देह से दूर, संस्कारों में अमर ! वे चले गए, लेकिन संस्कारों में आज भी जीवित हैं, मेरी चेतना के ध्रुवतारा प्रो. अज़हर हाशमी

प्रो. अज़हर हाशमी की प्रथम पुण्यतिथि पर उनकी शिष्या श्वेता नागर का भावपूर्ण संस्मरण। साहित्यकार, गीता मनीषी, सूफी चिंतक और भारतीय संस्कृति के अध्येता हाशमी जी के व्यक्तित्व, संस्कारों और जीवन मूल्यों का मार्मिक स्मरण।

देह से दूर, संस्कारों में अमर ! वे चले गए, लेकिन संस्कारों में आज भी जीवित हैं, मेरी चेतना के ध्रुवतारा प्रो. अज़हर हाशमी
प्रो. अज़हर हाशमी की पुण्यतिथि (10 जून, 20226) पर विशेष।

श्वेता नागर

गर्मी की भीषण तपन जब धरती की हरियाली को मुरझा देती है, जब कोमल पौधे जीवन की नमी खोजते हुए झुकने लगते हैं और पंछी व्याकुल होकर आसमान में राहत की तलाश करते हैं, तब कहीं दूर से आती वर्षा की पहली बूंदें केवल धरती को ही नहीं, मन को भी तृप्त कर जाती हैं। उन बूंदों के स्पर्श से जैसे प्रकृति फिर मुस्कुराने लगती है, वैसे ही जीवन के संघर्षों और विषम परिस्थितियों में किसी सद्गुरु का सान्निध्य हमारे अस्तित्व को नई ऊर्जा, नई दिशा और नया अर्थ प्रदान करता है।

गुरु का आशीर्वाद केवल शब्द नहीं होता, वह जीवन की धूप में छांव बनकर साथ चलता है। वह हमारी थकान को हर लेता है, हमारी उलझनों को सुलझा देता है और हमारे भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानकर उन्हें आकार देता है। ऐसे ही कृपा, करुणा, ज्ञान और संस्कार की अमृतवर्षा से अपने शिष्यों को सिंचित करने वाले मेरे श्रद्धेय गुरु, प्रो. अज़हर हाशमी जी की प्रथम पुण्यतिथि (10 जून) पर उन्हें स्मरण करते हुए मन बार-बार भावनाओं से भर उठता है।

प्रो. अज़हर हाशमी जी केवल एक साहित्यकार, कवि, गीतकार या गीता-मनीषी नहीं थे। वे भारतीय संस्कृति की जीवंत चेतना थे। वे उन विरले व्यक्तित्वों में से थे जिनके लिए ज्ञान किसी एक धर्म, संप्रदाय या विचारधारा की सीमाओं में कैद नहीं था। उनका संपूर्ण जीवन इस सत्य का प्रमाण था कि मनुष्य को जोड़ना ही सबसे बड़ा धर्म है और संस्कारों से समृद्ध समाज ही राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति है।

उन्होंने भारतीय संस्कृति की गौरवशाली परंपरा को केवल पढ़ा या समझा नहीं, बल्कि उसे जिया। यही कारण था कि उनके संपर्क में आने वाला हर व्यक्ति स्वयं को समृद्ध अनुभव करता था। विशेषकर युवा पीढ़ी के भीतर वे संस्कार, संवेदना और राष्ट्रभाव का ऐसा दीप जलाते थे, जो जीवनभर प्रकाश देता रहे।

आज भी एक प्रसंग मेरी स्मृतियों में उतनी ही स्पष्टता से जीवित है। कुछ वर्ष पूर्व, जब उनका स्वास्थ्य निरंतर गिर रहा था और वे स्वयं भी जीवन की अनिवार्य यात्रा को सहजता से स्वीकार कर चुके थे, तब मैं उनका कुशलक्षेम जानने उनके पास गई। मन में एक प्रश्न लंबे समय से था।

मैंने कहा, “सर, मैं आपसे कुछ पूछना चाहती हूँ।”

उन्होंने हमेशा की तरह सहज मुस्कान के साथ कहा, “हाँ, पूछिए।”

मैंने उनसे कहा, “आपने जीवनभर सभी धर्मों की साधना की, उनके ज्ञान का प्रचार किया और अपने शिष्यों को उनकी आस्था के अनुसार मार्गदर्शन दिया। लेकिन जो सूफ़ी परंपरा आपको अपने पूज्य पिता से विरासत में मिली, वह आपके साथ ही समाप्त होती दिखाई दे रही है। क्या यह बात आपको कभी चिंतित नहीं करती?”

मेरे प्रश्न के उत्तर में उन्होंने क्षणभर भी विचार नहीं किया। अत्यंत सहजता और आत्मविश्वास से बोले-

“मुझे इसकी रत्तीभर भी चिंता नहीं है। मैंने अपने विद्यार्थियों और शिष्यों को जो अच्छे संस्कार दिए हैं, उनमें मैं सदैव जीवित रहूँगा। मेरा उद्देश्य किसी पंथ या संप्रदाय को आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि संस्कारी पीढ़ी का निर्माण करना रहा है।”

उनके ये शब्द केवल उत्तर नहीं थे, बल्कि उनके पूरे जीवन-दर्शन का सार थे। उसी क्षण मुझे लगा कि महानता वास्तव में विचारों की विशालता में होती है, अनुयायियों की संख्या में नहीं।

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श्रद्धेय हाशमी सर से जुड़ी असंख्य स्मृतियाँ आज भी मन के द्वार पर दस्तक देती रहती हैं। उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता थी- सबके प्रति समान सम्मान।

उनके घर कोई उच्च पदस्थ अधिकारी आए या वर्षों से घर की देखभाल करने वाले आदिवासी बापूजी, उनके व्यवहार में कभी कोई अंतर दिखाई नहीं देता था। सम्मान उनके लिए व्यक्ति की सामाजिक स्थिति का विषय नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा का प्रश्न था।

उनका एक सुंदर नियम था। जन्मदिन या किसी शुभ अवसर पर आशीर्वाद लेने आने वाले प्रत्येक व्यक्ति का वे शॉल, श्रीफल और पुष्पगुच्छ देकर अभिनंदन करते थे। उस सम्मान में औपचारिकता नहीं, आत्मीयता होती थी। सामने वाला व्यक्ति केवल सम्मानित नहीं होता था, स्वयं को महत्वपूर्ण भी महसूस करता था।

किसी की छोटी-सी उपलब्धि में भी वे उतनी ही प्रसन्नता अनुभव करते थे, जितनी किसी बड़ी सफलता में। यदि किसी विद्यार्थी ने विद्यालय में कविता सुनाई हो, किसी बच्चे ने कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया हो या किसी युवक ने जीवन में कोई छोटी-सी उपलब्धि हासिल की हो, तो वे उसे पूरे उत्साह से सबके सामने सराहते थे। वे जानते थे कि प्रोत्साहन आत्मविश्वास को जन्म देता है और आत्मविश्वास ही भविष्य का निर्माण करता है।

कृतज्ञता उनके व्यक्तित्व का एक अत्यंत विलक्षण गुण था। जीवन में किसी ने उनके लिए कितना ही छोटा कार्य क्यों न किया हो, वे उसे कभी नहीं भूलते थे। उनके हृदय में आभार का भाव जीवनभर बना रहता था।
उनकी प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं-

“जो शख़्स तेरे दुख में तेरे साथ खड़ा था,
कद उसका फ़रिश्ते से कहीं ज़्यादा बड़ा था।”

ये पंक्तियाँ केवल उनकी कविता नहीं थीं, उनका जीवन-सत्य थीं। उन्होंने स्वयं इन्हें अपने व्यवहार में उतारा था।
उनके व्यक्तित्व और साहित्य पर हुए शोध कार्यों में भी इसका प्रमाण मिलता है। अपने छात्र जीवन में सहायता करने वाले अपने मित्र नागौरी जी के प्रति उन्होंने जिस कृतज्ञता का उल्लेख किया, वह आज भी हृदय को छू जाता है।

उन्होंने लिखा-
"मेरे मित्र नागौरी जी का मुझ पर इतना अहसान है कि यदि मैं अपनी चमड़ी के जूते भी उन्हें पहना दूँ, तब भी वह कम होगा।"

आज के समय में, जब लोग छोटी-सी सफलता के बाद अपने सहयोगियों को भूल जाते हैं, वहाँ ऐसा आभार भाव वास्तव में दुर्लभ है।

वेदों, उपनिषदों, गीता, कुरान, गुरुग्रंथ साहिब और जैन दर्शन के गहन अध्येता हाशमी जी ज्ञान के उस विराट संगम का नाम थे, जहाँ विभिन्न परंपराएँ एक-दूसरे से मिलती हुई प्रतीत होती थीं।

उनके मुख से गीता के श्लोक, वेदों की ऋचाएँ, गुरुग्रंथ साहिब की वाणी, कुरान की आयतें और नवकार मंत्र सुनना किसी आध्यात्मिक उत्सव से कम नहीं होता था। जो लोग पहली बार उन्हें सुनते थे, वे अक्सर यह अनुमान ही नहीं लगा पाते थे कि वे किस धर्म से संबंधित हैं। यही उनकी सबसे बड़ी पहचान थी-मानवता।

बहुत से लोग जानते हैं कि वे ज्योतिष के विद्वान थे, किंतु कम लोग यह जानते हैं कि उन्हें गंध-विद्या का भी अद्भुत ज्ञान था। वे व्यक्ति के शरीर से निकलने वाली गंध के आधार पर उसके स्वभाव और भविष्य के संबंध में संकेत देने की क्षमता रखते थे। यह उनके व्यापक अध्ययन और साधना का ही परिणाम था।

इतना विशाल ज्ञान होने के बावजूद उनमें अहंकार का लेशमात्र भी नहीं था। वे ज्ञान के सर्वोच्च शिखर पर खड़े होकर भी सेवा के धरातल पर बने रहना पसंद करते थे। यही उनकी महानता थी।

आज जब वे हमारे बीच भौतिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, तब भी ऐसा लगता है कि वे हर कदम पर हमारे साथ हैं। उनके शब्द, उनके संस्कार, उनका स्नेह, उनका मार्गदर्शन और उनकी मुस्कान आज भी स्मृतियों में उतनी ही जीवंत है।

हम जैसे शिष्यों के लिए यह सौभाग्य की बात है कि हमें उनके सान्निध्य में सीखने, समझने और जीवन को देखने की दृष्टि मिली। हमें केवल एक गुरु नहीं मिला, बल्कि एक ऐसा व्यक्तित्व मिला जिसने जीवन जीने का अर्थ समझाया।

मेरी अनुभूतियों के आकाश में वे आज भी ध्रुवतारे की तरह स्थिर और प्रकाशित हैं। समय बदल सकता है, पीढ़ियाँ बदल सकती हैं, किंतु ऐसे गुरु कभी विलुप्त नहीं होते। वे अपने विचारों, संस्कारों और प्रेरणाओं के रूप में सदैव जीवित रहते हैं।

"सर, आपने कहा था कि 'मैं संस्कारों में जीवित रहूंगा...' सचमुच, आज भी आप हमारे भीतर सांस लेते हैं। आप देह से भले ही हमारे बीच नहीं हैं, किंतु हमारे विचारों, हमारे संस्कारों और हमारी चेतना के प्रत्येक उजाले में आप आज भी जीवित हैं।

श्रद्धेय प्रो. अज़हर हाशमी जी की प्रथम पुण्यतिथि पर उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि, कोटिशः नमन और विनम्र प्रणाम।

(लेखिका श्वेता नागर पेशे से शिक्षक हैं और प्रो. अज़हर हाशमी की शिष्या भी हैं)