अतीत की स्मृतियों से... एक सिगरेट, एक स्वीकारोक्ति और जीवन बदल देने वाली सीख- डॉ. श्वेता विंचुरकर

डॉ. श्वेता विंचुरकर का प्रेरणादायक संस्मरण, जिसमें एक बच्चे, उसके पिता और सिगरेट की आदत से जुड़ा अनुभव यह बताता है कि बच्चे उपदेशों से अधिक बड़ों के आचरण से सीखते हैं। देखें- माता-पिता और शिक्षकों के लिए महत्वपूर्ण संदेश।

अतीत की स्मृतियों से... एक सिगरेट, एक स्वीकारोक्ति और जीवन बदल देने वाली सीख- डॉ. श्वेता विंचुरकर
डॉ. श्वेता विंचुरकर ने साझा किया एक प्रेरक प्रसंग।

अंतरराष्ट्रीय तंबाकू निषेध दिवस की स्मृतियों के बीच डॉ. श्वेता विंचुरकर का एक मार्मिक अनुभव, जो बताता है कि बच्चों पर सबसे गहरा प्रभाव हमारे व्यवहार का पड़ता है।

डॉ. श्वेता विंचुरकर

"बड़े जो कहते हैं वो बच्चे नहीं करते लेकिन बिना कहे भी बड़े जो आचरण कर रहे होते हैं, बच्चे उसे जरूर करते हैं।"

यह अनुभव मुझे कई बार हुआ।

बात कई सालों पहले की है जब क्लास में पढ़ाने के दौरान एक बच्चे के पास सिगरेट मिली, वह तब 13 या 14 साल का रहा होगा।

जब वह पकड़ा गया, तो फौरन उसने कहा- 'यह सिगरेट उसकी है ही नहीं, किसी और ने उसके पॉकेट में डाल दी।'

संभव है, इस उम्र में बच्चे शरारतें करते हैं।

...लेकिन मैं उसकी आँखों में वह शरारत नहीं देख पाई, कुछ देर तक उसे और प्रश्नों में घेरा, पर उसने कुछ नहीं बताया।

मेरा हमेशा से ही यह मानना रहा है कि इन गलतियां पर सजा से ज्यादा सही समझाइश की जरूरत होती है। बहरहाल हमने उसके पिताजी को यह बता देना उचित समझा और उनको बुलवाया।

चर्चा के दौरान बहुत समझदारी से हमने उनके सामने यह बात रखी।

उनका जवाब ज़ाहिर सा था-
'घर में तो कोई सिगरेट नहीं पीता', फिर उन्होंने बेटे को कड़े स्वर में डांटा और पूछा कि- 'यह सब क्या है?'

बच्चा खामोश रहा, सिर झुकाकर खड़ा रहा।

पिता ने कहा-
'वे इस बात का ध्यान रखेंगे', इतना कह कर वे चले गए, लेकिन उस बच्चे की खामोशी और झुकी नजरों ने मुझे बेचैन कर दिया।

मैंने अकेले में उससे बात की, थोड़ा और उसे समझने का प्रयास किया लेकिन वो कुछ भी बताने की स्थिति में नहीं था। मैंने भी उसे जाने की अनुमति दे दी।

अचानक उसने मुझसे पूछा-
'मुझे इस गलती के लिए क्या पनिशमेंट मिलेगा?

मैंने उससे ऐसे प्रश्न की अपेक्षा नहीं की थी।

मैंने उसकी ओर प्रश्नवाचक नज़रों से देखा और कहा-
'गलती का कारण अभी भी पता नहीं चला सका, इसलिए डिसीजन पेंडिंग रहेगा।'

वह जाने लगा, दरवाजे तक पहुंचा ही होगा कि अचानक मुड़कर उसने मुझे देखा, जैसे कुछ कहना चाहता हो।

मैंने भी उचित मौका समझ कर उसे अपने पास बुलाया और कहा-
'डरो नहीं, कहो क्या कहना चाहते हो?

झुकी नजरें कुछ ऊपर हुईं, और उसने कांपते स्वर में कहा-

'आप किसी से कहेंगी तो नहीं?'

मैंने स्वीकृति में सिर हिला दिया नहीं, 'आप बेहिचक बोलो...'

उसकी आंखों में तब मैंने अपने लिए विश्वास की चमक देखी, पूरी तरह आश्वस्त होने पर वह बोला-
'पापा अपने कमरे में सिगरेट पीते हैं, मैं जब उन्हें चोरी-छिपे ऐसा करते देखता हूं तो मुझे भी ऐसा करने का मन किया। इसलिए मैं उनके कमरे से इसे ले आया, लेकिन आज जब पापा ने कहा कि हमारे घर में कोई सिगरेट नहीं पीता है तो इस बात ने मुझे हिला दिया।'

वह बोले जा रहा था-
'मुझे लगता था कि सिगरेट पीना बुरा नहीं, लेकिन सबके सामने पीना गलत है। आज जब पापा ने आपके सामने यह कह दिया कि घर में सिगरेट आती ही नहीं, तब समझा कि यह इतना गलत काम है कि वे इसे आपके सामने कबूल नहीं कर पाए।'
'मैडम, प्लीज़ ! आप मेरे पापा से मत कहना'

...और वह रोने लगा। उसके निर्मल आसुओं ने उसकी गलती को धो दिया था। उसने वादा किया कि वह आगे से ऐसा नहीं करेगा।

मन को एक सुकून मिला लेकिन अभी भी मामला पूरी तरह हल नहीं हुआ था, इसलिए एक दिन बच्चे को बिना बताए उसके पिताजी को स्कूल बुलवाया, उनसे कहा-
'बड़े जो कहते हैं, वो बच्चे नहीं करते लेकिन बिना कहे भी बड़े जो आचरण कर रहे होते हैं, बच्चे उसे जरूर करते हैं। आप मेरी इस बात पर विचार जरूर करियेगा।
एक पिता अपने बच्चे का आदर्श होता है, उसका संरक्षक होता है, उसका भरोसा होता है, और उसकी छवि में ही बच्चा अपनी छवि देखता है।
आपको लगता है कि आप घर में बच्चों से छिप कर कोई कार्य कर रहे हैं और वह उनकी जानकरी में नहीं तो यहां आप गलत हैं।
यह उम्र जिज्ञासाओं की है, इसलिए बच्चे पूछें उससे पहले हमें उनकी जिज्ञासाओं को न सिर्फ समझना चाहिए बल्कि उनका संतोषप्रद सही समाधान देते आना चाहिए।'

आज वर्षों बाद यह घटना मुझे शायद इसलिए याद आ गई कि 31 मई को अंतराष्ट्रीय तंबाकू निषेध दिवस पर हमने एक शिविर लगाया था, और कई मजदूरों का स्वास्थ्य परीक्षण करवाया। उस दिन सही मायने में उस बच्चे को मैं समझा पाई थी और उसे इस लत का शिकार नहीं होने दिया था।

संभवतः उसके पिता ने भी इस आदत से अवश्य किनारा किया होगा। उस दिन वास्तव में ईश्वर ने एक नेक कार्य सम्पन्न कराया।

आप भी याद रखें, बच्चों से जो करवाना चाहते हैं उसे कहना नहीं, पहले स्वयं के आचरण में लाना सीखें...

(लेखिका रतलाम के एक निजी स्कूल की प्राचार्य हैं)