रचनात्मकता से जीवंत होती है शहर की पहचान, 4 वर्ष में ‘सुनें सुनाएं’ से जुड़े 1500 से अधिक रचनाप्रेमी, 500 ने रचना पाठ किया
रतलाम में रचनात्मक वातावरण और पठन-पाठन को बढ़ावा देने वाला आयोजन ‘सुनें सुनाएं’ पांचवें वर्ष में प्रवेश कर गया। 49वें सोपान में रचना प्रेमियों ने प्रिय रचनाकारों की रचनाओं का पाठ किया।
एसीएन टाइम्स @ रतलाम । किसी शहर की पहचान वहां की रचनात्मकता से होती है। सृजनशीलता से शहर जीवंत बनता है और उसकी पहचान वहां के रचनात्मक लोगों से होती है। शहर में रचनात्मक वातावरण बनाने और रचनाशीलता से जुड़े लोगों को पठन-पाठन के प्रति आकर्षित करने के उद्देश्य से प्रारंभ किए गए आयोजन ‘सुनें सुनाएं’ ने पांचवें वर्ष में प्रवेश किया।
जी. डी. अंकलेसरिया रोटरी हॉल, रतलाम में आयोजित 49वें सोपान में उपस्थित सुधिजन ने आयोजन की समयबद्धता और स्व-अनुशासन की सराहना की। निर्धारित समय पर शुरू होकर निर्धारित समय पर समाप्त होने वाला यह शहर का एकमात्र आयोजन है। बीते 48 माह के दौरान आयोजन का दिन और समय कभी नहीं बदला गया। शहर के रचना प्रेमियों ने स्वप्रेरणा से उपस्थित होकर इसे निरंतर सार्थक बनाया। आयोजन के चार वर्ष के सफर में 500 से अधिक रचना प्रेमियों ने अपनी पसंद की रचनाओं का पाठ किया, जबकि डेढ़ हजार से अधिक रचना प्रेमी इससे जुड़े हैं।
रचना प्रेमियों ने किया प्रिय रचनाकारों की रचनाओं का पाठ
49वें सोपान में रचना प्रेमियों ने अपने प्रिय रचनाकारों की रचनाओं का पाठ किया। छत्रपाल सिंह ‘दाताहोकम’ ने पंडित श्याम नारायण पांडे की रचना ‘थाल सजाकर किसे पूजने चले’, कीर्ति शर्मा ने रमेश रंजक की रचना ‘दमन की चक्की पीस रही इंसान’, लाखन सिंह मीणा ने श्री सतीश सृजन की रचना ‘याज्ञसेनी’ और ओमप्रकाश मिश्र ने नीलेश मिश्रा की रचना ‘हम अपने फ़ोन में ढूंढ क्या रहे हैं’ का पाठ किया।
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अपनी रचना का पाठ नहीं, प्रिय रचनाकार को पढ़ने की परंपरा
‘सुनें सुनाएं’ की खासियत यह है कि इसमें कोई भी व्यक्ति अपनी रचना का पाठ नहीं करता। आयोजन में प्रतिभागी अपने प्रिय रचनाकार की एक रचना का पाठ बिना किसी भूमिका के निर्धारित समय में करते हैं। यही विशिष्टता इसे अन्य साहित्यिक आयोजनों से अलग पहचान देती है।
इन सुधिजन की रही मौजूदगी
आयोजन में प्रो. रतन चौहान, गुस्ताद अंकलेसरिया, डॉ. प्रदीप सिंह राव, अशोक अग्रवाल, ललित चौरड़िया, श्रीराम दिवे, मुकेश व्यास, ऋषिकेश शर्मा, सुभाष यादव, मांगीलाल नगावत, आई. एल. पुरोहित, मणिलाल पोरवाल, रीता दीक्षित, सांत्वना शुक्ला, गजेंद्र सिंह चाहर, आशा श्रीवास्तव, डॉ. गोविंद प्रसाद डबकरा, लक्ष्मी कुंवर, ज्योत्स्ना तिवारी, डॉ. गीता दुबे, नरेन्द्र तिवारी, प्रो. दिनेश राजपुरोहित, जितेन्द्र सिंह पथिक, यू. एल. जायसवाल, गजेन्द्र सिंह चौहान, शाश्वत आलोक, पद्माकर पागे, दुष्यंत कुमार व्यास, राजेन्द्र सेन, शैलेन्द्र शितूत, सत्यनारायण सोढ़ा, गफ्फार मंसूरी, हीरालाल खराड़ी, प्रकाश केरवार, ज्योति केरवार, वाजिद हुसैन ख़ान, महावीर वर्मा और आशीष दशोत्तर सहित शहर के सुधिजन मौजूद रहे।
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