पते की बात! ! रतलाम के जैन-सनातनी, मत करो तनातनी, यह हमारी संस्कृति और परंपरा नहीं है

रतलाम में एक बार फिर जैन और सनातनी विवाद गहरा था नजर आ रहा है। ऐसे विवाद से बचने का संदेश देता यह आलेख एक बार जरूर पढ़ें।

पते की बात! ! रतलाम के जैन-सनातनी, मत करो तनातनी, यह हमारी संस्कृति और परंपरा नहीं है
अगर जी का मंदिर, रतलाम।

मुकेश पुरी गोस्वामी की फेसबुक वॉल से

रतलाम की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं से नहीं, बल्कि यहां के लोगों के दिलों से होती है। यह शहर आपसी सौहार्द और धार्मिक सहअस्तित्व का जीवंत उदाहरण रहा है। ऐसे में अगरजी के मंदिर को लेकर जैन और सनातन परंपराओं के बीच पहले भी और अब भी तनातनी की बातें न केवल दुर्भाग्यपूर्ण हैं, बल्कि हमारी साझा संस्कृति के मूल भाव के भी विपरीत हैं।

कोई भी धार्मिक स्थल ईश्वर से जुड़ने का माध्यम होते हैं, अधिकार की लड़ाई का अखाड़ा नहीं। अगरजी का मंदिर भी इसी भावना का प्रतीक है। यह किसी एक पंथ, एक विचारधारा या एक वर्ग की बपौती नहीं, बल्कि उन सभी का है जो श्रद्धा, विश्वास और सद्भाव लेकर आते हैं। जैन हों या सनातनी दोनों ही अहिंसा, करुणा, संयम और सत्य जैसे मूल्यों को अपने धर्म का आधार मानते हैं। फिर भेद कैसा?

इतिहास गवाह है कि रतलाम में विभिन्न धर्मों और समुदायों ने मिलकर एक-दूसरे की आस्थाओं का सम्मान किया है। त्योहारों में सहभागिता, संकट के समय एक-दूसरे का साथ और सामाजिक कार्यों में साझेदारी की है।

अगरजी के मंदिर को लेकर विवाद की कोई भी कोशिश इस परंपरा को कमजोर करती है और समाज में अनावश्यक विभाजन पैदा करती है।

यह समझना ज़रूरी है कि ईश्वर किसी एक नाम, एक रूप या एक मत तक सीमित नहीं है। भक्त की भावना, उसका आचरण और उसका बड़ा दिल ही असली पूजा है। जब हम मंदिर को "मेरा" और "तेरा" में बाँटते हैं, तब हम स्वयं उस ईश्वरीय भाव से दूर हो जाते हैं, जिसके लिए मंदिर बनाए जाते हैं।

आज ज़रूरत है संयम, संवाद और समझदारी की। सोशल मीडिया की अफ़वाहों, भावनात्मक उकसावों और संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर हमें यह सोचना होगा कि हम आने वाली पीढ़ियों को क्या विरासत देना चाहते हैं। टकराव की या सद्भाव की? अगरजी का मंदिर प्रेम, शांति और एकता का केंद्र बने, यही रतलाम की आत्मा के अनुरूप है।

बड़ा दिल दिखाइए। यह मंदिर, जैन का भी है, सनातनी का भी, और हर उस इंसान का है जो ईश्वर को मानता है। आखिरकार, हम सब उसी परमात्मा की संतान हैं। आओ सब मिलकर एक जाजम पर बैठे, समाधान ढूंढे, विवाद का अंत करें।

(मुकेश पुरी गोस्वामी वरिष्ठ पत्रकार एवं रतलाम प्रेस क्लब के अध्यक्ष हैं।)