नीर का तीर : नगर सरकार का ‘सियासी अखाड़ा’ यानी आग में घी और राजनीति में नमक, दफ्तरों में ‘मैडम राज’ और ‘सर की सरगोशी' का दौर

रतलाम नगर सरकार के सम्मेलन में जनहित के मुद्दों के बजाय 'तू-तू, मैं-मैं' और अहंकार की लड़ाई हावी रही। जानिए कैसे 'मैडम राज' ने प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा रखी है और क्यों बंद कमरों की गोपनीयता अब अखबारों की सुर्खियां बन रही हैं।

नीर का तीर : नगर सरकार का ‘सियासी अखाड़ा’ यानी आग में घी और राजनीति में नमक, दफ्तरों में ‘मैडम राज’ और ‘सर की सरगोशी' का दौर
नीर का तीर

नीरज कुमार शुक्ला

सेव के स्वाद और सोने की शुद्धता के लिए ख्यात रतलाम सरकार और संगठन की तनातनी के लिए कुख्यात हो रहा है। रही-सही कसर यहां की राजनीति पूरी कर रही है जिसकी न तो चाल समझ आ रही है और न ही चरित्र स्पष्ट है। ऐसे में बेचारी जनता टकटकी लगाए देख रही है कि उसका भला कब, कैसे और कौन करेगा ?

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नगर पालिक निगम अधिनियम में 60 दिन के अंतराल पर सम्मेलन आहूत करने का प्रावधान है लेकिन नगर सरकार ने 5 माह बाद (6 नवंबर 2025 को हुआ था आखिरी सम्मेलन) साधारण सम्मेलन आहूत कर जनता पर अहसान कर दिया। इसमें शहर के गड्ढों, पानी, सफाई, सीवरेज और विकास की बात होनी चाहिए थी लेकिन यह सड़क नामकरण संस्कारतक सीमित होकर रह गया। अब विपक्ष छाती पीट रहा है कि- एजेंडे में जनहित के मुद्दे ही नहीं है। (आप पढ़ रहे हैं 'नीर का तीर') विपक्ष ने शुरुआत तो ‘लोकतांत्रिक अंदाज़’ में की और नारे लगाकर प्रदर्शन भी किया। हालांकि, फोटो सेशन (Photo Session) होते ही सभी कुर्सियों पर ऐसे पसर गए जैसे अभी-अभी लोकतंत्र बचाकर आए हों। यानी नाटक का मंचन भी हुआ और समय पर इंटरवल भी!” सर्वानुमति से चार सड़कों और स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स का नामकरण भी हो गया, सड़कें भले ही टूटी हों… पर नाम चमकदार होना चाहिए! 

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अब बारी थी 169 व्यवसायों पर लाइसेंस शुल्क लगाने का निर्णय लेने की। तभी सत्तापक्ष के एक पार्षद ने राहुल गांधी पर कटाक्ष कर सभा को स्थानीय से राष्ट्रीय बना दिया। विपक्षी महिला पार्षद ने तेज, तगड़ा और पूरी ऊर्जा से विरोध दर्ज कराया और एक बार फिर मुद्दा ठंडा हो गया। अगले ही पल विपक्ष के पार्षद ने वीर सावरकर को राष्ट्रद्रोही कह कर आग में घी… और राजनीति में नमक डालने का काम कर दिया। इसके लिए उनके पुतले पर जूते-चप्पल बरसे और एफआईआर भी हो गई। जो विपक्ष सदन में अपने नेता के अपमान पर ज्यादा मुखर नजर नहीं आया वही अपने पार्षद पर कार्रवाई के बाद अब पुलिस को ज्ञापन देकर अपमान करने वाले पार्षद पर कार्रवाई की मांग कर रहा है। (आप पढ़ रहे हैं 'नीर का तीर') अब सवाल ये नहीं है कि किसने किसे क्या कहा…, सवाल ये है कि- जिस सदन में शहर की समस्याएं हल होनी थीं… वहां नेताओं की ‘इज्जत’ और बेज्जती करने का यह ठेका क्यों लिया गया? डेढ़ सौ से ज्यादा लाइसेंस शुल्क, शहर विकास के मुद्दे, पानी, सड़क और सफाई सहित सब एजेंडे में कहीं पीछे छूट गए। और आगे आ गई राजनीति की वही पुरानी स्क्रिप्ट : तू-तू, मैं-मैं… और जनता बीच में ‘हाय-हाय’ वाली।” यानी नगर निगम का सदन समस्याओं का समाधान कम और सियासी अखाड़ा ज्यादा लगता है। यहां मुद्दे नहीं छिड़ते, अहंकार भिड़ते हैं। और जब अहंकार जीतता है तो हार हमेशा जनता की होती है। 

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मैडम राज में ऐसा काज कि- इशारों में काम निकालने वाले टटोल रहे नियमों की किताबें

रतलाम इन दिनों एक और दिलचस्प दौर से गुजर रहा है। यहां फैसलों की मेज पर ‘मैडम’ का दबदबा है और गलियारों में ‘सर’ की सरगोशी। तमाम प्रमुख मेजों मैडम राज होने से सर लोगों को अपनी दाल गलाने में मुश्किल हो रही है। इशारों में एक मेज से दूसरी मेज तक दौड़ने वाली फाइलें चल तो अब भी रही हैं लेकिन कुछ संभल-संभल कर। काम हो रहे हैं, पर ‘अपने तरीके’ से; जल्दीबाज़ी कम, जांच-परख ज्यादा। यानी कोई इसे सख्ती कह रहा है तो कोई अनजान भय के चलते कदम फूंक-फूंक कर रखने वाली सावधानी। वजह जो भी हो लेकिन यह भी सही है कि ऐसे में कभी-कभी ‘जरूरी’ काम भी इंतजार करते नजर रह जाते हैं। (आप पढ़ रहे हैं 'नीर का तीर')  नए मिजाज वाले सिस्टम से उनकी परेशानी ज्यादा बढ़ गई है जिन्हें इशारों में काम निकाल लेने में महारथ हासिल है, ऐसे लोग नियमों की किताबों में मैडमों से जल्दी काम कराने के तरीके खोज रहे हैं। प्रशासनिक गलियारों में इन इशारेबाजों और सर लोगों की खुसर-फुसर भी तेज होती जा रही है। इनकी बातों पर यकीन करें तो काम में देरी की बड़ी वजह मैडमों में तालमेल की कमी है और कई बार ईगो भी आड़े आ जाता है। अब इस बात में कितनी सच्चाई है, यह कहना मुश्किल है लेकिन एक बात तो तह है कि जहां लगाम कसी हो, वहां घोड़े ही नहीं, सवार भी थोड़ा असहज हो ही जाते हैं। 

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दीवारों से बाहर झांकती गोपनीयता, सुर्खी बनती तनातनी

राजनीतिक दलों में खींचतान जगजाहिर है। किसी की खींचतान खुलकर सड़कों तक पहुंच जाती है तो किसी की बंद कमरे में या फिर इससे जुड़े लोगों के दिलों में ही दफन होकर रह जाती है। खबरों को दीवारों के बाहर पहुंचने से रोकने से ज्यादा उसे बाहर पहुंचाने वाले ज्यादा सक्रिय नजर आते हैं और वे सफल भी हो जाते हैं। नगर सरकार के सम्मेलन से पहले हुई सत्ता पक्ष के पार्षद दल में हुई कथित तनातनी की बात न सिर्फ बंद कमरे से बाहर आई बल्कु वह अखबार की सुर्खी भी बन गया। (आप पढ़ रहे हैं 'नीर का तीर') सम्मेलन के दौरान विपक्ष ने मौका देखकर चौका मारा और अखबार की कटिंग भी सदन में लहराते हुए सत्ता पक्ष की अंदरूनी खींचतान को सार्वजनिक कर दिया। यह नगर सरकार के मुखिया को नागवार गुजरा, उन्होंने कथित तनातनी की बात को अस्वीकार करते हुए कहा कि- बैठक में कुछ नहीं हुआ। उन्होंने तो खबर प्रकाशित करने वाले अखबार को नोटिस देने तक की बात कह दी। उनका तर्क था कि बैठक गोपनीय थी और उसमें क्या हुआ यह बाहर को किसी को कैसे पता चल सकता है। अब नगर सरकार के मुखिया को यह कौन समझाए कि- कि जो बात दीवारों के अंदर भी नहीं टिक पाती… वो अखबार तक कैसे नहीं पहुंचेगी? ...और बंद कमरों से ऐसी बातों पहले भी आती रही हैं सुर्खियां भी बनती रही हैं।” 

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