरत बदलने का वादा कर के गए थे लेकिन उसके बाद ऐसे मुहं फेरा कि अब मुंह तक दिखाने लायक नहीं रहे। एक बार फिर नगर सरकार चुनने की कवायद शुरू हो गई है। ‘कुर्सी के दीवानों’ ने फिर आसामन सिर पर उठा लिया है। मेरे दोनों ही धड़ों (वार्डों) में राजनीतिक दलों को एक भी योग्य व्यक्ति नजर नहीं आया जिस पर जनता भरोसा कर सके।

चार इंजिन की सरकार वाली पार्टी को मेरे अनारक्षित वार्ड में एक भी अनारक्षित योग्य महिला नहीं मिली। वहीं दूसरी पार्टी ने ऐसे व्यक्ति के घर में टिकट दे दिया जिस पर मकानों की सौदेबाजी में अनियमितता का आरोप है। दूसरे वार्ड में भी कमोबेश यही स्थिति है। यहां भी चार इंजिन की सरकार चलाने वाली फूल ब्रांड पार्टी को एक भी ऐसा योग्य व्यक्ति नहीं मिला जिसके चाल-चलन और नीयित को लेकर आरोप न लग रहे हों। वहीं दूसरी ओर पंजा ब्रांड पार्टी से टिकट पाने वाले के सामने अपनी पहचान का संकट है।

न विजन, न एजेंडा, पहचान का संकट भी

दोनों ही वार्डों में दोनों ही प्रमुख पार्टियों के प्रत्याशियों का वार्ड विकास को लेकर उपलब्धि का खाका खाली है। अफसोस की बात यह है कि दोनों के ही पास मेरे (कॉलोनी) के विकास को लेकर न तो कोई विजन है और न ही कोई एजेंडा। ऐसे में दोनों ही वार्डों में निर्दलीय आधी रोटी में दाल हथियाने की कोशिश में लगे हैं। इनमें एक पूर्व पार्षद हैं जो टिकट नहीं मिलने से अपनी पार्टी ने नाराज हैं किंतु उनकी राह में उनके अपने लोगों का बड़बोलापन ही मुसीबत बनते दिख रहा है। इसी तरह दूसरे वार्ड की निर्दलीय के सामने भी पहचान का संकट है क्योंकि उन्हें जानने वालों की संख्या बहुत ही कम है।

अब फैसला आपका, क्योंकि जनता ही जनार्दन है

चुनाव है, एक नई उम्मीद फिर जागी है लेकिन जितने भी प्रत्याशी हैं उनकी राजनीतिक एप्रोच, बुद्धि-बल पर संदेह है। मैं तो मतदान कर नहीं सकता लेकिन आप जनता-जनार्दन है और अपना और मेरा अच्छा-बुरा समझते हैं। इसलिए जो भी फैसला लें, सोच-समझ कर ही लें, अन्यथा पूर्व की तरह अगले पांच साल फिर हमारे हिस्से आंसू और समस्या ही आएगी। मतदान जरूर करें, क्योंकि यह आपका संवैधानिक अधिकार है और आपके मतदान नहीं करने से उन्हें मौका मिल सकता है जिन्हें हमारी फिक्र नहीं, सिर्फ ‘अवसर’ की तलाश है। एक बात और ध्यान रखिए, कि जो भी वोट मांगने आ रहा है उससे उसका योगदान, योग्यता, राजनीति और नगर निगम के काम की समझ और उनका एजेंडा व प्राथमिकता के बारे में सवाल जरूर कीजिए।

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Tue, 05 Jul 2022 11:56:02 +0530 Niraj Kumar Shukla
नीर&का&तीर : कहानी एक बरसाती मेंढक के परिपक्व चुनावी मेंढक बनने की https://acntimes.com/neer-ka-teer-the-story-of-a-rainy-frog-to-a-mature-electoral-frog https://acntimes.com/neer-ka-teer-the-story-of-a-rainy-frog-to-a-mature-electoral-frog नीरज कुमार शुक्ला

प्रकृति की एक बिरली रचना है मेंढक ! ऐसा जीव जिसे शायद ही कोई अनोखा व्यक्ति होगा जो इसे अथवा इसके व्यक्तित्व के बारे में न जानता हो। जंतु विज्ञान में इस अभूतपूर्व हस्ती की 5 हजार से अधिक प्रजातियां बताई गई हैं। हालांकि, मैं सिर्फ दो ही प्रजाति के मेंढकों को जानता हूं, 1. बरसाती मेंढक और 2. चुनावी मेंढक। इन दिनों दोनों ही किस्म के मेंढक यत्र-तत्र-सर्वत्र देखे जा सकते हैं। एक मेंढक तो हमारे घर तलक भी आ पहुंचा। चुनावी दौर में यह कोई नई बात नहीं है लेकिन जो कुछ हमारे साथ घटित हुआ वह जरूर खास है।

किस्सा यूं है, कि- कुछ वर्ष पहले एक रात हम वर्क-टू-होम कर रहे थे। समय रात के 12.45 बजे का रहा होगा। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। हमनें आसपास नजरें घुमाईं तो पाया कि साहबजादे और हमारी जिंदगी की मल्लिका सो रही हैं। हम भी ठहरे बड़े वाले आलसी, इसलिए जहां थे वहीं बैठे रहे। अगले ही पल दूसरी दस्तक हुई। इस बार दस्तक का प्रयास थोड़ा प्रभावी था। मजबूरन हमें ही उठकर दरवाजा खोलना पड़ा परंतु बाहर कोई नजर नहीं आया। चारों तरफ नजर दौड़ाना व्यर्थ ही रहा। हवा तेज थी सो दस्तक को भ्रम मान कर दरवाजा बंद करने लगा।

दरवाजा बंद होता उससे पहले ही एक एक भर्राई सी आवाज कानों में पड़ी- 'महोदय, ऊपर नहीं, यहां नीचे देखिए। मैं यहां हूं, आपके कदमों के पास।'

नीचे देखा तो एक लहू-लुहान मेंढक वहां बैठा था और हमारी ओर याचक की तरह देख रहा था। हाल-बेहाल देख उसे अपने हाथों में उठा लिया और दरवाजा बंद कर लिए। फटाफट एक कटोरी में पानी गर्म किया और रुई का फाहा लेकर उसके जख्मों को साफ करने लगे। अभी फाही उसके घावों पर स्पर्श ही हुआ था कि उसकी चीख निकल गई। सर, काफी दर्द था चीख में। स्नेह रूपी मरहम लगते ही उसके मेंढक के चेहरे पर राहत व सुकून के भाव नजर आने लगे।

जब लगा कि मेंढक बात कर पाने की स्थिति में है तो उसकी इस दशा का हाल पूछ लिया। पहले तो वह चुप रहा लेकिन जब उसे यह अहसास हो गया कि अब वह सुरक्षित हाथों में है तो आपबीती सुना डाली।

मेंढक दबी आवाज में बोला- 'हमारे क्षेत्र के एक सफेदपोश ने चुनाव लड़ने के लिए नामांकन दाखिल किया है। निर्वाचन विभाग से उसे चुनाव चिह्न मेंढक दिया गया है।

'तो इसमें बुराई क्या है ? चुनाव चिह्न के रूप में मेंढक की तस्वीर छपेगी। इससे तो मेंढक जाति का मान-सम्मान बढ़ेगा।' हमने कहा।

हमारी बात उसे रास नहीं आई। हमारी बात काटते हुए मेंढक ने कहा- 'नहीं श्रीमान्, यह खुशी की बात नहीं बल्कि मुसीबत का सबब है। दरअसल, उक्त सफेदपोश के चुनाव चिह्न वाले मेंढक की शक्ल मुझसे मिलती है। मेरी इस दुर्दशा का कारण यही है।'
सो कैसे ?’ हमने पूछा।

मेंढक बोला- 'आप तो जानते ही हैं कि मेंढक जाति किसी का अच्छा होत नहीं देख सकती। जरा सी भी शोहरत या उपलब्धि मिल जाए या मिलने के आसार हों तो उसकी टांग खींचना शुरू कर देते हैं। हमारी बिरादरी के सारे मेंढकों ने भी इस परंपरा को काबिज रखते हुए हुए मेरी टांग खींचनी शुरू कर दी है। उन्हें लगता है कि चुनाव चिह्न वाले मेंढक हम ही हैं। सभी को बहुत समझाया लेकिन वे समझने को तैयार ही नहीं हैं। हम जैसे-तैसे बचते-बचाते आपकी शरण में आया हूं। इस उम्मीद से कि आप मदद अवश्य करेंगे। आप तो पत्रकार हैं, लेखक हैं, आपके पास तो हर मर्ज की दवा होती है।

खैर, मेरी छोड़िए, अपनी बताइए, आप इतनी रात तक क्यों जाग रहे हैं ?' (मेंढक ने सवाल दागा)

हम तो रोज ही देर रात तक जागते हैं। अभी चुनावी माहौल है तो सोचा इसी पर कुछ लिखूं। एक आर्टिकल लिख रहा हूं। शीर्षक है- बरसाती मेंढक बनाम चुनावी मेंढक

हम आगे कुछ और कह पाते उससे पहले ही वह जोर से चिल्लाया, मानों किसी ने उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया हो। बोला- 'मैं तो आपको नेकदिल इनसान समझ रहा था लेकिन आप तो हम बेगुनाह मेंढकों की तुलना चुनावी मेंढकों से कर रहे हैं। हम मेंढक बेशक दूसरे मेंढक की उपलब्धि पर उसकी टांग खींचें पर एक-दूसरे पर कीचड़ नहीं उछालते। हम अपने निजी स्वर्थ के लिए अपना ईमान गिरवी नहीं रखता और न ही भाई-भाई को लड़वाते ही हैं। धर्म-संप्रदाय के नाम पर दंगे-फसाद करवाने की कला से हम कोसों दूर हैं।

हम मेंढक तो हर साल बारिश में और कभी-कभी शुष्क मौसम में भी नजर आ जाते हैं लेकिन चुनावी मेंढक चुनाव के चुनाव ही प्रकट होते हैं। चुनाव जीतने या हारने के बाद पांच साल में यदि ये किसी को दर्शन दे दे तो वह परम् सौभाग्यशाली है। झूठे वादे करने के मामले में तो इनका कोई सानी ही नहीं है। रंग बदलने के मामले में गिरगिट भी इनसे पीछे है। दलों के दलदल में अठखेलियां करना इनका मुख्य शगल है। अब आप ही बताइये, क्या हम जैसे बरसाती मेंढकों से चुनावी की तुलना करना किसी भी दृष्ट से न्यायसंगत है?

श्रीमान्, हम पर इतनी बड़ी तोहमत मत लगाइए। वरना हमें आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ेगा। हम पहले ही परेशान हैं अपने अस्तित्व को बचाने के लिए।' इतना कह कर वह रुक गया। लगा उसकी बात पूरी हो गई।

मैं कुछ कहता- उससे पहले ही उसने गहरी सांस ली और फिर शुरू हो गया, बोला- 'जिसे देखो हमारे कंधे पर बंदूक रखकर निशाना लगाना चाहता है। आप जैसे लेखक और पत्रकार हमारे व्यक्तित्व पर लेख लिखकर ख्याति आर्जित करना चाहते हैं। मेडिकल के छात्र डॉक्टर बनने के लिए प्रयोगशाला में हमारे खंड-खंड कर देते हैं। हम यह सोचकर प्रतिकार नहीं करते कि चलो हमारा मरना किसी के तो काम आ रहा है। यह कोई नहीं जानता कि मरने के बाद हमारी आत्मा भटकती रहती है हमें खंड-खंड करने वाले डॉक्टर, मास्टर, लेखक-पत्रकार हमें झूठी श्रद्धांजलि देना भी उचित नहीं समझते। आपको लिखना ही है तो हमारी प्रजाति के त्याग-बलिदान और बचाने के लिए लिखिए। हमारी प्रजाति आपको दुआएं देगी।' इतना कहकर मेंढक ऐसे चुप हो गया जैसे किसी ने उसकी आवाज छीन ली हो।

वाकई, दम था उसकी बेबाक बयानी में। इसका असर यह हुआ कि हमारी कलम ने आगे कुछ भी लिखने से इनकार कर दिया। इसलिए लिखने का विचार त्यागकर मेंढकराज को ससम्मान विदा किया और सो गया।

अगली सुबह दरवाजे पर फिर रात जैसी जानी-पहचानी दस्तक हुई। शायद दूध वाला होगा, यह सोचकर दरवाजा खोला तो चौंक गया। चंद घंटे पहले जो बरसाती मेंढक चुनावी मेंढकों को कोस रहा था वही सफेद झक कुर्ते-पजामे में खादी की टोपी लगाए हाथ जोड़े सामने खड़ा था। चेहरे पर कुटिल मुस्कान कुछ और ही बयां कर रही थी।

उसने हमें कुछ भी पूछने का मौका नहीं दिया और बोला- 'श्रीमान, आप हमारी वेश-भूषा देखकर चौंकिए मत। अब मैं भी चुनावी मेंढक बन गया हूं और अपने अपने इलाके से चुनाव लड़ रहा हूं।

उसकी बात सुनकर हम हैरान थे। सवाल भरी निगाहों से उसकी तरफ ही देखे जा रहे थे। उसने हमारे मन के भाव पढ़ लिए थे। उसने कहा- 'रात को आपके पास से घर पहुंचा तो पता चला कि चुनाव लड़ने वाले सफेदपोश चुनावी मेंढक ने अपने प्रचार के लिए एडवांस में ही पोस्टर छपवा लिए। उसने नामांकन दाखिल कर चुनाव चिह्न मेंढक मांगा है और उसे उम्मीद है कि उसे यह मिल भी जाएगा। अब हुआ यूं कि प्रिंटिंग प्रेस की त्रुटि के कारण चुनाव चिह्न (मेंढक) की जगह प्रत्याशी का और प्रत्याशी की जगह चुनाव चिह्न छप गया। मैंने सोचा क्यों न इसका फायदा उठाया जाए। इसलिए सारे पोस्टर रद्दी के भाव खरीद लिए। नामांकन भी दाखिल कर दिया है और चुनाव चिह्न वही चुनावीं मेंढक मांगा है। अब चुनाव चिह्न मिला तो ठीक और नहीं मिला तो कम से मैं प्रचारित तो हो ही जाऊंगा।'

'मेरे इस कदम से पूरी मेंढक प्रजाति खुश है। जैसा समर्थन मिल रहा है, उससे मुझे अपनी जीत पर गले-गले तक विश्वास है। जीतने के बाद आपको अपना पी.ए. बनाऊंगा। इसलिए आप मुझे वोट देना न भूलें। इतना कह कर वह अगले घर की ओर बढ़ चला।'

राजयोग देखिए, दो दिन बाद ही चुनाव चिह्न का आवंटन हुआ और उसे वही चुनाव चिह्न मिल गया जो उसने चाहा था। चुनाव भी जीत गया। एक बार फिर चुनाव आ चुके हैं लेकिन चुनावी मेंढक बने मेंढक का औरों की तरह मुझे भी उसका और उसके वादे के पूरा होने का इंतजार है। शयद, वह भी परिपक्व चुनावी मेंढक बन चुका है। 

डिस्क्लेमर

यह इस चुनावी दौर में स्वस्थ मनोरंजन के लिए लिखा गया एक काल्पनिक व्यंग्य है। इसमें उल्लेखित प्रक्रिया को चुनाव की वास्तविक प्रक्रिया से जोड़ कर नहीं देखें। यह प्रयास आपको कैसा लगा, इस बारे में वाट्सएप नंबर +91 9826809338 अथवा ई-मेल आईडी neeruababa@gmail.com पर प्रतिक्रिया दे सकते हैं।

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Sat, 02 Jul 2022 20:42:26 +0530 Niraj Kumar Shukla
नीर&का&तीर : कांग्रेस का टिकट तय होते ही कई भाजपाइयों ने शहर विधायक व संगठन से काटी कन्नी तो एक वरिष्ठ नेता ने अपना दायरा सीमित कर दिया झटका https://acntimes.com/neer-ka-teer-as-soon-as-the-congress-ticket-was-decided-many-bjp-members-cut-the-city-mla-and-organization https://acntimes.com/neer-ka-teer-as-soon-as-the-congress-ticket-was-decided-many-bjp-members-cut-the-city-mla-and-organization नीरज कुमार शुक्ला

एसीएन टाइम्स @ रतलाम । भाजपा के महापौर पद के प्रत्याशी प्रहलाद पटेल के नाम का बी-फॉर्म जारी हो चुका है। उन्हीं के एक अन्य नामाराशी ने नाम भी वापस ले लिया है लेकिन बगावत का शंखनाद कर चुके नेता अभी भी नगर सरकार में भाजपा की वापसी के लिए चुनौती बनकर खड़े हैं। पार्टी ने ऐसे नेताओं को अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी है। ऐसे में पार्टी के कतिपय वरिष्ठ नेताओं का कन्नी काटते नजर आना टिकट निर्धारण में अहम् भूमिका निभाने वाले शहर विधायक चेतन्य काश्यप और संगठन की साख प्रभावित कर सकती है।

भाजपा महापौर प्रत्याशी के लिए नाम लगभग तय हो चुका था। माना जा रहा था कि रतलाम से पूर्व एमआई सदस्य अशोक पोरवाल अधिकृत उम्मीदवार हो सकते हैं। अगर वे नहीं भी हुए तो मैरिज गार्डन संचालक प्रवीण सोनी को मौका मिल सकता है। इसके विपरीत आखरी समय में घटनाक्रम तेजी से परिवर्तन हुआ और नाम भी बदल गया। नाम बदलने में सबसे बड़ी भूमिका ही शहर विधायक चेतन्य काश्यप की रही जिसने ना केवल भाजपा के पूरे समीकरणों को उलट-पलट कर दिया बल्कि पार्टी में उनकी सर्वोच्चता भी साबित कर दी। इस समय तक पार्टी के कुछ अन्य अवसरवादी बड़े नेता भी चुंबक की तरह चिपके रहे। इनमें से एक नेता वे भी हैं जिनकी आस्था को लेकर पार्टी कार्यकर्ता हमेशा ही आशंकित रहते हैं। दरअसल पल-पल आस्थाएं बदलना और एक समय में एक से अधिक नावों में सवार रहना उनका नैसर्गिक गुण है। 

कांग्रेस प्रत्याशी घोषित होते ही आस्था रूपी नाव में हो गया सूराख

पूर्व निगम अध्यक्ष पोरवाल का टिकट फाइनल न हो इसमें डगमगाती आस्था वाले नेताओं का भी योगदान कम नहीं रहा। इसके लिए वे दिन-रात विधायक काश्यप के निवास पर नजर आए। उनकी आस्था रूपी नाव में सूराख तो तब नजर आया जब कांग्रेस प्रत्याशी का नाम घोषित हो गया। नाम तय होते ही कतिपय भाजपा नेता रणछोड़ साबित हुए। यह विधायक काश्यप के लिए संभवतः पहला झटका था। दूसरा छटका तब लगा जब वरिष्ठ नेता और समाजसेवी की छवि वाले पूर्व एमआईसी सदस्य गोविंद काकानी ने अचानक ही खुद को एक सीमित दायरे में समेट लिया।

भाजपा के महापौर व पार्षदों के टिकट फाइनल होते ही उन्होंने ना केवल भाजपा के सभी वाट्सएप ग्रुप छोड़ दिए बल्कि भाजपा पदाधिकारियों और पत्रकारों तक के काल रिसीव करने बंद कर दिए। कोरोना काल में विधायक काश्यप के साथ कंधे से कंधा मिलाकर जान की परवाह किए बिना शासकीय मेडिकल कॉलेज से लेकर जिला अस्पताल तक उल्लेखनीय सेवाएं देने वाले काकानी से यह अपेक्षा ना तो विधायक को थी और ना ही भाजपा को। 

जिसे निर्दलीय रहते हराया वह संगठन में तीसरे नंबर का पदाधिकारी

एसीएन टाइम्स ने जब काकानी के इस रवैये को जानने के लिए उनके मित्रों को टटोलने का प्रयास किया तो उनकी नाराजगी का कारण समझ आया। उनके मित्रों में जो चर्चा है उसके मुताबिक 20 साल से पार्टी के कुछ गिने-चुने नेताओं का संगठन पर कब्जा है। इनमें से कई तो ऐसे हैं जिन्होंने कभी वार्ड तक का चुनाव नहीं जीता। काकानी निर्दलीय रहते हुए जिस व्यक्ति को हराया था वह तीन बार से संगठन में जिले के तीसरे नंबर के पदाधिकारी की जिम्मेदारी निभा रहा है। काकानी के मित्रों का कहना है कि सभी जीते हुए वरिष्ठ पार्षदों को संगठन में जिम्मेदारी देने के बजाय उन्हें पार्टी गाइड लाइन के नाम पर हासिये पर लाकर छोड़ दिया गया।

पार्टी से जुड़े लोग यह कहने में कतई नहीं हिचकिचा रहे हैं कि वर्तमान प्रत्याशी सहित पिछले तीनों ही महापौरों के टिकट सिर्फ पैसों को देखकर दिए गए ना कि योग्यता को देख कर। इस मामले में संगठन में बैठी सभी चौकड़ियों पर जमकर मनमानी करने के आरोप हैं। यही वजह है तीन बार के एमआईसी सदस्य को ना तो किसी टिकट के योग्य समझा गया और ना ही रतलाम विकास प्राधिकरण जैसी संस्था के योग्य। जैसे ही यह बात काकानी को समझ आई कि उनका सिर्फ उपयोग ही हो रहा है तो उन्होंने मौजूदा नगरीय निकाय चुनाव से दूरी बना ली।

22 जून के बाद ही स्पष्ट होगी स्थिति

गौरतलब है कि भाजपा की पिछली परिषद बुरी तरह फेल रही। नतीजतन जनता के बीच रहने वाले वरिष्ठ पार्षद और नेता आगे अपनी संभावनाओं पर धुंध छाई देख कर घर बैठ गए हैं। टिकट नहीं मिलने से नाराज नेताओं ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में भाले गाड़ दिए हैं। वहीं कांग्रेस ने बाजार और पटरी पार के ठीक बीच के व्यक्ति को टिकट देकर  भाजपा की अतिविश्वास वाली नींद उड़ा दी है। पार्टी ने सभी बागियों को नाम वापस लेने के लिए कहा है। ऐसा नहीं करने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी भी दी है। चूंकि 22 जून नाम वापसी की आखिरी तारीख है। इसलिए आगामी दिनों में राजनीति का ऊंट किस करवट बैठता है, यह 22 जून के बाद ही स्पष्ट होगा।

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Tue, 21 Jun 2022 00:55:59 +0530 Niraj Kumar Shukla
नीर&का&तीर : टिकट नहीं मिलने से दावेदारों में उपजे आक्रोश के बीच एक वरिष्ठ ने भाजपा से बनाई दूरी, पार्टी के लिए यह नया झटका तो नहीं ? https://acntimes.com/neer-ka-teer-amidst-the-resentment-arising-among-the-claimants-due-to-not-getting-the-ticket-a-senior-made-distance-from-the-bjp https://acntimes.com/neer-ka-teer-amidst-the-resentment-arising-among-the-claimants-due-to-not-getting-the-ticket-a-senior-made-distance-from-the-bjp रतलाम के राजनीतिक ऊंट ने फिर बदली करवट, यह भाजपा के लिए बन न जाए अशुभ संकेत

नीरज कुमार शुक्ला 

एसीएन टाइम्स @ रतलाम । राजनीति में न स्थायी दोस्ती होती है और नहीं स्थायी दुश्मनी, इसलिए परिस्थिति कब बदल जाए, दावे के साथ नहीं कह सकते। कुछ वर्ष पूर्व रतलाम शहर में भाजपा के राजनीतिक ऊंट ने करवट बदली थी। इसका असर यह हुआ कि कि शहर की राजनीतिक शक्ति का केंद्र पैलेस रोड से उठकर स्टेशन रोड जा पहुंचा था। वही राजनीतिक ऊंट एक बार फिर करवट बदल रहा है। टिकट वितरण के बाद से उपजा आक्रोश महापौर प्रत्याशी प्रहलाद पटेल और बाकी पार्षद प्रत्याशियों की राह में तो रोड़ा बनने के आसार हैं ही, ऐसे विषम हालात में संघर्ष के दौर के साथियों द्वारा अपना दायरा सीमित कर लेना शहर विधायक चेतन्य काश्यप और भाजपा के लिए नई मुसीबतों को जन्म दे सकता है। 

टिकट नहीं मिलने से दोपहर में पूर्व एमआईसी सदस्य सीमा टांक सहित तमाम दावेदारों ने शुक्रवार दोपहर विधायक चेतन्य काश्यप के निवास पर हल्ला बोल दिया। शहर से बाहर होने से वे वहां नहीं मिले। ऐसे में नाराज कार्यकर्ताओं ने उनके स्टाफ को ही खरी-खोटी सुना दी। अभी इस घटनाक्रम चर्चा में ही था कि विधायक के संघर्ष में सहभागी रहे मीसाबंदी परिवार के सदस्य व सामाजिक कार्यकर्ता गोविन्द काकानी भाजपा से जुड़ सभी वाट्सएप ग्रुप से लेफ्ट हो गए।

चर्चा है कि जिम्मेदारों से मिली उपेक्षा के चलते वे भी नाराज हैं। इनकी सत्यता जांचने के लिए हमने भी उन्हें कॉल किया लेकिन उनका मोबाइल नो रिप्लाई मिला। अन्य स्रोतों से भी पुष्टि नहीं हो सकी। हमारी जानकारी के अनुसार उन्होंने इस बार कोई टिकट नहीं मांगा था। फिर उनकी नाराजी किस बात को लेकर है, यह जानने की जिज्ञासा है। प्रथमदृष्टया जो बात समझ आ रही है उसके अनुसार इसकी वजह शायद तीन बार एमआईसी में रहने के बाद भी उन्हें न तो चुनाव संबंधी कोई जिम्मेदारी मिली और न ही संगठन में। संभवतः यह कारण उनकी नाराजी का हो सकता है। खैर, वक्त आने पर यह भी स्पष्ट हो जाएगा।

जिम्मेदारों का अहम् और अदूरदर्शिता बड़ी वजह

आज के हालात पर बात करें तो नगरीय निकाय चुनाव के लिए महापौर और पार्षद के टिकट तय करने के लिए भाजपा को इस बार कुछ ज्यादा ही मशक्कत करना पड़ी। पार्टी से जुड़े सूत्र बता रहे हैं कि इसके मूल में संगठन में स्थानीय स्तर के जिम्मेदारों की अदूरदर्शिता और अहम् है। ये दोनों ही बातें टिकट वितरण के बाद ज्यादा स्पष्ट भी हो गईं। अगर ये दोनों ही कारण आड़े नहीं आते तो पार्टी के भीतर दौड़ रहा विरोध रूपी अंडर करंट जन्म ही नहीं लेता। 

आइये, इसे ऐसे समझते हैं... 

इतिहास के झरोखे में झांके तो हम पाएंगे कि मौजूदा विधायक चेतन्य काश्यप के पहले चुनाव के दौरान ज्यादातर बड़े नेता अनजान भय से ग्रस्त और किंकर्तव्यमूढ़ होकर घरों में बैठे थे। ऐसे में उनके संघर्ष में सहभागी बनने की हिम्मत कुछ लोग ही जुटा पाए। इनमें अशोक पोरवाल, गोविन्द काकानी, निर्मल कटारिया, अश्विन जायसवाल, रवि जौहरी, मनोहर पोरवाल और अशोक चौटाला (जैन) जैसे कुछ नाम प्रमुख हैं। इनमें से कुछ की आस्थाएं पूर्व के वर्षों में कहीं और थीं। यह उस दौर की बात है जब भाजपा की राजनीतिक शक्ति का केंद्र पैलेस रोड माना जाता था। जैसे ही अस्थाएं बदली और समय ने करवट बदली शक्ति का केंद्र खिसक कर स्टेशन रोड स्थित वीसाजी मेंशन बन गया। आस्थाएं क्यों बदली, शक्ति के केंद्र में परिवर्तन क्यों हुआ, इसके पीछे लंबी कहानी है और उसके लिए कई कारण जिम्मेदार हैं। जनका यहां उल्लेख करना बोझिल हो जाएगा। 

यह इतिहास का दोहराव तो नहीं ? 

किसी की शक्ति भी कभी स्थायी नहीं रहती, वह समय के अनुसार अपने ठिकाने बदलती है। यह शक्ति की प्रकृति है इसलिए यह एक बार फिर किसी अन्य दिशा की ओर रुख करने का संकेत दे रही है। राजनीति के पंडित इसके लिए जिन कारणों को जिम्मेदार मान रहे हैं उनमें पूर्व नगर निगम अध्यक्ष अशोक पोरवाल का महापौर का टिकट कटना, रवि जौहरी और अश्विन जायसवाल के पार्षद के टिकट कटना प्रमुख हैं।

कारणों की इस फेहरिश्त में विधायक की अशोक चौटाला से दूरी बढ़ना, और पूर्व एमआईसी सदस्य गोविन्द काकानी जैसे अऩुभवियों को संगठन में स्थान नहीं दिला पाना और रतलाम विकास प्राधिकरण जैसी संस्था के अध्यक्ष का पद अब तक खाली पड़ा रहना भी शामिल है। ये वजहें इन सभी की नाराजी बढ़ाने के लिए काफी हैं। कहीं यह इतिहास का दोहराव तो नहीं ? वैसे काश्यप से रूठने से यदि कोई बचा है तो वे हैं निर्मल कटारिया और मनोहर पोरवाल जिनकी अपनी ही मजबूरिया हैं। 

परिवार विशेष के यहां गिरवी आस्थाएं भी नहीं रहीं साथ 

कहा जा रहा है कि महापौर प्रत्याशी का टिकट और पार्षद के टिकट वितरण से असंतुष्ट हुए नेता न सिर्फ विधायक काश्यप के लिए मुसीबतें खड़ी कर सकते हैं, अपितु इस नगरीय निकाय के साथ ही 2024 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की राह में रोड़ा बन सकते हैं। एक तरफ जमीनी पकड़ वाले सेवाभावी और हिंदुत्व के प्रति समर्पित नेताओं और परिवार अपनी उपेक्षा के चलते खुद का दायरा सीमित करते जा रहे हैं वहीं दूसरी तरफ शहर के कतिपय बड़े नेताओं ने अपनी आस्थाएं अन्यत्र केंद्रित होती दिख रही हैं। अगर यह कहें कि कुछ ने तो अपनी आस्था एक परिवार विशेष के यहां गिरवी ही रख दी है तो यह गलत नहीं होगा।

...तस्वीर तो धुंधली है लेकिन धुंध नहीं छटी तो नुकसान होना तय

इन सब बातों का असर स्टेशन रोड स्थित शक्ति के केंद्र पर ही पड़ना है। वैसे भी पहले जहां फूल वाली कांग्रेस हुआ करती थी वहीं अब पंजे वाली भाजपा हो गई है। शुक्रवार को कांग्रेस द्वारा हर दृष्टि से प्रभावशाली व्यक्ति मयंक जाट को महापौर प्रत्याशी बनाने का संकेत देने से आने वाले दिनों की राजनीति की तस्वीर का खाका खिंच गया है। बेशक यह तस्वीर अभी कुछ धुंधली है लेकिन अगर अब भी जिम्मेदारों की अहम् और अदूरदर्शिता रूपी धुंध नहीं छंटी तो बड़ा खामियाजा भाजपा को ही भुगतना पड़ेगा।

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Fri, 17 Jun 2022 23:54:20 +0530 Niraj Kumar Shukla
नीर_का_तीर : आपको पीने के लिए पानी नहीं मिल रहा है तो यह आपकी बला से, हमें अभी सड़कें व डिवाइडर धोना हैं, क्योंकि हमारे अफसर इसी से खुश होते हैं https://acntimes.com/neer-ka-teer-ratlam-municipal-corporation-is-wasting-water-flowing-water-to-wash-roads-and-dividers https://acntimes.com/neer-ka-teer-ratlam-municipal-corporation-is-wasting-water-flowing-water-to-wash-roads-and-dividers नीरज कुमार शुक्ला

‘मालव माटी गहन गंभीर, पग-पग रोटी डग-डग नीर...’ यह कहावत हम सभी ने एक-दो बार नहीं बल्कि अनेकों बार सुनी है। हमें यह भले ही याद न हो लेकिन हमारे (रतलाम के) जिम्मेदारों और नगर सरकार के कारिंदों को शायद यह शब्दशः याद है और उन्होंने इसे समझ भी ज्यादा लिया है। यही वजह है कि वे सड़कों पर पानी बहाकर मालवा के इस शहर में ‘डग-डग नीर’ वाली बात चरितार्थ करने का कोई अवसर नहीं चूकते। अगर मेरी बात पर यकीन न हो रहा हो तो इस आलेख के साथ अटैच वीडियो देख लीजिए। आपको ‘अंधेर नगरी’ का उदाहरण देखने कहीं और नहीं जाना पड़ेगा।

महात्मा गांधी के स्वच्छता के संदेश को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से अपनाने का आह्वान किया। नतीजतन पूरे देश में स्वच्छता में ऊंची रैंक लाने की होड़ मची है। कई कस्बों और शहरों में जहां यह जनआंदोलन का रूप ले चुका है, वहीं हमारे शहर में यह 'प्रयोगों' और 'बर्बादी' का जरिया बनता नजर आ रहा है। मजह 135 किमी की दूरी पर स्थित इंदौर शहर स्वच्छता के नाम पर 6 साल से अव्वल है वहीं रतलाम अभी तक स्वच्छता के पथ पर ठीक से रेंगना भी नहीं सीख पाया है। इसलिए (अ)व्यवस्था में लगा अमला थोड़े को ज्यादा दिखाकर अफसरों को खुश करने की जुगत भिड़ाने में लगा रहता है।

स्वच्छा की कसौटी में हमारे जिम्मेदारों के दावे कितने खरे हैं यह जानना हो तो शहर के आंतरिक हिस्सों और कॉलोनियों में झांक लीजिए। लोग लगभग रोज नगर निगम के स्वच्छता अमले को कम, अपनी किस्मत को ज्यादा कोस रहे हैं। बावजूद जनप्रतिनिधि और अफसर अपनी झांकी जमाने में लगे हैं। इसी झांकीबाजी के फेर में गाहे-ब-गाहे नगर निगम के अफसरों और जिम्मेदारों को खरी-खोटी भी सुनी पड़ जाती है। इससे बचने के लिए अमले ने 'कम करो या न करो लेकिन काम की फिक्र जोर-शोर से करो और उसका जिक्र तो उससे भी ज्यादा ताकत से करो' की नीति पर अमल करना शुरू कर दिया है। इसके लिए सोशल मीडिया पर 'स्वच्छता की फिक्र का जिक्र' करते हुए फोटो और वीडियो तेजी से साझा किए जा रहे हैं। इसमें स्वच्छता के नाम पर हो रही पानी की बर्बादी के वीडियो भी शामिल हैं।

पानी की बर्बादी... तारीख - 8 जून, 2022, समय - रात 01.00 बजे, स्थान - अलकापुरी, सैलाना रोड।

पानी की बर्बादी... तारीख - 9 जून, 2022, समय - रात 12.57 बजे, स्थान - अलकापुरी, सैलाना रोड।

पानी की बर्बादी... तारीख - 9 जून, 2022, समय - रात 12.59 बजे, स्थान - अलकापुरी, सैलाना रोड।

शहर के आंतरिक इलाके साफ दिखें या न दिखें, फोरलेन और डिवाइडर जरूर चमकने चाहिए, इस पर हमारी नगर सरकार का फोकस ज्यादा नजर आ रहा है। जिस फायर लॉरी और पानी को आपात स्थिति में आग पर काबू पाने के लिए सुरक्षित रखा जाना चाहिए, उससे डिवाइडर व सड़क धोने के लिए पानी उलीचना (बहाना) तो यही दर्शाता है। शहर के कई इलाकों के लोग पानी के लिए तरस रहे हैं फिर भी रोज रात में हजारों लीटर पानी व्यर्थ बह रहा है। फायर लॉरी से पानी बहाने में लगे अमले के लिए यह किसी रोमांचकारी मनोरंजन से कम नहीं है। पानी बहाते समय जिस तरह से उसके पाइप और जेट से कलाबाजी का प्रदर्शन किया जाता है, वह देखते ही बनता है।

पानी की बर्बादी... तारीख - 9 जून, 2022, समय - रात 01.08 बजे, स्थान - दोबत्ती चौराहा (ज्योति होटल के सामने)।

करीब दो पखवाड़े पूर्व यह नजारा हमने भी देखा तो पत्रकारिता का कीड़े ने काट लिया। वीडियो जिले के तत्कालीन आला अफसर को साझा कर ऐसी बर्बादी को रोकने का आग्रह कर डाला। कुछ दिन तक तो पानी की बर्बादी के ऐसे नजारे देखने को नहीं मिले लेकिन व्यवस्था में बदलाव होते ही फिर वही 'ढाक के तीन पात' हो गए। अब हम जिम्मेदारों से तो कोई अपेक्षा करने से रहे लेकिन आपसे इतना जरूर कह सकते हैं कि- 'आपको पीने का पानी नहीं मिल रहा है तो यह आपकी बला से, हमें अभी सड़क और डिवाइडर धोने से मत रोकिए, क्योंकि हमारे अफसर तो इसी से खुश होते हैं।'

पानी की बर्बादी... तारीख - 9 जून, 2022, समय - रात 12.39 बजे, स्थान - शहीद चौक।

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Wed, 08 Jun 2022 06:02:12 +0530 Niraj Kumar Shukla
Neer&ka&Teer : 'रसूख' की प्रॉपर्टी पर आई 'आंच' तो शुरू हो गई लामबंदी, जिम्मेदार भी कहने लगे& अवैध को (अ)वैध होने दो, ये सब तो 'दूध के धुलें हैं', इनका कोई नुकसान न हो https://acntimes.com/neer-ka-teer-aanch-came-on-the-property-of-rasukh https://acntimes.com/neer-ka-teer-aanch-came-on-the-property-of-rasukh

नीरज कुमार शुक्ला @ एसीएन टाइम्स

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि- 'न बुरा देखो', 'न बुरा सुनो' और 'न बुरा कहो'। उनकी सीख पर हम आंखें मूंद कर अमल कर रहे हैं। अगर किसी की आंख खुल जाए या खोलने की हिमाकत कर भी ले तो सारे काम छोड़कर उन्हें बंद कराने की कवायद शुरू कर देते हैं। उद्देश्य सिर्फ इतना ही है कि- 'जैसे दूसरे आंखें बंद किए रहे, वैसे ही आप भी बंद कर लो। जैसा बुरा (गलत) पहले होता रहा है, वैसा ही अब भी होते रहने दो। एक दिन यही 'बुरा' स्वतः ही 'अच्छा' हो जाएगा।' हम रतलामवासी इसके आदी हैं। इसलिए जैसे ही कहीं भी, कुछ भी बुरा होता है तो उनकी आंखें खुद-ब-खुद मुंद जाती हैं। यह सबक हमने जन्म घुट्टी के रूप में पी रखा है। (Neer-ka-Teer)

हमारी आंखें तब तक नहीं खुलतीं जब तक कि हमारा बड़ा नुकसान न हो जाए। ये आंखें हमारे 'चरित्र' के अनुरूप ढल चुकी हैं। हमारा चरित्र 'गलत को गलत' और 'अवैध को अवैध' कहने की इजाजत नहीं देता, इतना साहस भी हममें नहीं है। हमारे लिए तो 'गलत ही सही' है और 'अवैध ही (अ)वैध' है। राशन हो या फिर प्रॉपर्टी, हम सबकुछ हजम कर जाते हैं और डकार भी नहीं लेते। "दाल-बाटी' जैसा गरिष्ठ भोजन पचाने में हम इतने अभ्यस्त हैं कि 'गलत' को भी आसानी से पचा लेते हैं और 'अवैध' को भी।

हमने एक सबक और पढ़ रखा है। यह कई जगह लिखा भी देखा जा सकता है, कि- 'राष्ट्र की हर सार्वजनिक संपत्ति आपकी अपनी है, इसे नुकसान न पहुंचाएं।' इस पर भी हम शब्दशः अमल करते हैं। जहां भी कोई सरकारी या सार्वजनिक संपत्ति नजर आती है तो बगैर देर किए उस पर अपना शामियाना तान देते हैं। यही बाद में हमारा स्थायी आशियाना बन जाता है। जब तक चाहो उपयोग करो और मनभर जाए या नकदीकरण की आवश्यकता महसूस हो तो बेच दो। इसलिए हम न तो खुद इसे नुकसान पहुंचाते हैं और न ही किसी को पहुंचाने देते हैं। अब जो चीज राष्ट्र की है, वह अपनी ही है और अपनी चीज को बेचने में भला क्या हर्ज है?

हम सौदा करते अपने 'जमीर' तक को दांव पर लगा देते हैं, फिर जमीन की क्या बिसात। जमीन, निजी है या सरकारी, इसकी फिक्र नहीं करते। जहां जगह मिली, डेरा डाल दिया। जिन्हें यह देखने की जिम्मेदारी मिली है वे भी 'बुरा नहीं देखने' के सबक पर अमल करते हुए आपनी आंखें मूंद लेते हैं। यह 'अनदेखी' भी 'बेमोल' नहीं होती। इसके लिए उन्हें 'मनचाहा मोल' मिलता है हमें हमारे 'गलत को सही' और 'अवैध को (अ)वैध' ठहराने का अवसर। किसी ने 'विपदा' में अवसर तलाशा तो हमने 'संपदा' में। कोई आंखें 'मूंदने' की वजह से 'लाभान्वित' हुआ तो कोई 'खुली' रखने के कारण। यानी 'सबका साथ - सबका विकास' हुआ।

आप पूछ सकते हैं कि- यह इतनी आसानी से हो कैसे जाता है ? इसका जवाब है- 'रसूख' और 'गांधी जी की तस्वीर' से। आप 'रसूखदार' हैं तो बे-हिचक उसका इस्तेमाल कीजिए और नहीं है तो 'गांधी जी की तस्वीरों' का सहारा लीजिए। वैसे दूसरा वाला उपाय ज्यादा कारगर, भरोसेमंद, और टिकाऊ हो सकता है। कोई इसे भ्रष्टाचार कहे तो कहता रहे, हमारे लिए तो यही 'शिष्टाचार' है।

'शिष्टाचारी' हमेशा सुकून में रहते हैं लेकिन इन दिनों यह 'सुकून' काफूर है। एक 'खुली आंख वाले' ने हमारी 'रातों की नींद' छीन ली है और 'दिन का चैन' भी। अब तक जो लोग 'शिष्टाचार' के लिहाज की चादर ओढ़े बैठे थे उनकी भी आंखें 'खोल दी' गई हैं और वे भी डरा देने वाली 'अंगड़ाई' ले रहे हैं। सुना है किराये पर बुल्डोजर भी मंगवाए गए हैं। 'रसूख की प्रॉपर्टी पर आंच' (Neer-ka-Teer) भी आने लगी है। हम रतलामी हैं, इतनी जल्दी हथियार नहीं डालेंगे। हम लामबंद हो ही गए हैं। सब मिलकर पहले दबाव बनाएंगे, दाल नहीं गली तो 'ऊपर तक' जाएंगे। खुली आंखें 'बंद' नहीं हुईं तो 'बंद आंखों वाला' ले आएंगे। इस तरह हम एक बार फिर 'काजल की कोठरी' में रहकर भी 'दूध में नहाए' हुए 'उजले' हो जाएंगे।

डिस्क्लेमर

उपरोक्त आलेख में प्रस्तुत विषय वस्तु लेखक की कल्पना और निजी विचार हैं जो सिर्फ स्वस्थ मनोरंजन के लिए है। इसका रतलाम शहर और जिले में (अ)वैध निर्माण पर प्रशासन द्वारा की जा रही कार्यवाही और तोड़-फोड़ से कोई सरोकार नहीं है।

एडीटर - एसीएन टाइम्स . कॉम

यह भी देखें... Collector’s Warning ‘…वरना ठेकेदार को कर देंगे ब्लैक लिस्टेड और भेज देंगे जेल, कार्यपालन यंत्री और इंजीनियर पर भी होगी कार्रवाई, अवैध कॉलोनियों पर चलेगा बुल्डोजर’, देखें वीडियो…

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Sat, 13 Nov 2021 02:40:26 +0530 Niraj Kumar Shukla
Everything possible in Ratlam : बधाई हो, अब सरकारी मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल में होगा निःशुल्क इलाज, सड़कों पर नहीं बहेगा नाली का पानी ! https://acntimes.com/everything-possible-in-ratlam https://acntimes.com/everything-possible-in-ratlam

नीरज कुमार शुक्ला @ एसीएन टाइम्स

कई दिनों के बाद आज फिर सरकारी महकमों से सुखद खबरें आई हैं। इन्हें सुनने और पढ़ने के बाद दिल मदमस्त है और तन-मन झूमने को बेताब है। यकीन मानिए, आप भी सुनेंगे तो झूम उठेंगे। एक खबर जिले के स्वास्थ्य विभाग से मिली है तो दूसरी नगर सरकार से। स्वास्थ्य विभाग ने तो अनूठी पहल की है जिसके अनुसार 'अब सरकारी मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल में लोगों का इलाज निःशुल्क होगा'। इसके लिए सरकारी कृपा की नहीं, सिर्फ एक अदद 'आयुष्मान कार्ड' की जरूरत होगी। अब शहर में कहीं भी सीवरेज और नाली का पानी भी सड़कों पर बहता नहीं दिखाई देगा। रविवार की तरह शहर फिर कभी 'पानी-पानी' न हो जाए, इसलिए नगर सरकार ने अधूरे सीवरेज प्रोजेक्ट का ही शुभारंभ कराने की ठान ली है। आखिर, 'रतलाम है तो मुमकिन है' (Everything possible in Ratlam)

फेंकने के मामले में ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतने वाले नीरज चौपड़ा का रिकॉर्ड भी तोड़ दिया

कहते हैं- काम मत करो, लेकिन काम का जिक्र खूब करो और उस जिक्र की फिक्र उससे भी ज्यादा करो। हमारा सरकारी अमला इस मामले में कतई कम नहीं है। 'फेंकने' के मामले में तो कुछ अफसरों ने ओलंपिक में जेवलिन थ्रो स्पर्धा में गोल्ड जीतने वाले नीरज चौपड़ा के फेंकने का रिकॉर्ड भी तोड़ दिया। मंगलवार को स्वास्थ्य विभाग से एक खबर जारी हुई। इस खबर के साथ तीन सपोर्टिंग खबरें भी थीं जो पहली खबर में दी गई जानकारी पुख्ता करने के लिए ही जारी की गईं थी। इन खबरों का लब्बोलुआव यह है कि- आयुष्मान कार्ड बनने के बाद लोगों का जिला अस्पताल और सरकारी मेडिकल कॉलेज में निःशुल्क उपचार होने लगा है।

यह सही है कि यह कार्ड बहुत उपयोगी है। इससे आप बड़े से बड़े प्राइवेट अस्पताल में 5 लाख रुपए तक का इलाज निःशुल्क करवा सकते हैं। इस महत्वपूर्ण कार्ड का प्रचार-प्रसार हर स्तर पर हो रहा है। हम भी इसके लिए लोगों को प्रेरित कर रहे हैं लेकिन सरकार को खुश करने के लिए बे सिर-पैर के उदाहरण गढ़ने की परंपरा समझ से परे है। खैर जाने दीजिए, 'रतलाम है तो मुमकिन है' (Everything possible in Ratlam)

सीवरेज लाइन घरों से जोड़ने के बजाय अधूरे प्रोजेक्ट का शुभारंभ है प्राथमिकता

सुना है कि, बुधवार को प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान प्रदेश भर में विभिन्न प्रोजेक्ट के साथ ही रतलाम के सीवरेज प्रोजेक्ट का शुभारंभ भी करने वाले हैं। शुभारंभ वर्चुअल होगा। यानी सीएम को सिर्फ उतना ही दिखेगा जितने आयोजन के दौरान कैमरे की जद में आएगा। प्रोजेक्ट बनने से लेकर अब तक तो इसे रतलाम विकास के इतिहास का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट कह कर प्रचारित किया जा रहा है। इससे अब तक शहरवासी जो तकलीफ झेल रहे हैं उसकी कुछ वक्त पूर्व प्रसव पीड़ा तक से की जा चुकी है।

Everything possible in Ratlam
Everything possible in Ratlam... रतलाम शहर के खेतलपुर में बनाया सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट जिसका बुधवार को सीएम वर्चुअल शुभारंभ करने वाले हैं जबकि अभी प्रोजेक्ट का काम आधा ही हुआ है।

दावा किया गया था कि जैसा सुखद अहसास प्रसव पीड़ा के बाद होता है, वैसा ही यह प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद भी होगा। भविष्य के गर्त में समाया यह सुखद अहसास तो जब होना है, हो ही जाएगा लेकिन तब तक जो पीड़ा होनी है उसे देखने और सुनने वाले कोई नहीं है। घरों से सीवरेज लाइन जोड़ने का काम आधे से ज्यादा बाकी है। इसे पूरा करने के बजाय सारी कवायद अधूरे प्रोजेक्ट का शुभारंभ पर केंद्रित है। अब यदि कौन बनेगा करोड़पति सीरियल के अगले सीजन में 15 करोड़ का यह सवाल जुड़ जाए तो कदाचित अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए कि- वह कौन सा शहर है जहां प्रि-मैच्योर डिलीवरी ज्यादा होती हैं। ऐसा हुआ तो अभी सिर्फ हम कह रहे हैं, फिर आप भी कहेंगे, कि- 'रतलाम है तो मुमकिन है' (Everything possible in Ratlam)

सड़कों के साथ ही उतर गया पानीदारों का पानी और वादों व दावों पर पानी भी फेर गया

प्रोजेक्ट लेट पर लेट होता गया लेकिन समय रहते जिम्मेदारों का जमीर नहीं जागा। पूरा कोरोना काल भी यूंही गुजर गया, तब भी कहीं कोई काम नहीं हुआ और फिर ताबड़तोड़ में सारा शहर बिना प्लानिंग के खोद दिया गया। लोगों ने परेशानी बताई तो हंसी में उड़ा दी गई। लोग फिसलते रहे, गिरते रहे और जख्मी होते रहे। सीवरे लाइन डालने के लिए खोदे गए गड्ढे अभी भी सिस्टम को ठेंगा दिखाते हुए परेशान होती जनता को मुंह चिढ़ा रहे हैं। बीच में दावा किया गया था कि 20 करोड़ रुपए में शहर की सारी सड़कें अक्टूबर में ठीक हो जाएंगी।

Everything possible in Ratlam
Everything possible in Ratlam... सीवरेज लाइन के लिए की गई खुदाई के बाद से सड़क का एक किनारा पहले ही परेशानी का सबब न रहा है, रही सही कसर रेत-गिट्टी के ऐसे ढेर लगा कर पूरी कर दी गई है जो रविवार को तेज बारिश में बह-बह कर नालियों तक पहुंची और सड़कों पर भी पसर गई।

22 सितंबर आ चुकी है और अक्टूबर आने में सिर्फ 8 दिन ही शेष हैं। जहां सड़क बनने के लिए गिट्टी और चूरी के ढेर लगाए गए थे वहां जिम्मेदारों ने दोबारा झांका तक नहीं। इसी बीच रविवार को बारिश आई और इन ढेरों को बहाते हुए सड़कों, नालियों और नालों तक ले गई। नतीजा, नालियां जाम और सीवरेज के चैंबर और गड्ढों से पटी सड़कों ने पल भर में नदी और नालों का रूप ले लिया। सड़कों पर भरा पानी उतर जरूर गया लेकिन सुख के वादों और दावों पर पानी भी फेर गया। पानी के साथ बहकर सड़कों पर पसरी रेत-गिट्टी हादसों का कारण बनने लगी है लेकिन जिम्मेदारों की प्राथमिकता इसे उठाने की नहीं है। यह सब 'रतलाम है तो मुमकिन है' (Everything possible in Ratlam)

लोगों को नहीं, यहां तो व्यवस्था और जिम्मेदारों को भी मार गया डेंगू का दंश

सीएम के निर्देशन पर प्रदेश भर में डेंगू के मरीजों का सर्वे किया जा रहा है। कोरोना की ही तरह इसका भी बुलेटिन जारी होने लगा है। इसके अनुसार अब 300 से ज्यादा लोगों को डेंगू का मच्छर दंश दे चुका है। लेबोरेटरियों में रोज लोगों के खून के सैंपलों में डेंगू होने की पुष्टि हो रही हैं। बावजूद डेंगू मरीजों के सर्वे में लगा महकमा औपचारिकाता निभाने से बाज नहीं आ रहा। पिछले दिनों दीनदयालनगर कॉलोनी में 16 सदस्यीय टीम डेंगू का सर्वे करने पहुंची थी। टीम में नगर निगम के अमले के अलावा स्वास्थ्य विभाग से आशा-उषा कार्यकर्ता भी थीं। पूरी टीम का फोकस मरीजों का पता लगाने के बजाय डेंगू के लार्वा का हवाला देकर चालान बनाने पर रहा। अधिकांश घरों को बायपास करते हुए टीम एक से दूसरे इलाके में पहुंची और आपत्ति लेने पर कुछ एक-दो लोगों को डेंगू से बचाव के संदेश वाले पर्चे थमा कर चलती बनी। इसकी जानकारी उसी समय उसी समय नगर सरकार के मुखिया को देने का प्राय भी किया गया। एक अफसर के संज्ञान में यह बात लाई भी गई लेकिन जो बाद में आई-गई कर दी गई। अब आप पूछ सकते हैं कि ऐसा क्यों? तो हम अब यही कहेंगे, कि-'रतलाम है तो मुमकिन है' (Everything possible in Ratlam)

neer ka teer
नीरज कुमार शुक्ला

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Wed, 22 Sep 2021 05:23:04 +0530 Niraj Kumar Shukla
'हमारी सड़कें बहुत ‘स्वादिष्ट’ हैं...' स्वादिष्ट चीज कहीं से भी और किधर से भी खाओ 'स्वाद' में अंतर नहीं पड़ता https://acntimes.com/our-roads-are-very-tasty https://acntimes.com/our-roads-are-very-tasty

नीरज कुमार शुक्ला

'सड़कों पर गड्ढे' हैं या 'गड्ढों में सड़क' है... आप इन दिनों इसी 'खोज' में व्यस्त होंगे। हम भी तो अपनी तमाम प्राथमिकताओं को परे धकेल कर 'यही' कर रहे हैं। सड़कों में गड्ढे की तो कोई गिनती ही नहीं और गड्ढों में सड़क मिलने का इंतजार तो 'डॉन' की तरह 11 मुल्कों की पुलिस (जनता) कर रही है लेकिन डॉन (सड़क) को पकड़ना (ढूंढना) मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। आपको 'सफलता' मिली क्या ? हमें तो नहीं मिली।

कहते हैं कि किताबें ज्ञान का भंडार हैं और हर प्रश्न का जवाब भी। इसलिए सोचा सड़क पर बारिश के पानी से लबरेज गड्ढों में गोते लगाने के बजाय कुछ किताबें ही टटोल ली जाएं। आलमारी खोली तो सबसे पहले जिस किताब पर नज़र पड़ी उसका शीर्षक है 'मैं भी खाऊं तू भी खा'। गुरुवर और साहित्यकार, चिंतक, समालोचक, व्यंग्यकार और कवि प्रो. अज़हर हाशमी द्वारा लिखित व्यंग्यों का यह संकलन आशीर्वाद के रूप में उन्हीं से प्राप्त हुआ था।

इसी संग्रह में प्रकाशित एक व्यंग्य ( हमारी सड़कें बहुत 'स्वादिष्ट' हैं ) है जिसे पढ़कर लगा कि- हम 'नाहक' ही मशक्कत कर रहे हैं। हमें सड़कों के मौजूदा हाल पर न तो 'मातम' मनाने की जरूरत है और न ही 'मातमपुर्सी' (सड़कों के कारण दूसरी दुनिया को चले गए लोगों के प्रति 'संवेदना' व्यक्त करने) की। दरअसल यह तो सड़क निर्माण और रखरखाव की व्यवस्था के 'मूल' में छिपे लोक'हित' का नतीजा है। व्यंग्य ने हमारे 'चक्षु' तो खोल दिए इसलिए हमने भी 'औरों' की तरह ही स्थिति से 'समझौता' कर लिया। हो सकता है यह आपकी मुश्किल भी आसान कर दे, तो खुद ही पढ़ लीजिए और आप भी हो जाइये '(अ)संवेदनशील'...

हमारी सड़कें बहुत 'स्वादिष्ट' हैं

प्रो. अज़हर हाशमी

हमारी सड़कें ‘स्वादिष्ट’ बहुत स्वादिष्ट हैं। यही कारण है कि हमारे देश के इंजीनियर, ठेकेदार और अन्य इसे अन्न की तरह खाते हैं, जो चीज स्वादिष्ट होती है उसे कहीं से भी और किधर से भी खाओ उसके स्वाद में अंतर नहीं पड़ता। सड़कें चूंकी ‘स्वादिष्ट’ चीजें हैं, इसलिए सड़कों को कभी इस कोने से खाया जाता है, कभी उस कोने से खाया जाता है। कभी ऊपर से खाया जाता है, कभी नीचे सिखाया जाता है। कभी बीच में से खाया जाता है, कभी सब तरफ से खाया जाता है। सड़कों के कोने पर गड्ढे होने का मतलब यह है कि इंजीनियर ने खाया है। सड़क के ऊपर-नीचे गड्ढे होने का अभिप्राय यह है कि इसे बड़े साहब और छोटे साहब ने मिलकर खाया है। सड़क के बीच में गड्ढे होने का तात्पर्य यह है कि इसे इंजीनियर और ठेकेदार ने खाया है। सड़क के सब तरफ गड्ढे होने का ‘अर्थ’ यह है कि इसे इंजीनियर, ठेकेदार और ‘अन्य’ अर्थात सब ने मिलकर खाया है। वाह ! क्या पाचन शक्ति है।

अच्छी पाचन शक्ति के कारण हमारे यहां ‘लोकसेवक’ सड़कों के साथ-साथ पुल भी खा जाते हैं। अंतर केवल इतना ही है कि सड़कें सलाद की तरह खाई जाती हैं और पुल पान- पराग की तरह चबाये जाते हैं। कोड वर्ड में सड़कें खाना ‘सिंहस्थ के मेले का समापन’ है और सड़कें तथा पुल खाना कुंभ के मेले का समापन है। कुछ लोग इससे सहमत नहीं हैं, वे समापन की बजाय संपन्न शब्द पर जोर देते हैं तथा सिंहस्थ की जगह अर्द्ध और पूर्ण कुंभ को ज्यादा पसंद करते हैं। इसको यों समझिये- सड़कें खाई गईं अर्थात् अर्द्ध कुंभ महापर्व संपन्न हुआ, सड़कें और पुल खा लिये गये अर्थात पूर्ण कुंभ महापर्व संपन्न हुआ। खैर !

तो बात चल रही थी कि हमारी सड़कें बहुत स्वादिष्ट हैं, इसलिए इन्हें खिलाया और खाया जाता है, कमीशन की कटोरियों में सड़कों को खिलाया जाता है। पेमेंट की प्लेटों में सड़कों को खाया जाता है अर्थात सड़कों को खिलाने और खाने का काम एक निश्चित अनुक्रम में चलता है। खिलाने का काम नीचे से ऊपर की ओर चलता है तथा खाने का काम ऊपर से नीचे की ओर चलता है। राजनीति विज्ञान के अंतर्गत लोकप्रशासन की भाषा में इसे सड़क पचाने का पदसोपान या रोड डाइजेस्टिंग हाइरारकी कहते हैं।

हमारी सड़कें खाने के अलावा अन्य कामों के लिए भी बड़ी उपयोगी हैं। क्रिकेट खेलने के लिये तो सड़क से बढ़िया और कोई प्रिय है ही नहीं। यही कारण है कि रात में बाजार की सड़कों पर और दिन में (कभी-कभी रात में भी) कॉलोनी तथा मोहल्ले की सड़कों पर क्रिकेट खेला जाता है। सड़क पर क्रिकेट खेलने से तीन बड़े लाभ हैं, एक तो यह कि मैकेनिकों और डॉक्टर्स को रोजगार मिलता है। आप पूछेंगे सड़क पर क्रिकेट खेलने से मैकेनिकों और डॉक्टर्स के रोजगार का क्या संबंध है? उत्तर यह कि संबंध है और गहरा संबंध है। इसको यों समझिये- जब बाजार की या मोहल्ले कॉलोनी की सड़कों पर क्रिकेट खेला जाता जाएगा तो लाख सावधानी के बावजूद क्रिकेट की गेंद किसी वाहन सवार या वाहन से टकराएगी। परिणामस्वरूप या तो सवार को चोट आएगी या वाहन दुर्घटनाग्रस्त होगा। सवार को चोट आती है तो डॉक्टर की बेरोजगारी दूर होगी और वाहन दुर्घटनाग्रस्त होता है तो बेचारे मैकेनिक को रोजगार मिलता है। ईश्वर को इसलिए ‘दयालु’ और ‘अन्नदाता’ कहा जाता है। मोहल्ले की सड़कों पर क्रिकेट खेलने की प्रेरणा देकर वह ‘जख्मी सवार’ और ‘दुर्घटनाग्रस्त वाहन’ के एपिसोड द्वारा दयालु और अन्नदाता का सीरियल दिखाता रहता है। वाह रे परमात्मा सिर्फ सड़क पर क्रिकेट के खेल में तूने कितने लोगों के लिए एम्पलॉयमेंट एक्सचेंज खोल दिया। सड़क पर क्रिकेट खेलने का दूसरा लाभ यह है कि इससे होने वाले शोर से निकटतस्थ पड़ोसी की नींद उचट जाती है वह सो नहीं पाता।

इस प्रकार सड़कों पर क्रिकेट ‘जागरण’ का संदेशवाहक है। मोहल्ले की सड़क पर क्रिकेट खेलकर यह भी संदेश दिया जाता है कि ‘जो सोवत है खोवत है, जो जागत है सो पावत है’।

तीसरा लाभ यह है कि इससे खेल के मैदान पर नहीं जाना पड़ता। इससे समय की बचत हो जाती है। वैसे भी हमारे यहां मैदान का उपयोग टॉयलेट के लिए किया जाता है। (हालांकि ‘कृपालु’ लोग कभी-कभी सड़क पर भी यह कृपा कर देते हैं) शायद इसलिए गांव में आज भी दिशा-मैदान जाने की परंपरा है। मोहल्ले की सड़क क पर क्रिकेट खेलने से एक तो अपने घर की चौकसी हो जाती है और दूसरे यह कि मैदान पर जाना ‘फॉरेन’ जाने की तरह है। इसलिए विदेश यात्रा का ‘समय’ और विदेश मुद्रा बच जाती है। वैसे भी सड़क की ऊबड़ खाबड़ और मैदान भी ऊबड़ खाबड़, जब दो ऊबड़-खाबड़ में ही चुनाव करना है तो अपने मोहल्ले या कॉलोनी की सड़क ही क्या बुरी। इसके अलावा मोहल्ले की सड़क पर क्रिकेट खेलने से क्रिकेट के ‘इनडोर गेम’ होने के उज्जवल अवसर हैं। आप पूछेंगे कि सड़क पर क्रिकेट इनडोर गेम कैसे? इसका उत्तर यह कि सड़क के इस बार घर का द्वार अर्थात ‘डोर’ है और सड़क के उस और या तो सड़क है या खुला है। बस सड़क को बीच में लेकर क्रिकेट की गेंद को ‘डोर’ के ‘इन’ कीजिए। इसे ही कहते हैं ‘इनडोर’। यह क्रिकेट के खेल में एक नए युग की शुरुआत है और श्रेय जाता है मोहल्ले की सड़कों पर क्रिकेट खेलने वाले होनहारों को।

हमारी सड़कों का एक अन्य उपयोग यह भी है कि इनसे गिल्ली डंडे के खेल की लोकप्रियता में भी वृद्धि होती है। सड़क के बीच में जो भी छोटा गड्ढा होता है उसी पर गिल्ली रखकर उसे डंडे से उछालने में आसानी होती है। इस प्रकार मैदान में जाकर गिल्ली के लिए अलग से छोटा गड्ढा नहीं खोदना पड़ता। हमारी सड़कों पर गड्ढे सदा सर्वदा सुलभ हैं। अतः गिल्ली-डंडा खेल को सड़क ने आनंददाई कर दिया है। इस प्रकार हमारी सड़कें क्रिकेट और गिल्ली-डंडा के लिये ‘टू-इन-वन’ का काम करती हैं।

हमारी सड़कों का अन्य उपयोग यह है कि इन गड्ढों से होने वाली दुर्घटनाओं और मौतों से भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या की समस्या का ‘समाधान’ होता है। जनसंख्या की समस्या से निपटने का यह सर्वाधिक कारगर उपाय है। हमारी सड़कें ‘माल्थस के जनसंख्या सिद्धांत’ को भी प्रमाणित करती हैं।

हमारी सड़कों का एक अन्य महत्वपूर्ण उपयोग यह है कि सड़कों पर गड्ढों के कारण कई बार गर्भवती महिलाओं का सड़क पर ही प्रसव हो जाता है। इस प्रकार सड़कें ‘ओपन मेटरनिटी वार्ड’ (खुले प्रसूति गृह) का काम करती हैं। ओपन यूनिवर्सिटी की तरह ओपन मेटरनिटी वार्ड भी तो होना चाहिए ना। आखिर ‘पारदर्शिता’ भी तो कोई चीज है।

प्रो. अज़हर हाशमी
32, इंदिरा नगर,
रतलाम (म. प्र.)
फोन : 07412-260221

(बैकग्राउंड फोटो राकेश पोरवाल के सौजन्य से )

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Tue, 03 Aug 2021 05:23:15 +0530 Niraj Kumar Shukla