शुक्र है… महिमा जूते की...

साप्ताहिक कॉलम 'शुक्र है...' इस बार कुछ अलहदा है। पढ़िए और बताइये कि आपको यह पसंद आया अथवा नहीं।

शुक्र है… महिमा जूते की...
शुक्र है... महिमा जूते की...

गर्मियों की छुट्टी हुई तो जैसे सभी बच्चे अपने रिश्तेदारों के यहां जाते हैं तो हम भी अपनी नानी के घर गुना गए जूते पहनकर। एक दिन हमने देखा कि नानाजी जी अपने पैर की मरहम-पट्टी कर रहे हैं।

हमने उनसे पूछा, क्या हुआ ?

वो बोले- जूते ने काट लिया।

हम हैरान-परेशान... तो क्या ‘जूता’ काटता भी है?

एक दिन हमने उन्हें जूते में तेल लगाते पाया। हमने पूछा क्या हुआ?

बोले ये ‘जूता’ चूं चूं करता है।

कमाल है 'जूता' बोलता भी है!

एक दिन उन्हें कहते सुना कि फलाना तो बस ‘जूते’ का यार है...

हम समझ गए कि ‘जूते’ तो दोस्ती भी करते हैं।

कल चाचा जी बेटे को डांट रहे थे, कि- तू तो ‘जूते’ खाये बिना मानेगा नहीं।

तब पता चला कि ‘जूते’ खाये भी जाते हैं, यानी भूख मिटाते हैं।

होली में देखा कि एक मूर्ख को चुना जाता है और गधे पर बैठाकर गले में ‘जूते का हार’ पहनाया जाता है।

तब जा कर पता चला मूर्खाधिराज को ‘जूतों’ का हार पहना कर सम्मानित किया गया है।

कमाल है... ‘जूते’ सम्मान प्रदान करने के काम भी आते हैं।

फुटबॉल में सबसे अधिक गोल स्कोर करने वाले खिलाड़ी को 'गोल्डन बूट' दिया जाता है।

वाह...! पुरस्कार में भी सोने का ‘जूता/ दिया जाता है।

कल ही हमें किसी ने बताया कि वेस्टर्न टेलीविज़न और मूवीज इंडस्ट्री में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता को

‘गोल्डन बूट अवॉर्ड’ दिया जाता है।

समझ नहीं आया कि सम्मान अभिनेता का हो रहा है कि ‘जूते का !

जब किसी को मिर्गी का दौरा आता है तब सब कहते हैं कि ‘जूता’ मंगवाओ, इसे ‘जूता’ सुंघाओ।

तब ज्ञान मिला कि ‘जूता’ तो औषधf भी है।

शादी में दूल्हे की सालियां दूल्हे के ‘जूते’ चुराती हैं। उन्हें वापस करने के लिए रुपए मांगती हैं।

ओह ! नो... ‘जूते’ का 'अपहरण भी हो जाता है।

जूता काटता है, जूता बोलता है, जूता दोस्ती-यारी करता है, जूता खाया जाता है। जूता सम्मान प्रदान करता है। जूता औषधf है और तो और जूते के अपहरण का भरा-पूरा व्यवसाय है।

पंडित जी ने बताया कि श्री भरत जी ने ‘राम’ के ‘जूते’ अर्थात खड़ाऊं राजगद्दी पर विराजमान करके चौदह वर्षों तक अयोध्या का राजकाज चलाया।

जय हो ‘जूता’ महाराज की जय हो।

और तो और माँ बाप अपने बच्चों की ‘पूजा’ अक्सर ‘जूते’ से ही करते हैं। तभी तो ‘जूता’ पूज्यनीय माना गया है।

'जूता' चाटने के काम भी आता है, बशर्ते जूता किसी नेता अथवा अफसर का हो।

कुल मिलाकर मुझे तो लगता है कि 'जूते में जीवन' है।

अथ् ‘श्री जूता कथा’ इति।

बोलिये, ‘जूताधिराज’ की जय।

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डिस्क्लेमर

साप्ताहिक कॉलम 'शुक्र है...' के रूप में प्रस्तुत यह रचना किसकी है, यह हम नहीं जानते। सोशल मीडिया पर उपलब्ध यह रचना हमें अच्छी लगी इसलिए अपने पाठकों के लिए यहां उपयोग कर ली अज्ञात लेखक से क्षमायाचना के साथ। हमारा यह प्रयास पसंद आए तो प्रतिक्रिया अवश्य दीजिए, पसंद नहीं भी आए तब भी जरूर बताएं, ताकि आप की पसंद और नापसंद के बारे में पता चल सके।

एसीएन टाइम्स