शासकीय भूमि पर कब्जा करने वाले मुस्लिम भाइयों को नहीं मिली बेदखली से राहत, 1310 वर्गफीट हिस्से पर अतिक्रमण मामले में कोर्ट ने दावा किया खारिज

रतलाम में सर्वे क्रमांक 385 की शासकीय भूमि के 1310 वर्गफीट हिस्से पर अतिक्रमण के मामले में न्यायालय ने जफर खान और सिकंदर खान का दावा निरस्त कर दिया।

शासकीय भूमि पर कब्जा करने वाले मुस्लिम भाइयों को नहीं मिली बेदखली से राहत, 1310 वर्गफीट हिस्से पर अतिक्रमण मामले में कोर्ट ने दावा किया खारिज
कोर्ट ने सरकारी जमीन पर किए गए कब्जे को हटाने के विरुद्ध दायर वाद खारिज कियाय।

एसीएन टाइम्स @ रतलाम । शहर में शासकीय भूमि पर अतिक्रमण के मामले में न्यायालय ने दो भाइयों का दावा निरस्त कर दिया है। मामला बाई जी का आवास स्थिति सर्वे क्रमांक 385 में दर्ज शासकीय भूमि का है। इस पर दो भाइयों मुस्लिम भाइयों द्वारा तार फैंसिंग कर कब्जा किया गया था। मामले में तहसीलदार न्यायालय के बेदखली के आदेश दिए गए थे जिसके विरुद्ध दोनों भाइयों ने न्यायालय में अपील प्रस्तुत की थी जो निरस्त कर दी गई है।

अपर लोक अभियोजक एवं शासकीय अधिवक्ता सतीश त्रिपाठी ने बताया कि जफर खान एवं सिकंदर खान पिता मुजफ्फर खान, निवासी हाथीखाना मोहल्ला रतलाम ने शासकीय भूमि पर तार फैंसिंग कर कब्जा किया था। इसके विरुद्ध राजस्व न्यायालय में प्रकरण चला, जहां वादीगण को सुनवाई का पूरा अवसर दिया गया। सुनवाई के बाद तहसीलदार ने बेदखली का आदेश पारित किया था। न्यायालय में चले मामले में यह तथ्य सामने आया कि वादीगण ने भूखंड क्रमांक 319 की आड़ लेकर सर्वे क्रमांक 385 की शासकीय भूमि के 1310 वर्गफीट हिस्से पर अतिक्रमण किया।

ये भी पढ़ें

1958 से जुड़ा है जमीन का पुराना विवाद

मामले में शासकीय भूमि पर कब्जे की शुरुआत वर्ष 1958 से जुड़ी बताई गई है। न्यायालय में प्रस्तुत तथ्यों के अनुसार वादीगण के दादा नौसेखा नगर निगम में कर्मचारी थे। उन्होंने रतलाम नगर सुधार न्यास की नीलामी के माध्यम से 3700 वर्गफीट भूमि ली थी। हालांकि, नीलामी पत्र में सर्वे नंबर और भूखंड क्रमांक का उल्लेख नहीं था। मामले में यह भी सामने आया कि मौके पर उक्त भूमि उपलब्ध नहीं थी। सीमांकन के दौरान मौके पर 2157 वर्गफीट भूमि ही पाई गई। नौसेखा की मृत्यु के बाद उक्त जमीन मुनव्वर खान के नाम हुई। इसके बाद मुनव्वर खान ने अपने भाई की पत्नी आबेदा के नाम वसीयत कर दी।

वसीयत के आधार पर हुई रजिस्ट्री

मामले के अनुसार, आबेदा ने उक्त भूखंड को अपने दोनों पुत्रों, जफर खान एवं सिकंदर खान के पक्ष में 17 लाख रुपए नगद प्राप्त कर विक्रय किया। इसी आधार पर वादीगण ने न्यायालय में अपना दावा प्रस्तुत किया था। प्रकरण की सुनवाई दशम व्यवहार न्यायाधीश अरुण सिंह ठाकुर के न्यायालय में हुई। न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर यह पाया गया कि वादीगण ने रजिस्ट्री में दर्ज भूखंड क्रमांक 319 की आड़ में सर्वे क्रमांक 385 की शासकीय भूमि के 1310 वर्गफीट हिस्से पर अतिक्रमण किया।

ये भी पढ़ें

1958 का फ्री होल्ड प्रमाण पत्र स्वामित्व का आधार नहीं माना

न्यायालय ने वर्ष 1958 के फ्री होल्ड प्रमाण पत्र को स्वामित्व का आधार नहीं माना। न्यायालय ने वादीगण को संबंधित शासकीय भूमि के संबंध में अतिक्रमक माना और उनका दावा निरस्त कर दिया। शासन की ओर से मामले में पैरवी शासकीय अधिवक्ता सतीश त्रिपाठी ने की।