रेल की बोगी में मिली थी 'देवी'... 16 दिन बाद जब विदा हुई तो छलक पड़ीं आंखें, गोविंद काकानी खुद छोड़ने गए मातृछाया
रतलाम जिला अस्पताल के एस.एन.सी.यू. में 14 दिनों तक उपचार और ममता मिलने के बाद रेलवे की बोगी में मिली नवजात 'देवी' को सेवा भारती मातृछाया शिशुगृह भेजा गया। विदाई के दौरान डॉक्टर, नर्स और समाजसेवी गोविंद काकानी भावुक हो उठे।
जिला अस्पताल की एस.एन.सी.यू. में मिली मां जैसी ममता, हर कोई उसे आखिरी बार गोद में लेना चाहता था; अब सेवा भारती मातृछाया शिशुगृह में मिलेगी नई पहचान
एसीएन टाइम्स @ रतलाम । 4 जुलाई 2026... रेलवे की एक बोगी… एक रोती हुई नवजात बच्ची। न कोई परिचित चेहरा, न किसी अपने का स्पर्श। उसे नहीं पता था कि जिंदगी उसे किस मोड़ पर लेकर आई है। जी.आर.पी. उसे जिला चिकित्सालय लेकर पहुंचे। एस.एन.सी.यू. (स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट) में भर्ती किया गया और ‘लाड़ली लक्ष्मी’ को नाम मिला 'देवी'। डॉक्टरों ने इलाज किया, नर्सों ने मां की तरह दुलारा और कर्मचारियों ने उसे अपना मान लिया। इस तरह महज 16 ही दिन में वह पूरे वार्ड की धड़कन बन गई।
स्वस्थ होने पर ‘देवी’ को सेवा भारती द्वारा संचालित मातृछाया शिशुगृह भेजा गया। उसकी इस विदाई ने अस्पताल के वार्ड में ऐसा माहौल कर दिया, मानो किसी घर की बेटी विदा हो रही हो। वहां मौजूद लोगों की आंखें नम थीं और हर कोई उसे अपनी गोद में लेने के लिए आतुर था।
विदाई की घड़ी आई तो एस.एन.सी.यू. के प्रभारी चिकित्सा अधिकारी डॉ. प्रतीक आर्य अपनी ड्यूटी समाप्त होने के बाद भी अस्पताल से नहीं गए। वजह सिर्फ इतनी थी कि वे 'देवी' को विदा होते हुए देखना चाहते थे। उन्होंने उसे देर तक अपनी गोद में रखा, दुलार किया और फिर नए सफर के लिए शुभकामनाओं के साथ विदा किया। इलाज करने वाले चिकित्सक की आंखों में उस समय केवल एक मरीज के स्वस्थ होने की संतुष्टि नहीं, बल्कि एक बेटी के उज्ज्वल भविष्य की चिंता और स्नेह भी साफ दिखाई दे रहा था। यह दृश्य वहां मौजूद हर व्यक्ति को भावुक कर गया।
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शुरुआत से अंत तक 'देवी' के साथ खड़े रहे गोविंद काकानी
इस पूरी कहानी में जिला रोगी कल्याण समिति के सदस्य एवं समाजसेवी गोविंद काकानी की भूमिका मानवीय संवेदनाओं का सशक्त उदाहरण बनकर सामने आई। जब 'देवी' एस.एन.सी.यू. में भर्ती थी, तब वे लगातार उसकी सेहत और उपचार की जानकारी लेते रहे।
जब विदाई का समय आया तो गोविंद काकानी स्वयं को केवल दर्शक बनाकर नहीं रख सके। उन्होंने नवजात को किसी वाहन या कर्मचारी के भरोसे भेजने के बजाय खुद अपनी निगरानी में उसे गोद में लेकर सेवा भारती मातृछाया शिशुगृह तक पहुंचाया। यह केवल एक जिम्मेदारी निभाने का काम नहीं था, बल्कि उस नन्हीं बच्ची के प्रति अपनत्व और संवेदना का परिचय भी था।
सांसद का भी मिला स्नेह
सांसद अनीता सिंह चौहान भी पिछले दिनों देवी का हाल जानने एस.एन.सी.यू. पहुंची थीं। सांसद अनीता सिंह चौहान ने नवजात के स्वास्थ्य और उसकी समुचित देखभाल को लेकर अस्पताल प्रशासन को आवश्यक निर्देश भी दिए थे। तब उन्हें देवी के उपचार की प्रगति से विस्तार से समाजसेवी काकानी द्वारा ही अवगत कराया गया था। स्वस्थ होने के बाद बच्ची को सेवा भारती मातृछाया शिशुगृह भेजे जाने की जानकारी भी सांसद को दी।
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चौबीसों घंटे की निगरानी
सिविल सर्जन डॉ. ए. पी. सिंह बताते हैं कि भर्ती होने के बाद लगभग एक पखवाड़े तक विशेषज्ञ चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ ने ‘देवी’ की चौबीसों घंटे निगरानी की। समर्पित उपचार, सतत देखभाल और स्नेह के बीच 'देवी' ने धीरे-धीरे जिंदगी की जंग जीत ली। उसका स्वास्थ्य पूरी तरह संतोषजनक होने के बाद मातृछाया शिशुगृह में प्रवेश के लिए सामाजिक कार्यकर्ता अर्पित गुप्ता एवं शीतल सोलंकी (यशोदा) को विधिवत सुपुर्द कर दिया गया।
मिली लावारिस, अब सुरक्षित हाथों में
'देवी' भले ही लावारिस मिली हो लेकिन अब सुरक्षित हाथों में है। पीछे छूट गई हैं वे गोदें, जिन्होंने उसे जीवन के पहले 16 दिनों में केवल दवाइयां ही नहीं, अपनापन भी दिया। जिला अस्पताल के एस.एन.सी.यू. में यह विदाई एक मरीज की छुट्टी भर नहीं थी, बल्कि उन रिश्तों की विदाई थी, जो खून से नहीं, संवेदनाओं से बने थे।
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