दैनिक भास्कर के MD सुधीर अग्रवाल सहित दो के विरुद्ध FIR दर्ज, 5 वर्षीय बच्ची के यौन उत्पीड़न से जुड़ा है मामला

दैनिक भास्कर के एमडी सुधीर अग्रवाल और एक क्राइम रिपोर्टर के खिलाफ 5 वर्षीय पीड़िता की पहचान उजागर करने के आरोप में भोपाल में एफआईआर दर्ज हुई है। मामला पॉक्सो एक्ट, बीएनएस और जेजे एक्ट की धाराओं से जुड़ा है।

दैनिक भास्कर के MD सुधीर अग्रवाल सहित दो के विरुद्ध FIR दर्ज, 5 वर्षीय बच्ची के यौन उत्पीड़न से जुड़ा है मामला
दैनिक भास्कर के एमडी सुधीर अग्रवाल के खिलाफ केस दर्ज।

पीड़िता की पहचान उजागर करने के आरोप में पॉक्सो व जेजे एक्ट और बीएनएस के तहत दर्ज हुआ केस

एसीएन टाइम्स @ भोपाल / जयपुर । देश के प्रमुख मीडिया समूहों में शामिल दैनिक भास्कर के प्रबंध निदेशक (MD) सुधीर अग्रवाल और भोपाल संस्करण के एक क्राइम रिपोर्टर के खिलाफ बाल संरक्षण कानूनों के उल्लंघन का मामला दर्ज किया गया है। आरोप है कि 5 वर्षीय यौन उत्पीड़न पीड़िता से संबंधित समाचार प्रकाशित करते समय ऐसी जानकारियां सार्वजनिक की गईं, जिनसे बच्ची की पहचान उजागर होने की संभावना बन गई। पुलिस ने पॉक्सो एक्ट, भारतीय न्याय संहिता (BNS) और जुवेनाइल जस्टिस (JJ) एक्ट से संबंधित धाराओं में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

जानकारी के अनुसार 7 मई 2026 को दैनिक भास्कर के भोपाल संस्करण में एक समाचार प्रकाशित हुआ था। इसमें पांच वर्षीय बच्ची के साथ कथित यौन उत्पीड़न की घटना का उल्लेख किया गया था। शिकायत में कहा गया है कि खबर में ऐसी सूचनाएं शामिल थीं, जिनके आधार पर किसी की भी पीड़िता और उसके परिवार की पहचान तक पहुंच संभव हो गई थी। बाल यौन अपराधों से जुड़े मामलों में भारतीय कानून में पीड़ित की पहचान को पूरी तरह गोपनीय रखने का स्पष्ट निर्देश है। जयपुर की अधिवक्ता रितिका पारीक ने जयपुर में दैनिक भास्कर के एमडी सहित अन्य के विरुद्ध शिकायत की थी।

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अखबार प्रबंधन पर ये हैं आरोप

शिकायतकर्ता का आरोप है कि प्रकाशित समाचार में बच्ची के निवास क्षेत्र का उल्लेख किया गया था। इसके अलावा पड़ोस में रहने वाले एक वकील का नाम भी प्रकाशित कर दिया गया। खबर में पीड़िता के पिता के कार्यस्थल की जानकारी भी दी गई। इतना ही नहीं यह भी बताया गया कि बच्ची किस स्कूल में पढ़ती है। अधिवक्ता पारीक का आरोप है कि समाचार अखबार के साथ ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी प्रकाशित किया गया। इन सभी सूचनाओं को एक साथ देखने पर पीड़िता की पहचान तक पहुंचना आसान था। पारीक के अनुसार यह सामान्य पत्रकारिता की त्रुटि नहीं, गंभीर लापरवाही है, इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

लंबे इंतजार के बाद हुई कार्रवाई

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार एडवोकेट रितिका पारीक ने जयपुर के बजाज नगर थाने में आवेदन दिया था, लेकिन तत्काल कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने पुलिस विभाग के उच्चाधिकारियों (डीसीपी, पुलिस कमिश्नर और डीजीपी आदि) तक शिकायत पहुंचाई। इसके पश्चात जीरो में एफआईआर दर्ज की गई। समाचार और घटना का संबंध भोपाल से होने से जयपुर पुलिस ने प्रकरण मध्यप्रदेश पुलिस को भेजा।  

मामला भोपाल के एमपी नगर थाने पहुंचा। मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 72(1), पॉक्सो एक्ट की धारा 23(2) और जुवेनाइल जस्टिस (JJ) एक्ट की धारा 74 में प्रकरण दर्ज किया गया है। पुलिस मामले की जांच कर रही है। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि समाचार के प्रकाशन में किन-किन व्यक्तियों की भूमिका रही और क्या वास्तव में कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन हुआ है।

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एक्ट और लगाई गई धाराओं में सजा के प्रावधान

POCSO (Protection of Children from Sexual Offences Act), 2012 : बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाया गया विशेष कानून है। यह 18 वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों पर लागू होता है। इस कानून की प्रमुख विशेषताओं में यह शामिल है कि यह लड़कों और लड़कियों दोनों पर समान रूप से लागू होता है। 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे की सहमति को कानूनी मान्यता नहीं दी जाती। साथ ही पीड़ित की पहचान सार्वजनिक करना अपराध माना जाता है। इसमें सख्त सजा का प्रावधान है।

प्रबंधन के विरुद्ध पॉक्सो एक्ट की धारा 23 (2) लगाई गई है। यह धारा मीडिया संस्थानों और प्रकाशनों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश तय करती है कि किसी बाल यौन अपराध पीड़ित की पहचान से जुड़ी कोई भी जानकारी प्रकाशित नहीं की जा सकती।

जुवेनाइल जस्टिस (JJ) एक्ट यानी Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015 : बच्चों की देखरेख, संरक्षण, पुनर्वास और उनके अधिकारों की सुरक्षा के लिए बनाया गया कानून है। यह कानून बच्चों की पहचान और निजता की रक्षा को विशेष महत्व देता है। धारा 74 के तहत किसी भी बच्चे की पहचान, फोटो, पता, स्कूल या ऐसी जानकारी प्रकाशित करना प्रतिबंधित है, जिससे उसकी पहचान उजागर हो सके। उल्लंघन करने पर कानूनी कार्रवाई और दंड का प्रावधान है।

प्रकरण में जुवेनाइल जस्टिस (JJ) एक्ट की धारा 74 भी शामिल है। यह धारा बच्चों की पहचान सार्वजनिक किए जाने पर रोक लगाती है।

भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 : भारत का नया आपराधिक कानून है, जिसने भारतीय दंड संहिता (IPC) का स्थान लिया है। यह कानून अपराधों और उनके दंड से संबंधित प्रावधानों को परिभाषित करता है।

प्रकरण में BNS की धारा 72(1) लगाई गई है। यह धारा पीड़ित की पहचान उजागर करने से संबंधित है। विशेष रूप से यौन अपराधों के मामलों में किसी पीड़ित का नाम, पता, फोटो या ऐसी कोई जानकारी प्रकाशित करना, जिससे उसकी पहचान हो सके, दंडनीय अपराध है। इसके उल्लंघन पर कारावास, जुर्माना या दोनों की सजा का प्रावधान है। 

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सुप्रीम कोर्ट भी दे चुका स्पष्ट निर्देश

बाल यौन अपराधों से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट समय-समय पर पीड़ितों की गोपनीयता बनाए रखने पर जोर देता रहा है। न्यायालय ने अपने विभिन्न फैसलों में कहा है कि पीड़ित की पहचान, सम्मान और निजता की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी माध्यम प्रिंट, डिजिटल या सोशल मीडिया में ऐसी जानकारी प्रकाशित करना, जिससे पीड़ित की पहचान का अनुमान लगाया जा सके, गंभीर कानूनी परिणामों को जन्म दे सकता है।

ACP भारद्वाज के तबादले को लेकर भी चर्चाएं

मामले के बीच भोपाल के एमपी नगर क्षेत्र के तत्कालीन असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर मनीष भारद्वाज के अचानक हुए तबादले को लेकर भी चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। उन्हें पुलिस मुख्यालय में पदस्थ किया गया है। हालांकि इस तबादले को एफआईआर से जोड़ने वाली कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। अभी केवल अटकलें और चर्चाएं ही चल रही हैं।

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