नीर का तीर : कहीं ‘गुमान’ ध्वस्त तो, कहीं गुल हुआ ‘डीपी’ का करंट, ‘शेर’ दहाड़ते और ‘प्रभु’ इंतजार करते रहे, इसलिए कहते हैं कि कुछ भी पालो पर मुगालता मत पालो

नीर का तीर में पढ़ें राजनितक दलों के निर्णय से रतलाम जिले में कहां से कौन हुआ निराश। किसके-किसके मुगालते हुए दूर।

नीर का तीर : कहीं ‘गुमान’ ध्वस्त तो, कहीं गुल हुआ ‘डीपी’ का करंट, ‘शेर’ दहाड़ते और ‘प्रभु’ इंतजार करते रहे, इसलिए कहते हैं कि कुछ भी पालो पर मुगालता मत पालो
नीर का तीर

नीरज कुमार शुक्ला

बड़े-बुजुर्ग कह गए हैं कि कुछ भी पाल लो, मुगालता मत पालो। विधानसभा निर्वाचन 2023 के लिए रतलाम जिले की विधानसभा सीटों से टिकट चाहने वालों को राजनीतिक दलों ने भी यही संदेश दिया है। प्रमुख राजनीतिक दलों में से किसी ने किसी का ‘गुमान’ उतार दिया तो कहीं किसी ‘डीपी’ का करंट ही गुल कर दिया। राजनीतिक पार्टियों ने न तो ‘वीरों के इंद्र’ की सुनी और न ही ‘इंद्रियों को जातने’ वाले की। ‘शेर’ की दहाड़ को भी अनसुना कर दिया, यहां तक कि ‘प्रभु’ को भी आईना दिखा दिया। हम यहां केवल संकेत देंगे, पहचानना आपको है।

गुमान ध्वस्त होन के बाद गूंजा विजय का संगीत

विशेष प्रकार के कांटों के लिए प्रसिद्ध इलाके में चुनाव की सरगर्मी बढ़ते ही ‘नारायण-नारायण’ और ‘विजय का संगीत’ सुनाई देने लग था। यह उस समय धीमा हो गया जब पिछले आम चुनाव में अच्छा खासा जनसमर्थन जुटाने वाले एक नेताजी की सक्रियता ज्यादा बढ़ गई। दिल्ली वाले इन नेता जी की इस सक्रियता ने टिकट के दावेदार स्थानीय नेताओं की धड़कनें बढ़ा दीं। परंतु वे अपना दर्द खुलकर जाहिर नहीं कर सके। उनमें से केवल एक को तब राहत मिल गई जब पार्टी ने टिकट की आस लगाए बड़े नेताजी का ‘गुमान’ ध्वस्त कर दिया।

दोबारा जनता के बीच भेजने लायक नहीं समझा

दिल्ली वाले नेताजी की दाल एक जगह नहीं गली तो उन्होंने दूसरे इलाके की ओर रुख कर लिया। इलाका ‘सूरज’ की किरणों से रोशन हो गया। इससे उन स्थानीय नेताजी की आंखें चौंधिया गईं जिन्हें जनता की याद चुनाव जीतने के करीब चार साल बाद आई थी। इनका नाम और भगवान श्री राम के पूर्वज रहे इच्छाकु वंश के एक राजा का नाम एक ही है। उन्हें जिस बात का डर था, वही हुआ। पार्टी ने उन्हें जनता के बीच दोबारा भेजने लायक नहीं समझा। इसकी वजह उनकी ईमानदारी पर उठी उंगलियां, घटती लोकप्रियता, समर्थकों के कारण दो समाजों में बढ़ी दूरी और निजी सहायक की कारगुजारियां बताई जा रही हैं। बता दें कि, यहां दिल्ली वाले नेताजी भी तीर नहीं मार पाए।

...और इन पर नहीं बरसी कृपा

स्वर्ण नगरी में अवसरवादियों की भरमार है। एक पार्टी में पहले सनातनियों की एकजुटता के नारे सुनाई दिए। बाद में एक नेता ने टिकट के लिए धर्म को जरिया बना लिया। भजन-कीर्तन के साथ धार्मस्थल की यात्रा तक करवाई। धार्मिक की किताबों का वितरण भी किया फिर भी टिकट रूपी ‘प्रभु’ की कृपा नहीं बरसी। जिसे सब चुनाव लड़वाना चाहते थे उसके आड़े कानूनी अड़चन आ गई और जिसके लड़ने की संभावना लगभग क्षीण लग रही थी, उसे टिकट मिल गया। यहां दूसरे राजनीतिक दल के एक नेताजी और उनके समर्थक आखिर तक बड़े बदलाव की बात कहते हुए ताल ठोंकते रहे लेकिन पार्टी ने उनकी दावेदारी को विचार करने लायक भी नहीं समझा।

बाहरी व आयातितों को नहीं मिली तवज्जो

नवाबों की नगर के हाल तो सबसे जुदा हैं। यहां एक राजनीतिक पार्टी के कई बाहरी नेता टूट पड़े और खुद को जनता का सेवक साबित करने में जुट गए। इनमें एक ‘वीरों का इंद्र’ है तो दूसरा वह शख्स जिसके लिए किसान आंदोलन के वक्त सीएम शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि- ‘इस डीपी में करंट नहीं आना चाहिए।’ खुद को एक समाज का ‘शेर’ बताने वाले एक युवा भी यहां राजनीतिक ‘जीवन’ तलाशना रहा है। हालांकि, पार्टी ने न तो आयातितों (बाहरियों) को अहमियत दी और न ही उक्त समाज प्रमुख को। पार्टी ने स्थानीय व्यक्ति पर भरोसा जताया जो बाहर से आकर जमीन तलाश रहे लोगों को नागवार गुजर रहा है। यहां दूसरी पर्टी ने भी आयातित (अन्य पार्टी छोड़कर शामिल हुए) व्यक्ति के बजाय पुराने चेहरे पर ही भरोसा जताया।

द्वंद्व पुराने चावलों का

जिले के सबसे दूरस्थ इलाके में भी टिकट को लेकर घमासान तगड़ा था। दोनों ही पार्टियां टिकट को लेकर पूरे समय असमंजस में रहीं। हालांकि एक पार्टी ने नाम तय करने में ज्यादा देर नहीं की और अपने पुराने ‘चावल’ को ही फिर से चुनाव रूपी आग में पकने चढ़ा दिया है। यह टिकट मांग रहे अन्य दावेदार को रास नहीं आ रहा जो पूर्व में विधानसभा में इसी क्षेत्र का नेतृत्व कर चुके हैं। पार्टी ने उनकी नहीं सुनी तो पिछले दिनों उन्होंने मजमा लगाकर भारी समर्थन होने का दावा किया, इस दौरान वे अचेत भी हो गए। इसके विपरीत दूसरे राजनीतिक दल ने तमाम दबावों के बाद भी पुराने प्रत्याशी पर भरोसा नहीं किया। भले ही उनका नाम ‘इंद्रियों को जीतने वाला’ हो लेकिन वे चुनाव में जीतेंगे, इसकी संभावना पार्टी को नजर नहीं आई।

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डिस्क्लेमर
यह किसी की भावना को ठेस पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि एक व्यंग्य स्वरूप विश्लेषण है। पसंद आए तो सराहना कहने में संकोच न करें और पसंद नहीं आए तो जी भर कर भला-बुरा कहिए। यानी प्रतिक्रिया जरूर दीजिए।