पिता का साया उठा तो लोग बोले- "अब नहीं पढ़ पाएगी” …मां ने सींगदाने-चने बेचे, पापड़ बेले और बेटी को बना दिया MBBS डॉक्टर

पिता के निधन के बाद मां ने चने-सींगदाने बेचकर बेटियों को पढ़ाया। कठिन संघर्ष के बीच खुशबू बाहेती ने MBBS कर डॉक्टर बनकर मां के सपने को साकार किया।

Apr 14, 2026 - 18:53
Apr 14, 2026 - 18:54
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पिता का साया उठा तो लोग बोले- "अब नहीं पढ़ पाएगी” …मां ने सींगदाने-चने बेचे, पापड़ बेले और बेटी को बना दिया MBBS डॉक्टर
सींगदाने-चने बेचने वाली सरलादेवी बाहेती की बेटी डॉ. खुशबू बनीं एमबीबीएस डॉक्टर।

नीरज कुमार शुक्ला

दिसंबर 2015…,

150

एक हादसा…

500
200

और पूरा परिवार बिखर गया।

रतलाम के न्यू रोड क्षेत्र में किराए के मकान में रहने वाले दिलीप बाहेती, जो सींगदाने और चने बेचकर परिवार चलाते थे, घर की सीढ़ियों से गिर पड़े। उन्हें सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया… लेकिन जिंदगी नहीं बच सकी।

उस दिन सिर्फ एक इंसान नहीं गया...
घर का सहारा ही चला गया था।

पीछे रह गईं- पत्नी सरला देवी… और तीन बेटियां- निकिता, भूमिका और सबसे छोटी खुशबू।

आर्थिक हालात इतने खराब थे कि सबसे बड़ा सवाल यही था कि, अब घर चलेगा कैसे… और बेटियों की पढ़ाई कैसे होगी?”

लोगों ने तो यहां तक कह दिया कि-
अब ये बेटियां कैसे पढ़ पाएंगे, शायद अब ये नहीं पढ़ पाएंगे...”

लेकिन सरला देवी ने ये मानने से इनकार कर दिया।

पति का काम… चने और सींगदाने बेचने का…
उन्होंने खुद संभाल लिया।
साथ में पापड़ बेले… सिलाई की…
यहां तक कि हॉस्टल में खाना बनाने का काम भी किया।

दिन भर काम… रात में चिंता…
लेकिन एक चीज कभी नहीं टूटी-
अपनी बेटियों को पढ़ाने की जिद।

वे खुद कहती हैं-
रहन-सहन और खाने-पीने में मैं अपनी बेटियों को ज्यादा सुख नहीं दे पाई… लेकिन उनकी पढ़ाई में कभी समझौता नहीं किया।”

आर्थिक तंगी के बावजूद बेटियों को अच्छे स्कूल में पढ़ाया।
यहां माहेश्वरी समाज भी साथ खड़ा हुआ।

उधर खुशबू…
जब पिता का निधन हुआ, तब वह 10वीं कक्षा में थी।
परीक्षा सामने थी… रिजल्ट आना बाकी था…
पिता के रूप में आधार छूटा था... दिल टूटा था, लेकिन हिम्मत नहीं टूटी।

तीनों बहनों ने पिता के जाने का दर्द सहा…
लेकिन उसे अपने और अपनी मां के सपनों के रास्ते में नहीं आने दिया।
बड़ी बेटी निकिता का 5 वर्ष पूर्व और भूमिका का एक वर्ष पूर्व विवाह हो चुका है। जमाई ऐसे मिले जो बेटे की कमी खलने ही नहीं देते।

सरला देवी की एक अधूरी कहानी भी इस संघर्ष के पीछे थी।

वे खुद नर्स बनना चाहती थीं…
लेकिन उनके पिता ने उन्हें आगे नहीं पढ़ने दिया।
इसलिए उन्होंने ठान लिया था-
मैं नहीं पढ़ सकी… लेकिन मेरी बेटियां जरूर पढ़ेंगी।”

और फिर एक और जिद जुड़ी-
बेटी को डॉक्टर बनाऊंगी… यदि संभव नहीं हुआ तो नर्स तो जरूर बनाऊंगी।”

एक मां की ऐसी जिद देख एक जमाई ने बेटी की तरह उनके सपने को साकार करने में सहभागिता निभाई।

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खुशबू का एडमिशन एलन इंस्टिट्यूट में करवाया गया ताकि वह डॉक्टर बनने की दिशा में पहला कदम बढ़ा सके। फीस की पहली इंस्टॉलमेंट भी जमाई ने ही भरी।

पिता नहीं होने से फीस में कुछ रियायत मिली… जो नाकाफी थी...
जब यह बात माहेश्वरी समाज को पता चली
, तो मदद का हाथ आगे आया।

समाज के मानधन्या जी ने सहयोग किया और फीस में और कमी करवाई…
मेधावी छात्रा होने का फायदा भी खुशबू को मिला।

आगे की पढ़ाई के लिए मंदसौर के एक शिक्षक का मार्गदर्शन भी मिला।

और फिर…
सालों की मेहनत ने रंग दिखाया।

खुशबू बाहेती आज MBBS डॉक्टर बन चुकी हैं।

जिन हालातों में लोग सपने देखना छोड़ देते हैं…
वहां इस बाहेती परिवार ने सपना जिया… और उसे सच कर दिया।

घर में आज भी आंसू हैं…
लेकिन अब ये आंसू दर्द के नहीं—
एक मां का सपना साकार होने के, गर्व के और बेटी खुशबू की सफलता की खुशी के हैं।

डॉ. खुशबू आगे की पढ़ाई भी जारी रखना चाहती हैं।
और अपनी इस सफलता का श्रेय वे बार-बार अपनी मां को देती हैं।

डॉ. खुशबू बाहेती भावुक होकर कहती हैं-

मां… ‘थैंक्यू’ शब्द बहुत छोटा है आपके लिए।
आपने सिर्फ मुझे पढ़ाया ही नहीं, बल्कि हर उस मुश्किल से लड़ना भी सिखाया, जो रास्ते में आई।

मुझे आज भी वो दिन याद हैं… जब आप खुद थकी होती थीं, लेकिन दीदी और मेरे लिए मुस्कुराती थीं।
जब घर में पैसों की कमी होती थी, तब भी आपने कभी मेरी पढ़ाई को रुकने नहीं दिया।
आपने अपनी जरूरतों को हमेशा पीछे रखा… और मेरे सपनों को आगे।

पापा के जाने के बाद भी आपने हमें कभी टूटने नहीं दिया।
आपने मां और पिता, दोनों की जिम्मेदारी निभाई।

आज मैं जो भी हूं…
इस सफेद कोट के पीछे आपकी मेहनत, आपका त्याग और आपका विश्वास है।

आप खुद अपने सपने पूरे नहीं कर पाईं…
लेकिन आपने मेरे जरिए उन्हें जिया… और सच कर दिखाया।

मैं वादा करती हूं कि मैं एक अच्छी डॉक्टर बनूंगी-
सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि आपके हर त्याग को सार्थक करने के लिए।

थैंक्यू मां…

मुझे इस मुकाम तक पहुंचाने के लिए…

और सबसे जरूरी- मुझ पर कभी विश्वास न खोने के लिए…”

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Niraj Kumar Shukla 1994 से अब तक पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय। इस दौरान सांध्य दैनिक 'रतलाम दर्शन' और हिंदी दैनिक 'साभार दर्शन', 'चेतना', 'नवभारत' और 'दैनिक भास्कर' सहित विभिन्न समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं में पूर्णकालिक संवाददाता, उप-संपादक और समाचार संपादक जैसे दायित्वों का निर्वहन किया। हिंदी ब्लॉगर और स्वतंत्र लेखन के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय रहते हुए वर्तमान में समाचार पोर्टल www.acntimes.com के मुख्य संपादक के दायित्व में। वर्ष 2011 से अब तक मप्र सरकार से राज्य स्तरीय अधिमान्यता प्राप्त पत्रकार। पत्रकारिता में आने से पूर्व और बाद के कुछ वर्षों तक अध्यापन भी किया।