नाम में ‘फूल’ - हौसला 'फौलादी' ! गरीब मजदूर के घर से संसद तक पहुंचे फूलचंद वर्मा के प्रेरक राजनीतिक सफर की कहानी...
12 जून जयंती विशेष। स्वर्गीय फूलचंद वर्मा का संघर्षपूर्ण जीवन, पांच बार सांसद बनने का सफर, आपातकाल में जेल यात्रा, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग में योगदान और सामाजिक न्याय के लिए उनके कार्यों पर विशेष लेख।
12 जून जयंती विशेष: शोषित-वंचित समाज की बुलंद आवाज थे स्व. फूलचंद वर्मा
एसीएन टाइम्स @ इंदौर । भारतीय राजनीति में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनका जीवन संघर्ष, सेवा, ईमानदारी और संगठन निष्ठा का पर्याय बन जाता है। स्व. फूलचंद वर्मा ऐसे ही जननेता थे, जिन्होंने अत्यंत साधारण और अभावग्रस्त परिवार से निकलकर देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्थाओं तक अपनी पहचान बनाई। 12 जून 2026 को उनकी जयंती के अवसर पर उनके जीवन संघर्ष, राजनीतिक योगदान और सामाजिक प्रतिबद्धता को स्मरण करना न केवल प्रासंगिक है, बल्कि नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत भी है।
फूलचंद वर्मा का जन्म 12 जून, 1939 में इंदौर के कुमारखेड़ी क्षेत्र में एक अत्यंत गरीब परिवार में हुआ था। उनके पिता मिल मजदूर थे और परिवार आर्थिक अभावों से जूझता था। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने शिक्षा को अपना आधार बनाया और अध्यापन कार्य करते हुए बी.ए. विशारद तक की शिक्षा प्राप्त की। रोजगार कार्यालय में नौकरी करते हुए भी उनका मन समाज और राष्ट्र सेवा में रमा रहा। इसी दौरान वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यों से जुड़े और बाल्यकाल से ही स्वयंसेवक के रूप में संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय हो गए।
संघ कार्यकर्ता से विधायक बनने तक का सफर
उनकी कार्यक्षमता, जनसंपर्क और संगठन निष्ठा को देखते हुए तत्कालीन संघ पदाधिकारी जुगल किशोर परमार और मोरू भैया गजरे ने उन्हें पंधाना विधानसभा क्षेत्र की अनुसूचित जाति आरक्षित सीट से चुनाव लड़ने का अवसर दिया। जनता के विश्वास और अपने अथक परिश्रम के बल पर उन्होंने चुनाव में विजय प्राप्त की और वर्ष 1967 की ऐतिहासिक संविद सरकार में उपवित्त मंत्री के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली। यह उस दौर में सामाजिक रूप से वंचित वर्ग से आने वाले किसी व्यक्ति के लिए बड़ी उपलब्धि थी।
जनसंघ से संसद तक, पांच बार बने सांसद
वर्मा भारतीय जनसंघ के मध्यप्रदेश संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए संयुक्त सचिव बने। वर्ष 1971 में उन्होंने भारतीय जनसंघ के प्रत्याशी के रूप में उज्जैन संसदीय क्षेत्र से लोकसभा चुनाव जीता। इसके बाद वे देवास-शाजापुर संसदीय क्षेत्र से लगातार चार बार सांसद निर्वाचित हुए। इस प्रकार वे कुल पांच बार भारतीय संसद के सदस्य रहे। संसद में उनकी पहचान एक गंभीर, अध्ययनशील, प्रखर वक्ता और कुशल संसदीय नेता के रूप में स्थापित हुई।
आपातकाल में लोकतंत्र की रक्षा के लिए जेल यात्रा
भारत के लोकतांत्रिक इतिहास के सबसे कठिन दौर, आपातकाल के समय भी फूलचंद वर्मा पीछे नहीं हटे। लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करते हुए उन्होंने लगभग 14 महीने इंदौर और बेगमगंज जेल में बिताए। उनकी यह जेल यात्रा केवल राजनीतिक विरोध नहीं थी, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता का प्रमाण थी।
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राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
वर्ष 2004 में भारत के राष्ट्रपति द्वारा उन्हें राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का सदस्य नियुक्त किया गया। इस पद पर रहते हुए उन्होंने अनुसूचित जाति वर्ग के अधिकारों, सम्मान और सामाजिक न्याय के मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी ढंग से उठाया। वे केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि शोषित, पीड़ित और वंचित समाज की सशक्त आवाज थे। आज भी देशभर में अनुसूचित जाति वर्ग के अनेक परिवार उन्हें सम्मान और श्रद्धा से याद करते हैं।
दीनदयाल से अटल तक, राष्ट्रीय नेतृत्व के विश्वसनीय सहयोगी
फूलचंद वर्मा ने भारतीय राजनीति के अनेक दिग्गज नेताओं के साथ कार्य किया। उनमें प्रमुख रूप से पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, प्यारेलाल खंडेलवाल, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी जैसे राष्ट्रीय नेताओं के नाम शामिल हैं। विशेष रूप से पंडित दीनदयाल उपाध्याय के साथ उनके निकट कार्य संबंधों ने उनके राजनीतिक चिंतन और जनसेवा के दृष्टिकोण को गहराई प्रदान की।
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41 वर्षों का बेदाग सार्वजनिक जीवन
लगभग 41 वर्षों के सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में फूलचंद वर्मा की पहचान एक ईमानदार, सादगीपूर्ण, संगठननिष्ठ और कुशल प्रशासक के रूप में बनी रही। राजनीति में रहते हुए भी उन्होंने व्यक्तिगत स्वार्थ के बजाय जनहित और संगठन को प्राथमिकता दी। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि आर्थिक अभाव किसी व्यक्ति की सफलता में बाधा नहीं बनते, यदि उसके भीतर दृढ़ इच्छाशक्ति, ईमानदारी और समाज सेवा का संकल्प हो।
आज भी प्रेरणा हैं फूलचंद वर्मा
एक गरीब अनुसूचित जाति परिवार में जन्म लेकर विधायक, मंत्री, पांच बार सांसद और राष्ट्रीय आयोग के सदस्य बनने तक का उनका सफर भारतीय लोकतंत्र की शक्ति और सामाजिक समरसता का जीवंत उदाहरण है। 12 जून को उनकी जयंती पर उन्हें स्मरण करना केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उन मूल्यों को याद करना है जिन पर उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया- राष्ट्रसेवा, सामाजिक न्याय, लोकतंत्र और संगठन निष्ठा। अब उनकी इस राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं उनके पुत्र राजेंद्र वर्मा (पूर्व विधायक)।
स्व. फूलचंद वर्मा का जीवन आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देता है कि संघर्ष चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, निष्ठा, परिश्रम और ईमानदारी से हर लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।







