एक चिंतन ! उछालवाद के दौर में पीछे छूटते मूल मुद्दे- स्वरांगी साने
फिल्म के बहाने गलगोटिया, कठमुल्लापन, जातिवाद, मनुवाद, ब्राह्मण वाद, एआई समिटि, यूजीसी ऐक्ट, दक्षिणपंथी विचारधारा, हिन्दू, मुस्लिम सहित तमाम मुद्दों पर कटाक्ष करता यह विशेष आलेख एक बार अवश्य पढ़ें।
पूरे 39 चालीस पहले बनी फ़िल्म ‘इजाज़त’ फिर एक बार देखी। फ़िल्म के बनने से लेकर अब तक में लगभग 40 साल का फ़ासला है। इन 40 सालों में इस फ़िल्म को लेकर जब भी बात हुई होगी, उसकी कथा, पटकथा, लेखन-निर्देशन, अभिनय की चर्चा हुई होगी। कभी उन बातों को रेखांकित नहीं किया गया होगा जो उस कहानी में कहन का हिस्सा भर थे। यदि आज यह फ़िल्म बनती तो यक़ीनन चर्चा उन मुद्दों पर होती और इसकी कथा-पटकथा आदि सब दीगर हो जाता। इन दिनों चर्चा में उन मुद्दों को उछाला जाता है, जिन्हें उछालना कतई ज़रूरी नहीं होता। इस उछालवाद में मूल मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। ‘अरे भई कहना क्या चाहते हो’, अब कोई नहीं पूछता। कोई नहीं देख रहा कि किसी कलाकृति, किसी आयोजन या किन्हीं नए नियमों को बनाने का उद्देश्य क्या है।
गुलज़ार द्वारा निर्देशित 1987 में बनी यह फ़िल्म सुबोध घोष की बंगाली कहानी ‘जातुगृह’ पर आधारित है। इसे तब दो राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले थे। घोष का नाम बंगाली साहित्य और पत्रकारिता जगत् में जाना-पहचाना है। मतलब मान लेते हैं कि उन्होंने जो लिखा वह काफ़ी सोच-समझकर ही लिखा होगा। फ़िल्म शुरू होने के 15 मिनट बाद ही महामृत्युजंय मंत्र बुदबुदाते दादू हैं, जो यह भी कहते हैं ‘स्नान कर लो’। नायक कहता है ‘मैं घर जाकर नहा लूँगा’, तो दादू कहते हैं ‘नहाती तो गाय-भैसें हैं’। आम बोलचाल में ‘नहाना’ ही कहा जाता है, ‘स्नान करना’ तो यह वाक् प्रचार तो ब्राह्मण परिवारों में होता है। यदि यह फ़िल्म आज बनी होती तो क्या इस पर ब्राह्मणवाद का ठीकरा नहीं फोड़ा गया होता? फिर फ़िल्म में दादू यह भी कहते हैं ‘क्यों जनेऊ नहीं पहना न…पहन ले बेटा, पहन ले’, लीजिए इसे भी आज ब्राह्मणवाद, मनुवाद, दक्षिणपंथी विचारधारा और न जाने किन-किन टैगों से देखा जाता, जबकि जो हमारे आस-पास के परिवेश की बहुत आम बातें रही हैं। फ़िल्म में इसका चित्रण करना किसी एक वर्ग के श्रेष्ठत्व को दिखाना, तब इस तरह के सवाल क्यों नहीं उठे?
फ़िल्म के 44वें मिनट में नायक अख़बार पढ़ रहा है और नायिका को बताता है, ‘सुनो इंदिराजी ने क्या छुट्टी कर दी है जनता की, रायबरेली की सीट तो जीती ही और साथ में….’ तब इंदिरा गांधी की फ़िल्म में हुई वाहवाही आपत्तिजनक नहीं लगी, किसी को ऐसा नहीं लगा कि सीधे-सीधे सत्ता की प्रशंसा हो रही है। जबकि अब हर बात, हर कोण को केवल इसी दृष्टि से देखा जा रहा है कि नरेटिव राहुल के साथ हैं या मोदी के? फ़िल्म में 45वें मिनट में नायिका मंदिर में पूजा करती है और नायक को जनेऊ पहनाती है। वह बताती है कि ‘दादू बद्रीनाथ जा रहे हैं’। तब सवाल क्यों नहीं उठा कि दादू बद्रीनाथ ही क्यों जा रहे हैं, वे कहीं और भी जा सकते थे? नायिका, नायक से गायत्री मंत्र का उच्चारण करवा रही है। इस फ़िल्म का नायक है नसीरुद्दीन शाह। हो सकता है तब उन्हें भी नहीं लगा हो कि यह तो हम हिंदुत्व को, जातिवाद को बढ़ावा दे रहे हैं। हो सकता है यह समझ उनकी उम्र के साथ अब बढ़ी हो। तब इस पर भी सवाल नहीं उठा कि महिलाओं को गायत्री मंत्र पढ़ना चाहिए या नहीं। मतलब दोनों ओर से कठमुल्लापन इन दिनों बढ़ा है।
याद है यूजीसी ऐक्ट पर कितना बवाल मच गया था। क्यों? ऐसा क्यों हुआ क्योंकि राजनेताओं ने लगातार एक पक्ष को कुछ अधिक सुविधाएँ देना शुरू कर दिया है और दूसरे पक्ष को सीधे-सीधे नकारना। वी. पी. सिंह की कुर्सी को मंडल आयोग ही ले डूबा था। यूजीसी ऐक्ट भी चर्चा में इसलिए आया क्योंकि उसे चर्चा में लाया गया। अजीब जुनून सबके सिर पर हावी हो गया है। चालीस साल में समाज प्रगति के पथ पर बढ़ते हुए खेमों में बँटता चला जा रहा है।
फिर लौटते हैं फ़िल्म पर। आज के दौर में बनने पर फ़िल्म क्या कहना चाह रही है उसे दरकिनार कर दिया जाता। पहले केवल सियासतदार लोग मतलबपरस्त होते थे, अब हर कोई अपने हित और अपने ख़ेमे के आईने से देखने में लगा रहता है। बताइए न पाँच दिनों तक चलने वाले एआई शिखर सम्मेलन या एआई समिट के बारे में कितने लोगों को 16 फ़रवरी से पहले तक पता था या कितनों को 20 फ़रवरी के बाद ही पता चलता। गलगोटिया प्रकरण हो गया और सबका ध्यान एआई समिट की ओर चला गया। जैसे इस समिट से क्या हासिल हुआ कि जगह वह किन वजहों से याद रखा जाए यह महत्वपूर्ण हो गया। गलगोटिया नाम ही जैसे एआई समिट हो गया। एआई संसाधनों के लोकतंत्रीकरण, उसे सुरक्षित और भरोसेमंद बनाने के उपायों के लिए 88 देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने साझा ग्लोबल विजन का समर्थन किया वह सब एक तरफ रह गया। पाँच दिन, 20 देशों के प्रमुख और दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों के बीच की बातचीत पर गलगोटिया विश्वविद्यालय से जुड़ा मामला हावी हो गया। यह सस्ती लोकप्रियता और नकारात्मक कथन शैली का इन दिनों का ताज़ा उदाहरण है।
आज ‘इजाज़त’ मूवी देखते हुए अपने-अपने चश्मे से देखिए, फिर न आप फ़िल्म के साथ रो पाएँगे, न बह पाएँगे आपका दिमाग तर्क-कुतर्क करता चला जाएगा कि फ़िल्म का नाम ‘इजाज़त’ क्यों रखा ‘अनुमति’ क्यों नहीं, अंतिम दृश्य में नायिका रेखा, नसीरुद्दीन के पैर क्यों छूती है? यह भी तो पितृसत्तात्मकता को, पुरुषवाद को, पति के चरित्र को बढ़ावा देना है। पति शादी के बाद अपनी प्रेमिका से रिश्ता रखे, फिर प्रेमिका को घर भी ले आए, प्रेमिका की असमय मृत्यु हो जाने पर उसे फ़िल्म की त्रासदी समझें और नायक को भोला, बेचारा, कहकर क्लीन चिट भी दे दें… तब तो सबने इस फ़िल्म को क्लीन चिट ही दी थी। आज यह फ़िल्म बनती तो इसे क्लीन चिट मिलना इतना आसान नहीं होता, सेंसर बोर्ड से अलहदा एक सेंसर बोर्ड दर्शकों का, दर्शकों को एक ख़ास तरह से सोचने के लिए बाध्य करने वालों का भी होता।
(आलेख स्वरांगी साने की फेसबुक वाल से लिया गया है। आप वरिष्ठ पत्रकार, ख्यात लेखिका, कवयित्री, भाषाविद् और कला साधिका हैं।)
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