अहम् फैसला ! 60 साल से शासकीय मंदिर की जमीन पर था कब्जा, कोर्ट ने खारिज कर दिया स्वामित्व का दावा

ग्राम कुंवरवाड़ा के शासकीय मंदिर श्री नागेश्वरजी की भूमि पर स्वामित्व का दावा जिला न्यायालय ने खारिज कर दिया। 60 वर्ष से कब्जे के दावे को भी पर्याप्त प्रमाण नहीं मिला।

अहम् फैसला ! 60 साल से शासकीय मंदिर की जमीन पर था कब्जा, कोर्ट ने खारिज कर दिया स्वामित्व का दावा
शासकीय मंदिर की मजीन पर मालिकाना हक के दावे को कोर्ट ने किया खारिज। (AI जनरेटेड इमेज)

एसीएन टाइम्स @ रतलाम। करीब 60 साल से जमीन पर कब्जा और खेती करने का दावा भी किसी व्यक्ति को उसका मालिक साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। रतलाम जिले के कुंवरवाड़ा में शासकीय मंदिर श्री नागेश्वरजी की भूमि को लेकर चल रहे विवाद में सप्तम जिला न्यायाधीश राजेश नामदेव की अदालत ने यह महत्वपूर्ण बात स्पष्ट करते हुए जमीन पर स्वामित्व का दावा खारिज कर दिया है। अदालत ने वादी कृष्णकुमार पिता मांगीलाल तेली की अपील निरस्त करते हुए विवादित भूमि पर राज्य शासन का स्वत्व एवं स्वामित्व बरकरार रखा है।

मामले में वादी की ओर से दावा किया गया था कि वह विवादित भूमि पर 60 वर्ष से अधिक समय से शांतिपूर्ण और निरंतर कब्जे में है तथा खेती करता आ रहा है। इसी आधार पर प्रतिकूल आधिपत्य के जरिए भूमि का स्वामित्व हासिल होने का दावा करते हुए राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज करने और राज्य शासन की ओर से बेदखली की कार्रवाई रोकने की मांग की गई थी।

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कोर्ट ने पूछा- कब्जा कब से और किस अधिकार के विरुद्ध?

अपील पर सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पाया कि वादी यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित नहीं कर सका कि वह किस निश्चित तारीख से भूमि पर कब्जे में आया, कब्जा किस प्रकृति का था और वास्तविक स्वामी के अधिकार के प्रतिकूल उसका कब्जा कब से और किस तरह रहा। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी जमीन पर लंबे समय तक कब्जा होना मात्र प्रतिकूल आधिपत्य के आधार पर स्वामित्व हासिल करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए कब्जे से जुड़े आवश्यक तथ्यों का स्पष्ट और पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत करना जरूरी है।

राजस्व रिकॉर्ड में मंदिर की जमीन, प्रबंधक कलेक्टर

न्यायालय ने खसरा, खतौनी, राजस्व अभिलेख और अन्य दस्तावेजों के परीक्षण में पाया कि विवादित भूमि श्री नागेश्वरजी मंदिर, कुंवरवाड़ा की भूमि है। अभिलेखों में इसके प्रबंधक के रूप में कलेक्टर, रतलाम का नाम दर्ज है। इसके विपरीत वादी ऐसा कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका, जिससे वह विवादित भूमि का स्वामी साबित हो सके।

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1984 से चल रहा है जमीन का विवाद

इस भूमि को लेकर वर्ष 1984 से न्यायालयीन विवाद चला आ रहा है। वर्ष 1984 में प्रस्तुत व्यवहार वाद वर्ष 1992 में निरस्त हुआ था। इसके खिलाफ प्रथम अपील भी वर्ष 1992 में निरस्त हुई, जबकि द्वितीय अपील का वर्ष 2011 में निराकरण हुआ। इसके बाद वर्ष 2016 में पुनः समान प्रकृति का व्यवहार वाद प्रस्तुत किया गया।

अतिरिक्त व्यवहार न्यायाधीश, सैलाना ने 31 अक्टूबर 2025 को कृष्ण कुमार व अन्य का दावा निरस्त कर दिया था। इसी निर्णय के खिलाफ कृष्ण कुमार ने जिला न्यायालय में अपील की थी, जिसे अब सप्तम जिला न्यायाधीश राजेश नामदेव ने भी निरस्त कर दिया।

अतिक्रमण हटाने की सरकारी कार्रवाई को कोर्ट ने माना वैध

न्यायालय ने यह भी माना कि वादी के विरुद्ध अतिक्रमण संबंधी कार्रवाई और कारण बताओ सूचना पत्र जारी किए गए थे। कलेक्टर और तहसीलदार द्वारा वादी के कब्जे में कोई अवैध हस्तक्षेप नहीं किया गया। राज्य शासन की ओर से की जा रही कार्रवाई को न्यायालय ने अवैध हस्तक्षेप नहीं माना।

निर्णय की प्रति कलेक्टर, रतलाम और तहसीलदार, रावटी को भेजते हुए न्यायालय ने उन्हें विधि अनुसार कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र किया है। प्रकरण में राज्य शासन की ओर से शासकीय अधिवक्ता समरथ पाटीदार ने पैरवी की।

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