रतलाम के बेटे की स्वर्णिम उपलब्धि ! डॉ. दिगंत पाटनी ने कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी द्वारा 200 से अधिक बच्चों को दी नई उम्मीद, ‘स्वर्णिम बुक ऑफ रिकॉर्ड’ में दर्ज हुआ नाम
युवा कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जन एवं ईएनटी सर्जन डॉ. दिगंत पाटनी ने CI सर्जरी द्वारा 200 से अधिक जन्मजात गंभीर श्रवण बाधित बच्चों को नई उम्मीद देकर मानव सेवा के लिए ‘स्वर्णिम बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ ने जगह बनाई। उन्हें ‘Young Cochlear Implant Surgeon’ के रूप में सम्मानित किया गया।
एसीएन टाइम्स @ रतलाम । किसी बच्चे के लिए पहली बार आवाज सुनना और फिर धीरे-धीरे बोलना सीखना बहुत सहज दिखाई देता है, लेकिन उसके पीछे कई परिवारों के लिए वर्षों की चिंता, उम्मीद और संघर्ष छिपा होता है। जन्मजात गंभीर श्रवण बाधिता से पीड़ित बच्चों के लिए कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी इसी उम्मीद को हकीकत में बदलने का माध्यम बनती है। रतलाम के युवा कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जन एवं ईएनटी सर्जन डॉ. दिगंत पाटनी ने इस दिशा में कार्य करते हुए ‘स्वर्णिम बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ में स्थान बनाया है।
महज 32 वर्ष की उम्र से स्वतंत्र रूप से कॉक्लियर इम्प्लांट (CI) सर्जरी शुरू करने वाले डॉ. दिगंत अब तक विभिन्न शासकीय योजनाओं के माध्यम से जन्मजात गंभीर श्रवण बाधिता से पीड़ित 200 से अधिक बच्चों की कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी सफलतापूर्वक कर चुके हैं। इन सर्जरियों का महत्व केवल चिकित्सा सफलता तक सीमित नहीं है। अनेक बच्चों को सुनने की क्षमता मिलने के साथ उनके बोलने, शिक्षा हासिल करने और सामान्य सामाजिक जीवन में आगे बढ़ने की राह आसान हुई है।
बच्चों के जीवन में सुनने और बोलने की नई उम्मीद जगाने वाले इस उल्लेखनीय कार्य और जरूरतमंद एवं वंचित बच्चों के प्रति उनकी सेवा भावना को देखते हुए डॉ. दिगंत पाटनी को ‘स्वर्णिम बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ का रिकॉर्ड सर्टिफिकेट प्रदान कर सम्मानित किया गया। इंदौर में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में यह सम्मान प. पू. सुधासागर जी महाराज की पावन निश्रा में प्रदान किया गया। इस अवसर पर विजय बाकलीवाल, अशोक दोशी, नवीन गोधा, वीरेंद्र कुमार जैन, अशोक शास्त्री, सौरभ बड़जात्या, गिरीश गिन्नी ग्रुप, पिंकेश टोंग्या, प्रिंसिपल टोंग्या एवं आलोक कोयला सहित गणमान्यजन द्वारा डॉ. दिगंत पाटनी को सम्मानित किया गया।
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‘Young Cochlear Implant Surgeon’ के रूप में सम्मान
स्वर्णिम बुक ऑफ रिकॉर्ड्स की ओर से जारी प्रमाण-पत्र में डॉ. पाटनी को “Young Cochlear Implant Surgeon” के रूप में सम्मानित किया गया है। यह सम्मान उनकी चिकित्सा विशेषज्ञता के साथ उस मानवीय दृष्टिकोण को भी रेखांकित करता है, जिसके तहत उन्होंने जरूरतमंद और वंचित बच्चों के उपचार को अपने कार्य का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया।
बच्चों के लिए बदली जिंदगी की दिशा
कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी ऐसे बच्चों के लिए महत्वपूर्ण उपचार विकल्प है, जो जन्मजात गंभीर श्रवण बाधिता के कारण सुनने की क्षमता से वंचित होते हैं। सुनने की क्षमता विकसित होने से बच्चों के भाषा और बोलने के विकास, शिक्षा तथा सामाजिक सहभागिता के अवसर बेहतर हो सकते हैं।
डॉ. दिगंत पाटनी ने विभिन्न शासकीय योजनाओं के माध्यम से ऐसे बच्चों तक उपचार की सुविधा पहुंचाने में अपनी चिकित्सा विशेषज्ञता का उपयोग किया। 200 से अधिक सफल कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरियों के जरिए उन्होंने अनेक बच्चों और उनके परिवारों को उस उम्मीद से जोड़ा, जिसमें एक बच्चा आवाज सुन सके, शब्दों को समझ सके और शिक्षा तथा सामाजिक जीवन में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सके।
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चिकित्सा से आगे मानव सेवा का संकल्प
डॉ. पाटनी की उपलब्धि का प्रेरक पक्ष यह है कि चिकित्सा विशेषज्ञता को उन्होंने केवल पेशेवर जिम्मेदारी तक सीमित नहीं रखा। जरूरतमंद बच्चों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने की उनकी प्रतिबद्धता ने उनके चिकित्सा कार्य को मानव सेवा का स्वरूप दिया है।
सम्मान समारोह में प. पू. सुधासागर जी महाराज ने डॉ. दिगंत पाटनी के मानव सेवा के इस उत्कृष्ट कार्य की सराहना करते हुए उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया। उन्होंने चिकित्सा के माध्यम से जरूरतमंदों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के प्रयासों को प्रेरणादायी बताया।
रतलाम से निकली प्रतिभा ने बढ़ाया शहर का गौरव
डॉ. दिगंत पाटनी की स्कूली शिक्षा रतलाम में हुई है। वे रतलाम के वरिष्ठ पत्रकार एवं कर सलाहकार दिलीप पाटनी के पुत्र हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में कम उम्र में विशेषज्ञता हासिल कर सैकड़ों बच्चों के जीवन में बदलाव लाने और अब ‘स्वर्णिम बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ से सम्मानित होने की उनकी उपलब्धि से रतलाम सहित उनके परिवार और परिचितों में हर्ष का माहौल है।
डॉ. दिगंत पाटनी की कहानी इस बात की मिसाल है कि चिकित्सा विज्ञान की विशेषज्ञता जब सेवा भावना से जुड़ती है, तो उसका प्रभाव केवल एक मरीज के उपचार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह पूरे परिवार के जीवन में उम्मीद की नई रोशनी ला सकता है। जन्म से ही खामोशी में जी रहे नन्हे बच्चों को सुनने और बोलने की दुनिया से जोड़ने का उनका प्रयास निश्चित रूप से युवा चिकित्सा पेशेवरों के लिए भी प्रेरणा का विषय है।
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