13 साल की उम्र, 5 दिन, 5 होटल और 32 हैवान ! निर्लज्ज समाज तुझे... क्या फूलनदेवी याद है...

राजस्थान के श्रीगंगानगर में 13 वर्षीय बालिका से 32 दरिंदों द्वारा किए गए सामूहिक दुष्कर्म ने पूरे देश को झकझोर दिया। देखें, इस घटना पर व्यवस्था, न्याय प्रणाली और समाज की संवेदनहीनता पर तीखा सवाल उठाती मार्मिक प्रतिक्रिया...

13 साल की उम्र, 5 दिन, 5 होटल और 32 हैवान ! निर्लज्ज समाज तुझे... क्या फूलनदेवी याद है...
दरिंदगी पर सवाल उठाती मार्मिक प्रतिक्रिया।

क्या फूलनदेवी याद है

-डॉ. दीपक जैन

निर्लज्ज समाज तुझे चेतावनी और फरियाद है
भूल गया होगा, क्या फूलनदेवी याद है

​चौक पर खड़ा है सिस्टम।,पर आँखों में पट्टी है,
मदहोश सत्ता की गलियों में, हर फाइल एक रद्दी है।
पाँच दिन, पाँच रातें, और 32 दरिंदे बेशुमार,
एक तेरह साल की बच्ची पर, चलाती रही वह तलवार।
​वाह रे सिस्टम! धन्य है तेरी यह प्रशासनिक माया,
बेटी की चीखों से बढ़कर, तेरी कुर्सी का साया।
तूने आँकड़े गिने, तूने दफ्तर की मेजें चमकाईं,
वो पाँच दिन रोती रही, और तूने फाइलें दबीं छपाईं।
​तेरा क्या जाता है? तेरा तो घर आबाद है न?
तेरा बच्चा सोता चैन से, तू तो आज़ाद है न?
वो 32 हैवानों की भीड़ में, जब वह सिसक रही होगी,
क्या तब भी तेरी नींद में, कोई खलल मची होगी?

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​डूब मर! चुल्लू भर पानी, शायद अब कम पड़ जाए,
तेरी संवेदनाओं की लाश को, कौन अब ठिकाने लगाए?
कानून की मोटी किताबें,अब रद्दी की दुकान हैं,
जहाँ दरिंदे बेखौफ घूमें, वहाँ की क्या पहचान है?
​तूने जिम्मेदारी पहनी है, या नामर्दी का लबादा ओढ़ा है?
एक मासूम के जिस्म को, कुत्तों के आगे छोड़ा है?
तू कहता है 'बेटी बचाओ', क्या यही तेरा स्लोगन है?
जिसकी आँखों में आग नहीं, वह कैसा तेरा शासन है?
​यह रूहों का सौदा है, जो तूने सरेआम किया है,
न्याय की चौखट को तूने, खून से बदनाम किया है।
ऐ सिस्टम! सुन ले, यह चुप्पी अब टूटने वाली है,
हर बेटी अब जंजीरें काटकर, उठने वाली है।
​कल अगर तेरी दहलीज पर, वही अंधेरा छाएगा,
तब तू क्या करेगा? तब कौन तुझे बचाने आएगा?
न्याय की चिता जल रही है, और तू तमाशा देखता है,
हे निर्लज्ज सिस्टम ! तू खुद को ही, खुद में बेचता है।

(डॉ. दीपक जैन, घाटाबिल्लौद)

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'बेटियां बलि चढ़ती जाएंगी, हम तमाशा देखते रहेंगे...'

हैवानों में भी शायद उतनी हैवानियत नहीं होगी,
जितनी उन लोगों में है जो छोटी-छोटी बच्चियों तक को नहीं बख्शते हैं...
क्या कानून... क्या इंसाफ...
केस फास्ट ट्रैक पर चला दो,
छह महीने क्या, एक दिन में फैसला सुना दो,
सख्त से सख्त सज़ा दे दो...
 पर उसके बाद भी उस बच्ची को कभी इंसाफ नहीं मिलेगा !
उसका बचपन लौटकर नहीं आएगा।
उसका डर खत्म नहीं होगा...
वो जो सह चुकी है, उसे शायद पूरी ज़िंदगी भूल नहीं पाएगी !
कुछ अभागी तो अब इस दुनिया में लौटकर भी नहीं आएंगी !

नीच है वो आदमी जो अपनी हवस के लिए
लड़कियों की जिंदगियां बर्बाद कर देते हैं...
अब तो ये भी नहीं कह सकती कि ऐसे लोग नरक में जाएँगे...
क्योंकि कभी-कभी लगता है, हम नरक में ही तो जी रहे हैं...
नरक इससे बुरा तो नहीं हो सकता है !
अगर ये सब नहीं रुका, तो वो दिन दूर नहीं
जब माँ-बाप फिर से अपनी बेटियों को पढ़ाने, आगे बढ़ाने
...और अकेले बाहर भेजने से डरने लगेंगे...
उससे भी ज्यादा दुख ये होगा कि...
लोग बेटी के जन्म से ही डरने लगेंगे...
जब भी ऐसा कुछ होता है, तो सच में ये सवाल उठता है-
क्यों हम बड़ी-बड़ी बातें करते हैं कि भारत 'विश्व गुरु' बनेगा?

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क्या ऐसे बनेंगे हम विश्व गुरु?
कहाँ से आ रहे हैं ऐसे दरिंदे?
क्या इनके घरों में माँ, बहनें, बीवी या बेटियां नहीं हैं?
पुलिस प्रशासन कान खोलकर सुन लो...
अगर अभी भी आँखें नहीं खोलीं और ऐसे दरिंदों को काटना शुरू नहीं किया...
तो बेटियाँ बचेंगी ही नहीं हमारे देश में...
एक-एक करके बेटियों की बलि चढ़ती जाएंगी...
और हम बस तमाशा देखते रह जाएँगे...
पता है, किसी भी समाज की असली पहचान
उसकी ऊँची इमारतों, चमकती सड़कों से या जगमगाती दुकानों से नहीं,
बल्कि उसकी बच्चियों की, महिलाओं की सुरक्षा से होती है...
और जब बच्चियाँ सुरक्षित नहीं होतीं है,
जब बच्चियों के साथ ऐसे घिनौने अपराध होते हैं,
तो हार सिर्फ एक परिवार की नहीं, पूरे समाज की होती है, पूरे देश की होती है !

गरिमा सोनी, रतलाम

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