सौहार्द का संस्करण : आदर्श गुरु प्रो. अज़हर हाशमी जी को गुरु पूर्णिमा पर सादर नमन- श्वेता नागर
गुरु पूर्णिमा पर लेखिका श्वेता नागर का विशेष लेख। इसमें प्रो. अज़हर हाशमी के व्यक्तित्व, कृतित्व, मानवीय मूल्यों, सौहार्द, राष्ट्रभावना और आदर्श गुरु के रूप में उनके प्रेरणादायी जीवन का भावपूर्ण स्मरण किया गया है।
श्वेता नागर
"गुरु यानी / शिष्य के मन में सद्ज्ञान का संचरण।
गुरु यानी / व्यवहार के धरातल पर आदर्श का आचरण।
गुरु यानी / समस्या के अंधकार में आलोक का अवतरण।
गुरु यानी / संकीर्णता-निवारण में सौहार्द का संस्करण।"
अपनी इन काव्य-पंक्तियों को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि अपने संपूर्ण आचरण और जीवन-दर्शन में चरितार्थ करने वाले आदर्श गुरु प्रो. अज़हर हाशमी जी वास्तव में "सौहार्द का संस्करण" थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समाज में शांति, सद्भाव और मानवीय मूल्यों के यज्ञ में समर्पित कर दिया। इस यज्ञ की समिधा के रूप में उन्होंने अपनी भौतिक सुख-सुविधाओं तक का त्याग कर दिया।
आज वे भले ही दैहिक रूप से हमारे बीच उपस्थित नहीं हैं, किंतु उनके विचार, उनके संस्कार और उनकी शिक्षाएँ हजारों शिष्यों के जीवन में आज भी स्पंदित हैं। उन्होंने अपने शिष्यों के संस्कारों की भूमि में जो चिंतन का बीज बोया था, वह आज केवल एक पौधा नहीं, बल्कि एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है, जिसकी जड़ें भारतीय संस्कृति, मानवीय मूल्यों और राष्ट्रभावना की मिट्टी को दृढ़ता से थामे हुए हैं।
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प्रो. अज़हर हाशमी जी विलक्षण और बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। उनके व्यक्तित्व में इंद्रधनुष की भाँति अनेक रंग समाहित थे। वे कर्मयोग का संदेश देने वाली श्रीमद्भगवद्गीता के गहन अध्येता थे। साथ ही जैन दर्शन के मर्मज्ञ, कुरआन शरीफ़, बाइबिल तथा सिख धर्म की शिक्षाओं के गंभीर अध्येता और सूफ़ी परंपरा के उच्चकोटि के साधक भी थे। राम, कृष्ण और शिव जैसे सनातन आदर्श उनके साहित्य की आत्मा थे। यही कारण है कि उनका विविधतापूर्ण व्यक्तित्व और साहित्य उनके जीवनकाल में ही शोध का विषय बना। किसी साहित्यकार के लिए यह अत्यंत दुर्लभ और विशिष्ट उपलब्धि है।
मानवीय मूल्यों की राह पर चलते हुए उन्होंने जीवनभर अनेक चुनौतियों और कटुताओं का सामना किया। अनेक बार विरोध और उपेक्षा के कंटकों ने उनके विचारों को लहूलुहान करने का प्रयास किया, किंतु वे कभी रुके नहीं। वे और अधिक दृढ़ता, ऊर्जा तथा संवेदनशीलता के साथ समाज के बीच सक्रिय रहे। उनका लेखन, उनकी वाणी और उनका व्यवहार—तीनों समाज सेवा के सशक्त माध्यम बने।
संवेदनशीलता पर उनकी यह कविता आज भी मानवीय करुणा का सरल और गहरा अर्थ समझाती है-
"इस तरह समझ लीजिए संवेदनशीलता को,
जिस तरह समझते हैं हम मरहम-पट्टी को।"
(अर्थात् दुःख के घाव की मरहम-पट्टी है संवेदनशीलता।)
वीरभूमि राजस्थान के झालावाड़ जिले के पिड़ावा में जन्मे प्रो. अज़हर हाशमी जी ने रतलाम को अपनी कर्मभूमि बनाया। अपने विद्यार्थियों और शिष्यों के बीच उनकी लोकप्रियता का अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि जब-जब उनका स्थानांतरण अन्यत्र हुआ, तब-तब उनके विद्यार्थियों ने उनके समर्थन में आंदोलन किए। अंततः शासन को भी गुरु और शिष्यों के इस अटूट संबंध के आगे झुकना पड़ा।
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"मुझको राम वाला हिंदुस्तान चाहिए" और "बेटियाँ शुभकामनाएँ हैं" जैसी उनकी कालजयी रचनाएँ आज भी समाज को राष्ट्रप्रेम, सांस्कृतिक चेतना और मानवीय संवेदनाओं का संदेश देती हैं।
ज्योतिषशास्त्र की विभिन्न विधाओं में पारंगत होने के बावजूद उन्होंने कभी इसे व्यवसाय नहीं बनाया, बल्कि समाज सेवा का माध्यम बनाया। त्याग, तपस्या और सादगी उनके जीवन के आधार थे। उन्होंने कभी भौतिक सुख-सुविधाओं को महत्व नहीं दिया। उनका संपूर्ण जीवन राष्ट्र, समाज और मानवता के लिए समर्पित रहा।
महर्षि दधीचि ने सत्य और धर्म की रक्षा के लिए अपनी अस्थियों तक का दान कर दिया था। उसी प्रकार प्रो. अज़हर हाशमी जी ने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण राष्ट्र और समाज को समर्पित कर दिया। उनकी प्रत्येक श्वास और प्रत्येक धड़कन में राष्ट्रहित ही सर्वोपरि था।
शिष्यों के जीवन से अज्ञान, निराशा और संकीर्णता का अंधकार दूर कर ज्ञान, संवेदना और सौहार्द का प्रकाश फैलाने वाले ऐसे आदर्श गुरु प्रो. अज़हर हाशमी जी को गुरुपूर्णिमा के पावन अवसर पर हम सभी शिष्य श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं।
(लेखिका श्वेता नागर पेशे से शिक्षक हैं।)






