नारायण साई को झटका ! रेप केस में सजा निलंबन से गुजरात हाई कोर्ट का इनकार, कोर्ट ने कहा- 'सुनवाई में सहयोग नहीं किया, देरी के लिए हथकंडे अपनाए'
गुजरात हाई कोर्ट ने रेप केस में आसाराम के बेटे नारायण साई की सजा निलंबन याचिका खारिज की। कोर्ट ने अपराध की गंभीरता और सुनवाई में सहयोग न करने पर सख्त टिप्पणी की।
एसीएन टाइम्स @ डेस्क । स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम के बेटे नारायण साई को चर्चित रेप केस में गुजरात हाई कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा को निलंबित करने की उसकी मांग खारिज कर दी है। कोर्ट ने उसकी न्यायिक प्रक्रिया में भूमिका पर भी कड़ी टिप्पणी की है।
2001 के रेप मामले में नारायण साई को आजीवन कारावास की सजा मिली थी जिसके चलते अभियुक्त करीब 11 साल से जेल में है। सूरत की अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने के खिलाफ उसकी अपील अभी हाई कोर्ट में लंबित है। नारायण साई की ओर से सजा निलंबित करने की मांग हाई कोर्ट से की गई थी। इस पर कोर्ट ने फैसला सुनाया। अपने आदेश में जस्टिस इलेश वोरा और जस्टिस आरटी वच्छानी की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि अपराध की प्रकृति और गंभीरता को देखते हुए प्रथम दृष्टया ऐसा नहीं लगता कि अपील में आरोपी के बरी होने की पर्याप्त संभावना है।
कोर्ट की टिप्पणी- ‘सहयोग नहीं, सिर्फ देरी की’
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया कि नारायण साई ने अपनी अपील की सुनवाई में अपेक्षित सहयोग नहीं किया। अदालत के मुताबिक, 2019 से अब तक उसने अंतिम सुनवाई में सक्रिय भागीदारी नहीं दिखाई। इतना ही नहीं, कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी ने बार-बार अलग-अलग याचिकाएं दाखिल कर अस्थायी और स्थायी जमानत पाने की कोशिश की, जिससे कार्यवाही में अनावश्यक देरी हुई। अदालत ने इसे सुनियोजित तरीके से प्रक्रिया को लंबा खींचने की रणनीति के रूप में देखा।
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11 साल जेल में रहने का तर्क भी नहीं आया काम
नारायण साई की ओर से यह दलील दी गई थी कि वह करीब 11 साल से जेल में है, इसलिए उसे राहत दी जानी चाहिए। हालांकि कोर्ट ने इस तर्क को पर्याप्त आधार नहीं माना। कोर्ट ने साफ किया कि सजा निलंबन के लिए केवल जेल में बिताया गया समय ही निर्णायक नहीं हो सकता, खासकर जब मामला गंभीर अपराध से जुड़ा हो।
2019 में सुनाई गई थी उम्रकैद की सजा
मामले की पृष्ठभूमि में जाएं तो साल 2013 में एक पूर्व महिला अनुयायी ने नारायण साई के खिलाफ रेप का मामला दर्ज कराया था। लंबी सुनवाई के बाद अप्रैल 2019 में सूरत की अदालत ने उसे दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसके बाद से वह कई बार पैरोल और फर्लो के जरिए जेल से बाहर भी आ चुका है, लेकिन सजा के खिलाफ उसकी अपील अब भी हाई कोर्ट में लंबित है।
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अब आगे क्या ?
अब इस मामले में सभी की नजरें हाई कोर्ट में लंबित मुख्य अपील की सुनवाई पर टिकी हैं। फिलहाल अदालत का यह स्पष्ट संदेश है कि गंभीर अपराधों में राहत पाने के लिए केवल तकनीकी या प्रक्रिया आधारित तर्क पर्याप्त नहीं होंगे।
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