गोल्ड के बदले ‘प्लेटिनम’ खरीदने से पहले सावधान ! क्योंकि, ‘श्री’ बने ‘साईं’ तो आदेश फाइल में दफन हो जाते हैं, ये ‘हिम्मत’ की बात है...

यह 'नीर का तीर' आपके लिए..., पढ़ कर बताएं कि इसकी चुभन कैसी है। उम्मीद है कि जिसकी भी 'दाढ़ी में तिनका' होगा उसे यह जरूर चुभेगा, अगर नहीं किसी को नहीं चुभा तो वह अपनी 'चमड़ी' पर गर्व कर सकता है।

गोल्ड के बदले ‘प्लेटिनम’ खरीदने से पहले सावधान ! क्योंकि, ‘श्री’ बने ‘साईं’ तो आदेश फाइल में दफन हो जाते हैं, ये ‘हिम्मत’ की बात है...
नीर का तीर

नीरज कुमार शुक्ला

रतलाम की जनता बहुत भोली है इसलिए कतिपय लोग उसे लुभाने के लिए सदैव सक्रिय रहते हैं। अचानक ही विकास कार्यों के भूमि पूजन की बाढ़ आ गई है। जो कल तक सत्ता को कोसते नहीं थकते थे, वे आज मंचों पर प्रशस्ति गान करते नजर आ रहे हैं। पीएम के एक साल तक सोना नहीं खरीदने की अपील की तो कुछ लोग प्लेटनिम ही बेचने लगे। जिन दफ्तरों की चौखटों में घुसने के लिए जनप्रतिनिधियों तक को धरना देना पड़े वहां जनता की भी उम्मीदें टूटती नजर आती हैं। कहीं श्री को साईं बना लेने के कारण कोई आदेश फाइलों में दफन है तो किसी की सुनवाई सिर्फ इसलिए नहीं हो रही है क्योंकि उनके पास सिस्टम से टकराने की हिम्मत रखने वाला दोस्त नहीं है।

पीएम की अपील, प्लेटिनम वालों की पौबारह

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से एक साल तक सोना नहीं खरीदने की अपील की है। इससे जहां मोदी समर्थकों और विरोधियों को बहस करने का मुद्दा मिल गया है। रतलाम को स्वर्ण नगरीकहते हैं, और इसकी वजह है यहां मिलने वाले सोने की शुद्धता। यहां सोने के साथ सपने, भ्रम और चमकदार छलावे भी बिकते हैं। इसमें माहिर लोग कोई अवसर नहीं छोड़ते। हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फारसी क्या... तो एक बानगी देख ली जिए...

रतलाम शहर में या आस-बात बहुत ऊंचे पर्वत नहीं है... लेकिन यहां ऐसी वैली’ (घाटी) उपलब्ध हैं। इन ‘वैली’ में अब ‘प्लेटिनम’ के नाम पर सपने भी बेचे जा रहे हैं, जहां कोई भी अपनी खून-पसीने की गाढ़ी कमाई फंसा सकता है। पीएम ने गोल्ड नहीं खरीदने की अपील की है लेकिन प्लेटिनम में निवेश के लिए भी नहीं कहा है। इसलिए गोल्ड के बदले आंख मूंद कर प्लेटिनम न खरीदने लग जाएं। अगर पैसा जरूरत से ज्यादा है और जोखिम उठाने का शौक भी, तो फिर कोई क्या ही समझाए आप जहां चाहें फंसा दें, ऐसा करने से न तो पीएम रोकेंगे, न हम।

हमारी तो सिर्फ इतनी ही सलाह है, कि- प्लेटिनमखरीदते समय सावधानी जरूर बरतें, पहले बेचने वालों का इतिहास-भूगोल (रिकॉर्ड) जरूर जांच लें। कहीं ऐसा न हो कि आप कीमतीमानकर किसी चीज में अपना भरोसानिवेश करें, उसकी कीमत बाद में फूटी कौड़ीजितनी भी न मिले। तब यही हरियाली से लदी ‘वैली’ आपको निवेश नहीं, आर्थिक ‘मुक्तिधाम’ नजर आएगी।

श्री बने साईं’ तो समाधि ले लेते हैं आदेश !

रतलाम के जमीनबाजों का हाजमा इतना मजबूत है कि सरकारी जमीन भी इन्हें अपच नहीं होने देती। ये लोग मंदिरों से लेकर सरकारी जमीन तक ऐसे हजम कर जाते हैं, जैसे कब्जा नहीं, पैतृक विरासत हो। कहीं कोई मंदिर की जमीन पचाकर बैठा है तो कोई किसी भूखंड पर कुंडली मारकर। जिनकी जमीनें इन कबरबिज्जुओं की पकड़ में है वे न्याय की आस में दफ्तर-दर-दफ्तर चक्कर लगा-लगा कर चप्पलें घिसते रहते हैं। जनता अब जान चुकी है- जो तंत्र अपनी जमीन नहीं बचा पा रहा, वह आम आदमी का हक क्या बचाएगा?

विडंबना देखिए, शहर के पटरी पार इलाके में नैतिकता पढ़ाने वालों पर ही सरकारी नाला डकारने के आरोप हैं। इसकी पुष्टी सरकारी तंत्र ने ही की थी। तब कागज गरजे, आदेश निकले, जुर्माना लगा... लगा था अब कब्जे की ईंटें गिरेंगी, लेकिन 11 महीने में न जाने ऐसा क्या हुआ कि अब फाइलें हिलना ही बंद हो गईं। अब तो लगता है कि जिम्मेदारों के मुंह में दही ही जम गया है। इलाके में चर्चा है कि ‘श्री’ जब किसी की ‘साईं’ हो जाए, तो सरकारी आदेश भी फाइलों में समाधि ले लेते हैं। 

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सवाल हिम्मत का...

सिस्टम से टकराने की ‘हिम्मत’ हो तो कुर्सियां भी सतर्क हो जाती हैं और फाइलों की चाल भी अचानक तेज पड़ जाती है। इसके उलट आम आदमी सिर्फ आवेदन देता है लेकिन उसके हिस्से ताऱीखें, आश्वासन ही आते हैं। पिछले दिनों हुआ घटनाक्रम इसकी गवाही दे रहा है। हाल ही में एक पुराने राजनीतिक योद्धा ने अपने परिचित की जमीन के मामले में पुलिस कप्तान के दफ्तर के बाहर ऐसी ‘बैठक’ जमाई कि बरसों से सुस्त दिख रही सरकारी मशीनरी ने उसी शाम चुस्ती का प्रदर्शन कर दिया।

नेता जी के समर्थक इसे जनहित के लिए लाठी उठाना बता रहे हैं, जबकि विरोधियों को इसमें राजनीतिक वजूद बनाए रखने की बेचैनी नजर आ रही है। विरोधियों को इसमें जनहित से ज्यादा राजनीतिक मौजूदगी की धूल झाड़ने की कवायद नजर आ रही है। उनका मानना है कि सत्ता के गलियारों में वही आवाज सबसे ज्यादा गूंजती है, जिसकी प्रतिध्वनि धीमी पड़ने लगे। खैर, कोई कुछ भी कहे, जो काम लंबे समय से नहीं हो रहा था, वह कुछ ही घंटों में हो गया। अब जनता असमंजस में है कि जमीन के मामलों में वह राजस्व विभाग के चक्कर लगाए, पुलिस की चौखट पकड़े, खुद धरने पर बैठे या फिर किसी ऐसी ‘हिम्मत’ से दोस्ती कर ले, जिसके आगे सिस्टम भी फुर्तीला हो जाता है।

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