भाजपा से प्रहलाद पटेल रतलाम के लिए महापौर उम्मीदवार घोषित, जानिए- क्यों हुआ पटेल का टिकट और दूसरे क्यों रह गए पीछे

महापौर पद के लिए भाजपा ने रतलाम से प्रहलाद पटेल को प्रत्याशी बनाया है। वे नगर निगम के पूर्व पार्षद हैं और पेशे से मैरिज गार्डन व वाटर पार्क संचालक हैं। पटेल का टिकट भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की सहमिति के कारण मिल सका है।

भाजपा से प्रहलाद पटेल रतलाम के लिए महापौर उम्मीदवार घोषित, जानिए- क्यों हुआ पटेल का टिकट और दूसरे क्यों रह गए पीछे
प्रहलाद पटेल, महापौर प्रत्याशी, भाजपा

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मौजदूगी में हुई चुनाव संचालन समिति की बैठक में लगी नाम पर मुहर

नीरज कुमार शुक्ला

एसीएन टाइम्स @ रतलाम । महापौर पद के टिकट के लिए भाजपा में जारी दंगल में जीत आखिरकार पूर्व पार्षद प्रहलाद पटेल की हो गई। अंतिम दौर में जारी रही इस राजनीतिक जलेबी रेस में टिकट रूपी जलेबी पटेल के हिस्से तो आ गई है लेकिन अब वे महापौर बन पाते हैं या नहीं, यह जनता की अदालत में तय होगा। टिकट वितरण को लेकर मची खींचतान से यह साफ जाहिर है कि महापौर की कुर्सी तक पहुंचने की डगर मुश्किलों भरी है। 

महापौर पद के लिए भाजपा और कांग्रेस, दोनों में ही ऊहापोह की स्थिति मची हुई थी। कांग्रेस में जहां सीमित नाम हैं वहीं भाजपा में रोज एक नया नाम उछल और उछाला जा रहा था। कभी खुशबू के सौदागर का जिक्र चला तो कभी दो पहिया वाहन विक्रेता का। इस बीच मैरिज गार्डन वालों और प्रॉपर्टी व्यवसाय से जुड़े नाम भी जोरों पर रहे। इस बीच खेती-किसान से जुड़े और होस्टल संचालक को लेकर भी कयास लगाए गए। ये सारे सिर्फ चर्चाओं में ही रहे। आखिर में जद्दोजहद सिर्फ तीन नामों पर आकर सिमट गई। इनमें पूर्व निगम अध्यक्ष अशोक पोरवाल, समाजसेवी व मैरिज गार्डन के संचालक प्रवीण सोनी तथा वाटर पार्क व होटल संचालक पूर्व पार्षद प्रहलाद पटेल शामिल हैं। इनमें भी शुरुआती रुझान पोरवाल और सोनी के पक्ष में बताया जा रहा था और यह भी कहा जा रहा था कि इन दोनों की खींचतान में पटेल बाजी मार सकते हैं। हुआ भी यही। 

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टिकट का निर्धारण होते ही अब सभी यह जानने को उत्सुक हैं कि पटेल का टिकट क्यों हुआ और बाकी का क्यों नहीं हो पाया। लोग यह भी जानने का प्रयास कर रहे हैं कि जो भी नाम उछले या उछाले गए उसके पीछे क्या कारण जिम्मेदार रहे। अपनी इसी जिज्ञासा को शांत करने के लिए हमें भी राजनीतिक गलियारों में तांक-झांक करने के साथ ही दीवारों से कान भी सटाने पड़े। इस प्रयास में कुछ बातें छनकर बाहर आईं जिन्हें आपसे भी साझा किया जा रहा है। 

प्रहलाद पटेल (पूर्व पार्षद – वाटर पार्क संचालक)

नाम चला क्यों ? शुरुआत से ही बड़े नेताओं को साधने पर फोकस रहा। टिकट के लिए विगत डेढ़ साल से सीधा संपर्क रखा और मिलना-जुलना जारी रहा। उनका टिकट होने में यही बात काम आई।

नाम कटता तो क्यों ? विरोधियों द्वारा यह प्रचारित किया जा रहा था कि उन्हें पार्षद का टिकट योग्यता के कारण नहीं, उनके संबंधों व अन्य कारणों से मिला था। जनसेवक के बजाय हाईप्रोफाइल दिखने का शौक व विधायक चेतन्य काश्यप के साथ कभी नजर नहीं आना, योग्य नहीं होने से ही एमआईसी में जगह नहीं मिलने तथा पार्षद रहते उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं होने जैसी चर्चाएं भी चलीं। यह बात दीगर है कि अलकापुरी चौराहे का मौजूदा स्वरूप पटेल की व्यक्तिगत रुचि का ही नतीजा है। पार्टी ने भी महापौर का टिकट देकर सारी अटकलों को दरकिनार कर दिया है। 

राजेश पटेल (व्यवसायी व समाजसेवी)

नाम चला क्यों ? संघ के पदाधिकारी होने के साथ ही व्यवसायी हैं। माना जा रहा था कि संघ की चली तो उसी कोटे से टिकट होगा।

नाम कटा क्यों ? संघ चालक का दायित्व है। बताय जा रहा है कि टिकट के लिए ऐसे दायित्व से कम से कम एक वर्ष पहले निवृत्त होना जरूरी है। चर्चा है कि पटेल परिवार अपना कारोबार इंदौर में शिफ्ट करना चाह रहा है। चुनाव के चक्कर में यह काम प्रभावित हो सकता था और आर्थिक नुकसान भी होता, इसलिए परिवार की रुचि नहीं रही। फिर यह नाम पैराशूट की श्रेणी में भी आ जाता जिस प्रकार पूर्व महापौर डॉ. सुनीता यार्दे के टिकट को प्रचारित किया गया था। 

बलवंत भाटी (भाजपा नेता व बस ऑपरेटर) 

नाम चला क्यों ? मंडल अध्यक्ष और युवा मोर्चा अध्यक्ष होते हुए भाजपा जिला अध्यक्ष सहित विभिन्न पदों पर रहने के कारण। संघ से जुड़ाव। पूर्व जिला अध्यक्ष कान्ह सिंह चौहान सहित अन्य को सहयोग करने के साथ ही साफ-सुथरी छवि। कोई विवाद नहीं।
नाम कटा क्यों ? चर्चा है कि तत्कालीन अध्यक्ष कान्ह सिंह चौहान के कार्यकाल में कतिपय भाजपाइयों को दरकिनार कर के रखने से एक धड़े में नाराजगी व्याप्त है। विधायक चेतन्य काश्यप के खेमे की नाराजगी ने भी नुकसान पहुंचाया। स्थानीय बड़े नेताओं का समर्थन नहीं मिला, वे दूसरे दावेदारों के लिए प्रयासरत रहे।    

अशोक पोरवाल (पूर्व निगम अध्यक्ष एवं भाजपा प्रदेश कार्यसमिति सदस्य) 

नाम चला क्यों ? मौजूदा भाजपा जिला अध्यक्ष को बनाने में उल्लेखनीय भूमिका। केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर व राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय का विशेष स्नेह। युवाओं की अच्छी टीम। प्रदेश अध्यक्ष वी. डी. शर्मा तथा विधायक काश्यप के साथ अच्छा समन्वय।

नाम कटा क्यों ? निगम अध्यक्ष के तौर पर जितनी क्षमता से काम से होना चाहिए था, नहीं नजर आया। जिस वार्ड से जीत कर निगम अध्यक्ष बने थे वहां विरोधियों की अधिकता और क्षेत्र की समस्याओं को लेकर जनता का फीडबैक अपेक्षित नहीं रहा। तत्कालीन महापौर डॉ. सुनीता यार्दे के साथ संबंधों में दूरी से संघ का समर्थन नहीं जुटा पाए। कुछ अंतराल पहले विधायक काश्यप दूरी से भी दूरी बना लेना भी टिकट नहीं मिलने की वजह माना जा रहा है। 

प्रवीण सोनी (समाजसेवी एवं मैरिज गार्डन संचालक)

नाम चला क्यों ? भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष एवं वरिष्ठ नेता प्रभात झा सहित वरिष्ठ नेताओं से नजदीकता। विधायक काश्यप के साथ उचित समन्वय। व्यवसायी, साफ-सुथरी छवि और सभी से मधुर व्यवहार। परिवार के सदस्य का संघ से जुड़ाव व खुद की पार्टी में सक्रियता। संत श्री उत्तम स्वामी जी का आशीर्वाद। 

नाम कटा क्यों ? स्थानीय स्तर पर इनके लिए लॉबिंग करने वाले स्थानीय बड़े नेता (एक पूर्व महापौर, एक पूर्व जिला अध्यक्ष और एक महामंत्री आदि) रतलाम शहर से विधानसभा के दावेदार माने जा रहे हैं। ऐसे में उनके विरोधियों ने इनके नंबर घटाने में अहम् भूमिका निभाई। यही वजह रही कि उन्हें नहीं चाहने वाले स्थानीय और प्रदेश स्तर के नेताओं की इनके नाम को लेकर असहमति रही। व्यवसाय में सहभागी एक व्यक्ति की छवि ने भी असर डाला। बताया जा रहा है कि विरोधियों ने ऐसी जानकारियां प्रमुखता से टिकट निर्धारकों तक पहुंचाई। 

प्रहलाद राठौड़ (व्यवसायी)

नाम चला क्यों ? भाजपा के पिछड़ा वर्ग के मोर्चे के पदाधिकारी होना प्रमुख वजह रही। रतलाम विधायक काश्यप के साथ समन्वय और उनकी बात नहीं काटने की योग्यता। पूर्व गृहमंत्री हिम्मत कोठारी की ओर से असहमति नहीं होना।

नाम कटा क्यों ? कोई ऐसी उपलब्धि नहीं जिससे यह बताया जा सके कि महापौर के लिए उपयोगी साबित होंगे। प्रचारित किया जा रहा था कि इनका नाम विधायक खेमे से आया है और ये उनकी रबर स्टाम्प की तरह ही काम करेंगे। इससे ऊपर बैठे विधायक को पसंद नहीं करने वालों ने राठौड़ के नाम पर असहमति जताई। विधायक के अलावा संभागीय चयन समिति में ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं है जो राठौड़ के नाम की पैरवी करे। इनके व्यवसाय से जुड़ी कुछ जानकारियां भी ऊपर पहुंची जो नागवार गुजरीं। 

दिनेश पोरवाल (पूर्व निगम अध्यक्ष एवं व्यवसायी)

नाम चला क्यों ? पूर्व निगम अध्यक्ष होने के साथ अफसरों व कर्मचारियों से काम करा लेने में सक्षम होने की धारणा के कारण। पूर्व गृह मंत्री हिम्मत कोठारी के खेमे से होने से भी दावेदारी प्रबल रही। भाजपा के अन्य गुटों से भी अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ाव।

नाम कटा क्यों ? तत्कालीन महापौर शैलेंद्र डागा से वैचारिक मतभेद। पूर्व गृह मंत्री कोठारी से भाजपा के अन्य खेमों की नाराजगी का असर। खासकर मौजूद शहर विधायक काश्यप के खेमे का। संघ का समर्थन जुटाने में असफल। वरिष्ठों से सतत् संपर्क नहीं बना सके जिससे कि उनका समर्थन टिकट वितरण के समय मिल पाता। व्यवहार के मामले में भी लोग प्रायः असंतुष्ट ही रहते हैं। हाल के दिनों में जमीन को लेकर पोरवाल के साथ हुई मारपीट। 

ये नाम भी रहे चर्चा में

महापौर पद के अन्य दावेदारों में अशोक पाटीदार, राजेंद्र पाटीदार तथा गुस्ताद अंकलेसरिया का नाम भी चर्चा में आया। ये सभी नाम जनता से जुड़े नहीं होने के कारण अपनी जगह नहीं बना सके। अशोक पाटीदार साफ-सुथरी छवि के होकर कृषि कार्य से जुड़े होने के साथ ही वे संघ से जुड़े हैं। वर्तमान में राष्ट्रीय स्तर के संगठन से जुड़े हैं और विजन के मामले में भी सर्वमान्य हैं। इसी वहीं राजेंद्र पाटीदार का नाम सिर्फ सांसद गुमान सिंह डामोर के नजदीकी होने के कारण चला। वहीं अंकलेसिरया का नाम चर्चा में आने की वजह सिटी डेवलपमेंट को लेकर बेहतर सोच, समाजसेवी की छवि रही। माना जाता है कि वे विधायक काश्यप के मित्र भी हैं। इनके अलावा भी कई अन्य ने बायोडाटा देकर महापौर पद के लिए दावेदारी की थी जो सिर्फ बायोडाटा देने तक ही सीमित रह गए।