बड़ा मामला ! पुलिस-ATS अधिकारी बनकर डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 55 लाख की साइबर ठगी, रतलाम पुलिस ने 15 लाख फ्रीज कराए, 20 लाख की ठगी भी रोकी
रतलाम में डिजिटल अरेस्ट के नाम पर कुवैत में मोटर पार्ट्स का कारोबार करने वाले व्यक्ति से 55 लाख रुपए की साइबर ठगी। पुलिस ने 15 लाख रुपए फ्रीज कराए और 20 लाख रुपए की अतिरिक्त ठगी रोकी।
एसीएन टाइम्स @ रतलाम । रतलाम में साइबर ठगों ने एक ऑटो पार्ट्स कारोबारी को ‘डिजिटल अरेस्ट’ के जाल में फंसाकर दो दिन में 55 लाख रुपए ठग लिए। ठगों ने खुद को पुलिस और एटीएस अधिकारी बताकर पीड़ित को गंभीर आपराधिक मामले में फंसाने का भय दिखाया। लगातार फोन और वीडियो कॉल के जरिए उस पर निगरानी रखी। पुलिस यूनिफॉर्म में नजर आ रहे लोगों के वीडियो कॉल, हथियारों से संबंधित फोटो और सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के लेटरहेड जैसे दिखने वाले फर्जी दस्तावेज भी भेजे। पुलिस ने 15 लाख फ्रीज करवाए हैं और 20 लाख की अतिरिक्त ठगी भी रोकी।
पुलिस के अनुसार, पीड़ित कारोबारी रतलाम का निवासी होकर कुवैत में ऑटो पार्ट्स का काम करता है। वह 15 सितंबर को रतलाम में था। उसी दिन उसके मोबाइल पर अज्ञात नंबर से कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को महाराष्ट्र के कोलाबा का पुलिस इंस्पेक्टर बताते हुए पीड़ित से उसके मोबाइल नंबर, व्यवसाय और भारत में रहने से जुड़ी जानकारी पूछी। इसके बाद ठगों ने एक अन्य मोबाइल नंबर का हवाला देते हुए कहा कि वह नंबर पीड़ित के नाम पर जारी हुआ है और उससे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के एक एजेंट से संपर्क किया गया है। इस दावे के बाद पीड़ित को गंभीर आपराधिक मामले में फंसाने का भय दिखाया गया।
कुछ ही समय बाद अलग-अलग मोबाइल नंबरों से फोन और व्हाट्सएप वीडियो कॉल आने लगे। कॉल करने वाले कभी खुद को वरिष्ठ पुलिस अधिकारी तो कभी एटीएस अधिकारी बताते रहे। इसी दौरान पीड़ित से आधार कार्ड, पैन कार्ड और अन्य व्यक्तिगत जानकारी भी हासिल कर ली गई।
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वर्दी, हथियार और फर्जी सुप्रीम कोर्ट के दस्तावेजों का सहारा
साइबर ठगों ने डर का माहौल बनाने के लिए वीडियो कॉल पर पुलिस की वर्दी पहने व्यक्तियों को दिखाया। खुद को एटीएस अधिकारी बताते हुए उन्होंने हथियारों से जुड़े फोटो और दस्तावेज भेजे तथा उनमें दिखाई देने वाले लोगों की पहचान करने के लिए कहा। इसके बाद पीड़ित को सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के लेटरहेड जैसे दिखने वाले फर्जी दस्तावेज भी भेजे गए। इन दस्तावेजों के जरिए उसे विश्वास दिलाने की कोशिश की गई कि उसके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामला दर्ज है और अब उसके बैंक खातों में जमा रकम का सत्यापन किया जाना जरूरी है।
यहीं से ठगी का अगला चरण शुरू हुआ। ठगों ने बैंक खाते में मौजूद रकम के ‘वेरिफिकेशन’ के नाम पर अलग-अलग खातों में रुपए ट्रांसफर करने के निर्देश दिए।
35 लाख पहले, 20 लाख बाद में- दो दिन में 55 लाख साफ
लगातार फोन, वीडियो कॉल और कार्रवाई का डर दिखाए जाने के बीच पीड़ित ठगों के जाल में फंस गया। उसने 17 सितंबर को 35 लाख रुपए और 18 सितंबर को 20 लाख रुपए, यानी कुल 55 लाख रुपए, RTGS के जरिए ठगों द्वारा बताए गए अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर कर दिए। ठगों ने पीड़ित को भरोसा दिलाया कि बैंक खातों में रकम का सत्यापन पूरा होने के बाद पूरी राशि वापस कर दी जाएगी। लेकिन ठगी यहीं नहीं रुकने वाली थी।
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पत्नी को फोन नहीं लगा तो खुलने लगा पूरा राज
पीड़ित के परिवार ने जब उससे संपर्क करने की कोशिश की और फोन पर बात नहीं हो सकी तो उसकी पत्नी ने रतलाम में मौजूद रिश्तेदारों से संपर्क किया। बाद में जब परिजनों की पीड़ित से बात हुई तो वह बेहद घबराया हुआ था और ठगों के निर्देश पर 20 लाख रुपए और ट्रांसफर करने की तैयारी में था। परिजन ने तत्काल रतलाम साइबर सेल से संपर्क किया। साइबर सेल के प्रधान आरक्षक लक्ष्मीनारायण सूर्यवंशी और परिजन ने पीड़ित को समझाया कि वह किसी वास्तविक पुलिस कार्रवाई में नहीं, बल्कि साइबर ठगों के बनाए गए ‘डिजिटल अरेस्ट’ के जाल में फंसा है। समझाइश के बाद 20 लाख रुपए का अगला ट्रांसफर रोक दिया गया। इसके बाद साइबर सेल और माणकचौक पुलिस ने पीड़ित की काउंसलिंग कर उसे पूरे मामले की वास्तविकता समझाई।
पुलिस ने बैंकिंग चैनल में तत्काल कार्रवाई कराई, 15 लाख रुपए फ्रीज
मामले की सूचना मिलते ही पुलिस ने ठगी की रकम को रोकने के लिए बैंकिंग चैनल में तत्काल कार्रवाई शुरू की। एसपी अमित कुमार के निर्देश तथा एएसपी विवेक कुमार एवं राकेश पंद्रो के मार्गदर्शन में साइबर सेल और माणकचौक पुलिस की टीम सक्रिय हुई। माणकचौक थाना प्रभारी निरीक्षक विक्रमसिंह चौहान, साइबर सेल प्रभारी उप निरीक्षक जीवन बारिया और टीम ने तकनीकी जांच करते हुए NCRP पोर्टल के माध्यम से संबंधित बैंकिंग चैनल में कार्रवाई की। पुलिस के अनुसार 15 लाख रुपए फ्रीज करवाने में सफलता मिली है। मामले में E-FIR दर्ज कर ली गई है। पुलिस अब ठगी में इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबरों, बैंक खातों और अन्य तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों की पहचान और गिरफ्तारी के साथ शेष राशि की रिकवरी के प्रयास कर रही है।
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पुलिस की अपील - फोन पर कोई ‘डिजिटल अरेस्ट’ नहीं होता
रतलाम पुलिस ने लोगों को आगाह किया है कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ कानूनन कोई वास्तविक प्रक्रिया नहीं है। पुलिस, CBI, ED, NCB, TRAI, ATS या सुप्रीम कोर्ट के नाम पर फोन अथवा वीडियो कॉल करके किसी व्यक्ति को इस तरह हिरासत में नहीं लिया जा सकता। यदि कोई फोन या वीडियो कॉल पर खुद को पुलिस या किसी जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर गिरफ्तारी, FIR, मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग्स, सिम कार्ड अथवा किसी अन्य आपराधिक मामले का भय दिखाए और रुपए ट्रांसफर करने के लिए कहे तो तत्काल सतर्क हो जाएं। घबराकर किसी खाते में रकम ट्रांसफर न करें। ऐसी स्थिति में तुरंत साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत करें या नजदीकी पुलिस थाने अथवा साइबर हेल्प डेस्क से संपर्क करें।
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