चौबे जी गए थे छब्बे बनने, दुबे बनकर लौटे ! पार्टी का झंडा लेकर राजनीति चमकाने पहुंचे कांग्रेसियों को दोबत्ती चौपाटी के दुकानदारों ने दिया झटका, बोले- हमें रोजी-रोटी चाहिए, राजनीति नहीं

रतलाम की दो बत्ती चौपाटी हटाने के विरोध में कांग्रेस के प्रदर्शन के दौरान दुकानदारों के बीच मतभेद सामने आए। एक वर्ग ने कांग्रेस के झंडे पर आपत्ति जताकर अलग ज्ञापन सौंपा।

चौबे जी गए थे छब्बे बनने, दुबे बनकर लौटे ! पार्टी का झंडा लेकर राजनीति चमकाने पहुंचे कांग्रेसियों को दोबत्ती चौपाटी के दुकानदारों ने दिया झटका, बोले- हमें रोजी-रोटी चाहिए, राजनीति नहीं
रतलाम की चाट-चौपाटी विवाद में कांग्रेस की फजीहत।

एसीएन टाइम्स @ रतलाम । चौबे जी गए थे छब्बे बनने, दुबे बनकर लौटे...” स्टेडियम मार्केट के सामने लगने वाली चौपाटी के दुकानदारों के समर्थन में नगर निगम का घेराव करने पहुंची कांग्रेस पर यह कहावत सटीक बैठती है। उजड़ते कारोबार को बचाने के लिए जूझते दुकानदारों ने पार्टी का झंडा लेकर हमदर्दी जताकर राजनीतिक चमकाने आए कांग्रेसियों को करारा झटका दिया। उन्होंने दो-टूक शब्दों में कह दिया कि- हमें रोजी-रोटी चाहिए, राजनीति नहीं। इससे सबसे ज्यादा फजीहत शहर कांग्रेस अध्यक्ष शांतिलाल वर्मा की हुई है।

हुआ यूं कि मंगलवार को नगर निगम का अमला जेसीबी और पोकलेन लेकर स्टेडियम मार्केट से सामने लगने वाली चौपाटी से अतिक्रमण हटाने पहुंचा था। निगम ने यहां 50 से अधिक ठेला और दुकान संचालकों को हटाने की कार्रवाई शुरू की। जिम्मेदारों का इशारा मिलते ही जेसीबी गरज उठीं एक एक छोर से सीमेंट-कांक्रीट का फर्श उखाड़ना शुरू कर दिया। इससे दुकानदारों में हड़कंप मच गया। रोजी-रोटी का सवाल सामने था, लिहाजा विरोध भी शुरू हो गया। जानकारी मिलने पर दुकानदारों के समर्थन में जिला युवा कांग्रेस अध्यक्ष मयंक जाट और शहर महिला कांग्रेस अध्यक्ष यास्मीन शेरानी सहित अन्य नेता भी मौके पर पहुंच गए। उन्होंने भी कार्रवाई का विरोध करते हुए रोकने का प्रयास किया। नतीजतन तब कार्रवाई थम गई।

दूसरे दिन फिर गरमाया माहौल

बुधवार को कांग्रेस ने फिर मोर्चा संभाला और दुकानदारों की रोजी-रोटी छिनने का हवाला देकर महापौर प्रहलाद पटेल तथा नगर निगम प्रशासन को खूब लानत दी। यहां तक तो सबकुछ ठीक था लेकिन जैसे ही कांग्रेसी नगर निगम का घेराव करने पहुंचे तो पांसा पलट गया। वे जिन दुकानदारों के समर्थन में यहां पहुंचे थे उन्होंने ही उनसे किराना कर लिया। इसकी वजह कांग्रेसियों द्वारा अपने साथ लाया गया पार्टी का झंडा था। झंडा देखते ही दुकानदार में दो फाड़ हो गई। एक धड़े ने कांग्रेसियों के साथ चौपाटी हटाने के विरोध में धरना दिया जबकि दूसरे धड़े ने पार्टी नेताओं को को आड़े हाथ ले लिया। उन्होंने साफ कह दिया कि उनका मुद्दा रोजी-रोटी से जुड़ा है, राजनीति से नहीं।

इसके बाद दुकानदारों के एक धड़े ने कांग्रेस और कांग्रेस के झंडे से दूरी बनाई। उन्होंने नगर निगम में अपना अलग ज्ञापन सौंप दिया। यानी तस्वीर कुछ ऐसी बनी कि- मुद्दा एक था, परेशानी एक थी, निगम के खिलाफ शिकायत भी एक थी... लेकिन कांग्रेस के झंडे ने दूध में नीबू का काम किया। सार्वजनिक रूप से किरकिरी होने के बाद शहर अध्यक्ष वर्मा को अपनी दुकान के सामने मजमा लगाना पड़ा। वे यहीं से जनता के साथ खड़े होने की बात कहते नजर आए। यह बात दीगर है उनकी यह बात सुनने के लिए जनता के बजाय उनकी पार्टी के लोग ही मौजूद थे।

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शहर अध्यक्ष की हुई फजीहत, महापौर ने बटोर ली वाहवाही

एक दिन पूर्व तक दुकानदार जिस कांग्रेस को महत्व दे रहे थे वहे बुधवार को उसके खिलाफ नजर आए। इसे लेकर सोशल मीडिया में काफी चर्चा हो रही है। कांग्रेस की इस फजीहत के लिए लोग शहर कांग्रेस अध्यक्ष शांतिलाल वर्मा और उनकी नेतृत्व क्षमता को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। किसी का कहना है कि कांग्रेस को दुकानदारों का दर्द समझना चाहिए था, तो कोई इसे कांग्रेस द्वारा मुद्दे को राजनीतिक रंग देने की कोशिश का नतीजा बता रहा है। 

एक ओर जहां कांग्रेस की फजीहत हुई वहीं दूसरी ओर महापौर प्रहलाद पटेल ने इस अवसर को न सिर्फ भुना लिया वरन् वाहवाही भी लूट ली। उन्होंने राजीव गांधी सिविक सेंटर में स्थान देने का आश्वासन दिया तो कांग्रेस से किनारा करने वाले दुकानदारों ने उनकी शान में कसीदे गढ़ने शुरू कर दिए।

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इन्हें रास नहीं आया सिविक सेंटर का विकल्प

महापौर द्वारा सुझाए गए विकल्प को लेकर कुछ व्यवसायी सहमत नहीं हैं। उन्होंने महापौर पर गंभीर आरोप लगाए हैं। खुद को स्ट्रीट फूड वेंडर संघ का पदाधिकारी बताने वाले एक व्यवसायी का कहना है कि महापौर इस संवेदनशील मुद्दे पर ओछी राजनीति कर रहे है। उसका आरोप है कि महापौर से जुड़े गिने-चुने लोगों को सिविक सेंटर ले जाकर जनता भ्रमित किया जा रहा है। वे सिविक सेंटर या सुभाष कॉम्प्लेक्स जैसी जगहों पर जाने के लिए तैयार नहीं हैं, क्योंकि वहां न तो उन्हें ग्राहक मिलेंगे और न ही उनका व्यापार चलेगा। नतीजतन उनका परिवार भुखमरी की कगार पर आ जाएगा।