वाह रे सरकार ! 15 अक्टूबर की अधिसूचना में 19 जुलाई से टोल वसूली की दे दी अनुमति! कांग्रेस नेता पारस सकलेचा ने भोपाल बायपास टोल वसूली पर उठाया गंभीर सवाल

भोपाल बायपास टोल वसूली पर पूर्व विधायक पारस सकलेचा ने सवाल उठाए। 360 करोड़ रुपये की वसूली, पिछली तारीख से प्रभावी अधिसूचना और अनुबंध की शर्तों की जांच की मांग की।

वाह रे सरकार ! 15 अक्टूबर की अधिसूचना में 19 जुलाई से टोल वसूली की दे दी अनुमति! कांग्रेस नेता पारस सकलेचा ने भोपाल बायपास टोल वसूली पर उठाया गंभीर सवाल
भोपाल टोल वसूली की लेकर कांग्रेस नेता पारस सकलेचा ने गंभीर सवाल उठाया है। उन्होंने टोल वसूली निरस्त करने की मांग की है।

360 करोड़ रुपए वसूलने पर उठाई आपत्ति, विधि-विरुद्ध अधिसूचना निरस्त करने और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की

एसीएन टाइम्स @ भोपाल । भोपाल बायपास पर टोल वसूली को लेकर पूर्व विधायक एवं व्यापम व्हिसलब्लोअर पारस सकलेचा ने राज्य शासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि शासन ने इंडियन टोल एक्ट, 1851 की धारा 2 का दुरुपयोग करते हुए ऐसी सड़क पर जनता से लगभग 360 करोड़ रुपए वसूल लिए, जिसके निर्माण में शासन ने कोई राशि खर्च नहीं की। सकलेचा ने 15 अक्टूबर 2026 को जारी राज्यपाल की अधिसूचना क्रमांक 351 में 19 जुलाई 2026 से टोल वसूली की अनुमति दिए जाने को विधि-विरुद्ध बताते हुए अधिसूचना निरस्त करने की मांग की है।

सकलेचा के अनुसार, 15 अक्टूबर 2026 को जारी अधिसूचना में 19 जुलाई 2026 से टोल वसूली का अधिकार दिया गया है। यानी अधिसूचना जारी होने से 88 दिन पहले की तारीख से वसूली की अनुमति दी गई। उनका कहना है कि इंडियन टोल एक्ट, 1851 की किसी भी धारा में शासन को स्पष्ट वैधानिक अधिकार के बिना पूर्ववर्ती तारीख से पथकर वसूली लागू करने की अनुमति नहीं है।

उन्होंने सवाल उठाया कि जब अधिसूचना 15 अक्टूबर को जारी हुई, तो उससे पहले की अवधि में टोल वसूली को किस वैधानिक आधार पर अधिकृत माना जा सकता है? उनके अनुसार, इस मामले में सक्षम कानूनी प्रावधानों और न्यायिक सिद्धांतों के अनुरूप अधिसूचना की वैधता की जांच आवश्यक है।

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वर्ष 2020 में भी दोहराई गई थी यही प्रक्रिया

सकलेचा ने दावा किया कि 8 दिसंबर 2020 को जारी पूर्व अधिसूचना में भी 18 जुलाई 2020 से टोल वसूली की अनुमति दी गई थी। इस तरह उस समय भी अधिसूचना जारी होने से लगभग 140 दिन पहले की तारीख से वसूली की अनुमति दी गई थी। उन्होंने कहा कि यह प्रश्न केवल वर्तमान अधिसूचना तक सीमित नहीं है, बल्कि पूर्व में अपनाई गई प्रक्रिया की वैधानिकता की भी जांच होनी चाहिए।

निर्माण में शासन का योगदान शून्य, टोल वसूली लगभग 360 करोड़ रुपए!

सकलेचा के मुताबिक, भोपाल बायपास का निर्माण बीओटी (Build-Operate-Transfer) योजना के अंतर्गत ट्रांसट्राय कंपनी ने 304 करोड़ रुपए की लागत से किया था। कंपनी ने वर्ष 2013 से 11 दिसंबर 2019 तक लगभग 150 करोड़ रुपए टोल के रूप में वसूल किए। इसके बाद शासन द्वारा यूजर फी योजना के नाम पर अब तक लगभग 360 करोड़ रुपये वसूल किए जा चुके हैं।

उन्होंने सवाल उठाया कि जब सड़क का निर्माण निजी कंपनी ने बीओटी अनुबंध के अंतर्गत किया और शासन ने निर्माण पर कोई राशि खर्च नहीं की, तो इंडियन टोल एक्ट की धारा 2 के अंतर्गत यूजर फी योजना लागू करने का वैधानिक अधिकार कैसे प्राप्त हुआ? सकलेचा के अनुसार, यूजर फी योजना उन सड़कों पर लागू की जा सकती है, जिनका निर्माण केंद्र या राज्य शासन की निधि से किया जाता है।

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241.97 करोड़ रुपए की वसूली का प्रकरण, फिर निरस्त हुई आपराधिक कार्यवाही

सकलेचा के अनुसार, कंपनी द्वारा अनुबंध की शर्तों के उल्लंघन के मामले में अनुबंध निरस्त किए जाने के लगभग दो वर्ष बाद, 9 जुलाई 2020 को मिसरोद थाने में अपराध क्रमांक 294/2020 दर्ज किया गया था। इसमें 241.97 करोड़ रुपए की वसूली से संबंधित आरोप शामिल थे।

उन्होंने आरोप लगाया कि इस मामले में लगभग तीन वर्षों तक आरोपपत्र पेश नहीं किया गया और अंततः मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने 28 नवंबर 2023 को संबंधित आपराधिक कार्यवाही निरस्त कर दी। सकलेचा का कहना है कि शासन ने इस आदेश को सक्षम उच्चतर न्यायालय में चुनौती नहीं दी।

उन्होंने आरोप लगाया कि शासन ने कंपनी से सांठगांठ कर मामले की पैरवी, दस्तावेजों की उपलब्धता और कानूनी कार्रवाई में गंभीर चूक की, जिससे कंपनी को लगभग 300 करोड़ रुपये का सीधा लाभ पहुंचा। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि संबंधित अभिलेखों और न्यायिक दस्तावेजों के परीक्षण से ही हो सकेगी।

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अनुबंध के अनुसार प्रीमियम क्यों नहीं वसूला गया?

सकलेचा ने अनुबंध के आर्टिकल 26 का हवाला देते हुए कहा कि कंपनी से वर्ष 2013 से प्रतिवर्ष 21 करोड़ रुपये तथा निर्धारित 5 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि के अनुसार प्रीमियम अथवा कंसेशन फीस वसूली जानी थी। उनके अनुसार, अनुबंध में निर्धारित शर्तों के बावजूद लगातार छह वर्षों तक प्रीमियम की वसूली नहीं की गई।

उन्होंने सवाल उठाया कि जब अनुबंध के अनुसार कंपनी से प्रीमियम वसूला जाना था, तो संबंधित विभाग ने समय पर वसूली क्यों नहीं की? उन्होंने इस कथित चूक के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की।

राज्यपाल को अधूरी या भ्रामक जानकारी देने की आशंका

सकलेचा ने आशंका व्यक्त की कि अधिसूचना जारी कराने के लिए विभागीय अधिकारियों ने राज्यपाल के समक्ष तथ्य अधूरे अथवा भ्रामक रूप में प्रस्तुत किए हो सकते हैं। उन्होंने मांग की कि अधिसूचना जारी करने के लिए प्रस्तुत प्रस्ताव, विभागीय अभिमत, विधि विभाग की राय और संबंधित अभिलेखों की जांच कराई जाए।

उन्होंने यह भी मांग की कि पूर्ववर्ती तारीख से टोल वसूली की अनुमति देने का कानूनी आधार सार्वजनिक किया जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि अधिसूचना को पिछली तारीख से प्रभावी करने के लिए किस वैधानिक प्रावधान का सहारा लिया गया।

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टोल वसूली निरस्त करने और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग

सकलेचा ने राज्य शासन से मांग की है कि अनुबंध के आर्टिकल 26 के अंतर्गत प्रीमियम वसूली में हुई कथित चूक के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई की जाए। साथ ही, कंपनी के खिलाफ सक्षम उच्चतर न्यायालय में वाद दायर किया जाए और भोपाल बायपास पर टोल वसूली तत्काल प्रभाव से निरस्त की जाए।

सकलेचा ने कहा कि भोपाल बायपास का मामला केवल टोल वसूली तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक जवाबदेही, अनुबंध की शर्तों के पालन और कानून के शासन से भी जुड़ा हुआ है। उनके अनुसार, पूरे मामले में संबंधित अभिलेखों की जांच कर वैधानिक स्थिति स्पष्ट करना और जिम्मेदारी तय करना आवश्यक है।

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