भविष्य से ये कैसा खिलवाड़ ? न सिलेबस आया, न परीक्षा की तारीख, विक्रम यूनिवर्सिटी फिर बनी 'चक्रम यूनिवर्सिटी', 44 डिग्री तापमान में स्टूडेंट का फूट रहा गुस्सा

अप्रैल खत्म होने को है लेकिन सिलेबस और परीक्षा कार्यक्रम तय नहीं। विक्रम यूनिवर्सिटी की अव्यवस्थाओं से छात्र परेशान, पढ़ाई ठप और भविष्य अधर में।

Apr 19, 2026 - 12:12
Apr 19, 2026 - 22:03
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भविष्य से ये कैसा खिलवाड़ ? न सिलेबस आया, न परीक्षा की तारीख, विक्रम यूनिवर्सिटी फिर बनी 'चक्रम यूनिवर्सिटी',  44 डिग्री तापमान में स्टूडेंट का फूट रहा गुस्सा
तनाव परीक्षा का।

एसीएन टाइम्स @ रतलाम । उच्च शिक्षा की हालत इतनी बदहाल हो चुकी है कि अब छात्रों का गुस्सा खुलकर सामने आने लगा है। अप्रैल महीना खत्म होने को है, लेकिन कॉलेजों में न सिलेबस तय है और न ही परीक्षा की तारीख घोषित हुई है। सवाल साफ है- जब पढ़ाई ही नहीं हुई, तो परीक्षा किस आधार पर ली जाएगी?

अप्रैल माह पूरा होने को आया, अभी तक सिलेबस तय नहीं हो पाया। परीक्षा प्रोग्राम भी नहीं आया। सेमेस्टर सिस्टम और नवीन प्रयोगो से पूरे वर्ष अध्यापन करने के बजाय परीक्षा ड्यूटी कर रहे हैं प्रोफ़ेसर। देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में कुछ वर्षों से नवीन राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू की गई। इसका उद्देश्य कॉलेजों में वैल्यू एडेड पढ़ाई कराना था। लेकिन बेहतरी के उद्देश्य लाल - फीताशाही से जूझ रहे हैं। स्थिति यह है कि जितने भी वैल्यू एडेड कोर्स हैं, उनका सिलेबस अभी तक तय नहीं हो पाया है। सिलेबस नहीं आने के कारण इन विषयों में प्रवेश लेने वाले विधार्थियों ने पूरे वर्ष भर क्या पढ़ाई की होगी, इसका सहज़ अंदाजा लगाया जा सकता है।

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पढ़ाई नहीं तो परीक्षा कैसी

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अभी बीते कल एक विषय का सिलेबस मिल पाया है। आने वाले महीने में परीक्षा आ जाएगी, पढ़ाई नहीं हुई सिलेबस नहीं तो परीक्षा कैसे? इसके लिए जिम्मेदार कौन? ये सवाल इन दिनों कॉलेज कैम्पस में तैर रहे हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मामले के अलावा प्रोफ़ेसर विक्रम विश्वविद्यालय की परीक्षा विभाग की अव्यवस्थाओं को लेकर भी नाराजगी जता रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि अप्रैल माह का तीसरा सप्ताह बीतने को हैं,लेकिन विश्वविद्यालय प्रथम वर्ष के बच्चों के लिए अभी तक परीक्षा कार्यक्रम  तय नहीं कर पाया है।

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बढ़ते तापमान ने बढ़ाई समस्या

प्रति वर्ष ग्रीष्म काल में परीक्षा आयोजित करने को विश्वविद्यालय ने जैसे परम्परा बना लिया गया है। प्रदेश के तमाम जिले 40 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान से सुलग रहे है। इसके बावजूद द्वितीय और तृतीय वर्ष के बच्चों की अभी परीक्षा चल रही हैं। इतनी भीषण गर्मी में तमाम तरह की दिक्क़तों से जूझकर छात्र परीक्षा दे रहे हैं। रतलाम के चार बड़े कॉलेज में से कोई भी कॉलेज यह नहीं बता पा रहा है कि प्रथम वर्ष की परीक्षा कब होंगी।

अध्ययन के बजाय सिर्फ परीक्षा केंद्र बन रहे कॉलेज

एक बड़ी विसंगति और भी सामने आई कि विश्वविद्यालय में पोस्ट ग्रेजुएशन विषयों की पढ़ाई अभी भी सेमेस्टर सिस्टम से हो रही हैं। वर्ष 2008 तक यूनिर्वसिटी में वार्षिक आधार पर परीक्षा आयोजित होती थी। इसके बाद इस व्यवस्था में बदलाव किया गया और सेमिस्टर सिस्टम लागू कर दिया गया। तमाम अव्यवस्थाओं के कारण वर्ष 2018 में ग्रेजुएशन के तीनो वर्षों प्रथम, द्वितीय और तृतीय से सेमिस्टर सिस्टम को हटाकर पुनः वार्षिक परीक्षा पर लाया गया। लेकिन पोस्ट ग्रेजुऐसन के दो वर्षों के लिए सेमिस्टर सिस्टम लागू रख लिया गया। इस व्यवस्था से कॉलेज अब अध्यायन केंद्र के बजाय परीक्षा केंद्र के रूप में तब्दील होते जा रहे हैं।

यह भी पढ़ाई चौपट होने की वजह

मिस्टर व्यवस्था में पूरे वर्ष भर परीक्षाए चलती हैं। इसलिए अध्यापन कार्य ठप हो जाता हैं। कॉलेज से जुड़े सूत्र बताते हैं कि शहरों के और समृद्ध वर्ग के छात्र तो वैसे भी व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में पढ़ाई करने चले जाते हैं। इसलिए इन कालेजों में अधिकतर छात्र ग्रामीण या जनजाति पृष्ठभूमि के पढ़ने आते हैं। लेकिन उनकी उपस्थिति मात्र 15 से 25 प्रतिशत रहती है। दूसरा कॉलेज के प्राध्यापकों की अन्यत्र मामलो में ड्यूटी लग जाती है। इसके अलावा सेमिस्टर व्यवस्था के कारण  साल में ज्यादा समय परीक्षा संचालन में निकल जाता है। इसलिए कॉलेजों में पढ़ाई व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित रहती है।

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पुराना गौरव वापस दिलाने की आवश्यकता

देश का भविष्य गढ़ने के लिए जिम्मेदार शिक्षा केंद्रों की दुरावस्था असल चिंता का विषय हैं। मालवा की शान विक्रम विश्वविद्यालय को देश की शान माना  जाता था। लेकिन आज न शिक्षक खुश और न विधार्थियों को खुशी हैं। आवश्यकता इस बात की है कि महाराजा विक्रमादित्य के नाम से कायम इस बड़ी यूनिवर्सिटी को इसका पुराना गौरव पुनः दिलाया जाए। इसके साथ राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने के बजाए प्रयोग करने की स्थिति में बदलाव किया जाए।

इसलिए है अव्यवस्था

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अन्तर्गत किये  जा रहे संरचनात्मक बदलावों के लिए विश्वविद्यालय और महाविद्यालय दोनों ही तैयार नहीं हैं I इसका ही परिणाम है कि यह अव्यवस्था देखने को मिल रही है।

-डॉ. संजय वाते, सेवानिवृत प्राचार्य- शासकीय कला एवं विज्ञान महाविद्यालय

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Niraj Kumar Shukla 1994 से अब तक पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय। इस दौरान सांध्य दैनिक 'रतलाम दर्शन' और हिंदी दैनिक 'साभार दर्शन', 'चेतना', 'नवभारत' और 'दैनिक भास्कर' सहित विभिन्न समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं में पूर्णकालिक संवाददाता, उप-संपादक और समाचार संपादक जैसे दायित्वों का निर्वहन किया। हिंदी ब्लॉगर और स्वतंत्र लेखन के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय रहते हुए वर्तमान में समाचार पोर्टल www.acntimes.com के मुख्य संपादक के दायित्व में। वर्ष 2011 से अब तक मप्र सरकार से राज्य स्तरीय अधिमान्यता प्राप्त पत्रकार। पत्रकारिता में आने से पूर्व और बाद के कुछ वर्षों तक अध्यापन भी किया।