मप्र के लेबड़-नयागांव फोरलेन पर टोल वसूली को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को जारी किया नोटिस
रतलाम के पूर्व विधायक पारस सकलेचा की ओर से दायर विशेष अनुमति याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने मप्र सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिका लेबड़-नयागांव टोल पर टैक्स वसूली को लेकर दायर की गई है।

पूर्व विधायक पारस सकलेचा की दायर की है चुनौती देने वाली याचिका, मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ एवं न्यायाधीश हिमा कोहली की पीठ ने जारी किया नोटिस
एसीएन टाइम्स @ रतलाम । मध्यप्रदेश के लेबड़-जावरा और जावरा नयागांव फोरलेन पर टोल वसूली के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है। नोटिस मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ तथा न्यायाधीश हिमा कोहली की पीठ ने जारी किया। न्यायालय ने एक कार्रवाई पूर्व विधायक पारस सकलेचा की ओर से दायर की गई वसूली को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई करते हुए ने की।
सामाजिक कार्यकर्ता तथा पूर्व विधायक पारस सकलेचा ने एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड डॉ. सर्वम रितम खरे के माध्यम से विशेष अनुमति याचिका दायर की थी। इसमें बताया गया था कि सिर्फ जावरा-नयागांव फोरलेन रोड पर वर्ष 2020 तक लगभग 1461 करोड़ रुपए टोल टैक्स वसूला जा चुका है। यह कुल परियोजना की लागत के तीन गुना से भी अधिक है। जावरा-नयागांव फोरलेन की कुल परियोजना लागत 471 करोड़ रुपए है। इसी प्रकार लेबड-जावरा फोरलेन परियोजना की लागत 605 करोड़ थी। इसके एवज में अब तक 1325 करोड़ रुपए टोल टैक्स वसूला जा चुका है। यानि इस परियोजना क लागत का लगभग ढाई गुना वसूली हो चुकी है। चूंकि ठेके की अवधि 25 साल (2033 तक) है, तब तक वसूला जाने वाला टोल टैक्स कई गुना अधिक होगा। यह जनता पर अत्यधिक और मनमाना कराधान है। यह इंडियन टोल एक्ट 1851 के भी विपरीत है।
मप्र उच्च न्यायालय ने कर दी थी खारिज
सकलेचा ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ के समक्ष एक रिट याचिका दायर की थी। इसे उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया था। इसके चलते ही उक्त आदेश के खिलाफ, भारत के सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दायर की गई। शुक्रवार को वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने अधिवक्ताओं ओल्जो जोसेफ और डॉ. सर्वम रितम खरे की सहायता से दी गई दलीलें सुनने के बाद मुख्य न्यायाधीश चन्द्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने नोटिस जारी किया। न्यायालय ने सरकार से जवाब तलब किया है।
प्राकृतिक संसाधन जनता की संपत्ति
इन दो सड़कों पर टोल संग्रह को दी गई चुनौती का असर पूरे मध्य प्रदेश में टोल टैक्स कलेक्शन और टोल नीति पर पड़ेगा। इसे ठेकेदार के बजाय जनता के अनुकूल किया जाना चाहिए। सकलेचा ने अपनी पिटीशन में कहा कि शासन ट्रस्टी के रूप में भूमि का उपयोग जनता की भलाई के लिए कर सकता है, लेकिन वह कुछ व्यक्तियों को अनावश्यक लाभ पहुचाने के लिए भूमि का उपयोग नहीं कर सकता। संविधान के अनुसार कल्याणकारी राज्य में प्राकृतिक संसाधन जनता की संपत्ति है, और उसका उपयोग शासन का रेवेन्यू बढ़ाने के लिए और निजी व्यक्तियों को लाभ पहुंचाने के लिए नहीं किया जा सकता है।
विभिन्न उच्च न्यायालयों ने भी यह स्पष्ट किया है
इंडियन टोल एक्ट 1851 के सेक्शन 2 के बारे में विभिन्न उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा है कि, शासन को रोड और ब्रिज पर टोल लगाने का असीमित अधिकार नहीं है। उसके निर्माण में लगी राशि, उसका प्रबंधन तथा उसके ऊपर होने वाला ब्याज खर्च, इतना वसूल करने का अधिकार है। शासन अपने अधिकार का असीमित उपयोग कर, जनता से अनावश्यक वसूली कर, किसी व्यक्ति विशेष को लाभ पहुंचाने का कार्य नहीं कर सकता है।
2033 तक 3800 व 4600 करोड़ की अनुमानित वसूली संभाव्य
सकलेचा ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि उक्त दोनों फोरलेन पर लागत से 250% से 350% टोल मात्र 11 साल में वसूल हो चुका है। अगर पूरी अवधि 2033 तक टोल वसूली होती रहे तो दोनों रोड पर क्रमशः ₹ 3800 करोड़ तथा ₹ 4600 करोड़ राशि की वसूली होगी। इसके मद्देनजर सकलेचा ने सुप्रीम कोर्ट से दोनों मार्ग पर टोल वसूली बंद किए जाने का अनुरोध किया है। जानकारी के अनुसार सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद भी सरकार ने टोल वसूली रद्द करने को लेकर कोई कदम नहीं उठाया है। अभी टोल टैक्स वसूली जारी है।