गोपाल नगर में धोखे का खेल ! धोखेबाज कॉलोनाइजर मनीष सुराणा की अपील खारिज, 3 साल की सजा बरकरार

रतलाम की गोपाल नगर कॉलोनी मामले में धोखेबाज कॉलोनाइजर मनीष सुराणा को कोर्ट से राहत नहीं मिली। प्रथम अपर सत्र न्यायालय ने अपील खारिज कर 3 साल की सजा समेत ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि बरकरार रखी।

गोपाल नगर में धोखे का खेल ! धोखेबाज कॉलोनाइजर मनीष सुराणा की अपील खारिज, 3 साल की सजा बरकरार
धोखाधड़ी में दोषी ठहराए गए कॉलोनाइजर की अपील खारिज।

बंधक 13 प्लॉट भी बेच डाले, नक्शे के उलट निर्माण और सरकारी जमीन पर कब्जे जैसे मामलों में दोषसिद्धि; रतलाम कोर्ट ने अपील खारिज कर ट्रायल कोर्ट का फैसला रखा कायम

एसीएन टाइम्स @ रतलाम । शहर की गोपाल नगर कॉलोनी में प्लॉट खरीदारों और नगर निगम के साथ धोखाधड़ी, बंधक रखे प्लॉटों की बिक्री और स्वीकृत नक्शे के विपरीत निर्माण के मामले में धोखेबाज कॉलोनाइजर मनीष सुराणा (सुराना) को अदालत से एक और झटका लगा है। प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश संजीव कटारे ने सुराणा की अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई तीन साल की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि उपलब्ध मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों के मूल्यांकन में ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष में ऐसा कोई कानूनी या तथ्यात्मक दोष नहीं है, जिसके आधार पर हस्तक्षेप किया जाए।

अदालत के सामने आए रिकॉर्ड के मुताबिक गोपाल नगर कॉलोनी के 13 प्लॉट नगर निगम के पक्ष में बंधक रखे गए थे। इन प्लॉटों के बंधकनामे पर स्वयं मनीष सुराणा के हस्ताक्षर थे। इसके बावजूद इन प्लॉटों को सक्षम प्राधिकारी से बंधक-मुक्त कराए बिना खरीदारों को बेच दिया गया। कोर्ट ने इस तथ्य को सुराणा की जानकारी और सक्रिय भूमिका स्थापित करने वाला महत्वपूर्ण साक्ष्य माना।

मामले में पेश रजिस्टर्ड विक्रय पत्रों से भी यह सामने आया कि सुराणा ने खरीदारों को बंधक की वास्तविक स्थिति छिपाकर प्लॉट बेचे। अदालत ने रिकॉर्ड के आधार पर माना कि दो खरीदारों से 50-50 हजार रुपये प्राप्त किए गए और यह आचरण भारतीय दंड संहिता की धारा 420 के तहत दंडनीय धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है।

स्वीकृत नक्शा कुछ और, मौके पर निर्माण कुछ और

गोपाल नगर के लिए 14 सितंबर 2004 को स्वीकृत अभिन्यास के बावजूद कॉलोनी में बड़े पैमाने पर नियमों को ताक पर रखकर निर्माण किया गया। अदालत ने रिकॉर्ड के आधार पर पाया कि कॉलोनी की स्वीकृत सड़क की चौड़ाई 24 फीट 6 इंच थी, जबकि मौके पर लगभग 20.9 फीट सड़क मिली। यानी सड़क की चौड़ाई कम कर दी गई थी।

इतना ही नहीं, प्लॉटों के आगे 8 फीट और पीछे 5 फीट का खुला क्षेत्र छोड़ना निर्धारित था, लेकिन इन निर्धारित खुले क्षेत्रों को छोड़े बिना निर्माण किया गया। बगीचे के लिए आरक्षित 497 वर्गमीटर जमीन तथा सड़क की संयुक्त भूमि पर भी पक्का निर्माण किए जाने की बात न्यायिक रिकॉर्ड में दर्ज है। अदालत ने इन तथ्यों को केवल किसी अधिकारी की राय नहीं माना, बल्कि स्थल निरीक्षण, पंचनामा और स्वीकृत अभिन्यास से वास्तविक स्थिति की तुलना से सामने आए तथ्य माना।

मनीष सुराणा के कारनामें पढ़ें

बगीचे की जमीन भी निर्माण की चपेट में

स्वीकृत अभिन्यास में कुल 0.47 हेक्टेयर क्षेत्र में से 0.050 हेक्टेयर यानी 497 वर्गमीटर जमीन बगीचे के लिए आरक्षित थी। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार बगीचे और रास्ते के लिए आरक्षित भूमि पर भी निर्माण किया गया। साथ ही स्वीकृत मापदंडों के विपरीत प्लॉटों को अलग-अलग आकार में बांटकर बेचा गया।

सुराणा को नियमों की जानकारी थी : कोर्ट

फैसले में एक अहम बात यह सामने आई कि मनीष सुराणा कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जिसे कॉलोनी के स्वीकृत नक्शे या निर्माण की शर्तों की जानकारी न हो। अदालत ने रिकॉर्ड के आधार पर माना कि वह स्वयं कॉलोनी का कॉलोनाइजर था और स्वीकृत अभिन्यास की प्रक्रिया में प्रत्यक्ष रूप से शामिल रहा था। उसने 3 सितंबर 2004 को अभिन्यास स्वीकृति के लिए आवेदन किया था और 14 सितंबर 2004 को स्वीकृत अभिन्यास जारी हुआ था।

नगर पालिका से निर्माण अनुमति मिलने के बावजूद उस अनुमति के साथ लगी शर्तों से बाहर जाकर निर्माण करने का अधिकार नहीं था। अदालत ने माना कि मौके पर सड़क की चौड़ाई कम करना, बगीचे और रास्ते की आरक्षित भूमि पर निर्माण करना तथा निर्धारित खुला क्षेत्र नहीं छोड़ना स्वीकृत अनुमति और अभिन्यास के विपरीत निर्माण था।

जांच के बाद रातों-रात तुड़वा दिया था मकान

मामले में सामने आए साक्ष्य के अनुसार प्रशासनिक दल ने 1 जून 2010 को मौके पर पहुंचकर बगीचे की आरक्षित जमीन पर किए गए अवैध निर्माण का भौतिक सत्यापन किया और पंचनामा बनाया। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार इस निरीक्षण की जानकारी होने के बाद उसी रात सुराणा ने बगीचे वाले प्लॉट पर निर्मित संरचना को तुड़वा दिया। अदालत ने इस आरोप को भी साक्ष्यों के आधार पर स्वीकार किया और माना कि सुराणा द्वारा अपराध से संबंधित भौतिक साक्ष्य नष्ट किया गया था।

मनीष सुराणा के कारनामें पढ़ें

खरीदारों से बेईमानीपूर्ण छल हुआ

अदालत ने समूचे मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का संयुक्त मूल्यांकन करते हुए माना कि सुराणा कॉलोनी का कॉलोनाइजर था, स्वीकृत अभिन्यास और निर्माण अनुमति की शर्तों से परिचित था, स्वीकृत नक्शे के विपरीत निर्माण हुआ, आरक्षित भूमि पर निर्माण किया गया, सड़क की चौड़ाई कम की गई और बंधक प्लॉटों को बंधक-मुक्त कराए बिना बेचने की कार्रवाई की गई। फैसले में यह भी दर्ज है कि बंधकनामे पर सुराणा के अपने हस्ताक्षर होने के बावजूद बंधक प्लॉटों की बिक्री की गई। अदालत ने इन परिस्थितियों को उसकी जानकारी और सक्रिय भूमिका स्थापित करने वाला साक्ष्य माना।

अपील में भी नहीं बची सजा

मनीष सुराणा ने ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ आपराधिक अपील दायर कर दोषसिद्धि और सजा को चुनौती दी थी। प्रथम अपर सत्र न्यायालय ने उसके तर्कों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि अभियोजन के पास स्वीकृत अभिन्यास, निर्माण अनुमति, स्थल निरीक्षण पंचनामा, बंधकनामा और पंजीकृत विक्रय पत्र जैसे स्वतंत्र दस्तावेजी साक्ष्य मौजूद हैं, जो उसके कृत्यों और भूमिका की पुष्टि करते हैं।

अदालत ने अंततः ट्रायल कोर्ट द्वारा मनीष सुराणा को धारा 420 और 201 भारतीय दंड संहिता, नगर पालिक निगम अधिनियम की धारा 292(सी) सहपठित 293 तथा मध्यप्रदेश नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम की धारा 36 के तहत दोषी ठहराए जाने को विधिसम्मत माना।

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ट्रायल कोर्ट की सजा, जिसे प्रथम अपर सत्र न्यायालय ने बरकरार रखा

धारा 420 : 3 वर्ष का साधारण कारावास और ₹5,000 अर्थदंड।

धारा 201 : 6 माह का साधारण कारावास और ₹5,000 अर्थदंड।

नगर पालिक निगम अधिनियम की धारा 292(सी) सहपठित 293 : 3 वर्ष का साधारण कारावास और ₹10,000 अर्थदंड।

मध्यप्रदेश नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम की धारा 36 : 4 माह का साधारण कारावास और ₹10,000 अर्थदंड।

अर्थदंड नहीं भरने पर अलग-अलग अतिरिक्त कारावास का भी प्रावधान रखा गया है। अदालत ने सुराणा की अपील खारिज करते हुए 18 फरवरी 2026 के ट्रायल कोर्ट के निर्णय और दंडादेश की पुष्टि कर दी तथा सजा भुगतने के लिए आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए।

13 बंधक प्लॉट, नियमों के विपरीत निर्माण और खरीदारों से धोखा- कोर्ट ने नहीं दी राहत

गोपाल नगर प्रकरण में अदालत के फैसले का सबसे अहम पहलू यह है कि मामला सिर्फ कॉलोनी के नक्शे से हटकर निर्माण करने तक सीमित नहीं रहा। न्यायिक रिकॉर्ड में बंधक रखे गए 13 प्लॉटों की बिक्री, खरीदारों को बंधक की वास्तविक स्थिति से अलग जानकारी देना, स्वीकृत अभिन्यास के विपरीत निर्माण, बगीचे और सड़क के लिए आरक्षित भूमि पर निर्माण तथा जांच के बाद निर्माण गिराए जाने जैसे तथ्य दर्ज हैं। इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि को प्रथम अपर सत्र न्यायालय ने बरकरार रखा है।

बता दें कि अभियुक्त मनीष इसी साल 16 मार्च को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था। इसके बाद वह जमानत पर छूटा था। बताया जा रहा है कि अपीलीय न्यायालय से उसकी अपील खारिज हुए काफी समय हो चुका है लेकिन वह अभी तक खुला घूम रहा है। इसमें कोर्ट के कतिपय कर्मचारियों की मिलीभगत बताई जा रही है।

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